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अर्नब को लेकर वही ‘उद्वेलित’ जो रिया की गिरफ्तारी को ‘जस्टीफाई’ कर रहे थे


अर्नब की गिरफ्तारी के कुछ माह पूर्व रिया चक्रवर्ती की गिरफ्तारी हो चुकी है. दोनों मामले कई दृष्टियों से मिलते – जुलते हैं और भारतीय समाज में व्यापक बहस का मुद्दा बने हैं. दोनों ख्यातिप्राप्त लोग हैं. एक मिडिया की दुनिया का चमकता सितारा तो दूसरा फिल्मी दुनिया का सितारा. सापेक्षिक दृष्टि से अर्नब ज्यादा चमकते सितारे हैं. दोनों की गिरफ्तारी आत्महत्या में प्रेरक भूमिका निभाने के नाम पर हुई.
यहां इस बात की चर्चा इसलिए कि अपने देश में इस तरह की घटनाएं रोजमर्रा की बातें हैं. विधि सम्मत शासन छींजता जा रहा है. सामान्य लोग पुलिस उत्पीड़न के शिकार होते ही रहते हैं. सत्ता अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करती ही रहती है, अपने खिलाफ उठी आवाज को दबाने के लिए. भीमा कोरेगांव को बहाना बना करीबन दो दर्जन बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता जेल में बंद हैं. समाज का प्रभु वर्ग या बड़ा हिस्सा इन बातों से बेपरवाह है.
लेकिन रिया चक्रवर्ती या अर्नब गोस्वामी जैसे ख्यातिप्राप्त लोग, जो इस व्यवस्था के सम्मानित हिस्सा और गणमान्य नागरिक हैं, कभी कभार राजनीति के शिकार हो या सत्ता पक्ष के भीतर की गुटबाजी के शिकार हो कर पुलिसिया उत्पीड़न के शिकार होते हैं, तो कुछ ज्यादा ही हंगामा होता है. उसमें कुछ ज्यादा ही लोग रस लेने लगते हैं. सामान्य लोग, जो अपने प्रति सत्ता के व्यवहार के प्रति उदासीन ही रहते हैं, वे किसी समर्थ व्यक्ति के उत्पीड़न से ज्यादा विगलित होने लगते हैं. यह भारतीय समाज का एक बड़ा सच है.
तो, अर्नब की गिरफ्तारी को लेकर लोग परेशान हैं. उनके पक्ष विपक्ष में लोग गोलबंद हो रहे हैं. चूंकि अर्नब मीडिया से जुड़े व्यक्ति हैं, इसलिए मीडियाकर्मी कुछ ज्यादा ही उद्वेलित हैं. और चूंकि अर्नब भाजपा और संघ परिवार के चहेते थे, जिनका देश की केंद्रीय सत्ता पर कब्जा है, इसलिए सत्ता पक्ष के लोग भी. अमित शाह को समान्यतः देश में नये किस्म का फासीवाद लाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है, उन्हें भी एकबारगी ‘लोकतंत्र’ की याद आ गयी और अर्नब का मामला ‘अभिव्यक्ति की आजादी पर’ हमला नजर आने लगा.
हम इसे त्रासदी ही मानते हैं कि हमारा देश एक विभाजित मानसिकता वाला देश बन चुका है. किसी भी मुद्दे पर तटस्थ और शुद्ध वैचारिक दृष्टि से मीमांसा करने में असमर्थ है. हर मुद्दे का राजनीतीकरण हो जाता है. उससे उबर कर हम किसी भी विषय पर विचार विमर्श कर ही नहीं सकते. एक ठोस उदाहरण लीजिये. जो लोग रिया चक्रवर्ती की गिरफ्तारी और उनके जेल जाने से खुश थे, उनमें से अधिकतर अर्नब वाले मामले में आहत महसूस कर रहे हैं. जो लोग- पत्रकार, बुद्धिजीवी और राजनेता- रिया चक्रवर्ती के खिलाफ कार्रवाई को उचित ठहरा रहे थे, वे अर्नब की गिरफ्तारी से उद्वेलित हैं. क्यों?
0 रिया चक्रवर्ती के खिलाफ सुशांत सिंह ने कोई सुसाईड नोट नहीं छोड़ा था. अर्नब के खिलाफ सुसाईड नोट है और उसमें उनका नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है. बिना किसी पुख्ता आधार के रिया को गिरफ्तार किया गया. जेल में एक महीने बंद रखा गया. अर्नब को अभी सिर्फ न्यायिक हिरासत में रखा गया है. कोर्ट में पेशी होगी और कोर्ट को जमानत देने योग्य मामला लगेगा, तो उन्हें जमानत मिल भी जायेगा.
0 यह अजीब विडंबना है कि बिना किसी पुख्ता आधार के अर्नब अपने चैनल पर रिया का मीडिया ट्रायल करते रहे. उनकी गिरफ्तारी को जस्टीफाई करते रहे. रिया को पहले सुशांत के पैसे का गबन का आरोपी बनाया, फिर हत्या की साजिश में शामिल और कुछ भी प्रमाणित नहीं हुआ तो गंजेड़ी साबित करने की कोशिश हुई. अब वही अर्नब और मीडिया में उनके समर्थक उनके साथ हुए पुलिसिया व्यवहार पर बिसुर रहे हैं.
0 क्या यह मामला किसी भी कोण से अभिव्यक्ति की आजादी का मसला नजर आता है? किस सच का उद्घाटन अर्नब कर रहे थे जिसे दबाने के लिए यह कार्रवाई हुई? वे तो वर्तमान केंद्रीय सत्ता के सबसे अधिक दुलारु पत्रकार हैं. टीवी एंकरों में सबसे अधिक मुखर और चीखने चिल्लाने वाले. अधिक से अधिक यह आरोप लगाया जा सकता है कि वे सत्ता की अंदरुनी उठा पटक के शिकार हुए. लेकिन सत्ता के भीतर की गुटबाजी के बीच उन्होंने स्वयं कभी भी तटस्थ भूमिका निभाने का प्रयास कब किया? वे तो एक पक्ष के प्रतिनिधि बन कर एंकरिंग करते नजर आते थे.
0 क्या मीडियाकर्मी को भारतीय संविधान में किसी तरह का विशेषाधिकार प्राप्त है? उन पर ठगी या अन्य आपराधिक मामले दर्ज नहीं हो सकते? हकीकत तो यह है कि पत्रकारिता आज की तारीख में तलवार की धार पर चलने के समान है. सच बोलने के लिए सत्ता और माफिया तंत्र पत्रकारों का उत्पीड़न करता है और उसकी हत्या तक कर दी जाती है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अर्नब की गिरफ्तारी ऐसे मामले में हुई है जिससे पत्रकारिता की गरिमा नहीं बढ़ती है.
0 इस बात के लिए जरूर अफसोस व्यक्त किया जा सकता है कि महाराष्ट्र पुलिस की कार्रवाई बदले की कार्रवाई जैसी नजर आती है. एक मुकदमा दो वर्ष पहले उनके खिलाफ दायर हुआ. जाहिर है राजनीतिक प्रभाव से उसे बंद कर दिया गया. अब वही मुकदमा फिर से खोल कर उनके खिलाफ कार्रवई की गयी है. इससे अर्नब निर्दोष साबित नहीं हो जाते. इतना ही कहा जा सकता है कि हमारे देश में विधि सम्मत शासन नहीं चल रहा. लेकिन इस ‘सिस्टम’ को बनाने में अर्नब जैसे लोगों की ही जिम्मेदारी बनती है. उन्होंने कब इस बात के लिए संघर्ष किया कि देश में विधि सम्मत शासन हो और सत्ता पुलिसिया ताकत का गलत इस्तेमाल न कर सके.
वैसे, रिया तो रुपये के गबन या सुशांत की आत्महत्या-हत्या वाले मामले में एक तरह से दोषमुक्त हो चुकी हैं, अर्नब अभी इसी तरह के मामले में दोषमुक्त करार नहीं हुए हैं और उन्हें इस अग्नि परीक्षा से गुजरना है.

हंटर के हवाले संतालों की संस्कृति और इतिहास


विनोद कुमार

भारत में रहने वाली विशाल आबादी को मोटे तौर पर दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है- आर्य और अनार्य, गैर आदिवासी और आदिवासी. दोनों में फर्क यह है कि गैर आदिवासी समुदाय का मुख्य हिस्सा आर्य भाषा परिवार का सदस्य है, जबकि आदिवासी समुदाय में विभिन्न भाषा परिवार के सदस्य हैं. भारत के किसी भी हिस्से के जंगलों में, पर्वतीय अंचलों में चले जाईये, अपनी नीरवता में जीते किसी न किसी आदिवासी समुदाय के लोग आपको मिल जायेंगे. कम से कम 200 किस्म की भाषायें ये बोलते हैं. इनके रूप रंग में भी भिन्नता है. कुछ मलय मूल से मिलते जुलते हैं. कुछ चाईनीज मूल के लोगों से मिलते जुलते हैं. इनके बारे में आज हमारे पास पहले से ज्यादा जानकारी है, लेकिन आज भी वे एक धुंध में लिपटे नजर आते है. हंटर ने अपनी पुस्तक ‘एनल्स आफ रूरल बंगाल’ मे इसी जनजातीय समुदाय के एक प्रमुख सदस्य -संतालों को अपनी लेखनी का विषय बनाया है. चंूकि अतिक्रमणकारी आर्यों के दासत्व को, उनकी भाषा-संस्कृति को आदिवासियों ने कभी स्वीकार नहीं किया, अपने अस्तित्व के लिए लगातार उनसे संघर्ष करते रहे, इसलिए आर्यों ने उन्हें अपने वेद पुराणों में असुर, दासायन, दस्यु, राक्षस आदि के रूप में चित्रित किया और यह प्रचारित किया कि उनकी भाषा अपूर्ण है, वे मांस भक्षी हैं. उनका कोई ईश्वर नहीं. कोई संस्कृति और आचार विचार नहीं. लेकिन यह भ्रामक धारणा है. उनकी अपनी संस्कृति है, जीवन जगत के बारे में अपनी धारणासें है. एक समृद्ध संस्कृति है और हर तरह के भावबोध को अभिव्यक्त करने वाली एक सशक्त भाषा भी है. आश्चर्य तो यह देख कर होता है कि कोई लिपि या लिखित इतिहास नहीं होने के बावजूद उनकी भाषा और संस्कृति आज तक जीवित कैसे है?

संतालों के बारे में चर्चा करने के पहले हम यह जान लें कि संताल जनजातीय समुदाय की सबसे बड़ी प्रजाती है. हंटर की पुस्तक 1868 में प्रकाशित हुई थी जब संपूर्ण बिहार और ओड़िसा बंगाल में ही शामिल था. उनका मूल ठिकाना तबके लोअर बंगाल का संपूर्ण पश्चिमी क्षेत्र है. वे समुद्र से कुछ किमी की दूरी से लेकर वतर्मान भागलपुर जिला तक बसे हुए हैं, जो वीरभूम के रूप में चिन्हित किया जाता है. यह भौगोलिक क्षेत्र अर्द्ध चक्करदार सीढियों के आकार का है जो मोटे रूप में एक सौ माईल चैड़े और चार सौ माइल लंबे क्षेत्र में फैला हुआ है. लोअर बंगाल के पश्चिम के संपूर्ण जंगलों में ये फैले हुए हैं.

मानव जीवन की उत्पत्ति के संबंध में एक सामान्य वैज्ञानिक सोच यह है कि सूरज से टूट कर पृथ्वी बनी जो प्रारंभ में आग का धधकता हुआ पिण्ड था. हजारों वर्षों में यह ठंढा हुआ और तीन भाग समुद्र और एक भाग स्थल में तब्दील हो गया. पहले जलचर जीव पैदा हुए,फिर ऐसे जीव जो जल और स्थल दोनों पर विचरण कर सकते थे. फिर विकास के क्रम में स्थल पर चलने वाले जीव जंतु जिनसे विकास के क्रम में आदि मानव की उत्पत्ति हुई. लेकिन विभिन्न मानव समुदाय के धार्मिक ग्रंथों में ईश्वरेच्छा से मनुष्य और जीव जगत की सृष्टि हुई. ईसाई धर्म ग्रंथों के अनुसार प्रभु इच्छा से सिर्फ सात दिनों में पूरे कायनात की सृष्टि हुई. सभी धार्मिक ग्रंथों में एक जल प्लावन की भी चर्चा है. हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार एक समय सर्वत्र जल ही जल था. आदि मानव एक नाव पर सवार हुआ. नाव पर बीज आदि रखे और नाव बहते बहते हिमालय की चट्टानों के पास आकर टिक गया. आदि मानवों के संसर्ग से सप्त ऋषि पैदा हुए जिन्हों ने मानव सभ्यता को विकसित किया. मनुष्य जीवन की उत्पत्ति के संबंध में संतालों के बीच भी एक कथा प्रचलित है. सबसे पहले समुद्र की अतल गहराईयों से पहाड़ पैदा हुए. पहाड़ एकाकीपन से उब रहे थे. उन्होंने देखा, जल की सतह पर कुछ पक्षी दौड़ रहे हैं. उनके विश्राम के लिए उन्होंने उन्हें उठा कर कमल के पत्तों पर रख दिया. फिर कछुए और मछलियों को आदेश दिया कि वे समुद्र की तली से मिट्टी लाये. वे उन्हें ला कर पहाड़ के आस पास फैलाने लगे जिससे धरती बनी और फिर घास पैदा हुए. फिर बत्तखों के अंडे से आदि पुरुष और औरत की सृष्टि हुई. उनके युवा होने पर पहाड़ ने ही उन्हें वस्त्र दिये. फिर पहाड़ द्वारा दिये जड़ी बंूटी से उन्होंने नशीला पेय-हड़िया- बनाया. खुद पीने के पहले उन्होंने हड़िया पहाड़ पर भी चढाया. फिर उन्होंने सात बच्चों को जन्म दिया जिन्होंने संतालों के समुदाय को आगे बढाया. हंटर यहां बताना नहीं भूलते कि आर्यों के आदि पुरुष और स्त्री ने भी सात संतानों को ही जन्म दिया था. हां, वे सात ऋषि बने.

अपने वर्तमान निवास स्थल तक वे कैसे पहुंचे, किन रास्तों से पहुंचे, इसके बारे में भी उनके पूर्वज बताते रहे हैं. लेकिन जिन भौगोलिक क्षेत्रों का वे जिक्र करते हैं, उसकी शिनाख्त अब तक नहीं हो पायी है. लेकिन कुछ बातें विचारणीय हैं. विशाल पहाड़ उनकी स्मृतियों में भी है. लेकिन वे पश्चिमोत्तर नहीं हो सकता, क्योंकि उनके मौखिक गाथा में सप्त संधू या किसी भी बड़ी नदी की चर्चा नहीं आती. यानी, जिस रास्ते आर्य भारत में आये, उस रास्ते वे नहीं. उनके प्रस्थान के बिंदू से आज के निवास स्थल तक जिन स्थान विशेषों का नाम आता है उसमें से कुछ है हिहिड़ी -पिपिड़ी, चाई चंपा, शिकार, नागपुर आदि. इसमें हिहिड़ी पिपिड़ी को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है. इस तरह के शब्द न तो संस्कृत में मिलते हैं और न हिंदी, उर्दू या बंगला में. संताली में भी हिहिड़ी शब्द नहीं आता. पिपिड़ी शब्द आता है जिसका अर्थ तितली है. हिमालय की तराई में तितली बेशुमार मिलते हैं. चाई चंपा यानी चंपा एक मीठी सुगंध वाले फूलों का पेड़ है. ब्रह्मपुत्र के उपरी घाटी में ये पेड़ बहुलता से मिलते हैं. शिकार दामोदर नदी के उपर का इलाका है जो पुराने वीरभूम में ही पड़ता है.

हंटर ने संताली भाषा पर विस्तार से चर्चा की है और यह बताने की कोशिश की है कि इसका एक अपना व्याकरण है और यह अत्यंत शक्तिशाली भाषा है. संतालों की भाषा की बनावट संस्कृत से अलग है. इसकी प्रमुख खासियत है कि यहां एक मूल शब्द से कई शब्द बनते हैं, वह भी मूल में बगैर किसी परिवर्तन के. मसलन, हिंदी का बाघ और अंग्रेजी के टाईगर को संताली में कुल कहा जाता है. अब यदि बाघ दो हुए तो हिंदी में दो बाघ और अंग्रेजी में टाईगर-टू कहेंगे. लेकिन संताली में किन शब्द कुल में जोड़ कर कुलकिन यानी दो बाघ हो गया. अनेक बाघ की जगह ‘कुल’ में ‘को’ शब्द जोड़ कर ‘कुलको’ बना दिया गया. समय के लिए संस्कृत में काल शब्द का प्रयोंग होता है. संताली में समय के लिए कोई शब्द नहीं. लेकिन काल को जोड़ कर ही समय के अंतराल को बताने वाले कई शब्द बनते हैं. मसलन, काल-ओम, अगला वर्ष, दिन काल ओम, पिछला वर्ष, हाल-कालओम, दो वर्ष पूर्व आदि. इसी तरह मैन अंग्रेजी शब्द है लेकिन इससे संस्कृत और संताली के कई समान अर्थक शब्द बनते है. संस्कृत का मानवा, मनु, मन आदि. उसी तरह संताली का मन-ऐट, सोचना, मन-इ, आत्मा, मानिको, पहला आदमी, मनोई जोनोम, मानव जनम आदि. हंटर कहते हैं कि बहुत सारे शब्द का मूल रूप संस्कृत और संताली दोनों में हैं. लेकिन ये एक दूसरे से नहीं लिये गये हैं बल्कि किसी एक अन्य स्रोत से लिये गये प्रतीत होते हैं.

क्यों टूटी हरे और लाल झंडे की मैत्री ?

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सत्तर के दशक में शिबू सोरेन, कामरेड एके राय और बिनोद बिहारी महतो ने मिल कर जो सामाजिक—राजनीतिक शक्तियों का समीकरण बनाया उसने कोयलांचल में माफियागिरी और आदिवासी इलाकों में व्याप्त महाजनी शोषण के खिलाफ निर्णायक संघर्ष किया. वह दौर ‘लाल—हरे झंडे की मैत्री’ का दौर था. वह मैत्री क्यों टूटी, इसे लेकर बहुतों में गहरी जिज्ञासा है.

इसलिए अपनी जानकारी में जो बातें हैं उसे आपसे शेयर कर रहा हूं. यह सम्मान की राजनीति से बेहतर हम इस बात को जाने और समझें कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन और कामरेड एके राय के बीच का रिश्ता कैसा था? मुझे उन दोनों से लंबे साहचर्य का अवसर रहा, क्योंकि एक पत्रकार के रूप में जब मैं बोकारों में था तो 1985 के बाद से लगातार उनके संपर्क में रहा. 2003 में मैं रांची चला आया और प्रभातखबर में ही राजनीतिक डेस्क का प्रभारी रहा.

यह झारखंड के लिए महत्वपूर्ण कालखंड था. झारखंड अलग राज्य का आंदोलन, उसके समानांतर माओवाद का फैलाव और झारखंड अलग राज्य का गठन व शुरुआती दिन. 2005 में कामरेड महेंद्र सिंह की हत्या और उसी वर्ष होने वाले विधान सभा चुनाव के बाद मैंने सक्रिय पत्रकारिता से किनारा कर लिया. इस दौर की जानकारी और जीवनानुभव को ही मैंने अपने तीन उपन्यासों- ‘समर शेष है’, ‘मिशन झारखंड’ व ‘रेडजोन’ में व्यक्त किया है. वैसे, वाहिनी धारा के एक सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत से पत्रकारिता में आने के पहले आदिवासी क्षेत्र में काम करने का अनुभव भी मेरे काम आया.

तो, अब मैं मूल बात पर आता हूं. मैं यह जानता था कि झामुमो के गठन में कामरेड एके राय और बिनोद बिहारी महतो की बराबरी की भूमिका रही. कामरेड राय आदिवासियों को सबसे बड़ा सर्वहारा मानते थे और झारखंड को क्रांति की उपयुक्त भूमि, इसलिए उन्होंने झारखंड को लालखंड की संज्ञा और ‘लाल-हरे झंडे की मैत्री’ का नारा दिया था. इस मैत्री की ही वजह से झारखंडी जनता कोयलांचल में माफियागिरि और छोटानागपुर में महाजनी शोषण के खिलाफ मजबूती से संघर्ष कर सकी थी. फिर यह मैत्री टूटी क्यों? यह जिज्ञासा मुझे भी थी और बहुतों को है.

गुरुजी से मैंने कई अवसरों पर बात की. उन्होंने कभी भी इस बात पर बहुत बिस्तार से नहीं बताया. उनके मन में कुछ् मलाल तो था, पर वे बोलते नहीं थे. वे बस इतना ही कहते कि जो हो गया सो हो गया. अब यही सच है कि हम अलग हैं. एक बार बस उन्होंने सिर्फ इतना कहा था – ‘ कम्युनिस्टवन सब किसी का होता है हो.’ लेकिन उन्होंने कभी भी कामरेड एके राय के प्रति अवज्ञा नहीं दिखायी. कभी भी उनके खिलाफ एक शब्द नहीं कहा. एक बार राजीतिक संबंध खत्म हो जाने के बाद वे दोनों बहुत कम अवसरों पर मिले. लेकिन शिबू सोरेन ने उनका हमेशा समादर किया

दूसरी तरफ कामरेड एके राय ने तो गुरुजी को आदिवासियों का महानायक ही कहा है. उन्होंने अपनी पुस्तक झारखंड और लालखंड में लिखा है – ‘‘बागुन सुंब्रई, एनई होरो और शिबू सोरेन आदिवासी आंदोलन में तीन धाराओं के प्रतीक हैं. श्री सुंब्रई आदिवासी सामंतवाद के प्रतीक हैं जो कि झारखंड को पीछे ले जाने वाला है. श्री होरो आदिवासी पूंजीवाद के प्रतीक हैं जो ज्यादा से ज्यादा वर्तमान में सीमित है. शिबू सोरेन आदिवासी समाजवाद के प्रतीक हैं जिसमें सारे समाज का भविष्य नीहित है. श्री सोरेन भारत के उपर एक लाल सितारा बनने की संभावना रखते हैं और हरा झंडा लाल भारत का जन्मदाता होगा.’’
फिर ऐसा क्या हुआ जिसे बिनोद बिहारी महतो भी पाट नहीं सके?

दो अलग सामाजिक राजनीतिक पृष्ठभूमि

कामरेड एके राय और शिबू सोरेन दो बिल्कुल अलग सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि से आये थे. शिबू सोरेन गोला प्रखंड के नेमरा गांव के रहने वाले थे जहां उनके पिता सोबरन मांझी की महाजनों ने हत्या कर दी थी. सोबरन मांझी स्कूल शिक्षक थे, साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता. शराब और महाजनी शोषण के विरोध की वजह से उनकी हत्या महाजनों ने करवा दी थी. उस वक्त अपने भाई राजराम के साथ शिबू सोरेन गोला के आवासीय विद्यालय में पढ़ते थे. पिता की हत्या के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट गया. उनकी मां सोनामणि कुछ वर्ष तक अपने पति के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए कोर्ट के चक्कर लगाती रही जहां वे अक्सर शिबू सोरेन और उनके बड़े भाई राजाराम को लेकर जाते थीं. लेकिन आखिरकार निराश हो गयी और ठंढ़ी सांस लेकर सोचा कि अब तो उनके बेटे ही अपने पिता की हत्या का बदला बड़े होकर लेंगे. और यही हुआ. युवावस्था की दहलीज पर पहुंचते ही शिबू सोरेन और उनके साथियों ने महाजनों के कब्जे वाली जमीन पर खड़ी फसल को काटना शुरु कर दिया. वे यह सब किसी राजनीतिक दर्शन से प्रेरित हो कर नहीं कर रहे थे, सहज बुद्धि से कर रहे थे कि यह जल, जंगल, जमीन हम आदिवासियों का है. वे आदिवासियों के उस संघष परंपरा के बारिस बन गये जिसका नेतृत्व कभी सिदो कान्हू और बिरसा मुंडा ने किया था. बाद में वे झालदा में कुछ कम्युनिस्ट नेताओं के संपर्क में आये जहां वे लकड़ी बेचने जाया करते थे. फिर चितरपुर में भी कम्युनिस्ट नेता मंजूर हसन के संपर्क में आये. वैज्ञानिक समाजवाद का पाठ पढ़ा, लेकिन कितना समझा, यह कहना मुश्किल. बस उन्हें अपने संघर्ष का नैतिक आधार मिल गया. उनके जीवन की व्यक्तिगत त्रासदी एक सामाजिक त्रासदी के खिलाफ युद्ध में बदल गया. उन्हीं दिनों बोकारो कारखाना के भूमि अधिग्रहण का काम भी शुरु हुआ था और वे बोकारो के विस्थापित आंदोलन में भी भाग लेने लगे. वह एक लंबी कहानी है, लेकिन इसी क्रम में एक दिन उनकी मुलाकात चास कोर्ट में बिनोद बिहारी महतो से हुई जो धनबाद के कम्युनिस्ट नेता थे और साथ ही विस्थापितों का मुकदमा लड़ा करते थे. और विनोद बिहारी महतो उन्हें अपने साथ धनबाद ले गये. धनकटनी आंदोलन के नेता के रूप में शिबू सोरेन की ख्याति उस वक्त तक दूर दूर तक फैल चुकी थी.

एके राय ने कोलकाता विश्वविद्यालय से एम टेक किया था और कुछ दिन कोलकाता के ही किसी कारखाना में नौकरी करने के बाद सिंदरी कारखाना में बहाल हो गये थे. यहां उनकी नियुक्ति प्लानिंग एंड डेवेलपमेंट विभाग में रिसर्च इंजीनियर की थी. यहां नौकरी शुरू करने के बाद कुछ अन्य रिसर्च इंजीनियरों और विभाग के सहयोगियों के साथ मिल कर ‘साथी’ नाम की संस्था बनायी और साप्ताहिक अवकाश के दिनों में आस पास के गांवों में परिभ्रमण के लिये जाने लगे. वहां साक्षरता का काम करते थे. शुरूआती दिनों में वामपंथी विचारधारा का होने के बावजूद उनका किसी राजनीतिक दल से संपर्क नहीं था. यहां तक कि कुछ कम्युनिस्ट साथियों ने मिल कर जब सिंदरी में जनवादी श्रमिक संगठन का गठन किया तो ये उससे अलग रहे. लेकिन श्रमिक आंदोलन और राजनीति में उनकी भूमिका बढ़ती गयी. कांग्रेसी शासन में बढ़ती मंहगाई और बेरोजगारी के विरोध में 9 अगस्त 1966 को समाजवादियों और कम्युनिस्टों ने मिल कर बिहार बंद का आह्वान किया था. राय और उनके साथियों ने इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. उस बार वे बीस अन्य साथियों के साथ पहली बार गिरफ्तार हुये. अन्य लोग तो जेल से निकल गये, लेकिन वे और उनके साथ गिरफ्तार मनोरंजन प्रसाद तीन चार महीने जेल में रह गये. लेकिन दूसरी बार एक हड़ताल के दौरान गिरफ्तार होने के बाद सिंदरी कारखाना की उनकी नौकरी जाती रही. जब वे जेल में बंद थे तभी विनोद बिहारी महतो उनसे मिलने जेल में गये और उनके ही जोड़ देने पर राय सक्रिय राजनीति में आये और 67 में हुये विधानसभा चुनाव में सिंदरी से चुनाव लड़ कर विधायक बन गये. बिनोद बाबू भाकपा में तो थे ही और भाकपा टूट कर जब माकपा बनी तो विनोद बिहारी महतो और राय माकपा में शामिल हो गये. लेकिन आदिवासी और झारखंड संबंधी अपनी अवधरणाओं की वजह से उन्हें और विनोद बिहारी महतो को बाद में माकपा से निकाल दिया गया. उस वक्त तक कोई भी कम्युनिस्ट पार्टी अलग राज्य की मांग का समर्थन नहीं करती थी और राय अलग राज्य की मांग का समर्थन करते थे.

शिबू सोरेन से एके राय की मुलाकात 67 में उनके विधायक बनने के बाद हुई थी. जयपाल सिंह और तत्कालीन अन्य झारखंडी नेताओं के कांग्रेस से बढ़ती नजदीकी को देख कर वे प्रारंभ में शिबू सोरेन के प्रति भी आशंकित हुये, लेकिन टुंडी में उनके काम काज से प्रभावित हो कर उन्होंने ही शिबू सोरेन को आदिवासियों का महानायक करार दिया.

झामुमो के गठन के वक्त उभरा द्वंद्व

राजनीतिक दलों के नाम के साथ सामान्यतः ‘दल’ या ‘पार्टी’ शब्द जुड़ा रहता है. भारतीय जनता पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया, माले, जनता दल आदि आदि. लेकिन झामुमो एक राजीतिक दल तो है, उसके साथ पार्टी शब्द नहीं जुड़ा है. वह मोर्चा है. आपने कभी समझने की कोशिश की कि ऐसा क्यों है? दरअसल, यही वह पेंच है जिसमें शिबू सोरेन और कामरेड एके राय के बीच की दूरी का रहस्य छिपा है. आईये, उसे खोलते हैं.
शिबू सोरेन, विनोद बिहारी महतो से पहली बार जब मिले थे, तभी इस बात पर संक्षिप्त चर्चा हुई थी कि आदिवासी सुधार समिति और शिवाजी समाज को मिला कर एक नया संगठन बनाया जाये, लेकिन इस योजना को मुकम्मल रूप 73 तक नहीं दिया जा सका, हालांकि उनकी मुलाकात 68 में ही हो चुकी थी. एक तो शिबू सोरेन टुंडी में लग गये और यहां घटनाक्रम इतनी तेज गति से चला कि और सब बातें पीछे चली गयी. शिबू का टुंडी से निकलना बहुत कम हो गया था और टुंडी में हो रही बहुत सी बातों का पता विनोद बाबू और एके राय को तब होती, जब वह घटना लोकल अखबारों में छपती. विनोद बाबू और राय भी वहां नियमित नहीं जा पाते, लेकिन जब जाते वहां चल रही गतिविधियों से प्रभावित होते. कामरेड राय के मन में भी शिबू सोरेन के प्रति आस्था बनने लगी थी. लेकिन जब एक नया संगठन बनाने की बात शुरू हुई तो कुछ मतभेद फिर उभर आये.

गौरतलब यह है कि 1967 में पहली बार विधायक बनने के बाद से लगातार एके राय सिंदरी से विधानसभा का चुनाव तो जीत रहे थे, लेकिन विनोद बाबू झरिया से चुनाव नहीं जीत पा रहे थे. उन्हें लगता था कि एक क्षेत्रीय पार्टी जिसे आदिवासी और सदान अपना समझ सके, बनाने का वक्त आ गया है. उस वक्त तक जयपाल सिंह की झारखंड पार्टी कांग्रेस में विलय के बाद अपना वजूद खो चुकी थी. हालांकि अखिल भारतीय झारखंड पार्टी के रूप में बाघुन सुम्बरई और एनई होरो उसे जीवित रखने का प्रयास कर रहे थे. वे अलग झारखंड राज्य के गठन की मांग कर रहे थे. 1967 में मोजेस गुड़िया के नेतृत्व में बिरसा सेवा दल का गठन किया गया था. लेकिन सेवा दल झारखंड में चुनाव का वहिष्कार करती थी. 1969 में जस्टिस रिचर्ड के नेतृत्व में संथाल परगना में हूल झारखंड पार्टी गठित की गयी. लेकिन ये सभी पार्टियां झारखंड आंदोलन को दिशा देने में कामयाब नहीं हो सकी. इनकी एक सीमा यह थी कि ये सभी आदिवासियों को केंद्र में रख कर झारखंड की राजनीति को देख रही थीं.

विनोद बाबू इस तथ्य को समझ रहे थे कि जब तक आदिवासी और सदान इकट्ठे नहीं होंगे, तब तक राष्ट्रीय पार्टियों का मुकाबला नहीं किया जा सकता. लेकिन अड़चन यह थी कि उस वक्त तक राजनीतिक रूप से परिपक्व नहीं होने के बावजूद शिबू तो उनके विचारों से सहमत थे, लेकिन कामरेड एके राय एक नया संगठन तो चाहते थे, लेकिन नई राजनीतिक पार्टी नहीं. वे इस बात पर जोर दे रहे थे कि राजनीतिक दल और मूल पार्टी के रूप में उनकी पार्टी मार्क्सवादी समन्वय समिति ही बनी रहे और नई पार्टी उसके जन संगठन के रूप में काम करे. इसके अलावा वे अलग झारखंड राज्य के तो पक्ष में थे, लेकिन उनका सपना शोषण मुक्त अलग झारखंड राज्य का था. इसलिये जब फरवरी माह में धनबाद के गोल्फ मैदान में एक जनसभा करके नई पार्टी को लांच करने की योजना बनी तो उसके पहले टुंडी और धनबाद में कई बैठकें हुई और झारखंड मुक्ति पार्टी की जगह झारखंड मुक्ति मोर्चा नये संगठन का नाम रखा गया. कामरेड राय और विनोद बिहारी महतो दोनों चाहते थे कि पार्टी का अध्यक्ष शिबू सोरेन को ही बनाया जाये, लेकिन शिबू इसके लिये सहमत नहीं हुये. उनका कहना था कि विनोद बिहारी महतो के रहते वे अध्यक्ष कैसे रह सकते हैं. और तय हुआ कि बिनोद बिहारी महतो नये संगठन के अध्यक्ष और शिबू सोरेन महासचिव बनेंगे.

गोल्फ मैदान में उस ऐतिहासिक सभा के पहले विनोद बाबू, शिबू सोरेन, शक्ति महतो एवं कुछ अन्य साथियों की टीम ने पूरे झारखंड क्षेत्र का दौरा किया. कुछ लोग पश्चिम बंगाल, ओड़िसा और मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों में भी गये. सभी जगहों से सहयोग और समर्थन का आश्वासन मिला. विनोद बिहारी महतो की सक्रियता से जमशेदपुर और हजारीबाग- गिरिडीह जिले के कई कुड़मी युवक सामने आये, जिनमें प्रमुख थे शैलेंद्र महतो, शिवा महतो, टेकलाल महतो और जमशेदपुर के कम्युनिस्ट नेता सरयू प्रसाद.

शिबू सोरेन उस वक्त इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं थे कि मोर्चा और पार्टी में क्या अंतर है. कामरेड एके राय पार्टी बनाने के बजाय मोर्चा बनाने पर जोर क्यों दे रहे हैं. उन्होंने विनोद बाबू से इस संबंध में बात की और इस अंतर को स्पष्ट करने का आग्रह किया. विनोद बिहारी महतो ने बताया कि राय झारखंड मुक्ति मोर्चा को जन संगठन बनाना चाहते हैं, जो शोषण मुक्त अलग झारखंड राज्य के लिये संघर्ष करे, वे उसकी परिकल्पना राजनीतिक दल के रूप में, यानी चुनाव लड़ने वाली पार्टी के रूप में नहीं करते. शिबू सोरेन ने उस वक्त तो इस बात को लेकर ज्यादा बहस नहीं की लेकिन उस वक्त उनके दिल में एक गांठ जरूर पड़ गयी और एके राय के प्रति एक अविश्वास का भाव जिसे बाद में कांग्रेस नेता ज्ञानरंजन और सूरज मंडल ने हवा दी.

पार्टी नहीं मोर्चा

4 फरवरी 1973 को धनबाद के गोल्फ मैदान में झामुमो के गठन की जो ऐतिहासिक सभा हुई थी, उसके बारे में यहां बताने में मैं अपने ही पहले उपन्यास ‘समर शेष है’ की मदद ले रहा हूं. उस उपन्यास का प्रकाशन 1998 में हुआ था और उसे लिखना मैंने 1995 में शुरु किया था. करीबन तीन वर्षों की मेहनत से मैं उसे लिख पाया और उसके लिए बहुत सारे लोगों से मिला. गुरुजी अपने बारे में कम बोलते थे, इसलिए मैंने उनके गांव नेमरा की कई बार यात्रा की. उनके बड़े भाई राजाराम से मिला, कामरेड एके राय से कई बार बातचीत हुई. बिनोद बाबू से मेरी मुलाकात कम हुई, उनके बारे में सबसे अधिक मदद मिली चास कालेज के प्राचार्य चंडीचरण महतो के संपादन में बिनोद बाबू की मृत्यु के बाद निकाले गये एक सोविनियर से जिसमें बिनोद बाबू को जानने वाले अनेकानेक विद्वानों ने उनके व्यक्तित्व पर लिखा था. इसके अलावा मैंने टुंडी की भी कई बार यात्रा की अपने मित्र विश्वनाथ बागी के साथ, जो अब नहीं रहे. टुंडी में हमारे एक पत्रकार मित्र देवीशरण भी रहते हैं. उन्होंने बहुत मदद की.

तो, अब हम उस सभा में चले जिसमें विनोद बाबू के शिवाजी समाज और शिबू सोरेन के सनत संथाल समाज का विलय हुआ और झामुमो के गठन का ऐलान.

उस दिन सुबह से ही गोल्फ मैदान, धनबाद में लोग जमा होने लगे थे. हरे झंडे और नगाड़े की घनघोर आवाज के साथ चलते लोग. लाल झंडो के साथ मजदूर कोलियरियों से से निकले लोग. गोल्फ मैदान को जाने वाली हर सड़क पर यही नजारा था और दिन चढने के साथ अपार भीड़ मैदान में जमा हो जाती है, उस ऐतिहासिक दिन का गवाह बनने के लिये. मंच पर तमाम प्रमुख नेता मौजूद थे. सबसे पहले मंच से आदिवासी सुधार समिति और शिवाजी समाज के विलय की सूचना दी गयी और इस घोषणा के साथ डुगडुगी बज उठी. फिर यह सूचना दी गयी कि नये संगठन का नाम झारखंड मुक्ति मोर्चा होगा, जिसके अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो और महासचिव शिबू सोरेन होंगे. उसके बाद विनोद बाबू को मंच संचालन का जिम्मा सौंप दिया गया.
सबसे पहले विनोद बाबू ही माईक पर बोलने आते हैं. उनकी जोरदार आवाज हवा में गूंजने लगती हैः

‘‘आज का दिन ऐतिहासिक दिन है. झारखंड आंदोलन को एक नई दिशा देने के लिये हम एक संगठन की नींव रख रहे हैं. इस संगठन का उद्देश्य शोषण मुक्त अलग झारखंड राज्य का निर्माण है. लेकिन साथ ही हमे गांव से महाजनी शोषण को मिटाना है. कोयलांचल से माफियागिरी को खत्म करना है…’’
फिर वे शिबू सोरेन को बोलने के लिये आमंत्रित करते हैं. शिबू उस दिन बोलते हुये भावुक हो गये थे. उनकी बोली से भदेसपन अभी तक खत्म नहीं हुआ था. वे कभी खड़ी बोली में बोलते, कभी संथाली में और कभी सादरी में. जो कुछ उन्होंने कहा था उस दिन उसका लब्बोलुआब यह थाः

‘‘मुझे झारखंड मुक्ति का महासचिव बनाया गया है. पता नहीं मैं इस योग्य हूं भी या नहीं, लेकिन मैं अपने मृत पिता की सौगधं खाकर कहता हूं कि शोषण मुक्त झारखंड के लिये अनवरत संघर्ष करता रहूंगा. हम लोग दुनियां के सताये लोग हैं. अपने अस्तित्व के लिये हमें लगातार संघर्ष करते रहना पड़ा है. हमे बार बार अपने घरों से, जंगल और जमीन से उजाड़ा जाता है. हमारे साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जाता है. हमारी बहू-बेटियों के इज्जत से खिलवाड़ किया जाता है. दिकुओं के शोषण उत्पीड़न से परेशान हो कर हमारे लोगों को अपना घर बार छोड़ कर परदेश में मजूरी करने जाना पड़ता है. हरियाणा-पंजाब के इंट भट्ठों में, असम के चाय बगानों में, पश्चिम बंगाल के खलिहानों में मांझी, संथाल औरतें मर्द मजदूरी करने जाते हैं और वहां भी उनसे बंधुआ मजदूरों जैसे व्यवहार किया जाता है. यह बात नहीं कि हमारे घर गांव में जीवन-यापन के साधन नहीं, लेकिन उन पर बाहर वालों का कब्जा है. झारखंड की धरती का, यहां के खदानों का दोहन कर, उनका लूट खसोट कर नये-नये शहर बन रहे हैं, जगमग आवासीय कालोनियां बन रही है और हमनी सब गरीबी और भूखमरी के अंधकार में धंसे हुये है. लेकिन अब यह सब नहीं चलेगा.. हम इस अंधेरगर्दी के खिलाफ संघर्ष करेंगे..’’

शिबू सोरेन बोलते बोलते अचानक रूके और अपनी जगह पर जा कर बैठ गये. उनके भाषण के दौरान मैदान में सन्नाटा था. उसके बाद आये बोलने शक्तिनाथ महतो. उनका व्यक्तित्व कद्दावर और आवाज गूंजती हुई थी. उन्होंने कहाः

‘‘आज हम वर्षों की लड़ाई की बुनियाद डाल रहे हैं. यह लड़ाई लंबी होगी और कठिन भी. हम जिस पार्टी की नींव डाल रहे हैं, वह अन्य पार्टियों से भिन्न एक क्रांतिकारी पार्टी है. इसमें आने जाने वालों की कभी कमी नहीं रहेगी, परंतु इसकी धार रूकेगी नहीं. इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेंगे. दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेंगे और तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे. जीत अंत में हमारी होगी..’’

सभा के अंत में बोलने आये थे कामरेड एके राय. उनके माईक पकड़ते ही कामरेड एके राय को लाल सलाम.. मजदूर एकता जिंदाबाद के नारों से आकाश गूंज उठाः

‘‘साथी, देश एक मुक्ति संग्राम चाहता है. संयुक्त फ्रंट नहीं मुक्ति फ्रंट. एक विकल्प की राजनीति,सिर्फ विरोध की राजनीति नहीं. एक नया माॅडल चाहिये. यह माॅडल बंगाल और केरल को बनाना मुश्किल है, लेकिन झारखंड में बन सकता है. यहां का समाज समतामुखी और बाहर से जो यहां आये मजदूर भी समाजमुखी. शोषणहीन समाज का माॅडल यहां छोड़ और कहां बन सकता है?… साथियों आज इस नये संगठन की नींव रखते हुये मैं कुछ बातों की तरफ आपका ध्यान खींचना चाहता हूं. आज तक जितनी भी झारखंडी पार्टियां बनी, वे आदिवासी बहुल रांची या सिंहभूम में. लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा का जन्म धनबाद में हो रहा है जो एक औद्योगिक क्षेत्र है. यहां आदिवासियों की संख्या सिर्फ दस फीसदी है. झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन आदिवासी और गैर आदिवासी को मिला कर हुआ है. इस संगठन की दूसरी बड़ी विशेषता है कि यह एक माक्र्सवादी आंदोलन की संतान के रूप में सामने आया है. इतिहास में पहली बार लाल झंडा हरे झंडे को नये रूप में पैदा करने जा रहा है. इस आंदोलन की नींव रखने वालों में प्रमुख हैं विनोद बाबू जो इस इलाके में कम्युनिस्ट आंदोलन के भी जनक हैं… इस पार्टी के महामंत्री हैं शिबू सोरेन जो दूसरे आदिवासी नेताओं की तरह सत्तामुखी नहीं, हमेशा जनमुखी रहे हैं. जुल्म और शोषण को इन्होंने बचपन से देखा है. इनके पिताजी को महाजनों ने मार दिया था, इसलिये अन्याय के खिलाफ बगावत और क्रांति सिर्फ इनकी राजनीति नहीं, उनके जीवन का अंग है.
खैर, वह दिन उत्साह और उमंग का था. देर रात तक गोल्फ मैदान में जन सभा चलती रही और आंदोलन के तमाम साथी मिल बैठ कर आगे की येाजना बनाते रहे. सभी जिलों में संगठन की कमेटी बनाने और रांची में पूरी तैयारी से एक विराट प्रदर्शन करने का निर्णय लिया गया. एक दो दिन धनबाद में रूकने के बाद शिबू वापस टुंडी चले आये. नये संगठन से उन्हें भी एक ताकत मिली थी. उनके संघर्ष को एक पार्टी और एक झंडा मिल गया था. झामुमो के गठन के बाद टुंडी के आंदोलन को नया विस्तार मिला और माफियागिरी के खिलाफ कोयलांचल में चल रहे संघर्ष को एक नयी धार.

लेकिन झामुमो के गठन में ही अंतर्निहित थे उसके विभाजन के बीज. पहली बात तो यह कि झामुमो के गठन के बाद भी टुंडी में शिबू अकेले थे, शहर से उन्हें कोई खास मदद नहीं मिलने वाली थी, जबकि कोयलांचल के मजदूरों को ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों के समर्थन से नई ताकत मिली. इस्ट बसुरिया गोली कांड के पहले और बाद इस बात का एहसास सभी को हुआ. दूसरी बात यह कि कामरेड राय भले ही झामुमो को माक्र्सवादी समन्वय समिति का एक जन संगठन मानते थे, लेकिन शिबू सोरेन और उनके करीबी झामुमो को एक राजनीतिक दल का रूप देना चाहते थे और आने वाले दिनों में इस बात को लेकर साथियों में भारी मतभेद उत्पन्न हुये. शिबू और उनके समर्थकों की समझ थी कि यदि राय ‘लाल और हरे झंडे की मैत्री’ के इतने ही पक्षधर है तो कामगार यूनियन को समाप्त क्यों नहीं कर देते. वे क्या चाहते हैं कि हम हमेशा उनका झंडा ढ़ोते रहें?

और टुंडी में गुरुजी के मुकाबले शक्ति महतो को खड़ा करना

मैंने गुरुजी और कामरेड एके राय के बीच के द्वंद्व को रेखांकित करने के लिए जो चर्चा शुरु की, उसकी शुरुआत निर्मल महतो प्रकरण के अपने उपन्यास ‘रेडजोन’से की थी और इसका अंत भी अपने उसी उपन्यास के एक अंश से कर रहा हूं. कृपया ध्यान से पढ़ियेगा. ‘लाल—हरे झंडे की मैत्री’ क्यों खत्म हुई, यह समझ पायेंगे.
यदि यह उपन्यास खरीदना चाहें तो रांची में फिरायालाल के सामने ज्ञानदीप में उपलब्ध है और एमेजोन पर भी.

रेडजोन
उपन्यास अंश, पृष्ठ 370

यात्रा की वापसी में मानव धनबाद में रुकते हैं. बागी से मिलते हैं. फिर दोनों साथ कामरेड ए. के. राय से मिलते हैं. राय जो एक जमाने में कोयलांचल के सबसे बड़े नेता थे, मंडल और कमंडलवादी राजनीति से हुए सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों की वजह से राजनीति के हाशिये पर पहुंच गये हैं. लेकिन अभी भी उनकी जीवन शैली नहीं बदली है. पार्टी कार्यालय के ही एक छोटे-से कमरे में रहते हैं. समय पर कार्यालय में बैठते हैं. कोयलांचल के मजदूरों से, अपने संगठन के लोगों से और बाहर से आये अतिथियों से उत्साह पूर्वक मिलते हैं.
‘‘क्या कहूं, औद्योगीकरण की दिशा ही एकबारगी विदेशमुखी हो गई है! इस वजह से हमारे अपने जो संसाधन हैं, उनकी संभावनाओं की खोज नहीं हो पा रही है. बौद्धिक पंूजी नष्ट हो रही है. अपने देश में कोयले का जो भंडार है वह पूरे विश्व का छठा भाग है. इसमें ऐश की मात्रा जरूर ज्यादा है लेकिन गंधक की मात्रा विदेशी कोयला से कम है. लेकिन नइयी अर्थनीति जब से आयी है, विदेशी कोकिंग कोल का उपयोग बढ गया है. खपत का बड़ा हिस्सा विदेश से आता है, लगभग 15 मिलियन टन. देशी कोयले का उपयोग नहीं हो रहा है. वाशरियां बंद हो रही हैं. कोयला आधारित कई उद्योग बंद हो चुके हैं. सेंट्रल फ्यूल रिसर्च इंस्टीच्यूट एक प्रतिष्ठित संस्था थी, जो मर रही है. सेंट्रल माइनिंग रिसर्च इंस्ट्च्यिूट को मारने की साजिश हो रही है. सिंदरी फर्टिलाइजर बंद कर दिया गया. दरअसल, स्वदेशी तरीके से विकास की कोशिश ही खत्म हो रही है.
झारखंड की अपनी समझी जाने वाली सरकार पिछले तीन वर्षों में इस बात को समझ नहीं सकी है कि झारखंड की असली ऊर्जा झारखंडी भावना है. इसी भावना की वजह से झारखंडी नेताओं के बार-बार बिकते रहने के बावजूद झारखंड आंदोलन को समाप्त नहीं किया जा सका. इस भावना में झारखंड निर्माण की जो संभावना थी, उसे सरकार नहीं समझ सकी. बस, उनका सारा ध्यान विदेशी पूंजी का आयात करने और अपना कच्चा माल, जल, जंगल, जमीन बेचने की तरफ लगा है. अरे भाई, आजादी के बाद भारत में सार्वजनिक क्षेत्र में जितनी पूंजी लगी हुई है, उसका सबसे बड़ा हिस्सा इसी राज्य में लगा. सिंदरी, बोकारो, एचईसी, बीसीसीएल, सीसीएल, डीवीसी इसके उदाहरण हैं. लेकिन तमाम विकास बाहर से आये विकसित लोगों का चारागाह रहा. झारखंडियों का विकास नहीं हुआ, उल्टे उन्हें विस्थापन, शोषण और उपेक्षा का शिकार होना पड़ा. इसलिए उनके मन में सत्ताधारियों के प्रति गहरी घृणा है. जिस विकास में उनको पूछा नहीं जाता, जिसमें उनकी कोई भूमिका ही नहीं, उसका वे अंदर से विरोध करते हैं. और कोई भी क्षेत्र तब तक विकास नहीं कर सकता जब तक उसमें उस क्षेत्र के लोगों का उत्साह जुड़ा न हो. इसलिए झारखंड एक आंतरिक उपनिवेश के रूप में रहा और कभी विकास की राह पर नहीं चल सका. तमाम तरह के कल कारखाने, पूंजी आदि लेकर भी झारखंड अपनी गरीबी में ही सिमटा रहा. यहां तक कि उसको उपनिवेश बनाने वाला बिहार भी एक पिछड़ा राज्य ही बना रहा. हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि आजादी और मुक्ति की भावना से ही समाज में ऊर्जा और शक्ति पैदा होती है.
झारखंड बनने के बाद एनडीए सरकार ने विकास की ऐसी नीति अपनायी है कि उससे आम झारखंडी नफरत करता है. जो बीजेपी का आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सोच है, वही एनडीए का सोच है. वह सोच दरअसल बाजारवादी सोच है जो पूंजीवादी सोच की एक विशेष विकृति है. जो उत्पादन से ज्यादा व्यापार को महत्व देता है. वर्ग चरित्र के रूप में यह सेठ, साहुकार और बिचैलियों की पार्टी है जो कुछ दिनों से उद्योग पर भी अपनी बाजारी सोच के साथ हस्तक्षेप कर रहा है. दूसरी तरफ झारखंडी सोच, संस्कृति एवं परंपरा पूर्णरूपेण समाजवादी न सही समाजमुखी है. बाजार से ये अक्सर दूर रहते हैं. उतना ही संबंध रखते हैं जितना जीवन के लिए नितांत जरूरी है. वे मूलतः श्रमजीवी हैं और अपने बलबूते जीवित रहना चाहते हैं. लेकिन झारखंड बनने के बाद झारखंड सरकार ने ऐसी नीति अपनायी है जिससे आम झारखंडी नफरत करते हैं और जिसके विरोध में झारखंड आंदोलन पनपा. झारखंडी लोग ऊपर से थोपा हुआ विकास नहीं चाहते, जबकि सरकार की नीति यह बनी है कि जो विकास होगा, ऊपर से होगा. ऊपर से ही नहीं आसमान से होगा. बहुराष्ट्रीय कंपनियां आयेंगी और आदिवासियों की जमीन पर कब्जा कर उन्हें उठा देंगे. साथ ही टीवी और अन्य तरह के प्रचार माध्यमों से उनके अंदर उपभोक्तावादी रुझान पैदा करने की पुरजोर कोशिश की जा रही है ताकि वह उत्पादक से ज्यादा पूंजीवादी माल का क्रेता बन जाये. उसके अंदर का चारित्रिक बल, शुद्धता आदि नष्ट हो जाये. भूमंडलीकरण के बबंडर में वे भी बह जायें. इससे उनके अस्तित्व और पहचान के समक्ष ही खतरा बन गया है.
मानव, इस स्थिति का निदान तभी संभव है जब झारखंड के लिए झारखंडी भावना के साथ आज तक संघर्ष करने वाले सही राजनीतिक दिशा के साथ नेतृत्व में आयें. लेकिन विडंबना यह है कि वे लोग जिन्होंने झारखंड के लिए संघर्ष किया और जिनका झारखंडी भावना और संस्कृति से संबंध है, उनको विकास की सही दिशा का ज्ञान और समझ नहीं है और जिनमें यह समझ है, उनका झारखंडी भावना और संस्कृति से लगाव नहीं है. वह कौन-सी दिशा हो सकती है जो झारखंडी भावना और संस्कृति को साथ लेकर झारखंड का विकास कर सके? झारखंड आंदोलन बुनियादी रूप में एक सामाजिक आंदोलन रहा है जो एक स्तर के बाद अलग राज्य के आंदोलन में बदल गया. अब अलग राज्य में उनके राज को सुनिश्चित करना है तो सामाजिक आंदोलन के उनके सूत्र को पकड़ कर उसे समाजवादी आंदोलन में बदलना होगा. विडंबना यह भी है कि आम झारखंडी नेता समाजवादी आंदोलन मुखी नहीं हैं और जो लोग समाजवादी आंदोलन में हैं, वे झारखंडी नहीं हैं.’
मानव और बागी राय की बातों को मुग्ध भाव से सुनते रहे. फिर चाय पी और उनसे विदा लिया.
‘क्यों बागी, राय दा कहीं गुरूजी और अपनी बात तो नहीं कह रहे थे! उन्हें कहीं इस बात का मलाल तो नहीं कि वे मूलतः झारखंडी नहीं! आदिवासी नहीं और इसलिए झारखंड आंदोलन के एक बड़े नेता होने के बावजूद राजनीति के हाशिये पर पहुंच गये.’
‘इसमें उनका अपना भी दोष रहा है. समाजवादी वे हैं, लेकिन नितांत व्यक्तिवादी भी. गुरूजी को उन्होंने ही आदिवासियों का महानायक बताया था. लेकिन एमरजेंसी के बाद जब गुरूजी टुंडी विधानसभा सीट से खड़े हुए तो उन्होंने अपनी पार्टी के टिकट पर शक्तिनाथ महतो को खड़ा कर दिया. परिणाम यह हुआ कि दोनों चुनाव हार गये और कोयलांचल में पहली बार भाजपा के टिकट पर भाजपा के एक उम्मीदवार सत्यनारायण दुधानी चुनाव जीत गये.”
मानव इस बाबत गुरूजी के मुंह से ही वर्षों पहले सारी बात सुन चुके थे.
‘लेकिन झारखंडी नेताओं के बारे में रायदा की यह आशंका भी सच साबित हुई कि वे सत्ता की सीढ़ियों पर जल्दी फिसल जाते हैं.’
‘तो गुरूजी क्या करते! राय की महत्वाकांक्षी राजनीति की कठपुतली बने रहते?’

‘तीर-धनुष’ की कहानी

टुंडी में चुनावी जंग हारने के बाद गुरुजी ने संथालपरगना का रुख किया जहां साईमन मरांडी, सटीफन मरांडी, हेमलाल मुर्मू सहित अनेक संगी साथी उन्हें वहां मिले. उनका टुंडी आना जाना तो रहा, लेकिन कार्यक्षेत्र संथाल परगना बनता गया. इंदिरा गांधी ने पहली बार देश में एमरजंसी लगायी थी और हटाने के बाद चुनाव कराने का मन बनाया तो वे चाहती थीं कि आदिवासी इलाके में उनके साथ शिबू सोरेन आ जायें जिनकी ख्याति उस वक्त तक धनकटनी आंदोलन की वजह से पूरे देश में फैल चुकी थी.

कहा जाता है कि केबी सक्सेना को धनबाद का डीसी बना कर इस कार्य विशेष के लिए भेजा जाता गया था कि वे गुरुजी को बागी जीवन छोड़ संसदीय राजनीति में आने के लिए राजी करें. केबी सक्सेना गुरुजी से मिलने टुंडी गये. पोखड़िया आश्रम देखा, रात्रि पाठशालाएं देखी और उन्होंने शिबू सोरेन को गुरुजी कहना शुरु कर दिया.

खैर, उनकी सलाह पर गुरुजी ने एमरजंसी में ही आत्मसर्पण किया, जेल गये और फिर निकल कर संसदीय राजनीति में प्रवेश किया. अब वह कहानी फिर कभी. अभी तीर धनुष की कहानी, जिसके बारे में आरोप लगाया जाता है कि उसे कामरेड एके राय की पार्टी मार्क्सवादी समन्वय समिति से गुरुजी ने छीन लिया.

दरअसल, जब राह अलग हो गयी तो गुरुजी ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 1980 का संसदीय चुनाव दुमका से लड़ा और जीते. उसके बाद झामुमो को एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण कराने की कोशिश शुरु हुई. और इस काम में उनकी सर्वाधिक मदद मुक्ति प्रकाश तिर्की ने की.जिन्हें आज हम ‘दलित आदिवासी दुनिया’ के संपादक के रूप में जानते हैं. साथी मुक्ति तिर्की पर भी हम बीस अन्य समाजकर्मियों के साथ देशद्रोह का मुकदमा भाजपा सरकार ने किया था जिसे हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री बनने के बाद वापस लिया.

मुक्ति तिर्की अलिपुरद्वार से पांच बार सांसद रहे एक शीर्ष नेता पियूष तिर्की के पुत्र हैं और जब गुरुजी सांसद बन कर दिल्ली गये तो वे वहीं रहते थे और इंडियन एयर लाइंस की नौकरी किया करते थे. वे गुरुजी को संसद ले जाने का काम करते. अपना ज्यादा समय गुरुजी के साथ बिताते बिताते उन्होंने एयरलाइंस की नौकरी भी छोड़ दी. जब पार्टी को रजिस्टर्ड कराने की बात हुई तो यह काम उन्हें ही सौंपा गया. इधर कामरेड राय भी अपनी पार्टी का पंजीकरण कराना चाहते थे.
अब हुआ यह कि तिर्की अपने कुछ अन्य साथियों के साथ आनन फानन इस काम में जुट गये. भाकपा सहित कई पार्टियों के दफ्तर गये. उनके संविधान का अध्ययन किया और झामुमो का संविधान रजिस्टार आफिस में जमा कर दिया. उन्होंने तीर धनुष, जो अब तक बिहार में मुक्त सिंबल था, की मांग की. यही मांग कामरेड एके राय की तरफ से भी किया गया. लेकिन कामरेड राय को धनबाद जाकर पार्टी का संविधान बनाना आदि काम था, इसलिए उनका आवेदन बिलंब से रजिस्टार कार्यालय में जमा हो पाया और ‘तीर-धनुष’ गुरुजी की पार्टी को मिल गया. जयपाल सिंह की पार्टी झारखंड पार्टी का सिंबल मुर्गा था, और तीर धनुष झामुमो का सिंबल हो गया.

वैसे, कामरेड राय उस चुनाव चिन्ह से पहले लड़ चुके थे और वे अपना विरोध दर्ज कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. वह आज का जमाना नहीं था..

और इस तरह खत्म हो गया ‘लाल—हरे झंडे की मैत्री’ का ऐतिहासिक दौर.

रामजी मुंडा ने शहादत दी है

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बिरसा की कर्म भूमि, उलगुलान का क्षेत्र खूंटी हिंसा प्रतिहिंसा की आग में झुलस रहा है. कई नदियों, शांत सरोवरों, वनों और मेहनतकश खुद्दार मुंडाओं का क्षेत्र बर्बादी के कगार पर है. इस क्षेत्र की भूमि और आस पास की खनिज संपदा के लूट के लिए निहित स्वार्थी तत्व तरह-तरह की साजिशों में संलग्न है. आये दिन वहां हत्यायें हो रही हैं. और अधिकतर हत्या के मामले रहस्य बन कर रह जाते हैं. भाजपा के शीर्ष नेता और खूंटी के कई बार सांसद रहे कड़िया मुंडा के आवास से महज दो-तीन किमी दूर गत 24 जून को क्षेत्र के एक युवा सामाजिक कार्यकर्ता रामजीव मुंडा की हत्या हो गई. लेकिन अब तक पुलिस इस गुत्थी को नहीं सुलझा सकी है.

8 जुलाई को आदिवासी जनाधिकार महासभा और कुछ अन्य संगठनों से जुड़े लोंगों की एक फैक्ट र्फाइंडिंग टीम ने खूंटी के घाघरा गांव का दौरा किया. इस टीम में आलोका कुजूर, झामुमो की स्नेहलता, प्रफुल्ल लिंडा, सिराज, वर्षा, एक स्थानीय पत्रकार और मैं शामिल थे. हमने घाधरा गांव के ग्रामीणों से, मारे गये रामजीव मुंडा की पत्नी और मां से, घटना के वक्त रामजीव मुंडा के साथ रहे दो अन्य ग्रामीणों से, खूंटी थाना में इस मामले का अनुसंधान कर रहे पुलिस अधिकारी से बात की. लेकिन कही से भी इस हत्या की गुत्थी सुलझाने की दिशा में कोई क्लू नहीं मिला. जबकि हत्या की परिप्रेक्ष्य और पूरी परिस्थितियों पर गौर करें तो हत्या की यह गुत्थी सुलझ जानी चाहिए थी.

पहले हम घटना के ब्योरे को जान ले जो थाने में दर्ज एफआईआर और ग्रामीणों से बातचीत से सामने आयी. ब्योरा कुछ इस प्रकार है. रामजीव मुंडा की पत्नी ने एक बच्ची को जन्म दिया था. वह अस्वस्थ थी. उसका इलाज अस्पताल में चला और फिर परिजन अपनी कुछ मान्यताओं के अनुरुप भी पूजा पाठ कर रहे थे. इस क्रम में उन्हें समीप के गांव साकेडीह ले जाया गया था जहां पूजा की विधि पूरी की गयी. पूजा के सामान आदि को डिसपोज करने के लिए रामजी मुंडा दो अन्य लोगों के साथ अपने गांव घाधरा लगभग रात नौ बजे लौट रहा था. रास्ते में लोवाडीह पीड़ी के पास पहले से घात लगाये चार लोगों ने हमला किया. बांस के बल्ले से उन्हें मार कर गिरा दिया गया. दो तो भाग गये. रामजी मुंडा को वे पीटते रहे और उसके चेहरे और आस पर टांगी से गहरे वार कर उसे मार डाला. गांव में साथ के एक व्यक्ति ने सूचना पहुंचाई, दूसरा समीप की ही झाड़ झंकार में छुपा रहा. गांव से बीस पच्चीस लोग पहुंचे. तब तक उसकी मौत हो चुकी थी. रात भर वे वही उसे अगोरते रहे. अगली सुबह खूंटी थाना को सूचना दी गयी. और एफआईआर 25 को ही रामजीव मुंडा के एक चचेरे भाई ने किया.

एफआईआर में हत्या के कारणों की कोई जानकारी नही दी गयी है. किसी पर संदेह नहीं व्यक्त किया गया है. उसकी पत्नी और ग्रामीण भी हत्या की कोई वजह नहीं बता सके. सबों ने यही कहा कि उसकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी.

यह तो स्पष्ट है कि रामजीव मुंडा, जिन्हें हम रामजी मुंडा के नाम से जानते थे, नितांत व्यक्तिगत कारणों से या किसी तरह के पारिवारिक झगड़ों की वजह से नहीं मारे गये. वे एक सामाजिक कार्यकर्ता थे और उन्हें साजिश पूर्वक मारा गया. घटनास्थल पर पहले से घात लगा कर हत्यारों का बैठा रहना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उन्हें रामजी मुंडा के वहां से गुजरने और समय की जानकारी थी. फिर उनके साथ मोटर साईकल पर सवार दो अन्य लोगों का बच निकलना इस बात का संकेत है कि हत्यारों का टारगेट रामजी मुंडा ही थे. उनके साथ सफर कर रहे दोनों व्यक्तियों का बयान विश्वसनीय नहीं. उनमें से एक तो उनका अपना भाई बेनसे मुंडा था और दूसरा उनके दूर का परिजन मदन नाग था.

बेनसे का कहना है कि वह भी घायल हो गया था, कुछ देर बेहोश भी रहा. सवाल उठता है कि हत्यारों ने उसे जीवित क्यों छोड़ दिया? वह घटना का चश्मदीद गवाह है. दूसरा मदन नाग, जिसका एक हाथ कटा हुआ है, हजारीबाग का रहने वाला है और वहां आया हुआ था. उसका कहना है कि वह झाड़ झंकाड़ में छुप गया. जब गांव वाले घटनास्थल पर पहुंचे, तब वह बाहर आया. सवाल उठता है कि हमलावर चार थे और ये तीनों भी तीन थे, फिर इन लोगों ने हमलावरों का मुकाबला करने की कोशिश क्यों नहीं की? रामजी मुंडा को छोड़ दोनों भाग क्यों खड़े हुए? मदन नाग यदि भागा भी तो झाड़ियों में वहीं क्यों छुपा रहा? ज बवह घटना स्थल के करीब ही था तो वह हत्यारों के बारे में किसी तरह का सुराग देने में असमर्थ क्यों है. वह हत्यारों की आवाज तो सुन सकता था? उसका जवाब है कि हत्यारे बात नहीं कर रहे थे, सीटी बजा बजा कर एक दूसरे को संकेत दे रहे थे.

पुलिस दोनों को पकड़ कर ले गयी थी, लेकिन उन्हें छोड़ भी दिया. कुल मिला कर पूरा मामला रहस्यमय लगता है. उस इलाके के सांसद और विधायक भाजपा के हैं. सांसद हैं अर्जुन मुंडा. विधायक हैं नीलकंठ मुंडा. घटना स्थल के करीब ही कड़िया मुंडा की हवेली है. दुमका में सिधो, कान्हू के किसी परिजन की संदेहास्पद मौत को लेकर भाजपा के नेता खूब सक्रिय हैं, लेकिन रांची से महज 45 किमी दूर खूंटी में हुई हत्या की यह घटना उन्हें आंदोलित नहीं कर रही.

यहां यह चर्चा करना प्रासांगिक होगा कि खूंटी में भाजपा शासन के दौरान एक तीव्र आंदोलन चला जिसे पत्थलगड़ी आंदोलन के नाम से जानते हैं. घाघरा गांव उस आंदोलन के केंद्र में रहा है. पत्थलगड़ी आंदोलन जल, जंगल, जमीन बचाओं आंदोलन का ही एक रूप है जिसे गुजरात से आयातित सति पति कल्ट से जुड़े कुछ लोगों ने उग्र रूप दे दिया है. इससे ग्रामीणों को तो कोई लाभ नहीं हुआ, लेकिन भाजपा शासन को ग्रामीणों को कुचलने का अवसर मिल गया. हजारों लोगों को वहां देशद्रोह का अभियुक्त बना दिया गया. पूरे इलाके में पुलिस की दबिश बढ़ा दी गयी. खूंटी एक पुलिस-सेना छावनी में बदल गया. इसी माहौल में पिछला संसदीय चुनाव हुआ जिसमें खूंटी क्षेत्र से पहली बार अर्जुन मुंडा चुनाव लड़े और चंद वोटों के अंतर से जीत गये. विधानसभा चुनाव में भाजपा हार गयी, लेकिन खूंटी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा जीत गयी.

महासभा के साथियों के संपर्क में आने के बाद रामजी मुंडा पत्थरगड़ी आंदोलन को सतिपति कल्ट से मुक्त कराने की कोशिशों में लगे थे. उनका प्रभाव अपने इलाके में बढ़ रहा था. यह बात उन लोगों को रास नहीं आ रही थी जो पत्थरगड़ी आंदोलन को विवादास्पद बनाने में लगे हैं. हो सकता है उनकी हत्या की वजह यह हो.

झामुमो गठबंधन सत्ता में आ तो गयी है, लेकिन राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाने वाली इस तरह की घटनाओं के प्रति बेपरवाह है. भाजपा के नेताओं ने तो हत्या की इस घटना को कोई तवज्जो नहीं ही दी, झामुमो या गठबंधन के अन्य घटक दलों ने भी इस हत्या की कोई सुध नहीं ली. झामुमो ने इस बात की भी सुध नहीं ली कि रामजी मुंडा की मां और पत्नी, उसका नवजात बच्चा किस अवस्था में है. हमारे हिसाब से तो उनकी हालत खराब है. उसकी पत्नी की छाती का आपरेशन हुआ है और बच्चा एक तरफ से ही दूध पी पाता है और बेहद कमजोर. उन्हें इलाज की जरूरत है, आर्थिक मदद की जरूरत है.

रामजी मुंडा पारिवारिक विवाद या अन्य किसी व्यक्तिगत झगड़े में नहीं मारा गया, वह एक सामाजिक काउज के लिए मारा गया और उसकी मौत को शहादत ही कहा जायेगा.

रामजी मुंडा ने शहादत दी है

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बिरसा की कर्म भूमि, उलगुलान का क्षेत्र खूंटी हिंसा प्रतिहिंसा की आग में झुलस रहा है. कई नदियों, शांत सरोवरों, वनों और मेहनतकश खुद्दार मुंडाओं का क्षेत्र बर्बादी के कगार पर है. इस क्षेत्र की भूमि और आस पास की खनिज संपदा के लूट के लिए निहित स्वार्थी तत्व तरह-तरह की साजिशों में संलग्न है. आये दिन वहां हत्यायें हो रही हैं. और अधिकतर हत्या के मामले रहस्य बन कर रह जाते हैं. भाजपा के शीर्ष नेता और खूंटी के कई बार सांसद रहे कड़िया मुंडा के आवास से महज दो-तीन किमी दूर गत 24 जून को क्षेत्र के एक युवा सामाजिक कार्यकर्ता रामजीव मुंडा की हत्या हो गई. लेकिन अब तक पुलिस इस गुत्थी को नहीं सुलझा सकी है.

8 जुलाई को आदिवासी जनाधिकार महासभा और कुछ अन्य संगठनों से जुड़े लोंगों की एक फैक्ट र्फाइंडिंग टीम ने खूंटी के घाघरा गांव का दौरा किया. इस टीम में आलोका कुजूर, झामुमो की स्नेहलता, प्रफुल्ल लिंडा, सिराज, एक स्थानीय पत्रकार और मैं शामिल थे. हमने घाधरा गांव के ग्रामीणों से, मारे गये रामजीव मुंडा की पत्नी और मां से, घटना के वक्त रामजीव मंुडा के साथ रहे दो अन्य ग्रामीणों से, खूंटी थाना में इस मामले का अनुसंधान कर रहे पुलिस अधिकारी से बात की. लेकिन कही से भी इस हत्या की गुत्थी सुलझाने की दिशा में कोई क्लू नहीं मिला. जबकि हत्या की परिप्रेक्ष्य और पूरी परिस्थितियों पर गौर करें तो हत्या की यह गुत्थी सुलझ जानी चाहिए थी.

पहले हम घटना के ब्योरे को जान ले जो थाने में दर्ज एफआईआर और ग्रामीणों से बातचीत से सामने आयी. ब्योरा कुछ इस प्रकार है. रामजीव मुंडा की पत्नी ने एक बच्ची को जन्म दिया था. वह अस्वस्थ थी. उसका इलाज अस्पताल में चला और फिर परिजन अपनी कुछ मान्यताओं के अनुरुप भी पूजा पाठ कर रहे थे. इस क्रम में उन्हें समीप के गांव साकेडीह ले जाया गया था जहां पूजा की विधि पूरी की गयी. पूजा के सामान आदि को डिसपोज करने के लिए रामजी मुंडा दो अन्य लोगों के साथ अपने गांव घाधरा लगभग रात नौ बजे लौट रहा था. रास्ते में लोवाडीह पीड़ी के पास पहले से घात लगाये चार लोगों ने हमला किया. बांस के बल्ले से उन्हें मार कर गिरा दिया गया. दो तो भाग गये. रामजी मुंडा को वे पीटते रहे और उसके चेहरे और आस पर टांगी से गहरे वार कर उसे मार डाला. गांव में साथ के एक व्यक्ति ने सूचना पहुंचाई, दूसरा समीप की ही झाड़ झंकार में छुपा रहा. गांव से बीस पच्चीस लोग पहुंचे. तब तक उसकी मौत हो चुकी थी. रात भर वे वही उसे अगोरते रहे. अगली सुबह खूंटी थाना को सूचना दी गयी. और एफआईआर 25 को ही रामजीव मुंडा के एक चचेरे भाई ने किया.

एफआईआर में हत्या के कारणों की कोई जानकारी नही दी गयी है. किसी पर संदेह नहीं व्यक्त किया गया है. उसकी पत्नी और ग्रामीण भी हत्या की कोई वजह नहीं बता सके. सबों ने यही कहा कि उसकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी.

यह तो स्पष्ट है कि रामजीव मुंडा, जिन्हें हम रामजी मुंडा के नाम से जानते थे, नितांत व्यक्तिगत कारणों से या किसी तरह के पारिवारिक झगड़ों की वजह से नहीं मारे गये. वे एक सामाजिक कार्यकर्ता थे और उन्हें साजिश पूर्वक मारा गया. घटनास्थल पर पहले से घात लगा कर हत्यारों का बैठा रहना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उन्हें रामजी मुंडा के वहां से गुजरने और समय की जानकारी थी. फिर उनके साथ मोटर साईकल पर सवार दो अन्य लोगों का बच निकलना इस बात का संकेत है कि हत्यारों का टारगेट रामजी मुंडा ही थे. उनके साथ सफर कर रहे दोनों व्यक्तियों का बयान विश्वसनीय नहीं. उनमें से एक तो उनका अपना भाई बेनसे मुंडा था और दूसरा उनके दूर का परिजन मदन नाग था.

बेनसे का कहना है कि वह भी घायल हो गया था, कुछ देर बेहोश भी रहा. सवाल उठता है कि हत्यारों ने उसे जीवित क्यों छोड़ दिया? वह घटना का चश्मदीद गवाह है. दूसरा मदन नाग, जिसका एक हाथ कटा हुआ है, हजारीबाग का रहने वाला है और वहां आया हुआ था. उसका कहना है कि वह झाड़ झंकाड़ में छुप गया. जब गांव वाले घटनास्थल पर पहुंचे, तब वह बाहर आया. सवाल उठता है कि हमलावर चार थे और ये तीनों भी तीन थे, फिर इन लोगों ने हमलावरों का मुकाबला करने की कोशिश क्यों नहीं की? रामजी मुंडा को छोड़ दोनों भाग क्यों खड़े हुए? मदन नाग यदि भागा भी तो झाड़ियों में वहीं क्यों छुपा रहा? ज बवह घटना स्थल के करीब ही था तो वह हत्यारों के बारे में किसी तरह का सुराग देने में असमर्थ क्यों है. वह हत्यारों की आवाज तो सुन सकता था? उसका जवाब है कि हत्यारे बात नहीं कर रहे थे, सीटी बजा बजा कर एक दूसरे को संकेत दे रहे थे.

पुलिस दोनों को पकड़ कर ले गयी थी, लेकिन उन्हें छोड़ भी दिया. कुल मिला कर पूरा मामला रहस्यमय लगता है. उस इलाके के सांसद और विधायक भाजपा के हैं. सांसद हैं अर्जुन मुंडा. विधायक हैं नीलकंठ मुंडा. घटना स्थल के करीब ही कड़िया मुंडा की हवेली है. दुमका में सिधो, कान्हू के किसी परिजन की संदेहास्पद मौत को लेकर भाजपा के नेता खूब सक्रिय हैं, लेकिन रांची से महज 45 किमी दूर खूंटी में हुई हत्या की यह घटना उन्हें आंदोलित नहीं कर रही.

यहां यह चर्चा करना प्रासांगिक होगा कि खूंटी में भाजपा शासन के दौरान एक तीव्र आंदोलन चला जिसे पत्थलगड़ी आंदोलन के नाम से जानते हैं. घाघरा गांव उस आंदोलन के केंद्र में रहा है. पत्थलगड़ी आंदोलन जल, जंगल, जमीन बचाओं आंदोलन का ही एक रूप है जिसे गुजरात से आयातित सति पति कल्ट से जुड़े कुछ लोगों ने उग्र रूप दे दिया है. इससे ग्रामीणों को तो कोई लाभ नहीं हुआ, लेकिन भाजपा शासन को ग्रामीणों को कुचलने का अवसर मिल गया. हजारों लोगों को वहां देशद्रोह का अभियुक्त बना दिया गया. पूरे इलाके में पुलिस की दबिश बढ़ा दी गयी. खूंटी एक पुलिस-सेना छावनी में बदल गया. इसी माहौल में पिछला संसदीय चुनाव हुआ जिसमें खूंटी क्षेत्र से पहली बार अर्जुन मुंडा चुनाव लड़े और चंद वोटों के अंतर से जीत गये. विधानसभा चुनाव में भाजपा हार गयी, लेकिन खूंटी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा जीत गयी.

महासभा के साथियों के संपर्क में आने के बाद रामजी मुंडा पत्थरगड़ी आंदोलन को सतिपति कल्ट से मुक्त कराने की कोशिशों में लगे थे. उनका प्रभाव अपने इलाके में बढ़ रहा था. यह बात उन लोगों को रास नहीं आ रही थी जो पत्थरगड़ी आंदोलन को विवादास्पद बनाने में लगे हैं. हो सकता है उनकी हत्या की वजह यह हो.

झामुमो गठबंधन सत्ता में आ तो गयी है, लेकिन राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाने वाली इस तरह की घटनाओं के प्रति बेपरवाह है. भाजपा के नेताओं ने तो हत्या की इस घटना को कोई तवज्जो नहीं ही दी, झामुमो या गठबंधन के अन्य घटक दलों ने भी इस हत्या की कोई सुध नहीं ली. झामुमो ने इस बात की भी सुध नहीं ली कि रामजी मुंडा की मां और पत्नी, उसका नवजात बच्चा किस अवस्था में है. हमारे हिसाब से तो उनकी हालत खराब है. उसकी पत्नी की छाती का आपरेशन हुआ है और बच्चा एक तरफ से ही दूध पी पाता है और बेहद कमजोर. उन्हें इलाज की जरूरत है, आर्थिक मदद की जरूरत है.

रामजी मुंडा पारिवारिक विवाद या अन्य किसी व्यक्तिगत झगड़े में नहीं मारा गया, वह एक सामाजिक काउज के लिए मारा गया और उसकी मौत को शहादत ही कहा जायेगा.

हर जान की कीमत है

encounter
एनकाउंटर सभ्यता के आवरण में छुपी सत्ता की बर्बरता है

पांच हजार से अधिक एनकाउंटर सिर्फ उत्तर प्रदेश में हाल के कुछ वर्षों में हुए हैं. उत्तर प्रदेश का मुकाबला अन्य राज्य नहीं कर सकते, लेकिन आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र सहित अन्य राज्यों से भी एनकाउंटर या पुलिस कस्टडी में मौत की खबर आती ही रहती है. इससे इतर माब लिंचिंग की घटनाएं. लेकिन अब इन सबसे हमारी चेतना में कोई सुगबुगाहट नहीं होती. मानवाधिकार की बात करना देशद्रोह है. और ऐसे कुछ देशद्रोहियों को छोड़ पूरा समाज मुठभेड़ों को एक सामान्य घटना समझ कर चल रहा है.

एक मोटी सी बात लोगों के समझ में नहीं आती कि किसी को अभियुक्त करार देना, उसके लिए अनुसंधान और फिर उसे दोषी करार दे कर सजा देना यदि व्यवस्था के एक ही अंग को सौंप दिया जाये, तो यह खतरनाक होगा. इसलिए हर सभ्य समाज में पुलिस और न्यायपालिका के अलग अलग अधिकार है. अपराधी को पकड़ना और अनुसंधान का काम यदि पुलिस करती है, तो साक्ष्यों को परख कर सजा देने का काम न्यायपालिका का है.

हर एनकाउंटर के बाद बहस यह चलती है कि एनकाउंटर फर्जी था या असली. हालांकि यह बहस बेमानी है. एनकाउंटर की अधिकतर घटनाओं में एक जैसी कहानी सामने आती है. कथित अपराधी पुलिसकर्मी से ही हथियार छीन कर भागता है, उस पर हमला करता है और प्रतिउत्तर की कार्रवाई में मारा जाता है. यह एक बार नहीं, लगभग हर बार की कहानी है. हर कोई जानता है कि एनकाउंटर फर्जी है. फिर भी एक पाखंड पूरी ईमानदारी से टीवी चैनलों और अन्य संचार माध्यमों में चलता रहता है.

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर कानून व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित रखने और विधि सम्मत शासन को सुनिश्चित करने के लिए गठित पुलिस बल किसी निहत्थे व्यक्ति को घेर कर क्रूरता से मार डालती है, यह कैसी न्याय व्यवस्था है? सभ्यता के क्रमिक विकास में हम यह कहां पहुंच गये हैं कि हमारे ही आस पास एक ऐसे हिंस्र पशु वृत्ति के ऐसे लोग घूम फिर रहे हैं, जो बेरहमी से किसी का खून कर सकते हैं और उसके बदले तमगा बटोरते हैं?

लेकिन हमारे लिए मौजू सवाल यह है कि लोग उसका समर्थन क्यों करते हैं?

इसकी पहली वजह तो यह है कि हमारे भीतर की मानवीय संवेदना निरंतर भोथड़ी होती चली गयी है. आजादी के संघर्ष के दिनों में या फिर आजादी के बाद के कुछ वर्षोें में देश में कही गोली भी चलती थी तो देश व्यापी हलचल होती थी. पुलिस कस्टडी में मौत या फिर एनकाउंटर की घटनाएं हमें उद्वेलित करती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं होता. इस तरह की अमानुषिक घटनाएं हमारी संवेदना की नोक को भोथड़ा कर रही है. हमें थोड़ा और अमानुष बना रही हैं.

लोगों का विश्वास न्याय व्यवस्था से उठ गया है. न्यायिक प्रक्रिया लंबी होती है और पैसे व ताकत के बल पर उसे और लंबा खींचा जा सकता है. अपराधी सामान्यतः छूट जाते हैं या बेल पर रह कर अपराध करते रहते हैं. ऐसे में आपराधिक कृत्यों से आक्रांत जनता को लगता है कि पुलिस ने एनकाउंटर करके ठीक ही किया. हमें नहीं भूलना चाहिए कि दसकों पूर्व भागलपुर के आंख फोड़वा कांड को अंजाम देने वाले पुलिस अधिकारियों के समर्थन में लोग सड़कों पर उतर गये थे.

एनकाउंटर आज की तारीख में एक राजनीतिक मसला भी बन गया है. भाजपा के राज्य में एनकाउंटर अधिक हो रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के राज्य में नहीं होते थे, यह नहीं दावा किया जा सकता. फर्क यह है कि अब योगी सार्वजनिक रूप से यह घोषणा करते हैं कि अपराधी उनके राज्य से चले जाये, वरना उन्हें खत्म कर दिया जायेगा. लेकिन यह जानना दिलचस्प होगा कि उनकी इस बात की घोषणा के बावजूद हाल में मारा गया विकास दुबे अब तक अपने अपराध का साम्राज्य कैसे चलाता आ रहा था?

कभी नक्सलवाद के खात्मे के नाम पर, कभी आतंकवाद को समाप्त करने के नाम पर, कभी अपराध के सफाये के नाम पर एनकाउंटर का सहारा लिया जाता है. और हर एनकाउंटर हमारी ही न्यायिक प्रक्रिया की धज्जियां उड़ाता है. पुलिस को या सुरक्षा बलों को यह इख्तियार देता है कि वह किसी को भी अपराधी के रूप में चिन्हित करे और उसे मार डाले. गौर से देखेंगे तो कुछ अपवादों को छोड़ कर एनकाउंटर के नाम पर मारे जाने वाले लोग वंचित जमात के लोग होते हैं.

कुछ वर्ष पूर्व आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि एनकाउंटर करने वाले पुलिसकर्मियों पर हत्या का मामला चलना चाहिए और खुद को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी उन्हीं की होनी चाहिए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि कस्टोडियन डेथ की मैजिस्ट्रेट से जांच होनी चाहिए. उनकी स्वतंत्र जांच सीआईडी या फिर किसी दूसरे थाने के सीनियर पुलिसकर्मियों से करानी चाहिए. लेकिन सामान्यतः जांच का काम उन्हें ही शौंप दिया जाता है जो एनकाउंटर के लिए जिम्मेदार होते हैं. मैजिस्ट्रेट की जांच की हकीकत यह है कि 2017 से अब तक उत्तर प्रदेश में जिन 74 मामलों की जांच की गयी, उन सबमें पुलिस को क्लियर चिट दे दिया गया.

यह संभव है कि पुलिस यदि कथित अपराधी को पकड़ने गयी हो तो दोनों पक्षों में गोलीबारी हो और दोनों पक्षों में लोग मारे जा सकते हैं. लेकिन कस्टोडियन डेथ, यानि कथित अपराधी पुलिस की हिरासत में हो और उसकी मौत हो जाये तो उसकी ज्म्मिेदारी पुलिस की होनी ही चाहिए. अपवाद स्वरूप यदि अपराधी के भागने और उसके हमले की घटना हो और वह मारा जाये तो उसकी सक्षम व स्वतंत्र एजंसी से जांच होनी ही चाहिए.

हमारे पास एक विस्तृत व लिखित संविधान है. हर तरह के अपराध और समाज विरोधी कार्यों के लिए सजा भी सुनिश्चित है. लेकिन अपराधी को चिन्हित करने, उसके खिलाफ अनुसंधान करने और उसे सजा देने का काम किसी एक संस्था का नहीं. पुलिस और अन्य जांच एजंसियों का काम अपराधियों को पकड़ना, उस पर लगे आरोपों की जांच करना और उसे अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना है. सजा देने का काम अदालतों का है. एक न्यायिक व्यवस्था है और उसमें एनकाउंटर का कोई प्रावधान नहीं.

दरअसल, इस देश में ‘हर जान की कीमत है’ का आंदोलन चलाने की जरूरत है.

‘क्लाॅसट्रोफोबिक’ होने की त्रासदी

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एक अमेरिका पुलिस अधिकारी के घुटने के नीचे दम तोड़ते दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश अमेरिका के अश्वेत नागरिक जार्ज फ्लायड द्वारा मरने के चंद मिनट पहले उच्चरित एक शब्द ‘क्लाॅसट्रोफोबिक’ मुझे बेचैना किये हुए है कई दिनों से. पूरा वाक्य है- आई एम क्लासट्रोफोबिक, यानि मैं क्लासट्रोफोबिया का शिकार व्यक्ति हूं. इसकी हिंदी है ‘संवृतिभीत’. लेकिन उससे इस शब्द की पीड़ा और त्रासदी स्पष्ट नहीं होती, न इस शब्द के पीछे छिपे अश्वेतों के लंबे बर्बर शोषण के इतिहास का ही कोई अंदाजा होता है. मैंने अंग्रेजी हिंदी डिक्शनरी देखी. गुगल पर सर्च किया और अर्थ और उसके पीछे का दारुण इतिहास खुलता चला गया.

क्लाॅसट्रोफोबिया दो शब्दों के मेल से बना है. लैटिन शब्द क्लाॅसट्राम और ग्रीक शब्द फोबिया. लैटिन शब्द क्लाॅसट्राम का अर्थ है एक छोटी सी बंद जगह. और ग्रीक शब्द फोबिया का अर्थ हुआ फीयर/ भय. पूरे शब्द का अर्थ बताया गया है – ‘एबनाॅर्मली एफरेड आॅफ क्लोज्ड इन-प्लेस.’ एक और आशय बताया गया है ‘द क्लासट्रोफोबिया आॅफ टिनी हाउस.’ एक छोटा सा कमरा जिसमें खिड़कियां न हों, का भय. इस रोग के लक्षण क्या हैं?
पसीना और कंपन, बेहोशी और सर में चक्कर, मुंह सूखना, तेज सांस लेना, सरदर्द, छाती में कसाव, दर्द और सांस लेने में कठिनाई, पेशाब आना आदि.
जिन्हें बंद कमरे में रखा जाता है, वे इस रोग के शिकार हो सकते हैं. बंद कमरे में रखे जाने की कल्पना से भी रोग बढ़ता है. यह भय ‘जेनेटिक फैक्टर’ से भी हो सकता है.

अंदाजन पांच फीसदी अमेरिकन इस रोग के शिकार है. जाहिर है, उनमें से अधिकांश अश्वेत हैं.

मैं यह सब पढ़ता रहा और मेरी आंखों के समक्ष चलचित्र की तरह घूमता रहा अफ्रिकन देशों के विभिन्न बंदरगाहों से गुलाम बना कर लाये जाने वाले अश्वेतों का इतिहास. एक खास तरह के जहाजों पर लाद कर उन्हें यूरोपीये देशों के विभिन्न बंदरगाहों पर लाया जाता. अमानवीय परिस्थितियों में समुद्री यात्रा करते जंजीरों में जकड़े लोग, जिनमें से बहुतेरे यात्रा के दौरान ही मर जाते, अमेरिका और अन्य यूरोपीये देशों के बंदरगाहों पर जिनकी नीलामी होती और बड़े-बड़े लैंडलौर्डस जिन्हें खरीद कर अपने साम्राज्य में ले जाते. गन्ने और तंबाकू के खेतों में उन्हें जानवरों के तरह जोत दिया जाता. रहने के लिए दिये जाते अंधेरे, बंद बदबूदार कमरे. भागने पर तहखानों में बंद किया जाता. मारा पीटा जाता. कहा जाता है कि गुलामों के बर्बर शोषण से ही वह पूंजी पैदा हुई जिससे औद्योगिक क्रांति हुई और संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का जन्म भी.

लेकिन अफ्रीकन देशों से लाये गये अश्वेतों को अपनी गुलामी से मुक्ति के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा और आज भी उनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं. उन्हें समानता का संवैधानिक अधिकार तो मिला, लेकिन उनके जीवन की परिस्थितियां बहुत नहीं बदली हैं. उनके रहन सहन के स्तर में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है. वे सामान्यतः महानगरों के हासिये पर रहते हैं. कठोर श्रम करने के बावजूद उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं. सबसे गंभीर बात यह कि प्रच्छन्न रूप से वे नस्ली नफरत की धीमी आंच से हर वक्त घिरे रहते हैं.

और नस्ली नफरत की आंच कैसी है?
महज सौ वर्ष पहले ओमहा नस्ली दंगों के दौरान पहले एक अश्वेत शिकार की लिंचिंग की गयी और फिर उसे जलाया गया. नफरत की पराकाष्ठा यह कि जलते हुए बिल ब्राउन के साथ गोरो ने तस्वीर खिंचवायी. उस जमाने में इस तरह के पोस्टकार्ड बना कर वितरित करना एक लोकप्रिय तमाशा था. यह घटना 1919 की है.

और नफरत की वह आग अभी बुझी नहीं जिसके ताजातरीन गवाह बने जार्ज फ्लायड.

इसलिए कोरोना संकट से आक्रांत अमेरिका में विद्रोह प्रबल है. और गूंज रहा है नारा – ‘ब्लैक लाईव्स मैटर’.

छाता साग: आदिवासी जीवन से जुड़ी कोमल पत्तियां

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    इस बात को बहुत सारे लोग मानते हैं कि मानव जाति के विकास के क्रम में खाद्य-अखाद्य वनस्पतियों की पहचान में आदिवासियों ने अहम भूमिका निभाई है. वन संपदा, दवा के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली सैकड़ों किस्म की जड़ी-बूटियों की खोज और उन्हें बचाने का काम आदिवासी समाज ने ही किया है. इसलिए प्राकृतिक आपदाओं और महामारियों को भी आदिवासी समाज झेल लेने की कुव्वत रखता है. बस, जल, जंगल, जमीन पर उसका अधिकार बना रहे, वह जीने का रास्ता खोज लेता है.
    उदाहरण के लिए कई तरह के साग -सब्जी हम सभी खाते हैं. सागों का सभी के जीवन में उपयोग है. उन्हें विटामिन से भरपूर माना जाता है. लेकिन सामान्यतः सागों के रूप में हम उन्हीं सागों का इस्तेमाल करते हैं जिनकी मौसम के हिसाब से खेती होती है. पालक, गांधारी, भथुआ, मेथी, चना का साग आदि. लेकिन आदिवासी समाज इन प्रचलित सागों के अलावा कई ऐसे सागों का भी इस्तेमाल करता है जिसकी वह खेती नहीं करता, बस उसे प्रकृति पैदा करती है और वह भी सहज सुलभ है. ऐसा ही एक साग है छाता साग. मैंने गुगल में इसके बारे में पता लगाने की कोशिश की, लेकिन कुछ पता नहीं चला. इसलिए जितनी जानकारी मुझे है, वह यहां रख रहा हूं.
  • chata sag
    छाता साग मार्च-अप्रैल के इन्हीं महीनों में स्वतः जमीन से फूट पड़ता है. कोमल सा तना और उस पर तीन नन्हीं-नन्हीं पत्तियां. धान के खेतों में धान कटने के बाद पानी रहता है. पानी के सूखते ही नम जमीन पर दुनियां भर के खर पतवार निकल पड़ते हैं. धरती पर एक हरी चादर बिछ जाती है. जाहिर है, वह उन्हीं खेतों या उसके आस पास पैदा होती है जहां धान कटने के बाद जमीन परती छोड़ दी जाती है. उन इलाकों में नहीं, जहां धान कटने के बाद कुछ ही दिनों के अंतराल पर गेंहू या कोई अन्य फसल लगा दी जाती है.
    तो, बेशुमार उगे उन खर पतवारों से खाने योग्य कई पौष्टिक व सुस्वादु साग आदिवासी समाज ढ़ूढ निकालता है. उन्हीं में से एक है छाता साग. हालांकि, उन्हें पहचान कर तोड़ना एक कठिन काम है. सामान्य घरों की औरतें तो अब पीढ़े के बगैर बैठ ही नहीं सकती ज्यादा देर, और उस साग को तोड़ कर इकट्ठा करने में काफी समय लगता है. कोई लड़की एकाध घंटे धीरज और लगन से पत्ते तोड़ने का काम खेतों में बैठ कर कर सके, या लगातार झुक कर कर सके, तभी एक शाम के लिए साग इकट्ठा हो पाता है.
    आदिवासी लड़कियां या औरतें यह काम बहुधा दो चार लोगों के साथ मिल कर करती हैं. आपस में बतियाते, कभी-कभी कुछ गुनगुनाते हुए भी. और कुछ घंटों में इतना साग इकट्ठा कर लेती हैं जिससे छोटे परिवार के लिए एक शाम की सब्जी हो जाये. वैसे, उन पत्तियों को सुखा कर पाउडर बना कर भी खाने का रिवाज है. और यह सिलसिला उस वक्त तक जारी रहता है जब तक धान की अगली फसल के लिए खेतों को जोत नहीं दिया जाता.
    यह साग इस मौसम में घर की क्यारियों और गमलों में भी उग आता है. लेकिन गैर आदिवासियों के लिए इसका मोल नहीं. यदि बाजार में यह बिकने लगे तो शायद लोग खरीद कर इसे खायें, लेकिन बहुतायत से होने के बावजूद इसे तोडना आसान नहीं और तोड़ कर बेचना व्यावसायिक रूप से फायदेमंद नहीं. इसलिए यह साग आदिवासी समाज के लिए बचा हुआ है और कठिन समय में उनके काम आता है और उनके भोजन को जायकेदार बनाता है.

जो हम डिजर्व करते हैं, वही हमें मिलता है

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पता नहीं यह किसका कहा हुआ सूत्र वाक्य है – जो हम डिजर्व करते हैं, वही हमे मिलता है. मोदी जी को सुनते हुए यह एहसास तीव्र होता है कि इस देश को ठीक वैसा ही प्रधानमंत्री मिला है, जैसा यहां के लोग डिजर्व करते हैं. कोरोना से पूरी दुनिया आक्रांत है. कतिपय कारणों से हमारे देश में यह तमाम तरह की लापरवाहियों के बावजूद विकराल रूप में अब तक प्रकट नहीं हुआ है. लेकिन संकट तो बरकार है. और सामान्य से सामान्य बुद्धि विवेक वाला आदमी इस बात को समझ सकता है कि इस भीषण संकट का मुकाबला टोटकों से नहीं हो सकता, इसका मुकाबला तो वैज्ञानिक तौर तरीको से ही हो सकता है. सफाई, संक्रमण होने पर समुचित इलाज, संक्रमण दूसरे में न फैले, इसके लिए समुचित उपाय आदि. जमीनी हकीकत यह है कि हमारे यहां इस फ्रंट पर लड़ने वाले डाक्टरों, नर्सो और सफाईकर्मियों के लिए जरूरी सुरक्षा उपकरण नहीं, मास्क तक की कमी है, अस्पतालों में वेंटीलेटर की नितांत कमी, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री टोटकों से इसका मुकाबला करते दिख रहे हैं और पूरे आत्मविश्वास से जनता को भी इन टोटकों पर विश्वास करने की सलाह दे रहे हैं. अपने पिछले संबोधन में उन्होंने ताली, थाली, शंख आदि बजाने की सलाह दी थी और अपने कल के संबोधन में निर्धारित समय पर दीप, मोबाईल या टार्च जलाने की सलाह दी है. अब सिर्फ मंगल गीत गाने की सलाह रह गयी है.

विडंबना यह कि लोगों को इस पर विश्वास भी है. क्योंकि कोरोना से लड़ने की इस मूढ़तापूर्ण टोटकों को मोहक शब्दावली के साथ पेश किया गया है और जोड़ा गया है- अंधकार से प्रकाश की तरफ जाने का संघर्ष, एक बड़े संकट से मिलजुल कर लड़ने का संकल्प आदि. लेकिन क्या वास्तव में इन टोटकों से कोरोना से लड़ने में हमे मदद मिलने जा रही है? क्या ये टोटके हमें अंधविश्वास के महा अंधकार की तरफ ही और नहीं ढ़केलने वाले हैं?

हम सामान्यतः मान कर चलते हैं कि बहुसंख्यक आबादी साक्षर तो है, लेकिन शिक्षित नहीं और तरह तरह के अंधविश्वासों में फंसी हुई है. लेकिन क्या हमारा शिक्षित वर्ग, बौद्धिकों की जमात अंधविश्वासों से मुक्त है? मूढ़ता तो हमारी राष्ट्रीय पहचान बन चुकी है. हमारे गृहमंत्री युद्धक विमान खरीदने और लाने जाते हैं तो विमान के चक्कों के नीचे नींबू रखते हैं. आंतरिक्ष वैज्ञानिक अपने अभियान के पहले मंदिर जाकर मत्था टेकते हैं, हर महत्वपूर्ण कार्य के पहले नारियल फोड़ना जरूरी माना जाता है, राजनीतिक दलों के अधिकतर नेता चुनाव अभियान शुरु करने के पहले धार्मिक स्थलों के चक्कर लगाते हैं.

लेकिन क्या वास्तव में बौद्धिक जमात या समाज का प्रभु वर्ग इतना ही मूढ़ है जितना दिखता है? डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, शिक्षक, उच्च शिक्षण स्ंसथानों में पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले मूढ़ता का सार्वजनिक प्रदर्शन करते वास्तव में मूढ़ हैं? अंधविश्वास के शिकार हैं? मोदी के बताये टोटकों पर विश्वास करते हैं? दरअसल, कुछ तो वास्तव में पढ़ लिख कर भी मूढ़ होते हैं और कुछ मूढ़ता का नाटक करते हैं. उन्हें जिस तरह मनुवाद से, वर्ण व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप से, भाग्यवादी जीवन दर्शन से शोषण और विषमता पर आधारित इस व्यवस्था को बनाये रखने में मदद मिलती है, उसी तरह अंधविश्वास और टोटकों पर बनाये रखने से भी. इसलिए समाज का प्रभु वर्ग सचेतन ढंग से इस मूढ़ता को ग्लोरीफाई करता है और बहुसंख्यक आबादी का रोल माॅडल बनता है, भले ही वह खुद इस पर यकीन करे न करे.

यह बात भी समझने की है कि सामाजिक विसंगतियां, कुव्यवस्था और भ्रष्टाचार जैसे मामले जहां सत्ता के प्रति आक्रोश पैदा करते हंै, वही अंधविश्वास और टोटके इस आक्रोश को कम कर आम जनता के बीच के वर्गीय विषमताओं को पाट कर जोड़ने का काम करता है. मोदी की ताकत दरअसल भाजपा समर्थक वोटर हैं, लेकिन जब इस तरह के टोटके आजमाये जाते हैं तो पूरा विपक्ष भी धाराशायी हो जाता है. क्या मोदी के कल रात के आह्वान का झामुमो, कांग्रेस या अन्य विपक्षी दल के कैडर विरोध कर मूढ़ता के दीपोत्सव में शामिल नहीं होंगे? मुझे लगता है, होंगे. राजनीतिक चेतना को अंधविश्वास और टोटकों का कुहासा ढक लेगा.

कल बालकोनियों वाले फ्लैटों और बहुमंजिली इमारतों में तो नौ मिनट का दीपोत्सव होगा ही, जो बहुमंजिली इमारतों में नहीं रहते, वे भी इस भेड़ चल में शामिल होंगे. और ऐसी जनता के लिए मोदी एकदम फिट प्रधानमंत्री हैं.

कोरोना के मूल में है हमारी जीवन शैली

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सामान्यतः महामारी गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, स्वच्छता के प्रति लापरवाही आदि से पैदा होती है, लेकिन इस बार जिस तरह इसकी शुरुआत हुई और जिन देशों में इनका विस्तार हुआ, वे न तो गरीब मुल्क हैं और न अशिक्षित. स्वच्छता को लेकर भी उनमें अन्य एशियाई और अफ्रीकी देशों ज्यादा जागरूकता दिखाई देती है. कोरोना वाईरस से अब तक करीबन 416686 लोग पूरी दुनियां में संक्रमित हुए हैं. इनमें से सर्वाधिक चीन, इटली, अमेरिका, स्पेन, जर्मनी, इरान और फ्रांस के हैं. ये वे मुल्क जहां संक्रमित लोगों की संख्या 14 हजार के आंकड़े को पार कर चुकी है. पहले नंबर पर चीन है जहां संक्रमित लोगों की संख्या 81439 को पार कर चुकी है. दूसरे नंबर पर है इटली जे 69176 का आंकड़ा और तीसरे नंबर पर अमेरिका जो 53358 का आंकड़ा पार कर चुका है. तथाकथित पिछड़े और गरीब देशों में संक्रमित रोगियों की संख्या गिनती के हैं. उदाहरण के लिए भूख से मौतों के लिए विख्यात सोमालिया, युगांडा, आदि देशों में दो चार लोग अब तक संक्रमित हुए हैं. आबादी के लिहाज से चीन के बाद सबसे बड़ी आबादी वाले भारत में अब तक 600 संक्रमित मामले दर्ज किये गये हैं जिसमें 43 विदेशी मूल के हैं. भारत में मरने वालों की संख्या 10 तक पहुंच गयी है. पूरी लिस्ट आप गूगल पर जा कर देख सकते हैं.

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कहना यह है कि इस कोरोना वायरस से प्रभावित मुल्क विशेष रूप से वे हुए हैं जो साधन संपन्न और दुनियां के शक्तिशाली मुल्क हैं. तकनीकि दुष्टि से भी और पर कैपिटा खर्च करने की कुव्वत की भी दृष्टि से. ये वे मुल्क हैं जो दुनिया में दादागिरि करते हैं, हथियारों का व्यापार और पर्यावरण से सबसे अधिक खिलवाड़. खान पान की दृष्टि से देखें तो ये वे मुल्क हैं जो सबसे अधिक डब्बाबंद भोजन, बोतलबंद पानी का इस्तेमाल और व्यापार करते हंै. जिनका काम सेनिटरी नेपकिन, टिसू पेपर और सेनिटलाईजर के बगैर नहीं चल सकता. चीन राजनीतिक रूप से कम्युनिस्ट देश है, लेकिन आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनने के लिए उसने निर्मम पूंजीवाद के तमाम टोटके अपनाये हैं. वनों के विनाश, जैव विविधता को नष्ट करने में वह अमेरिका से जरा भी पीछे नहीं.

इस तथ्य को हम अपने देश में भी देख सकते हैं. अपने देश में भी इस रोग से संक्रमित लोगों की संख्या उन राज्यों में ज्यादा नजर आ रही है जो प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से, शिक्षा और आधुनिक जीवन शैली की दृष्टि से आगे हैं. सर्वाधिक केस महाराष्ट्र में, फिर केरल में, फिर हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में. उत्तर प्रदेश हरियाणा की तुलना में तीन गुना बड़ा है, फिर भी दोनों राज्यों में दो दिन पहले तक 16-16 संक्रमित लोग पाये गये. पश्चिम बंगाल और ओड़िसा में इक्के दुक्के मरीज. तथाकथित पिछड़े बिहार में अन्य राज्यों से मजदूरों की वापसी के बाद संक्रमित कुछ संक्रमित मरीज और झारखंड में अब तक संक्रमित मरीज नहीं.

संक्षेप में कहें तो पूंजीवाद, उपभोक्तावादी जीवन शैली को जन्म देता है. प्रकृति का अंधाधुंध दोहन, जल, जंगल, जमीन का सर्वनाश, और पैदा हुई अकूत संपदा, जो समाज के कुछ लोगों के बीच ही केंद्रित होती चली जाती है, के बदौलत एक ऐसी जीवन शैली जो भीतर से लोगों को कमजोर कर रही है. उनके अंदर की प्रतिरोधक क्षमता को खत्म करती है. जो बोतलबंद पानी पर इस कदर निर्भर हो जाते हैं कि कभी बाहर का पानी पीते ही बीमार हो जाते हैं. थोड़े से बुखार में पैरासिटामोल, सरदर्द में गोली, किसी तरह के इनफेंक्शन में एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन, आदि. विडंबना यह कि इस बार कोरोना वाईरस के ऐसे ही लोग वाहक बने हैं.

इस चिंतन धारा का ही विकृत रूप है यह प्रचार कि जीवन के लिए रोटी, कपड़ा, मकान से ज्यादा महत्वपूर्ण है वीमा. कम से कम शारीरिक श्रम, डब्बाबंद भोजन, बोतलबंद पानी, हर छोटे बड़े रोग के लिए रंग बिरंगी गोलियां से बीमार तन और मन के लिए वीमा-स्वास्थ वीमा सचमुच आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गयी है. लेकिन वीमा कंपनियां इलाज के लिए पैसा दे सकती हैं, रोग से लड़ने की ताकत नहीं. कोरोना ऐसे वाइरस से बचाना तो उनके वश में जरा भी नहीं.

आप पूछेंगे, तो कैसी जीवन शैली चाहिए?

तो पहले हम आपको बतायेंगे ऐसी बात जिससे आपको खींज झल्लाहट से भर जायें. आदिवासी गांवों इलाकों में आप जायेंगे तो आपको खोजे से भी थर्मामीटर नहीं मिलेगा. लोगों को थर्मामीटर देखने आता ही नहीं. बुखार आया तो दो चार दिन सहा, आराम कर लिया. ठीक हो गये. या फिर घरूलु दवाओं का सेवन, अंत में किसी डाक्टर के पास गये. आप कहेंगे, यह जहालत है. तो इस तथ्य को जान लीजिये की अभी तक अपने देश में पांचवीं और छठी अनुसूचि वाले इलाके में ही करोना वाईरस नहीं पहुंचा है. वैसे, छत्तीसगढ़ में कोरोना वाईरस से संक्रमित कुछ मामले सामने आये हैं. इन इलाको में भी कोरोना वाईरस पहुंच सकता है, क्योंकि अब बाहर के राज्यों से आवाजाही बढ़ी है. लेकिन यह तो मानना ही होगा कि इन इलाकों में रहने वालों की प्रतिरोधक क्षमता अन्य लोगों से बेहतर है.

तो, हमें प्रकृति से साहचर्य वाली जीवन शैली चाहिए, सीधा-सरल जीवन चाहिए. सफाई चाहिए, लेकिन सफाई की सनक नहीं. जरूरत पड़ने पर बिना बोतलबंद पानी पीने की भी आदत होनी चाहिए. थोड़ा शारीरिक श्रम भी जरूरी है. दवाओं पर निर्भरता कम हो, ताकि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बनी रहे. और आस पास के हर जीव-जंतु या वस्तु को उपभोक्ता माल नहीं समझना चाहिए. कोरोना से ग्रसित होने या आतंकित हो कर अपने बालकोनी में खड़े हो कर गाना नहीं, सामान्य दिनों में भी थोड़ा नाचना, गाना चाहिए.

और मौत आये तो सहज भाव से स्वीकार करना चाहिए, उससे डरना और आतंकित होना तो बेवकूफी ही है.