Category Archives: साहित्य-संस्कृति

एक अनूठा मंचन

12 फरवरी की शाम शांतिनिकेतन के कला विभाग के प्रांगण में एक अनूठा नाट्य मंचन देखने को मिला. खुले आकाश के नीचे, एक विस्तृत प्राकृतिक मंच, सीमित नाट्ट उपादान, प्रकाश व ध्वनि व्यवस्था. सबसे मजेदार पहलू यह कि जब नाटक के कलाकार कथा के प्रवाह में भागते हुए एक जगह से उठ कर कुछ फर्लांग की दूरी पर अवस्थित मंच पर पहुंचे तो दर्शकों का समूह भी गिरते पड़ते दूसरी जगह पहुंच गया. दोनों स्थानों पर मंच, धरती और भीमाकार पेड़, झाड़ झंकार ही बने थे. लेकिन थोड़ी सी कल्पनाशीलता और प्रकाश व्यवस्था से पहले वाली जगह यदि एक गरीब परिवार का घर था तो दूसरी जगह कारपोरेट जगत की मायावी दुनियां.
लेकिन क्या वह नुक्कड़ नाटक था. यकीनन नहीं. नुक्कड़ नाटक किसी नुक्कड़ या चैराहे पर होता है और दर्शक मंच के चारों तरफ वृत्ताकार इकट्ठा होते हैं. लेकिन यह मंचन खुले प्रांगण में होने के बावजूद दर्शकदीर्घा और मंच में बंटी हुई थी. किसी भवन की दीवार मंच की सीमा बनी थी और सामने कुर्सियां लगाई गयी थी. गरीब मुस्लिम परिवार के घर का सृजन महज दो जलते चूल्हें, उन पर चढ़ी मिट्टी की हंडियां, उनसे उठता धुंआ, एक खाट और एक कुएं से कर दिया गया था. और नये दौर की रुपहली मायावी दुनियां का संयोजन तो महज वृक्षों पर छितराई हरी रौशनी मात्र से कर दिया गया था.
नाटक में सिर्फ चार पात्र. पति, पत्नी, एक बच्ची, मायावी दुनियां की प्रतिनिधि बन कर उनके जीवन में आई एक गोरी मेम और एक बुजुर्ग पात्र जो सूत्रधार के रूप में बीच बीच में आता है और कुछ गा कर, कुछ कह कर कहानी को आगे बढाता है. कहानी कुल मिला कर यह कि एक गरीब मुस्लिम परिवार से उसकी जमीन हड़पने की नीयत से एक गोरी मेम उसके यहां आती है. उसे चमकीले पैकेट बंद खाद सामग्रियों और पेय आदि से लुभाती है और उसे अपने सम्मोहन में बांध कर अपनी मायावी दुनियां में ले जाती है. उसकी पत्नी स्त्री सुलभ अपनी सहज बुद्धि से उसे बार बार बार रोकती है लेकिन वह नहीं मानता. उसे लगता है कि वह उसके विकास की राह की अवरोधक है. वह नई दुनियां का हिस्सा बनना चाहता है. लेकिन अपना सर्वस्व गंवा कर मृत्यु को प्राप्त होता है और फिर मंच पर प्रवेश करता है एक भीमाकार बुलडोजर. रात के अंधेरे और सीमित प्रकाश के साथ उसकी गर्जन और बड़े बड़े नोकदार मुंह नाटक से एकाकार हो जाते हैं. दर्शक कुछ देर के लिए सहम तो जाते हैं, लेकिन फिर उसके प्रवेश के लिए रासता बना देते हैं.

शांतिनिकेतन में तीन दिन

लगभग दो दशक बाद शांतिनिकेतन गया. अच्छा लगा. कुछ बातों के लिए अफसोस भी. अफसोस इस बात के लिए कि जितना अभिमान और  शांतिनिकेतन के लिए प्रेम बंभाषियों के मन में है, उतना अभिमान हिंदी बिहारियों को नालंदा के लिए क्यों नहीं? शांतिनिकेतन की सहजता मन को भाती है, नालंदा की भव्यता अभिभूत करती है. लेकिन उसे लेकर बिहारियों के मन में वह आह्लाद नहीं, जितना शांतिनिकेतन को लेकर बंगभाषियों के मन में है. शांतिनिकेतन को बंगभाषियों ने तीर्थस्थल बना दिया है. वे सालो भर झुंड बना कर वहां पहुंचते है. पौष मेला और होली के वक्त आयोजित होने वाले डोल यात्रा के वक्त तो बहुत बड़ी संख्या में.
हालांकि, तकनीकि पढाई के इस दौर में शांतिनिकेतन के प्रति अब छात्रों का वह आकर्षण नहीं रहा. साहित्य और कला जैसे विषयों के प्रति ही आकर्षण घटा है. शांतिनिकेतन भी नई स्थितियों के अनुरुप खुद को ढालने की कोशिश कर रहा है.  कला और साहित्य से इतर विषयों की पढाई भी वहां होने लगी है. लेकिन आकर्षण के केंद्र हैं वही पुराना दौर. कविवर रवींद्रनाथ के शुरुआती दौर के चित्र, उनके जीवन से जुड़ी वस्तुओं का संग्रहालय, खुले प्रांगण में बने रामकिंकर की बनाई  सिमेंट और कंकरीट की आदमकद मूर्तियां.
इन मूर्तियों में महत्वपूर्ण है संथालों से जुड़ी मूर्तियां. उन मूर्तियों में उनका सौष्ठव और उनके जीवन की गति देखते ही बनती है. राज्य सरकार की मदद से शांतिनिकेतन के करीब ही एक शिल्प ग्राम भी बनाया गया है जहां बिहार, बंगाल, ओड़ीसा, मिजोरम, मणिपुर और अंडमान निकोबार के जनजातीय जीवन और लोक संस्कृति की झांकिया स्थापित की गई हैं. आप को वह सब अभिभूत तो करेगा, लेकिन एक तरह के आतंक से भी भर देगा. वह यह कि यह सब झांकियों में ही तो कही नहीं रह जायेगा? क्योंकि बाहर तो उपभोक्तावादी संस्कृति और बहुदेशीय कंपनियों का बुलडोजर चल रहा है.
यह महज इत्तफाक है कि वहां एक शाम हमे प्रकृति के खुले मंच पर कलाभवन के प्रांगण में एक नाटक देखने का अवसर भी मिला. एक गरीब मुस्लिम परिवार की जमीन हड़पने के लिए उपभोक्ता संस्कृति और कारपोरेट जगत की प्रतिनिधि बन कर आई एक गोरी सुकन्या उनके यहां आती है. चमकीले कागज वाले पाकेटों और रंग बिरंगे खिलौनों से पुरुष को प्रलोभित करती है और उसे खींच कर उस दुनियां में ले जाती है जहां चमकीली सड़के हैं, माॅल है, उपभोक्ता वस्तुओं से भरा बाजार है. वह यह सब देख कर संभावित खुशी के अतिरेक में उसकी  मौत हो जाती है और उसके बाद वास्तव में एक विशालकाय बुलडोजर मंच पर प्रवेश करता है..

कहानी: भूरी आंखे

जो ईश्वर में विश्वास करेगा, वह आत्मा-परमात्मा में विश्वास करेगा. जो आत्मा परमात्मा में विश्वास करेगा, वह भूत प्रेत में विश्वास करेगा. जो भूत प्रेत में विश्वास करेगा, वह अन्य किस्म के अंधविश्वासों में भी विश्वास करेगा. ऐसी मेरी धारणा थी. और चूंकि मैं ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता था, इसलिए अपने बारे में मेरी समझ थी कि मैं हर तरह के अंधविश्वासों से भी मुक्त हूं. लेकिन कभी कभी मुझे अपने बारे में संदेह होता कि क्या वास्तव में मैं अनीश्वरवादी हूं? हर तरह के अंधविश्वास से मुक्त हूं? क्योंकि घर लौटते वक्त या घर से बाहर निकलते वक्त अचानक कोई बिल्ली मेरा रास्ता काट देती तो मैं इस बात से आक्रांत हो जाता कि कुछ न कुछ अनहोनी होने वाली है. हांलांकि मेरे जीवन में बिल्ली के रास्ता काटने से कभी कोई बड़ी अनहोनी नहीं हुई. हां, छोटी छोटी अनहोनियां हो जाया करती थी. मसलन, घर लौटते वक्त बिल्ली ने रास्ता काट दिया तो पत्नी से झपड़ हो जाती, इस वजह से कि मैं उसका कहा कोई सामान लाना भूल जाता या फिर ठीक घर की दहलीज पर कुछ देर के लिए बिजली गुल हो जाती या फिर पता चलता कि आज वाटर सप्लाई बंद रही है और टंकी भी खाली है.
इसी तरह का एक अन्य अंधविश्वास जिसका मैं शिकार था, वह यह कि जिनकी भूरी आंखें होती हैं, वे शातिर और धूर्त किस्म के लोग होते हैं. यदि वह स्त्री हुई तो अपने प्रेमी या पति से बेवफाई करेगी और यदि वह मर्द हुआ तो वह अपने मददगार के ही कंधे पर पैर रख कर आगे बढने में गुरेज नहीं करेगा. इस अंधविश्वास का मैं ने अपने तरीके से सामान्यीकरण भी कर रखा था. गोरी चमड़ी और भूरी-नीली आंखों वाले लोगों ने दुनिया के श्याम रंग और काली आंखों वाले लोगों का शोषण किया है. अब भी कर रहे हैं. मान सिंह, मीर जाफर और विभीषण की आंखे भूरी थी या काली, यह जानने का मेरे पास कोई यंत्र नहीं था, बावजूद इसके मैं ने धारणा बना ली थी कि उनकी आंखे भूरी ही होंगी. धूर्ततम प्राणी बिल्ली की आंखें  भूरी होती है. हालांकि इस बात के भी अनेकों अपवाद हैं. सभी हिंस्र पशुओं की आंखें भूरी ही होती हैं.
इसलिए मैं भूरी आंखों के प्रति अपनी शंका को अंधविश्वास ही मानता था, लेकिन यह जानते हुए भी कि यह एक किस्म का अंधविश्वास है, मैं भूरी आंखों वाले व्यक्ति से साबका पड़ते ही उसके प्रति शंकालु हो उठता था. मेरी खुशकिस्मती थी कि मेरे इर्द गिर्द के अधिकतर लोगों की आंखों की पुतलियां काली थी. मेरे परिजनों, अधिकतर दोस्तों, यहां तक कि जिस अखबार में मैं काम करता था, उसके अधिकतर सहकर्मियों की आंखों की पुतली काली ही थी. मेरे संपादक की भी.
हांलांकि उनकी आंखें अपने कक्ष में कुछ और होती और संपादकीय कक्ष के बाहर सार्वजनिक स्थलों पर कुछ और. यदि वे अपने अधिनस्थों से बात कर रहे होते तो उनमें उनके प्रति हिकारत का भाव भरा रहता, जबकि सार्वजनिक स्थलों में या कक्ष के बाहर उनमें गजब सहृदयता और मैत्री का भाव.
आंखों की भंगिमा के साथ साथ उनकी बातों का अंदाज भी संपादकीय कक्ष के भीतर और बाहर बदल जाता. संपादकीय कक्ष में अपने अधीनस्थों से बातचीत करते वक्त या सभाकक्ष में संपादकीय कर्मचारियों को संबोधित करते वक्त वे हांगकांग में हुई आर्थिक प्रगति और खुली अर्थ व्यवस्था और वहां की कार्य संस्कृति का हवाला देते, श्रम कानूनों को विकास के लिए अवरोध बताते, जबकि सार्वजनिक स्थलों पर तीसरी दुनियां के देशों के हमदर्द बन जाते. सभा कक्ष में अपने संपादकीय सहयोगियों से बात करते वक्त वे सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट के प्रवक्ता बन जाते जबकि उनका सार्वजनिक चेहरा लोकतांत्रिक समाजवादी का होता.
इस तरह के कई अन्य विरोधाभासों से भी उनका व्यक्तित्व महिमामंडित था. मसलन, वे दलितों, पिछड़ों, स्त्रियों और आदिवासियों के घोषित रूप से हिमायती थे, लेकिन उनके संपादकीय विभाग में इन समुदायों के कर्मचारियों का नितांत अभाव था. हां, स्वागत कक्ष में एकाध लड़कियां बहाल कर रखी थी. वे आदिवासियों की स्थिति से द्रवित थे, लेकिन राज्य की तरक्की के लिए कारपोरेट पूंजी और आदिवासियों के विस्थापन को आवश्यक मानते थे. मुझे कभी कभी ऐसा भी लगता कि चूंकि वे संपादक हैं, इसलिए इस तरह का अंतरविरोध उनके भीतर पनप गया है. आज का दौर पहले जमाने वाले संपादकों का तो रहा नहीं जो खुदाई खिदमतगार किस्म के हुआ करते थे. अब के संपादक संपादक कम और अखबार के प्रबंधक अधिक हुआ करते हैं. और चूंकि उन पर यह दोहरा कार्यभार रहता हैं, इसलिए उनका व्यक्तित्व भी दोहरा हो जाता है. लेकिन इन विरोधाभासों के बावजूद उनकी आंखों की पुतलियां काली थी और इसे मैं अपनी  खुशकिस्मती समझता था. वैसे भी मैं राजधानी से दूर एक जिला मुख्यालय में उनके कार्यालय संवाददाता के रूप में पदस्थापित था और उनसे मेरा साबका कम ही पड़ता था.
लेकिन आखिरकार मेरा साबका एक भूरी आंखों वाले व्यक्ति से पड़ ही गया. पत्रकार विरादरी में तरह तरह के लोग थे, उसमें से एक वह भी, लेकिन मैं उन्हें तवज्जो नहीं देता. वजह वही, गजब की भूरी आंखें. हालांकि वह मुझसे हमेशा विनम्रता से ही बात करते, लेकिन भूरी आंखों के प्रति अपने पूर्वाग्रह और अंधविश्वास की वजह से मैं हमेशा उनसे कतरा कर निकल जाता. लेकिन एक दिन दरवाजा खटखटाये जाने पर जब मैं ने दरवाजा खोला तो वही सामने खड़े थे.
तड़ से कमरे में आये और आगे बढ कर पैर छू लिए.
‘भईया..बस आपका आर्शीवाद चाहिए..’
मैं आवाक. ‘
‘मैं भी अब आपके अखबार में ही लिखूंगा ..संपादकजी से बात हो चुकी है बस आपका आर्शीवाद चाहिए…’
एकबारगी मुझे भरोसा नहीं हुआ. लेकिन वे भी उसी जाति बिरादरी के थे जिसके हमारे संपादक, इसलिए लगा कि वे सही भी हो सकते हैं.
‘ठीक है आप भी लिखें, इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं लेकिन एक बार मैं दफ्तर फोन कर लूं. उसके बाद आपको बताउंगा..’
कुछ देर इधर उधर की बातें कर वे चले गये.
आदिवासीबहुल इस अत्यंत पिछड़े इलाके के अलग राज्य के रूप में गठन के बाद से यहां की विपुल खनिज संपदा और कोल भंडार ने कारपोरेट जगत को इस राज्य का मुरीद बना दिया था. जिंदलों, मित्तलों, भूषणों की बाढ़ आ गई थी. उसके पीछे पीछे अनेक अखबर समूह भी. राज्य की राजधानी से तो अखबार निकल ही रहे थे, छोटे छोटे शहरों से भी उनके एडीशन या छोटे बड़े अखबार निकलने लगे थे. उनकी नजर नवगठित राज्य के सरकारी विज्ञापनों पर तो थी ही, कारपोरेट जगत से भी उन्हें बहुत उम्मीद थी. लेकिन सबसे बड़ी बात यह कि वे खुद किसी न किसी कारपोरेट के हिस्सा थे और अपने आका के व्यापारिक हितों की रक्षा करते थे. कोई बिड़ला का अखबार था तो कोई गोयनका का. कोयलांचल के कई अखबार लोहा माफिया द्वारा निकाले जा रहे थे. किसी का मकशद कोयला-लोहा का पट्टा हासिल करना था तो किसी का अपने औद्योगिक प्रतिष्ठान के लिए सहूलियतें हासिल करना. कोई महज इसलिए अखबार निकाल रहा था कि सरकारी अमले उन्हें हड़का नहीं सके. उदाहरण के लिए अगर वे बिजली इस्तेमाल कर रहे हैं और दस बारह करोड़ का बकाया हो जाये तो बिजली कोई नहीं काटे और उसे सरकार औद्योगिक विकास के नाम पर माफ कर दे.  कोई इसलिए कि राजनीतिक दल के लोग उनसे चुनाव के वक्त भारी भरकम चंदा मांगने नहीं चला आये. हालांकि मुझे जब मेरे संपादक के बारे में कोई यह कहता कि वह फला कारखाना के सीपीओ हैं तो मैं उससे लड़ पड़ता था.
इस गोरखधंधे का एक परिणाम यह भी कि अनेक हिंदी अखबार प्रदेश से निकलने के बावजूद मुफस्सिल पत्रकारों की दशा नहीं सुधरी थी. प्रदेश की राजधानी से निकलने वाले कुछ अखवारों के मुख्यालयकों को छोड़ अन्यंत्र सभी जगह पत्रकारिता की गरिमा का वहन स्ट्रिंगर ही कर  रहे थे जिन्हें आधुनिक शब्दावली में संवाद सूत्र कहा जाता है. इन स्ट्रिंगरों को नाम मात्र का पारिश्रमिक दिया जाता था जो 200 रुपये प्रतिमाह से हजार बारह सौ रुपये प्रतिमाह हुआ करता था. जाहिर है, इस नाममात्र के पारिश्रमिक से उनका जीवन चलना मुश्कल होता. इसलिए वे अपने डेट लाईन को चारागाह की तरह इस्तेमाल करते. जिस जनता जनार्दन की वे सेवा करते, उसी से जीवन यापन के लिए पैसे वसूलते. जिसकी जितनी हैसियत उतनी ही वह वसूली करता. बड़े नायाब तरीको का इस्तेमाल वे इसके लिए करते. समाचार फैक्स करने के नाम पर वे प्रेस कंफ्रेंस करने वाले नेता से सौ दो सौ रुपये वसूल लेते. प्रेस कंफ्रेंस कह कर आयोजित करवाते और जम कर खाते पीते. कुछ पत्रकार तो अपनी घरवाली और बच्चों के लिए भी खाना पैक करवा लेते. इसके अलावा मन माफिक खबर छपवाने के लिए नियमित रूप से अपने क्षेत्र के नेता, माफिया और उद्यमी से पैसे वसूलना आम बात थी. कुछ तेज तर्रार पत्रकार जिला प्रशासन से सांठगांठ कर ठेका, परमिट हासिल कर लेते या किसी को दिला कर उससे पैसे वसूल लेते. परिणाम यह कि अपने इलाके की वास्तविक खबर-तस्वीर कभी भी अखबारों में नहीं आ पाती.
शुरु शुरु में मुझे यह सब बेहद अनैतिक लगता था. लेकिन बाद में लगने लगा कि इसके लिए मुफस्सिल पत्रकारों को दोष देना सही नहीं. जिम्मेदार तो मूलतः अखबारों के संपादक और प्रबंधक हैं जो उन्हें पारिश्रमिक के रूप में इतनी राशि नहीं देते कि वे आत्मसम्मान के साथ जीवन बसर कर सकें. खुद मोटी रकम वेतन के रूप में लेना और पत्रकारिता की गरिमा बनाये रखने का उपदेश देना आसान है, लेकिन हजार पांच सौ रुपये पारिश्रमिक के रूप में प्राप्त करने वाले संवाद सूत्रों के लिए पत्रकारिता की गरिमा बचाये रखने का काम कितना मुश्किल होता होगा, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.
वैसे, हमारे संपादक को संवादसूत्रों की इस कठिन माली हालत का एहसास था. और उससे निबटने का उन्होंने एक तरीका निकाला था. उन्होंने छूट दे रखी थी कि उनके अखबार से जुड़े संवाद सूत्र अपने क्षेत्र में विज्ञापन जुटाये और विज्ञापन राशि का 20 फीसदी कमीशन के रूप में काट लें. सालों भर यह सिलसिला तो चलता ही रहता था, साल में दो तीन बार इसके लिए उन्होंने कृपा पूर्वक विशेष परिशिष्ट निकालने की छूट दे रखी थी. स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और राज्य गठन के स्थापना दिवस को विशेष परिशिष्ठ निकाले जाते. उस परिशिष्ठ में विद्वान लेखकों, समीक्षकों, समालोचकों के ज्ञान-विज्ञान से भरे लेख तो छापे ही जाते, लेकिन उसका मुख्य उद्देश्य संवाद सूत्रों को मदद करना होता था. उन्हें यह जिम्मेदारी और मौका दिया जाता कि वे अपने क्षेत्र के धन्ना सेठों, छोटे बड़े नेताओं, माफियाओं आदि से शुभकामना संदेश के रूप में विज्ञापन हासिल करें और कमीशन के रूप में इतनी कमाई कर लें कि अगले परिशिष्ठ के पहले तक उनके दाल रोटी का जुगाड़ हो जाये. यह अलग बात कि इससे अखबार की भी कमाई हो जाती थी. बस उन परिशिष्ठों से यह पता नहीं चलता था की उसमें फीलर के रूप में विद्वान लेखकों के लेखों का इस्तेमाल हुआ है या विज्ञापन के रूप में छपने वाले शुभकामना संदेशों का. दूसरी मुसीबत यह हो जाती कि संवाद सूत्र हर वक्त इस दबाव में रहते कि जिन लोगों से उन्होंने विज्ञापन के रूप में पैसा ले रखा हैं और जिससे उसे भविष्य में भी शुभकामना संदेश प्राप्त करनाा है, उसके खिलाफ कोई खबर कैसे छापें? 
लेकिन करना क्या था. दुनिया तो इसी तरह चलती है. मेरे मातहत भी लगभग दर्जन भर संवाद सूत्र काम कर रहे थे. अब एक और नया संवाद सूत्र, मैं ने सीधे संपादकजी से बात करने के बजाये समाचार संपादक को फोन लगाया. दुआ सलाम के बाद मैंने उनसे पूछा -‘आपलोगों ने यहां से किसी और को भी काम करने का निर्देश दिया है? वे मुझसे मिलने आये थे. इसकी क्या जरूरत थी?’
दूसरी तरफ से कहा गया.
‘ आपको क्या परेशानी है? विज्ञापन-सकूर्लेशन का काम देखेगा. इक्का दुक्का समाचार भी लिखा करेगा..’
ठीक ही कह रहे हैं समाचार संपादक. मुझे क्यों परेशानी होने लगी? अब उनसे क्या कहता, उस शख्स की आंखें भूरी है. जो होगा देखा जायेगा.
अगले दिन से हमारे नये सहयोगी ने काम करना शुरु कर दिया. वह भी पूरी रफ्तार से. मुझे भी लगा कि आदमी काम का है. पूरे दो पेज का मैटर हमे प्रतिदिन भेजना पड़ता था. इतना मैटर जुटाना कठिन काम था. इसलिए नये सहयोगी हमे काम के लगे. लेकिन धीरे धीरे मेरी मुश्किले बढने लगी. उनके द्वारा लिखी हर खबर से मुझे किसी न किसी तरह की पक्षधरता की बू आती. कोई खबर पढ कर लगता कि उसमें चाटुकारिता की हर सीमा को पार कर दिया गया है. तो, कुछ खबरे ऐसी होती जिसमें किसी एक पक्ष के खिलाफ आग उगला जाता. मैं ने अपने स्तर से उनकी लिखी खबरों को सुधारने की कोशिश करता. लेकिन आखिरकार आजीज आ कर समाचार संपादक से शिकायत की. उनकी तरफ से कह दिया गया कि मैं उनकी खबरों को बिना देखे मॉडम से भेज दूं.
मैं ठंढी सांस ले कर रह गया. यह मेरे लिए राहत की बात थी और चिंता की भी, क्योंकि यहां से भेजे जाने वाली खबरों के लिए मूलतः मैैंं ही जिम्मेदार था.
दूसरी मुसीबत यह हुई कि लगभग हर प्रेस सम्मेलनों में वे हमारे न चाहने पर भी वे मौजूद रहने लगे. मैंने एक दिन उन्हें समझाया कि किसी भी प्रेस कंफ्रेंस में एक अखबार से एक ही प्रतिनिधि का रहना उचित है. तो उन्होंने झटपट सलाह दे डाली- ‘भईया आप हर जगह क्यों जाते हैं. आप प्रभारी हैं. कार्यालय में बैठिये हम हैं न..’
हर बात की शिकायत मुख्यालय में क्या करता. मैं ने उनकी सलाह मान ली. महत्वपूर्ण प्रेस कंफ्रेंसों को छोड़ कर प्रेस कंफ्रेंसों में जाना छोड़ दिया. मेरे लिए सहूलियत कि बात इतनी थी कि जिन प्रेस कंफ्रेंसों में खाने और पीने की व्यवस्था नहीं रहती, वहां जाने में उनकी रूचि नहीं रहती. और जन पक्षीय समाचार तो इसी तरह की जगहों से मिलता है.
फिर भी अखबार की छवि उनके कारनामो से प्रभावित हो रही थी. लेकिन मेरे सामने उन्हें बर्दाश्त करने का दूसरा विकल्प नहीं था. क्योंकि डेस्क के लोगों से उनके मधुर संबंध बन चुके थे. कई बार मैंने इस संबंध में सीधे संपादक से बात करने का विचार किया, लेकिन मुझे इस बात का भी एहसास था कि जब उनके निर्देश पर ही उन्हें यहां मेरे साथ काम करने की अनुमति दी गई है तो फिर उनके खिलाफ वे सुनेंगे? लेकिन कुछ दिन बाद इसका मौका मिल ही गया.
हुआ यह कि एक नये अखबार ने राजधानी में लांच किया. अखबारों की ‘स्वस्थ प्रतियोगिता’ शुरु हो गई. कर्मचारियों को तोड़ना-जोड़ना, एक दूसरे का पोस्टर फाड़ना, हॉकरों की आपसी मार पीट, आदि आदि. हमारे शहर में भी अखबार एजंटों की लड़ाई शुरु हो गई. मुझे भी निर्देश मिला कि जहां अखबार उतरता है, वहां सुबह सुबह जाउं. फिर एक दिन अखबार के दफ्तर से बुलावा आ गया.
तड़के बस पकउ़ कर कार्यालय के लिए रवाना हो गया. कार्यालय पहुंचते थोड़ा बिलंब हो गया. पता चला कि सभी संवाददाता और संपादकीय सहयोगी सभा कक्ष में हैं. मैं भी वहां पहुंचा. पूरा कक्ष ठसाठस भरा हुआ था. और संपादकजी का भाषण चल रहा था.
‘….यह कंपीटीशन का जमाना है. जो सतत रूप से इसके लिए तैयार नहीं रहेगा, वह पिछड़ जायेगा और अंततोगत्वा उसका अस्तित्व मिट जायेगा. वे हमसे अधिक साधन संपन्न हैं. अनैतिक तौर तरीका इख्तियार करने में उन्हें परहेज नहीं. हम पहले भी इस तरह की चुनौतियों का सामना कर चुके हैं. आप सबों के सहयोग से हम इस बार भी मुकाबला कर सकेंगे…लेकिन कैसे? हमे साबित करना होगा कि हम उनसे भिन्न हैं. हमारे संवाददाता, हमारे अन्य संपादकीय सहयोगी सिर्फ इस परिसर के भीतर ही नहीं, जहां कहीं भी बाहर जाते हैं, उन्हें याद रखना होगा कि वे इस अखबार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. ऐसे में उन्हें अपने चरित्र और आचरण पर विशेष ध्यान देना होगा. उसके  बल पर ही कर सकते हैं हम उनका मुकाबला कर सकते हैं….मैं अपने तमाम प्रभारियों को सावधान करता हूं कि वे ऐसा कोई काम न करें जिससे अखबार की छवि प्रभावित हो..यदि उनके अधीन काम करने वाला कोई स्ट्रिंगर भी किसी तरह का गलत आचरण करता है तो इसके लिए वे ही जिम्मेदार होंगे….’
बड़ा ओजस्वी भाषण था. मैं प्रभावित तो हुआ ही, यह मंथन भी मेरे दिलो दिमाग में शुरु हो गया कि अपने नये सहयोगी के आचरण के लिए भी मैं ही धरा जाउंगा. लेकिन करूं क्या? किसी की शिकायत करना मेरे स्वभाव में नहीं था. लेकिन अब भी चुप रहा तो यह मेरे लिए परेशानी का सबब बन जायेगा. सभाकक्ष से निकल कर आफिस के कैंटीन में गया. संक्षेप में संपादकजी के नाम एक पत्र लिखा जिसमें नये सहयोगी के कार्यशैली का ब्योरा दिया. आफिस से निकलने के पहले डरते डरते संपादकजी के कक्ष में गया. उन्होंने हंस कर स्वागत किया.
‘कहिये, क्या बात है?’
‘आपका भाषण अच्छा था. हम अपने चरित्र और आचरण से ही खुद को उनसे भिन्न साबित कर सकते हैं…इसीलिए यह पत्र देने आया हूं..’
‘ क्या है इस पत्र में..’
‘आप खुद पढ लीजिये, फिर जैसा निर्देश देंगे करूंगा..’
‘ठीक है, आप पत्र छोड़ जायें. मैं दो तीन दिनों के लिए बाहर जा रहा हूं. लौट कर पढूंगा, फिर आपसे बात करूंगा..’
मैं नमस्कार करके बाहर निकल आया. अगले दिन वापस अपने कार्यक्षेत्र में. अपने आफिस के छोटे से केबिन में बैठ कर मैंने अपने संपादक के ओजस्वी भाषण के आलोक में अपने सहयोगी संवाद सूत्रों के लिए एक आचार संहिता बनाई जिसमें टाईम पर कार्यालय आने, शाम चार बजे तक समाचार फाईल कर देने, हर समाचार में संबंधित पक्ष से बात कर लेने, किसी भी प्रेस कंफ्रेंस में शराब न पीने आदि का निर्देश दिया गया था. मैं ने उस लिखित आचार संहिता को अपने ऑफिस के नोटिश बोर्ड पर चिपका दिया. किसी ने पढ कर मुंह बिचकाया, किसी ने व्यंग्य भरी मुस्कान से मेरी तरफ देखा.
मेरे नये सहयोगी ने आते ही पूछा – ‘यह क्या है भईया..’
‘ हमे दूसरे अखबार के पत्रकारों से भिन्न दिखना है…’
बत आई गई हो गई. मैं बेसब्री से अपने संपादकजी के फोन की प्रतीक्षा करने लगा. पता नहीं पत्र पढ कर उनकी क्या प्रतिक्रिया हुई हो. उनके कृपापात्र के खिलाफ शिकायत की थी मैं ने. अब जो हो, देखा जायेगा.
एक सप्ताह बाद उनका फोन आया.
‘…यह सब आपने पहले क्यों नहीं बताया? आप हमारे प्रतिनिधि हैं वहां. आज सेे ही उनकी छुट्टी कीजिये.’
फिर रूक कर बोले- ‘विज्ञापन का जो पैसा उनके यहां बकाया है, उसकी वसूली कैसे होगी? ऐसा कीजिये, उन्हें अभी कार्यमुक्त नहीं कीजिये. सिर्फ उनके समाचार भेजने पर प्रतिबंध लगा दीजिये. उनसे कहिये कि पहले कार्यालय आ कर बिज्ञापन के बकाये का हिसाब करें.’
कुछ ही देर में वे पहुंच गये.
‘भैईया…आज एकदम एक्सक्लूसिव खबर है..’
मैं ने ठंढे स्वर में कहा-‘संपादकजी ने आपको समाचार भेजने से मना किया है.’
वे आसमान से गिरे, फिर हत्थे से उखड़ गये. लेकिन समाचार फाईल नहीं किया. बहुत देर तक लाल पीले होते रहे. फिर दनदनाते हुए कार्यालय से निकल गये.
दिन बीतता जा रहा था. मुझे लगा कि उनसे छुटकारा मिल गया. लेकिन वह मेरा भ्रम था. शहर में एक बड़े नेता का भाषण होने वाला था. वे राष्ट्रीय स्तर के नेता थे और हमारे संपादक उनके बेहद करीबी. उन्होंने मुझे सूचित किया कि वे उनसे मिलने मेरे यहां आने वाले हैं. कार्यालय भी कुछ देर के लिए आयेंगे.
‘ आप नेताजी से कहा मिलेंगे..’
‘वह सब आप चिंता न करें. मैं उनसे मिल लूंगा..’
मैंने अन्य सहयोगियों को भी संपादकजी के कार्यक्रम की जानकारी दे दी और अगले दिन उनके आने की प्रतीक्षा करने लगा. दिन चढने लगा था. अचानक कार्यालय के कुछ दूर पर एक गाड़ी आ कर रूकी. आगे आगे हमारे संपादकजी और उसके पीछे-पीछे उनका बैग उठाये हमारे भूरी आंखों वाले सहयोगी चले आ रहे थे. इनकी तो छुट्टी हो गई. फिर उसे साथ लिए क्यों फिर रहे हैं संपादकजी. कही नेताजी से तो पैरवी नहीं भिड़ाई?
मैं प्रतीक्षा करने लगा कि वे मुझे निर्देश देंगे, उन्हें पूर्ववत काम करने दिया जाये. लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. उनके साथ हम सीटी सेंटर गये. एक होटल में सबों को नास्ता कराया. उसके बाद वे वापस हो गये.
दो दिन बाद मुझे अपने मुख्यालय से बुलावा आया. सुबह की ट्रेन पकड़ने के लिए मैं स्टेशन पहुंचा. आवाक रह गया उन्हें भी वहां देख कर.
‘मुझे भी बुलाया गया है..’
हम दोनों एक साथ सफर तय कर अपने मुख्यालय पहुंचे. हमारे पेज के प्रभारी ने मीठी मुस्कान से हमारा स्वागत किया. कुछ देर इधर उधर की बातचीत के बाद हमारे सहयोगी को वहीं बैठा कर वे मुझे लेकर संपादक के कमरे में चले आये. कुछ देर अनौपचारिक बातें. फिर काम की बात शुरु हो गई.
‘..तो आपने नई परिस्थितियों से निबटने की क्या कार्ययोजना बनाई है. खबरो की संख्या बढानी होगी. विज्ञापन का फ्लो बढाना होगा…सकूर्लेशन पर भी नजर रखनी होगी..’
‘खबरों की गुणवत्ता के लिहाज से हम नंबर वन है..’, मैं ने दबे स्वर में कहने का प्रयास किया.
‘ क्वालिटी नहीं, क्वांटिटी भी बढानी होगी. खबरों की संख्या बढानी होगी संख्या. इधर कई दिन हमारा अखबार हॉकरों ने नहीं उठाया आपने पता किया..’
‘हमारा अखबार नहीं, किसी का भी अखबार नहीं उठा. हॉकरो ने हड़ताल..’
‘आपने दफ्तर में फोन किया? ऐसे तो काम नहीं चलेगा..’
मैं आजीज आ गया था उनके तावड़तोड़ हमले से.
‘ क्यों न उन्हें फिर से काम पर रख लिया जाये..’
संपादकजी गुरु गंभीर बने रहे. फिर बोले-‘उन्हें बुलाओ..’
पेज के प्रभारी बाहर निकल गये. कुछ ही पलों में उन्हें साथ लेकर भीतर आये.
संपादकजी ने किंचित नाराज स्वर में कहा -‘हम आपको फिर से काम करने का मौका दे रहे हैं. सर्कूलेशन बढ़ेगा न? मैं तीन महीने बाद फिर समीक्षा बैठक बुलाउंगा..’
मैं ने बुझे स्वर में कहा -‘इनके खबरों को देखने की जिम्मेदारी डेस्क की रहेगी..’
कुछ देर कमरे में सन्नाटा रहा. फिर संपादकजी बोले – ‘ क्यों न पूरे कार्यालय की जिम्मेदारी इन्हें दे दी जाये. आज से समाचार, विज्ञापन, सर्कूलेशन सब कुछ यही देखेंगे. आप सिर्फ विशेष खबर लिखिये..’
मैंने एक बार पेज के प्रभारी की तरफ देखा, फिर संपादकजी की तरफ. मुझे लगा जैसे उनके आंखों की पुतलियां भी भूरे रंग में तब्दील हो गई हो. निपट भूरे रंग में…

विनोद कुमार
सर्वोदयनगर, डैम साईड, कांके रोड, रांची.

 

 

कहानी : भूरी आंखे

जो ईश्वर में विश्वास करेगा, वह आत्मा-परमात्मा में विश्वास करेगा. जो आत्मा परमात्मा में विश्वास करेगा, वह भूत प्रेत में विश्वास करेगा. जो भूत प्रेत में विश्वास करेगा, वह अन्य किस्म के अंधविश्वासों में भी विश्वास करेगा. ऐसी मेरी धारणा थी. और चूंकि मैं ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता था, इसलिए अपने बारे में मेरी समझ थी कि मैं हर तरह के अंधविश्वासों से भी मुक्त हूं. लेकिन कभी कभी मुझे अपने बारे में संदेह होता कि क्या वास्तव में मैं अनीश्वरवादी हूं? हर तरह के अंधविश्वास से मुक्त हूं? क्योंकि घर लौटते वक्त या घर से बाहर निकलते वक्त अचानक कोई बिल्ली मेरा रास्ता काट देती तो मैं इस बात से आक्रांत हो जाता कि कुछ न कुछ अनहोनी होने वाली है. हांलांकि मेरे जीवन में बिल्ली के रास्ता काटने से कभी कोई बड़ी अनहोनी नहीं हुई. हां, छोटी छोटी अनहोनियां हो जाया करती थी. मसलन, घर लौटते वक्त बिल्ली ने रास्ता काट दिया तो पत्नी से झपड़ हो जाती, इस वजह से कि मैं उसका कहा कोई सामान लाना भूल जाता या फिर ठीक घर की दहलीज पर कुछ देर के लिए बिजली गुल हो जाती या फिर पता चलता कि आज वाटर सप्लाई बंद रही है और टंकी भी खाली है. इसी तरह का एक अन्य अंधविश्वास जिसका मैं शिकार था, वह यह कि जिनकी भूरी आंखें होती हैं, वे शातिर और धूर्त किस्म के लोग होते हैं. यदि वह स्त्री हुई तो अपने प्रेमी या पति से बेवफाई करेगी और यदि वह मर्द हुआ तो वह अपने मददगार के ही कंधे पर पैर रख कर आगे बढने में गुरेज नहीं करेगा. इस अंधविश्वास का मैं ने अपने तरीके से सामान्यीकरण भी कर रखा था. गोरी चमड़ी और भूरी-नीली आंखों वाले लोगों ने दुनिया के श्याम रंग और काली आंखों वाले लोगों का शोषण किया है. अब भी कर रहे हैं. मान सिंह, मीर जाफर और विभीषण की आंखे भूरी थी या काली, यह जानने का मेरे पास कोई यंत्र नहीं था, बावजूद इसके मैं ने धारणा बना ली थी कि उनकी आंखे भूरी ही होंगी. धूर्ततम प्राणी बिल्ली की आंखें भूरी होती है. हालांकि इस बात के भी अनेकों अपवाद हैं. सभी हिंस्र पशुओं की आंखें भूरी ही होती हैं. इसलिए मैं भूरी आंखों के प्रति अपनी शंका को अंधविश्वास ही मानता था, लेकिन यह जानते हुए भी कि यह एक किस्म का अंधविश्वास है, मैं भूरी आंखों वाले व्यक्ति से साबका पड़ते ही उसके प्रति शंकालु हो उठता था. मेरी खुशकिस्मती थी कि मेरे इर्द गिर्द के अधिकतर लोगों की आंखों की पुतलियां काली थी. मेरे परिजनों, अधिकतर दोस्तों, यहां तक कि जिस अखबार में मैं काम करता था, उसके अधिकतर सहकर्मियों की आंखों की पुतली काली ही थी. मेरे संपादक की भी. हांलांकि उनकी आंखें अपने कक्ष में कुछ और होती और संपादकीय कक्ष के बाहर सार्वजनिक स्थलों पर कुछ और. यदि वे अपने अधिनस्थों से बात कर रहे होते तो उनमें उनके प्रति हिकारत का भाव भरा रहता, जबकि सार्वजनिक स्थलों में या कक्ष के बाहर उनमें गजब सहृदयता और मैत्री का भाव. आंखों की भंगिमा के साथ साथ उनकी बातों का अंदाज भी संपादकीय कक्ष के भीतर और बाहर बदल जाता. संपादकीय कक्ष में अपने अधीनस्थों से बातचीत करते वक्त या सभाकक्ष में संपादकीय कर्मचारियों को संबोधित करते वक्त वे हांगकांग में हुई आर्थिक प्रगति और खुली अर्थ व्यवस्था और वहां की कार्य संस्कृति का हवाला देते, श्रम कानूनों को विकास के लिए अवरोध बताते, जबकि सार्वजनिक स्थलों पर तीसरी दुनियां के देशों के हमदर्द बन जाते. सभा कक्ष में अपने संपादकीय सहयोगियों से बात करते वक्त वे सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट के प्रवक्ता बन जाते जबकि उनका सार्वजनिक चेहरा लोकतांत्रिक समाजवादी का होता. इस तरह के कई अन्य विरोधाभासों से भी उनका व्यक्तित्व महिमामंडित था. मसलन, वे दलितों, पिछड़ों, स्त्रियों और आदिवासियों के घोषित रूप से हिमायती थे, लेकिन उनके संपादकीय विभाग में इन समुदायों के कर्मचारियों का नितांत अभाव था. हां, स्वागत कक्ष में एकाध लड़कियां बहाल कर रखी थी. वे आदिवासियों की स्थिति से द्रवित थे, लेकिन राज्य की तरक्की के लिए कारपोरेट पूंजी और आदिवासियों के विस्थापन को आवश्यक मानते थे. मुझे कभी कभी ऐसा भी लगता कि चूंकि वे संपादक हैं, इसलिए इस तरह का अंतरविरोध उनके भीतर पनप गया है. आज का दौर पहले जमाने वाले संपादकों का तो रहा नहीं जो खुदाई खिदमतगार किस्म के हुआ करते थे. अब के संपादक संपादक कम और अखबार के प्रबंधक अधिक हुआ करते हैं. और चूंकि उन पर यह दोहरा कार्यभार रहता हैं, इसलिए उनका व्यक्तित्व भी दोहरा हो जाता है. लेकिन इन विरोधाभासों के बावजूद उनकी आंखों की पुतलियां काली थी और इसे मैं अपनी खुशकिस्मती समझता था. वैसे भी मैं राजधानी से दूर एक जिला मुख्यालय में उनके कार्यालय संवाददाता के रूप में पदस्थापित था और उनसे मेरा साबका कम ही पड़ता था. लेकिन आखिरकार मेरा साबका एक भूरी आंखों वाले व्यक्ति से पड़ ही गया. पत्रकार विरादरी में तरह तरह के लोग थे, उसमें से एक वह भी, लेकिन मैं उन्हें तवज्जो नहीं देता. वजह वही, गजब की भूरी आंखें. हालांकि वह मुझसे हमेशा विनम्रता से ही बात करते, लेकिन भूरी आंखों के प्रति अपने पूर्वाग्रह और अंधविश्वास की वजह से मैं हमेशा उनसे कतरा कर निकल जाता. लेकिन एक दिन दरवाजा खटखटाये जाने पर जब मैं ने दरवाजा खोला तो वही सामने खड़े थे. तड़ से कमरे में आये और आगे बढ कर पैर छू लिए. ‘भईया..बस आपका आर्शीवाद चाहिए..’ मैं आवाक. ‘ ‘मैं भी अब आपके अखबार में ही लिखूंगा ..संपादकजी से बात हो चुकी है बस आपका आर्शीवाद चाहिए…’ एकबारगी मुझे भरोसा नहीं हुआ. लेकिन वे भी उसी जाति बिरादरी के थे जिसके हमारे संपादक, इसलिए लगा कि वे सही भी हो सकते हैं. ‘ठीक है आप भी लिखें, इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं लेकिन एक बार मैं दफ्तर फोन कर लूं. उसके बाद आपको बताउंगा..’ कुछ देर इधर उधर की बातें कर वे चले गये. आदिवासीबहुल इस अत्यंत पिछड़े इलाके के अलग राज्य के रूप में गठन के बाद से यहां की विपुल खनिज संपदा और कोल भंडार ने कारपोरेट जगत को इस राज्य का मुरीद बना दिया था. जिंदलों, मित्तलों, भूषणों की बाढ़ आ गई थी. उसके पीछे पीछे अनेक अखबर समूह भी. राज्य की राजधानी से तो अखबार निकल ही रहे थे, छोटे छोटे शहरों से भी उनके एडीशन या छोटे बड़े अखबार निकलने लगे थे. उनकी नजर नवगठित राज्य के सरकारी विज्ञापनों पर तो थी ही, कारपोरेट जगत से भी उन्हें बहुत उम्मीद थी. लेकिन सबसे बड़ी बात यह कि वे खुद किसी न किसी कारपोरेट के हिस्सा थे और अपने आका के व्यापारिक हितों की रक्षा करते थे. कोई बिड़ला का अखबार था तो कोई गोयनका का. कोयलांचल के कई अखबार लोहा माफिया द्वारा निकाले जा रहे थे. किसी का मकशद कोयला-लोहा का पट्टा हासिल करना था तो किसी का अपने औद्योगिक प्रतिष्ठान के लिए सहूलियतें हासिल करना. कोई महज इसलिए अखबार निकाल रहा था कि सरकारी अमले उन्हें हड़का नहीं सके. उदाहरण के लिए अगर वे बिजली इस्तेमाल कर रहे हैं और दस बारह करोड़ का बकाया हो जाये तो बिजली कोई नहीं काटे और उसे सरकार औद्योगिक विकास के नाम पर माफ कर दे. कोई इसलिए कि राजनीतिक दल के लोग उनसे चुनाव के वक्त भारी भरकम चंदा मांगने नहीं चला आये. हालांकि मुझे जब मेरे संपादक के बारे में कोई यह कहता कि वह फला कारखाना के सीपीओ हैं तो मैं उससे लड़ पड़ता था. इस गोरखधंधे का एक परिणाम यह भी कि अनेक हिंदी अखबार प्रदेश से निकलने के बावजूद मुफस्सिल पत्रकारों की दशा नहीं सुधरी थी. प्रदेश की राजधानी से निकलने वाले कुछ अखवारों के मुख्यालयकों को छोड़ अन्यंत्र सभी जगह पत्रकारिता की गरिमा का वहन स्ट्रिंगर ही कर रहे थे जिन्हें आधुनिक शब्दावली में संवाद सूत्र कहा जाता है. इन स्ट्रिंगरों को नाम मात्र का पारिश्रमिक दिया जाता था जो 200 रुपये प्रतिमाह से हजार बारह सौ रुपये प्रतिमाह हुआ करता था. जाहिर है, इस नाममात्र के पारिश्रमिक से उनका जीवन चलना मुश्कल होता. इसलिए वे अपने डेट लाईन को चारागाह की तरह इस्तेमाल करते. जिस जनता जनार्दन की वे सेवा करते, उसी से जीवन यापन के लिए पैसे वसूलते. जिसकी जितनी हैसियत उतनी ही वह वसूली करता. बड़े नायाब तरीको का इस्तेमाल वे इसके लिए करते. समाचार फैक्स करने के नाम पर वे प्रेस कंफ्रेंस करने वाले नेता से सौ दो सौ रुपये वसूल लेते. प्रेस कंफ्रेंस कह कर आयोजित करवाते और जम कर खाते पीते. कुछ पत्रकार तो अपनी घरवाली और बच्चों के लिए भी खाना पैक करवा लेते. इसके अलावा मन माफिक खबर छपवाने के लिए नियमित रूप से अपने क्षेत्र के नेता, माफिया और उद्यमी से पैसे वसूलना आम बात थी. कुछ तेज तर्रार पत्रकार जिला प्रशासन से सांठगांठ कर ठेका, परमिट हासिल कर लेते या किसी को दिला कर उससे पैसे वसूल लेते. परिणाम यह कि अपने इलाके की वास्तविक खबर-तस्वीर कभी भी अखबारों में नहीं आ पाती. शुरु शुरु में मुझे यह सब बेहद अनैतिक लगता था. लेकिन बाद में लगने लगा कि इसके लिए मुफस्सिल पत्रकारों को दोष देना सही नहीं. जिम्मेदार तो मूलतः अखबारों के संपादक और प्रबंधक हैं जो उन्हें पारिश्रमिक के रूप में इतनी राशि नहीं देते कि वे आत्मसम्मान के साथ जीवन बसर कर सकें. खुद मोटी रकम वेतन के रूप में लेना और पत्रकारिता की गरिमा बनाये रखने का उपदेश देना आसान है, लेकिन हजार पांच सौ रुपये पारिश्रमिक के रूप में प्राप्त करने वाले संवाद सूत्रों के लिए पत्रकारिता की गरिमा बचाये रखने का काम कितना मुश्किल होता होगा, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. वैसे, हमारे संपादक को संवादसूत्रों की इस कठिन माली हालत का एहसास था. और उससे निबटने का उन्होंने एक तरीका निकाला था. उन्होंने छूट दे रखी थी कि उनके अखबार से जुड़े संवाद सूत्र अपने क्षेत्र में विज्ञापन जुटाये और विज्ञापन राशि का 20 फीसदी कमीशन के रूप में काट लें. सालों भर यह सिलसिला तो चलता ही रहता था, साल में दो तीन बार इसके लिए उन्होंने कृपा पूर्वक विशेष परिशिष्ट निकालने की छूट दे रखी थी. स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और राज्य गठन के स्थापना दिवस को विशेष परिशिष्ठ निकाले जाते. उस परिशिष्ठ में विद्वान लेखकों, समीक्षकों, समालोचकों के ज्ञान-विज्ञान से भरे लेख तो छापे ही जाते, लेकिन उसका मुख्य उद्देश्य संवाद सूत्रों को मदद करना होता था. उन्हें यह जिम्मेदारी और मौका दिया जाता कि वे अपने क्षेत्र के धन्ना सेठों, छोटे बड़े नेताओं, माफियाओं आदि से शुभकामना संदेश के रूप में विज्ञापन हासिल करें और कमीशन के रूप में इतनी कमाई कर लें कि अगले परिशिष्ठ के पहले तक उनके दाल रोटी का जुगाड़ हो जाये. यह अलग बात कि इससे अखबार की भी कमाई हो जाती थी. बस उन परिशिष्ठों से यह पता नहीं चलता था की उसमें फीलर के रूप में विद्वान लेखकों के लेखों का इस्तेमाल हुआ है या विज्ञापन के रूप में छपने वाले शुभकामना संदेशों का. दूसरी मुसीबत यह हो जाती कि संवाद सूत्र हर वक्त इस दबाव में रहते कि जिन लोगों से उन्होंने विज्ञापन के रूप में पैसा ले रखा हैं और जिससे उसे भविष्य में भी शुभकामना संदेश प्राप्त करनाा है, उसके खिलाफ कोई खबर कैसे छापें? लेकिन करना क्या था. दुनिया तो इसी तरह चलती है. मेरे मातहत भी लगभग दर्जन भर संवाद सूत्र काम कर रहे थे. अब एक और नया संवाद सूत्र, मैं ने सीधे संपादकजी से बात करने के बजाये समाचार संपादक को फोन लगाया. दुआ सलाम के बाद मैंने उनसे पूछा -‘आपलोगों ने यहां से किसी और को भी काम करने का निर्देश दिया है? वे मुझसे मिलने आये थे. इसकी क्या जरूरत थी?’ दूसरी तरफ से कहा गया. ‘ आपको क्या परेशानी है? विज्ञापन-सकूर्लेशन का काम देखेगा. इक्का दुक्का समाचार भी लिखा करेगा..’ ठीक ही कह रहे हैं समाचार संपादक. मुझे क्यों परेशानी होने लगी? अब उनसे क्या कहता, उस शख्स की आंखें भूरी है. जो होगा देखा जायेगा. अगले दिन से हमारे नये सहयोगी ने काम करना शुरु कर दिया. वह भी पूरी रफ्तार से. मुझे भी लगा कि आदमी काम का है. पूरे दो पेज का मैटर हमे प्रतिदिन भेजना पड़ता था. इतना मैटर जुटाना कठिन काम था. इसलिए नये सहयोगी हमे काम के लगे. लेकिन धीरे धीरे मेरी मुश्किले बढने लगी. उनके द्वारा लिखी हर खबर से मुझे किसी न किसी तरह की पक्षधरता की बू आती. कोई खबर पढ कर लगता कि उसमें चाटुकारिता की हर सीमा को पार कर दिया गया है. तो, कुछ खबरे ऐसी होती जिसमें किसी एक पक्ष के खिलाफ आग उगला जाता. मैं ने अपने स्तर से उनकी लिखी खबरों को सुधारने की कोशिश करता. लेकिन आखिरकार आजीज आ कर समाचार संपादक से शिकायत की. उनकी तरफ से कह दिया गया कि मैं उनकी खबरों को बिना देखे मॉडम से भेज दूं. मैं ठंढी सांस ले कर रह गया. यह मेरे लिए राहत की बात थी और चिंता की भी, क्योंकि यहां से भेजे जाने वाली खबरों के लिए मूलतः मैैंं ही जिम्मेदार था. दूसरी मुसीबत यह हुई कि लगभग हर प्रेस सम्मेलनों में वे हमारे न चाहने पर भी वे मौजूद रहने लगे. मैंने एक दिन उन्हें समझाया कि किसी भी प्रेस कंफ्रेंस में एक अखबार से एक ही प्रतिनिधि का रहना उचित है. तो उन्होंने झटपट सलाह दे डाली- ‘भईया आप हर जगह क्यों जाते हैं. आप प्रभारी हैं. कार्यालय में बैठिये हम हैं न..’ हर बात की शिकायत मुख्यालय में क्या करता. मैं ने उनकी सलाह मान ली. महत्वपूर्ण प्रेस कंफ्रेंसों को छोड़ कर प्रेस कंफ्रेंसों में जाना छोड़ दिया. मेरे लिए सहूलियत कि बात इतनी थी कि जिन प्रेस कंफ्रेंसों में खाने और पीने की व्यवस्था नहीं रहती, वहां जाने में उनकी रूचि नहीं रहती. और जन पक्षीय समाचार तो इसी तरह की जगहों से मिलता है. फिर भी अखबार की छवि उनके कारनामो से प्रभावित हो रही थी. लेकिन मेरे सामने उन्हें बर्दाश्त करने का दूसरा विकल्प नहीं था. क्योंकि डेस्क के लोगों से उनके मधुर संबंध बन चुके थे. कई बार मैंने इस संबंध में सीधे संपादक से बात करने का विचार किया, लेकिन मुझे इस बात का भी एहसास था कि जब उनके निर्देश पर ही उन्हें यहां मेरे साथ काम करने की अनुमति दी गई है तो फिर उनके खिलाफ वे सुनेंगे? लेकिन कुछ दिन बाद इसका मौका मिल ही गया. हुआ यह कि एक नये अखबार ने राजधानी में लांच किया. अखबारों की ‘स्वस्थ प्रतियोगिता’ शुरु हो गई. कर्मचारियों को तोड़ना-जोड़ना, एक दूसरे का पोस्टर फाड़ना, हॉकरों की आपसी मार पीट, आदि आदि. हमारे शहर में भी अखबार एजंटों की लड़ाई शुरु हो गई. मुझे भी निर्देश मिला कि जहां अखबार उतरता है, वहां सुबह सुबह जाउं. फिर एक दिन अखबार के दफ्तर से बुलावा आ गया. तड़के बस पकउ़ कर कार्यालय के लिए रवाना हो गया. कार्यालय पहुंचते थोड़ा बिलंब हो गया. पता चला कि सभी संवाददाता और संपादकीय सहयोगी सभा कक्ष में हैं. मैं भी वहां पहुंचा. पूरा कक्ष ठसाठस भरा हुआ था. और संपादकजी का भाषण चल रहा था. ‘….यह कंपीटीशन का जमाना है. जो सतत रूप से इसके लिए तैयार नहीं रहेगा, वह पिछड़ जायेगा और अंततोगत्वा उसका अस्तित्व मिट जायेगा. वे हमसे अधिक साधन संपन्न हैं. अनैतिक तौर तरीका इख्तियार करने में उन्हें परहेज नहीं. हम पहले भी इस तरह की चुनौतियों का सामना कर चुके हैं. आप सबों के सहयोग से हम इस बार भी मुकाबला कर सकेंगे…लेकिन कैसे? हमे साबित करना होगा कि हम उनसे भिन्न हैं. हमारे संवाददाता, हमारे अन्य संपादकीय सहयोगी सिर्फ इस परिसर के भीतर ही नहीं, जहां कहीं भी बाहर जाते हैं, उन्हें याद रखना होगा कि वे इस अखबार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. ऐसे में उन्हें अपने चरित्र और आचरण पर विशेष ध्यान देना होगा. उसके बल पर ही कर सकते हैं हम उनका मुकाबला कर सकते हैं….मैं अपने तमाम प्रभारियों को सावधान करता हूं कि वे ऐसा कोई काम न करें जिससे अखबार की छवि प्रभावित हो..यदि उनके अधीन काम करने वाला कोई स्ट्रिंगर भी किसी तरह का गलत आचरण करता है तो इसके लिए वे ही जिम्मेदार होंगे….’ बड़ा ओजस्वी भाषण था. मैं प्रभावित तो हुआ ही, यह मंथन भी मेरे दिलो दिमाग में शुरु हो गया कि अपने नये सहयोगी के आचरण के लिए भी मैं ही धरा जाउंगा. लेकिन करूं क्या? किसी की शिकायत करना मेरे स्वभाव में नहीं था. लेकिन अब भी चुप रहा तो यह मेरे लिए परेशानी का सबब बन जायेगा. सभाकक्ष से निकल कर आफिस के कैंटीन में गया. संक्षेप में संपादकजी के नाम एक पत्र लिखा जिसमें नये सहयोगी के कार्यशैली का ब्योरा दिया. आफिस से निकलने के पहले डरते डरते संपादकजी के कक्ष में गया. उन्होंने हंस कर स्वागत किया. ‘कहिये, क्या बात है?’ ‘आपका भाषण अच्छा था. हम अपने चरित्र और आचरण से ही खुद को उनसे भिन्न साबित कर सकते हैं…इसीलिए यह पत्र देने आया हूं..’ ‘ क्या है इस पत्र में..’ ‘आप खुद पढ लीजिये, फिर जैसा निर्देश देंगे करूंगा..’ ‘ठीक है, आप पत्र छोड़ जायें. मैं दो तीन दिनों के लिए बाहर जा रहा हूं. लौट कर पढूंगा, फिर आपसे बात करूंगा..’ मैं नमस्कार करके बाहर निकल आया. अगले दिन वापस अपने कार्यक्षेत्र में. अपने आफिस के छोटे से केबिन में बैठ कर मैंने अपने संपादक के ओजस्वी भाषण के आलोक में अपने सहयोगी संवाद सूत्रों के लिए एक आचार संहिता बनाई जिसमें टाईम पर कार्यालय आने, शाम चार बजे तक समाचार फाईल कर देने, हर समाचार में संबंधित पक्ष से बात कर लेने, किसी भी प्रेस कंफ्रेंस में शराब न पीने आदि का निर्देश दिया गया था. मैं ने उस लिखित आचार संहिता को अपने ऑफिस के नोटिश बोर्ड पर चिपका दिया. किसी ने पढ कर मुंह बिचकाया, किसी ने व्यंग्य भरी मुस्कान से मेरी तरफ देखा. मेरे नये सहयोगी ने आते ही पूछा – ‘यह क्या है भईया..’ ‘ हमे दूसरे अखबार के पत्रकारों से भिन्न दिखना है…’ बत आई गई हो गई. मैं बेसब्री से अपने संपादकजी के फोन की प्रतीक्षा करने लगा. पता नहीं पत्र पढ कर उनकी क्या प्रतिक्रिया हुई हो. उनके कृपापात्र के खिलाफ शिकायत की थी मैं ने. अब जो हो, देखा जायेगा. एक सप्ताह बाद उनका फोन आया. ‘…यह सब आपने पहले क्यों नहीं बताया? आप हमारे प्रतिनिधि हैं वहां. आज सेे ही उनकी छुट्टी कीजिये.’ फिर रूक कर बोले- ‘विज्ञापन का जो पैसा उनके यहां बकाया है, उसकी वसूली कैसे होगी? ऐसा कीजिये, उन्हें अभी कार्यमुक्त नहीं कीजिये. सिर्फ उनके समाचार भेजने पर प्रतिबंध लगा दीजिये. उनसे कहिये कि पहले कार्यालय आ कर बिज्ञापन के बकाये का हिसाब करें.’ कुछ ही देर में वे पहुंच गये. ‘भैईया…आज एकदम एक्सक्लूसिव खबर है..’ मैं ने ठंढे स्वर में कहा-‘संपादकजी ने आपको समाचार भेजने से मना किया है.’ वे आसमान से गिरे, फिर हत्थे से उखड़ गये. लेकिन समाचार फाईल नहीं किया. बहुत देर तक लाल पीले होते रहे. फिर दनदनाते हुए कार्यालय से निकल गये. दिन बीतता जा रहा था. मुझे लगा कि उनसे छुटकारा मिल गया. लेकिन वह मेरा भ्रम था. शहर में एक बड़े नेता का भाषण होने वाला था. वे राष्ट्रीय स्तर के नेता थे और हमारे संपादक उनके बेहद करीबी. उन्होंने मुझे सूचित किया कि वे उनसे मिलने मेरे यहां आने वाले हैं. कार्यालय भी कुछ देर के लिए आयेंगे. ‘ आप नेताजी से कहा मिलेंगे..’ ‘वह सब आप चिंता न करें. मैं उनसे मिल लूंगा..’ मैंने अन्य सहयोगियों को भी संपादकजी के कार्यक्रम की जानकारी दे दी और अगले दिन उनके आने की प्रतीक्षा करने लगा. दिन चढने लगा था. अचानक कार्यालय के कुछ दूर पर एक गाड़ी आ कर रूकी. आगे आगे हमारे संपादकजी और उसके पीछे-पीछे उनका बैग उठाये हमारे भूरी आंखों वाले सहयोगी चले आ रहे थे. इनकी तो छुट्टी हो गई. फिर उसे साथ लिए क्यों फिर रहे हैं संपादकजी. कही नेताजी से तो पैरवी नहीं भिड़ाई? मैं प्रतीक्षा करने लगा कि वे मुझे निर्देश देंगे, उन्हें पूर्ववत काम करने दिया जाये. लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. उनके साथ हम सीटी सेंटर गये. एक होटल में सबों को नास्ता कराया. उसके बाद वे वापस हो गये. दो दिन बाद मुझे अपने मुख्यालय से बुलावा आया. सुबह की ट्रेन पकड़ने के लिए मैं स्टेशन पहुंचा. आवाक रह गया उन्हें भी वहां देख कर. ‘मुझे भी बुलाया गया है..’ हम दोनों एक साथ सफर तय कर अपने मुख्यालय पहुंचे. हमारे पेज के प्रभारी ने मीठी मुस्कान से हमारा स्वागत किया. कुछ देर इधर उधर की बातचीत के बाद हमारे सहयोगी को वहीं बैठा कर वे मुझे लेकर संपादक के कमरे में चले आये. कुछ देर अनौपचारिक बातें. फिर काम की बात शुरु हो गई. ‘..तो आपने नई परिस्थितियों से निबटने की क्या कार्ययोजना बनाई है. खबरो की संख्या बढानी होगी. विज्ञापन का फ्लो बढाना होगा…सकूर्लेशन पर भी नजर रखनी होगी..’ ‘खबरों की गुणवत्ता के लिहाज से हम नंबर वन है..’, मैं ने दबे स्वर में कहने का प्रयास किया. ‘ क्वालिटी नहीं, क्वांटिटी भी बढानी होगी. खबरों की संख्या बढानी होगी संख्या. इधर कई दिन हमारा अखबार हॉकरों ने नहीं उठाया आपने पता किया..’ ‘हमारा अखबार नहीं, किसी का भी अखबार नहीं उठा. हॉकरो ने हड़ताल..’ ‘आपने दफ्तर में फोन किया? ऐसे तो काम नहीं चलेगा..’ मैं आजीज आ गया था उनके तावड़तोड़ हमले से. ‘ क्यों न उन्हें फिर से काम पर रख लिया जाये..’ संपादकजी गुरु गंभीर बने रहे. फिर बोले-‘उन्हें बुलाओ..’ पेज के प्रभारी बाहर निकल गये. कुछ ही पलों में उन्हें साथ लेकर भीतर आये. संपादकजी ने किंचित नाराज स्वर में कहा -‘हम आपको फिर से काम करने का मौका दे रहे हैं. सर्कूलेशन बढ़ेगा न? मैं तीन महीने बाद फिर समीक्षा बैठक बुलाउंगा..’ मैं ने बुझे स्वर में कहा -‘इनके खबरों को देखने की जिम्मेदारी डेस्क की रहेगी..’ कुछ देर कमरे में सन्नाटा रहा. फिर संपादकजी बोले – ‘ क्यों न पूरे कार्यालय की जिम्मेदारी इन्हें दे दी जाये. आज से समाचार, विज्ञापन, सर्कूलेशन सब कुछ यही देखेंगे. आप सिर्फ विशेष खबर लिखिये..’ मैंने एक बार पेज के प्रभारी की तरफ देखा, फिर संपादकजी की तरफ. मुझे लगा जैसे उनके आंखों की पुतलियां भी भूरे रंग में तब्दील हो गई हो. निपट भूरे रंग में… विनोद कुमार कहानी भूरी आंखे जो ईश्वर में विश्वास करेगा, वह आत्मा-परमात्मा में विश्वास करेगा. जो आत्मा परमात्मा में विश्वास करेगा, वह भूत प्रेत में विश्वास करेगा. जो भूत प्रेत में विश्वास करेगा, वह अन्य किस्म के अंधविश्वासों में भी विश्वास करेगा. ऐसी मेरी धारणा थी. और चूंकि मैं ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता था, इसलिए अपने बारे में मेरी समझ थी कि मैं हर तरह के अंधविश्वासों से भी मुक्त हूं. लेकिन कभी कभी मुझे अपने बारे में संदेह होता कि क्या वास्तव में मैं अनीश्वरवादी हूं? हर तरह के अंधविश्वास से मुक्त हूं? क्योंकि घर लौटते वक्त या घर से बाहर निकलते वक्त अचानक कोई बिल्ली मेरा रास्ता काट देती तो मैं इस बात से आक्रांत हो जाता कि कुछ न कुछ अनहोनी होने वाली है. हांलांकि मेरे जीवन में बिल्ली के रास्ता काटने से कभी कोई बड़ी अनहोनी नहीं हुई. हां, छोटी छोटी अनहोनियां हो जाया करती थी. मसलन, घर लौटते वक्त बिल्ली ने रास्ता काट दिया तो पत्नी से झपड़ हो जाती, इस वजह से कि मैं उसका कहा कोई सामान लाना भूल जाता या फिर ठीक घर की दहलीज पर कुछ देर के लिए बिजली गुल हो जाती या फिर पता चलता कि आज वाटर सप्लाई बंद रही है और टंकी भी खाली है. इसी तरह का एक अन्य अंधविश्वास जिसका मैं शिकार था, वह यह कि जिनकी भूरी आंखें होती हैं, वे शातिर और धूर्त किस्म के लोग होते हैं. यदि वह स्त्री हुई तो अपने प्रेमी या पति से बेवफाई करेगी और यदि वह मर्द हुआ तो वह अपने मददगार के ही कंधे पर पैर रख कर आगे बढने में गुरेज नहीं करेगा. इस अंधविश्वास का मैं ने अपने तरीके से सामान्यीकरण भी कर रखा था. गोरी चमड़ी और भूरी-नीली आंखों वाले लोगों ने दुनिया के श्याम रंग और काली आंखों वाले लोगों का शोषण किया है. अब भी कर रहे हैं. मान सिंह, मीर जाफर और विभीषण की आंखे भूरी थी या काली, यह जानने का मेरे पास कोई यंत्र नहीं था, बावजूद इसके मैं ने धारणा बना ली थी कि उनकी आंखे भूरी ही होंगी. धूर्ततम प्राणी बिल्ली की आंखें भूरी होती है. हालांकि इस बात के भी अनेकों अपवाद हैं. सभी हिंस्र पशुओं की आंखें भूरी ही होती हैं. इसलिए मैं भूरी आंखों के प्रति अपनी शंका को अंधविश्वास ही मानता था, लेकिन यह जानते हुए भी कि यह एक किस्म का अंधविश्वास है, मैं भूरी आंखों वाले व्यक्ति से साबका पड़ते ही उसके प्रति शंकालु हो उठता था. मेरी खुशकिस्मती थी कि मेरे इर्द गिर्द के अधिकतर लोगों की आंखों की पुतलियां काली थी. मेरे परिजनों, अधिकतर दोस्तों, यहां तक कि जिस अखबार में मैं काम करता था, उसके अधिकतर सहकर्मियों की आंखों की पुतली काली ही थी. मेरे संपादक की भी. हांलांकि उनकी आंखें अपने कक्ष में कुछ और होती और संपादकीय कक्ष के बाहर सार्वजनिक स्थलों पर कुछ और. यदि वे अपने अधिनस्थों से बात कर रहे होते तो उनमें उनके प्रति हिकारत का भाव भरा रहता, जबकि सार्वजनिक स्थलों में या कक्ष के बाहर उनमें गजब सहृदयता और मैत्री का भाव. आंखों की भंगिमा के साथ साथ उनकी बातों का अंदाज भी संपादकीय कक्ष के भीतर और बाहर बदल जाता. संपादकीय कक्ष में अपने अधीनस्थों से बातचीत करते वक्त या सभाकक्ष में संपादकीय कर्मचारियों को संबोधित करते वक्त वे हांगकांग में हुई आर्थिक प्रगति और खुली अर्थ व्यवस्था और वहां की कार्य संस्कृति का हवाला देते, श्रम कानूनों को विकास के लिए अवरोध बताते, जबकि सार्वजनिक स्थलों पर तीसरी दुनियां के देशों के हमदर्द बन जाते. सभा कक्ष में अपने संपादकीय सहयोगियों से बात करते वक्त वे सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट के प्रवक्ता बन जाते जबकि उनका सार्वजनिक चेहरा लोकतांत्रिक समाजवादी का होता. इस तरह के कई अन्य विरोधाभासों से भी उनका व्यक्तित्व महिमामंडित था. मसलन, वे दलितों, पिछड़ों, स्त्रियों और आदिवासियों के घोषित रूप से हिमायती थे, लेकिन उनके संपादकीय विभाग में इन समुदायों के कर्मचारियों का नितांत अभाव था. हां, स्वागत कक्ष में एकाध लड़कियां बहाल कर रखी थी. वे आदिवासियों की स्थिति से द्रवित थे, लेकिन राज्य की तरक्की के लिए कारपोरेट पूंजी और आदिवासियों के विस्थापन को आवश्यक मानते थे. मुझे कभी कभी ऐसा भी लगता कि चूंकि वे संपादक हैं, इसलिए इस तरह का अंतरविरोध उनके भीतर पनप गया है. आज का दौर पहले जमाने वाले संपादकों का तो रहा नहीं जो खुदाई खिदमतगार किस्म के हुआ करते थे. अब के संपादक संपादक कम और अखबार के प्रबंधक अधिक हुआ करते हैं. और चूंकि उन पर यह दोहरा कार्यभार रहता हैं, इसलिए उनका व्यक्तित्व भी दोहरा हो जाता है. लेकिन इन विरोधाभासों के बावजूद उनकी आंखों की पुतलियां काली थी और इसे मैं अपनी खुशकिस्मती समझता था. वैसे भी मैं राजधानी से दूर एक जिला मुख्यालय में उनके कार्यालय संवाददाता के रूप में पदस्थापित था और उनसे मेरा साबका कम ही पड़ता था. लेकिन आखिरकार मेरा साबका एक भूरी आंखों वाले व्यक्ति से पड़ ही गया. पत्रकार विरादरी में तरह तरह के लोग थे, उसमें से एक वह भी, लेकिन मैं उन्हें तवज्जो नहीं देता. वजह वही, गजब की भूरी आंखें. हालांकि वह मुझसे हमेशा विनम्रता से ही बात करते, लेकिन भूरी आंखों के प्रति अपने पूर्वाग्रह और अंधविश्वास की वजह से मैं हमेशा उनसे कतरा कर निकल जाता. लेकिन एक दिन दरवाजा खटखटाये जाने पर जब मैं ने दरवाजा खोला तो वही सामने खड़े थे. तड़ से कमरे में आये और आगे बढ कर पैर छू लिए. ‘भईया..बस आपका आर्शीवाद चाहिए..’ मैं आवाक. ‘ ‘मैं भी अब आपके अखबार में ही लिखूंगा ..संपादकजी से बात हो चुकी है बस आपका आर्शीवाद चाहिए…’ एकबारगी मुझे भरोसा नहीं हुआ. लेकिन वे भी उसी जाति बिरादरी के थे जिसके हमारे संपादक, इसलिए लगा कि वे सही भी हो सकते हैं. ‘ठीक है आप भी लिखें, इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं लेकिन एक बार मैं दफ्तर फोन कर लूं. उसके बाद आपको बताउंगा..’ कुछ देर इधर उधर की बातें कर वे चले गये. आदिवासीबहुल इस अत्यंत पिछड़े इलाके के अलग राज्य के रूप में गठन के बाद से यहां की विपुल खनिज संपदा और कोल भंडार ने कारपोरेट जगत को इस राज्य का मुरीद बना दिया था. जिंदलों, मित्तलों, भूषणों की बाढ़ आ गई थी. उसके पीछे पीछे अनेक अखबर समूह भी. राज्य की राजधानी से तो अखबार निकल ही रहे थे, छोटे छोटे शहरों से भी उनके एडीशन या छोटे बड़े अखबार निकलने लगे थे. उनकी नजर नवगठित राज्य के सरकारी विज्ञापनों पर तो थी ही, कारपोरेट जगत से भी उन्हें बहुत उम्मीद थी. लेकिन सबसे बड़ी बात यह कि वे खुद किसी न किसी कारपोरेट के हिस्सा थे और अपने आका के व्यापारिक हितों की रक्षा करते थे. कोई बिड़ला का अखबार था तो कोई गोयनका का. कोयलांचल के कई अखबार लोहा माफिया द्वारा निकाले जा रहे थे. किसी का मकशद कोयला-लोहा का पट्टा हासिल करना था तो किसी का अपने औद्योगिक प्रतिष्ठान के लिए सहूलियतें हासिल करना. कोई महज इसलिए अखबार निकाल रहा था कि सरकारी अमले उन्हें हड़का नहीं सके. उदाहरण के लिए अगर वे बिजली इस्तेमाल कर रहे हैं और दस बारह करोड़ का बकाया हो जाये तो बिजली कोई नहीं काटे और उसे सरकार औद्योगिक विकास के नाम पर माफ कर दे. कोई इसलिए कि राजनीतिक दल के लोग उनसे चुनाव के वक्त भारी भरकम चंदा मांगने नहीं चला आये. हालांकि मुझे जब मेरे संपादक के बारे में कोई यह कहता कि वह फला कारखाना के सीपीओ हैं तो मैं उससे लड़ पड़ता था. इस गोरखधंधे का एक परिणाम यह भी कि अनेक हिंदी अखबार प्रदेश से निकलने के बावजूद मुफस्सिल पत्रकारों की दशा नहीं सुधरी थी. प्रदेश की राजधानी से निकलने वाले कुछ अखवारों के मुख्यालयकों को छोड़ अन्यंत्र सभी जगह पत्रकारिता की गरिमा का वहन स्ट्रिंगर ही कर रहे थे जिन्हें आधुनिक शब्दावली में संवाद सूत्र कहा जाता है. इन स्ट्रिंगरों को नाम मात्र का पारिश्रमिक दिया जाता था जो 200 रुपये प्रतिमाह से हजार बारह सौ रुपये प्रतिमाह हुआ करता था. जाहिर है, इस नाममात्र के पारिश्रमिक से उनका जीवन चलना मुश्कल होता. इसलिए वे अपने डेट लाईन को चारागाह की तरह इस्तेमाल करते. जिस जनता जनार्दन की वे सेवा करते, उसी से जीवन यापन के लिए पैसे वसूलते. जिसकी जितनी हैसियत उतनी ही वह वसूली करता. बड़े नायाब तरीको का इस्तेमाल वे इसके लिए करते. समाचार फैक्स करने के नाम पर वे प्रेस कंफ्रेंस करने वाले नेता से सौ दो सौ रुपये वसूल लेते. प्रेस कंफ्रेंस कह कर आयोजित करवाते और जम कर खाते पीते. कुछ पत्रकार तो अपनी घरवाली और बच्चों के लिए भी खाना पैक करवा लेते. इसके अलावा मन माफिक खबर छपवाने के लिए नियमित रूप से अपने क्षेत्र के नेता, माफिया और उद्यमी से पैसे वसूलना आम बात थी. कुछ तेज तर्रार पत्रकार जिला प्रशासन से सांठगांठ कर ठेका, परमिट हासिल कर लेते या किसी को दिला कर उससे पैसे वसूल लेते. परिणाम यह कि अपने इलाके की वास्तविक खबर-तस्वीर कभी भी अखबारों में नहीं आ पाती. शुरु शुरु में मुझे यह सब बेहद अनैतिक लगता था. लेकिन बाद में लगने लगा कि इसके लिए मुफस्सिल पत्रकारों को दोष देना सही नहीं. जिम्मेदार तो मूलतः अखबारों के संपादक और प्रबंधक हैं जो उन्हें पारिश्रमिक के रूप में इतनी राशि नहीं देते कि वे आत्मसम्मान के साथ जीवन बसर कर सकें. खुद मोटी रकम वेतन के रूप में लेना और पत्रकारिता की गरिमा बनाये रखने का उपदेश देना आसान है, लेकिन हजार पांच सौ रुपये पारिश्रमिक के रूप में प्राप्त करने वाले संवाद सूत्रों के लिए पत्रकारिता की गरिमा बचाये रखने का काम कितना मुश्किल होता होगा, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. वैसे, हमारे संपादक को संवादसूत्रों की इस कठिन माली हालत का एहसास था. और उससे निबटने का उन्होंने एक तरीका निकाला था. उन्होंने छूट दे रखी थी कि उनके अखबार से जुड़े संवाद सूत्र अपने क्षेत्र में विज्ञापन जुटाये और विज्ञापन राशि का 20 फीसदी कमीशन के रूप में काट लें. सालों भर यह सिलसिला तो चलता ही रहता था, साल में दो तीन बार इसके लिए उन्होंने कृपा पूर्वक विशेष परिशिष्ट निकालने की छूट दे रखी थी. स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और राज्य गठन के स्थापना दिवस को विशेष परिशिष्ठ निकाले जाते. उस परिशिष्ठ में विद्वान लेखकों, समीक्षकों, समालोचकों के ज्ञान-विज्ञान से भरे लेख तो छापे ही जाते, लेकिन उसका मुख्य उद्देश्य संवाद सूत्रों को मदद करना होता था. उन्हें यह जिम्मेदारी और मौका दिया जाता कि वे अपने क्षेत्र के धन्ना सेठों, छोटे बड़े नेताओं, माफियाओं आदि से शुभकामना संदेश के रूप में विज्ञापन हासिल करें और कमीशन के रूप में इतनी कमाई कर लें कि अगले परिशिष्ठ के पहले तक उनके दाल रोटी का जुगाड़ हो जाये. यह अलग बात कि इससे अखबार की भी कमाई हो जाती थी. बस उन परिशिष्ठों से यह पता नहीं चलता था की उसमें फीलर के रूप में विद्वान लेखकों के लेखों का इस्तेमाल हुआ है या विज्ञापन के रूप में छपने वाले शुभकामना संदेशों का. दूसरी मुसीबत यह हो जाती कि संवाद सूत्र हर वक्त इस दबाव में रहते कि जिन लोगों से उन्होंने विज्ञापन के रूप में पैसा ले रखा हैं और जिससे उसे भविष्य में भी शुभकामना संदेश प्राप्त करनाा है, उसके खिलाफ कोई खबर कैसे छापें? लेकिन करना क्या था. दुनिया तो इसी तरह चलती है. मेरे मातहत भी लगभग दर्जन भर संवाद सूत्र काम कर रहे थे. अब एक और नया संवाद सूत्र, मैं ने सीधे संपादकजी से बात करने के बजाये समाचार संपादक को फोन लगाया. दुआ सलाम के बाद मैंने उनसे पूछा -‘आपलोगों ने यहां से किसी और को भी काम करने का निर्देश दिया है? वे मुझसे मिलने आये थे. इसकी क्या जरूरत थी?’ दूसरी तरफ से कहा गया. ‘ आपको क्या परेशानी है? विज्ञापन-सकूर्लेशन का काम देखेगा. इक्का दुक्का समाचार भी लिखा करेगा..’ ठीक ही कह रहे हैं समाचार संपादक. मुझे क्यों परेशानी होने लगी? अब उनसे क्या कहता, उस शख्स की आंखें भूरी है. जो होगा देखा जायेगा. अगले दिन से हमारे नये सहयोगी ने काम करना शुरु कर दिया. वह भी पूरी रफ्तार से. मुझे भी लगा कि आदमी काम का है. पूरे दो पेज का मैटर हमे प्रतिदिन भेजना पड़ता था. इतना मैटर जुटाना कठिन काम था. इसलिए नये सहयोगी हमे काम के लगे. लेकिन धीरे धीरे मेरी मुश्किले बढने लगी. उनके द्वारा लिखी हर खबर से मुझे किसी न किसी तरह की पक्षधरता की बू आती. कोई खबर पढ कर लगता कि उसमें चाटुकारिता की हर सीमा को पार कर दिया गया है. तो, कुछ खबरे ऐसी होती जिसमें किसी एक पक्ष के खिलाफ आग उगला जाता. मैं ने अपने स्तर से उनकी लिखी खबरों को सुधारने की कोशिश करता. लेकिन आखिरकार आजीज आ कर समाचार संपादक से शिकायत की. उनकी तरफ से कह दिया गया कि मैं उनकी खबरों को बिना देखे मॉडम से भेज दूं. मैं ठंढी सांस ले कर रह गया. यह मेरे लिए राहत की बात थी और चिंता की भी, क्योंकि यहां से भेजे जाने वाली खबरों के लिए मूलतः मैैंं ही जिम्मेदार था. दूसरी मुसीबत यह हुई कि लगभग हर प्रेस सम्मेलनों में वे हमारे न चाहने पर भी वे मौजूद रहने लगे. मैंने एक दिन उन्हें समझाया कि किसी भी प्रेस कंफ्रेंस में एक अखबार से एक ही प्रतिनिधि का रहना उचित है. तो उन्होंने झटपट सलाह दे डाली- ‘भईया आप हर जगह क्यों जाते हैं. आप प्रभारी हैं. कार्यालय में बैठिये हम हैं न..’ हर बात की शिकायत मुख्यालय में क्या करता. मैं ने उनकी सलाह मान ली. महत्वपूर्ण प्रेस कंफ्रेंसों को छोड़ कर प्रेस कंफ्रेंसों में जाना छोड़ दिया. मेरे लिए सहूलियत कि बात इतनी थी कि जिन प्रेस कंफ्रेंसों में खाने और पीने की व्यवस्था नहीं रहती, वहां जाने में उनकी रूचि नहीं रहती. और जन पक्षीय समाचार तो इसी तरह की जगहों से मिलता है. फिर भी अखबार की छवि उनके कारनामो से प्रभावित हो रही थी. लेकिन मेरे सामने उन्हें बर्दाश्त करने का दूसरा विकल्प नहीं था. क्योंकि डेस्क के लोगों से उनके मधुर संबंध बन चुके थे. कई बार मैंने इस संबंध में सीधे संपादक से बात करने का विचार किया, लेकिन मुझे इस बात का भी एहसास था कि जब उनके निर्देश पर ही उन्हें यहां मेरे साथ काम करने की अनुमति दी गई है तो फिर उनके खिलाफ वे सुनेंगे? लेकिन कुछ दिन बाद इसका मौका मिल ही गया. हुआ यह कि एक नये अखबार ने राजधानी में लांच किया. अखबारों की ‘स्वस्थ प्रतियोगिता’ शुरु हो गई. कर्मचारियों को तोड़ना-जोड़ना, एक दूसरे का पोस्टर फाड़ना, हॉकरों की आपसी मार पीट, आदि आदि. हमारे शहर में भी अखबार एजंटों की लड़ाई शुरु हो गई. मुझे भी निर्देश मिला कि जहां अखबार उतरता है, वहां सुबह सुबह जाउं. फिर एक दिन अखबार के दफ्तर से बुलावा आ गया. तड़के बस पकउ़ कर कार्यालय के लिए रवाना हो गया. कार्यालय पहुंचते थोड़ा बिलंब हो गया. पता चला कि सभी संवाददाता और संपादकीय सहयोगी सभा कक्ष में हैं. मैं भी वहां पहुंचा. पूरा कक्ष ठसाठस भरा हुआ था. और संपादकजी का भाषण चल रहा था. ‘….यह कंपीटीशन का जमाना है. जो सतत रूप से इसके लिए तैयार नहीं रहेगा, वह पिछड़ जायेगा और अंततोगत्वा उसका अस्तित्व मिट जायेगा. वे हमसे अधिक साधन संपन्न हैं. अनैतिक तौर तरीका इख्तियार करने में उन्हें परहेज नहीं. हम पहले भी इस तरह की चुनौतियों का सामना कर चुके हैं. आप सबों के सहयोग से हम इस बार भी मुकाबला कर सकेंगे…लेकिन कैसे? हमे साबित करना होगा कि हम उनसे भिन्न हैं. हमारे संवाददाता, हमारे अन्य संपादकीय सहयोगी सिर्फ इस परिसर के भीतर ही नहीं, जहां कहीं भी बाहर जाते हैं, उन्हें याद रखना होगा कि वे इस अखबार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. ऐसे में उन्हें अपने चरित्र और आचरण पर विशेष ध्यान देना होगा. उसके बल पर ही कर सकते हैं हम उनका मुकाबला कर सकते हैं….मैं अपने तमाम प्रभारियों को सावधान करता हूं कि वे ऐसा कोई काम न करें जिससे अखबार की छवि प्रभावित हो..यदि उनके अधीन काम करने वाला कोई स्ट्रिंगर भी किसी तरह का गलत आचरण करता है तो इसके लिए वे ही जिम्मेदार होंगे….’ बड़ा ओजस्वी भाषण था. मैं प्रभावित तो हुआ ही, यह मंथन भी मेरे दिलो दिमाग में शुरु हो गया कि अपने नये सहयोगी के आचरण के लिए भी मैं ही धरा जाउंगा. लेकिन करूं क्या? किसी की शिकायत करना मेरे स्वभाव में नहीं था. लेकिन अब भी चुप रहा तो यह मेरे लिए परेशानी का सबब बन जायेगा. सभाकक्ष से निकल कर आफिस के कैंटीन में गया. संक्षेप में संपादकजी के नाम एक पत्र लिखा जिसमें नये सहयोगी के कार्यशैली का ब्योरा दिया. आफिस से निकलने के पहले डरते डरते संपादकजी के कक्ष में गया. उन्होंने हंस कर स्वागत किया. ‘कहिये, क्या बात है?’ ‘आपका भाषण अच्छा था. हम अपने चरित्र और आचरण से ही खुद को उनसे भिन्न साबित कर सकते हैं…इसीलिए यह पत्र देने आया हूं..’ ‘ क्या है इस पत्र में..’ ‘आप खुद पढ लीजिये, फिर जैसा निर्देश देंगे करूंगा..’ ‘ठीक है, आप पत्र छोड़ जायें. मैं दो तीन दिनों के लिए बाहर जा रहा हूं. लौट कर पढूंगा, फिर आपसे बात करूंगा..’ मैं नमस्कार करके बाहर निकल आया. अगले दिन वापस अपने कार्यक्षेत्र में. अपने आफिस के छोटे से केबिन में बैठ कर मैंने अपने संपादक के ओजस्वी भाषण के आलोक में अपने सहयोगी संवाद सूत्रों के लिए एक आचार संहिता बनाई जिसमें टाईम पर कार्यालय आने, शाम चार बजे तक समाचार फाईल कर देने, हर समाचार में संबंधित पक्ष से बात कर लेने, किसी भी प्रेस कंफ्रेंस में शराब न पीने आदि का निर्देश दिया गया था. मैं ने उस लिखित आचार संहिता को अपने ऑफिस के नोटिश बोर्ड पर चिपका दिया. किसी ने पढ कर मुंह बिचकाया, किसी ने व्यंग्य भरी मुस्कान से मेरी तरफ देखा. मेरे नये सहयोगी ने आते ही पूछा – ‘यह क्या है भईया..’ ‘ हमे दूसरे अखबार के पत्रकारों से भिन्न दिखना है…’ बत आई गई हो गई. मैं बेसब्री से अपने संपादकजी के फोन की प्रतीक्षा करने लगा. पता नहीं पत्र पढ कर उनकी क्या प्रतिक्रिया हुई हो. उनके कृपापात्र के खिलाफ शिकायत की थी मैं ने. अब जो हो, देखा जायेगा. एक सप्ताह बाद उनका फोन आया. ‘…यह सब आपने पहले क्यों नहीं बताया? आप हमारे प्रतिनिधि हैं वहां. आज सेे ही उनकी छुट्टी कीजिये.’ फिर रूक कर बोले- ‘विज्ञापन का जो पैसा उनके यहां बकाया है, उसकी वसूली कैसे होगी? ऐसा कीजिये, उन्हें अभी कार्यमुक्त नहीं कीजिये. सिर्फ उनके समाचार भेजने पर प्रतिबंध लगा दीजिये. उनसे कहिये कि पहले कार्यालय आ कर बिज्ञापन के बकाये का हिसाब करें.’ कुछ ही देर में वे पहुंच गये. ‘भैईया…आज एकदम एक्सक्लूसिव खबर है..’ मैं ने ठंढे स्वर में कहा-‘संपादकजी ने आपको समाचार भेजने से मना किया है.’ वे आसमान से गिरे, फिर हत्थे से उखड़ गये. लेकिन समाचार फाईल नहीं किया. बहुत देर तक लाल पीले होते रहे. फिर दनदनाते हुए कार्यालय से निकल गये. दिन बीतता जा रहा था. मुझे लगा कि उनसे छुटकारा मिल गया. लेकिन वह मेरा भ्रम था. शहर में एक बड़े नेता का भाषण होने वाला था. वे राष्ट्रीय स्तर के नेता थे और हमारे संपादक उनके बेहद करीबी. उन्होंने मुझे सूचित किया कि वे उनसे मिलने मेरे यहां आने वाले हैं. कार्यालय भी कुछ देर के लिए आयेंगे. ‘ आप नेताजी से कहा मिलेंगे..’ ‘वह सब आप चिंता न करें. मैं उनसे मिल लूंगा..’ मैंने अन्य सहयोगियों को भी संपादकजी के कार्यक्रम की जानकारी दे दी और अगले दिन उनके आने की प्रतीक्षा करने लगा. दिन चढने लगा था. अचानक कार्यालय के कुछ दूर पर एक गाड़ी आ कर रूकी. आगे आगे हमारे संपादकजी और उसके पीछे-पीछे उनका बैग उठाये हमारे भूरी आंखों वाले सहयोगी चले आ रहे थे. इनकी तो छुट्टी हो गई. फिर उसे साथ लिए क्यों फिर रहे हैं संपादकजी. कही नेताजी से तो पैरवी नहीं भिड़ाई? मैं प्रतीक्षा करने लगा कि वे मुझे निर्देश देंगे, उन्हें पूर्ववत काम करने दिया जाये. लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. उनके साथ हम सीटी सेंटर गये. एक होटल में सबों को नास्ता कराया. उसके बाद वे वापस हो गये. दो दिन बाद मुझे अपने मुख्यालय से बुलावा आया. सुबह की ट्रेन पकड़ने के लिए मैं स्टेशन पहुंचा. आवाक रह गया उन्हें भी वहां देख कर. ‘मुझे भी बुलाया गया है..’ हम दोनों एक साथ सफर तय कर अपने मुख्यालय पहुंचे. हमारे पेज के प्रभारी ने मीठी मुस्कान से हमारा स्वागत किया. कुछ देर इधर उधर की बातचीत के बाद हमारे सहयोगी को वहीं बैठा कर वे मुझे लेकर संपादक के कमरे में चले आये. कुछ देर अनौपचारिक बातें. फिर काम की बात शुरु हो गई. ‘..तो आपने नई परिस्थितियों से निबटने की क्या कार्ययोजना बनाई है. खबरो की संख्या बढानी होगी. विज्ञापन का फ्लो बढाना होगा…सकूर्लेशन पर भी नजर रखनी होगी..’ ‘खबरों की गुणवत्ता के लिहाज से हम नंबर वन है..’, मैं ने दबे स्वर में कहने का प्रयास किया. ‘ क्वालिटी नहीं, क्वांटिटी भी बढानी होगी. खबरों की संख्या बढानी होगी संख्या. इधर कई दिन हमारा अखबार हॉकरों ने नहीं उठाया आपने पता किया..’ ‘हमारा अखबार नहीं, किसी का भी अखबार नहीं उठा. हॉकरो ने हड़ताल..’ ‘आपने दफ्तर में फोन किया? ऐसे तो काम नहीं चलेगा..’ मैं आजीज आ गया था उनके तावड़तोड़ हमले से. ‘ क्यों न उन्हें फिर से काम पर रख लिया जाये..’ संपादकजी गुरु गंभीर बने रहे. फिर बोले-‘उन्हें बुलाओ..’ पेज के प्रभारी बाहर निकल गये. कुछ ही पलों में उन्हें साथ लेकर भीतर आये. संपादकजी ने किंचित नाराज स्वर में कहा -‘हम आपको फिर से काम करने का मौका दे रहे हैं. सर्कूलेशन बढ़ेगा न? मैं तीन महीने बाद फिर समीक्षा बैठक बुलाउंगा..’ मैं ने बुझे स्वर में कहा -‘इनके खबरों को देखने की जिम्मेदारी डेस्क की रहेगी..’ कुछ देर कमरे में सन्नाटा रहा. फिर संपादकजी बोले – ‘ क्यों न पूरे कार्यालय की जिम्मेदारी इन्हें दे दी जाये. आज से समाचार, विज्ञापन, सर्कूलेशन सब कुछ यही देखेंगे. आप सिर्फ विशेष खबर लिखिये..’ मैंने एक बार पेज के प्रभारी की तरफ देखा, फिर संपादकजी की तरफ. मुझे लगा जैसे उनके आंखों की पुतलियां भी भूरे रंग में तब्दील हो गई हो. निपट भूरे रंग में… विनोद कुमार सर्वोदयनगर, डैम साईड, कांके रोड, रांची.

महुआ फूलों की सुगंध और त्रासदी

 महुआ फूलों की मादक गंध और मांदल के बगैर आदिवासी समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती है. लेकिन त्रासदी यह कि उपभोक्तावादी संस्कृति के दबाव में मांदल लुप्त होता जा रहा है और महुआ एक शराब बन कर आदिवासियों के शोषण का हथियार बन गया है. हकीकत यह है कि आदिवासी समाज में महुआ के शराब का प्रचलन नहीं था. महुआ वसंत के दिनों में में खिलता है. कठोर श्रम के चार पांच महीने बाद अपनी एक साला फसल काट कर आदिवासी समुदाय जब कुछ महीनों के लिए कृषि कार्य से मुक्त होता है, उन्हीं दिनों महुआ फूलों की मादक गंध हवा में तिरने लगती है. अतल धरती और आकाश की सारी मादकता, परिपूर्ण सुगंध से लबरेज सफेद-पीले फूल महुआ के पेड़ों से खुद ब खुद टपकने लगते हैं और जमीन पर बिछ जाते हैं. आदिवासी औरते तड़के इन फूलों को चुन कर अपने आंचल में या टोकरियों में भर घर ले जाया करती थीं. इनसे श्रृंगार करती थीं. इन्हें बिना सुखाये चावल की गुंडी के साथ पका कर खाया जाता था, जो अत्यधिक स्वादिस्ट और पौष्टिक होता है. महुआ के फल से सब्जी बनती और उसके बीज से तेल.
लेकिन अब बहुविध उपयोग में आने वाला आदिवासी संस्कृति से जुड़ा यह फूल नशे की वस्तु के रूप में तब्दील होता जा रहा है. आदिवासी समाज को न तो महुआ के शराब बनाने की प्रविधि का ज्ञान था और न उनके बीच महुआ शराब का प्रचलन. जानकारों के अनुसार बंगाल के भीषण अकाल के दौरान शूरी ;मंडल और बनिया समुदाय के लोगों का इस क्षेत्र में प्रवेश हुआ और उन्होंने प्रकृति के इस अनमोल वरदान को शोषण के हथियार में बदल दिया. बंगाल में महुआ शराब का प्रचलन था और वे लोग वहीं से महुआ शराब बनाने की प्रविधि लेकर आये. उनकी नियोजित साजिश से विगत चालीस-पचास वर्षों में महुआ शराब का प्रचलन संपूर्ण आदिवासीबहुल इलाकों में हो गया है. महुआ शराब ने झारखंड में महाजनी शोषण का जो इतिहास लिखा उसका वर्णन किया जाये तो एक मोटी पोथी बन जायेगी. संक्षेप में कहा जा सकता है कि अब महुआ फूल मुख्य रूप में शराब बनाने के काम आता है. अब आदिवासी महिलाये उन्हें चुन कर घर नहीं ले जाती, व्यावसायियों के हाथों बेच देती हैं. महुआ फूल खिलने के पूर्व ही व्यावसायी स्वयं या उसका एजंट गांव में पहुंच जाता है.
जंगल के विनाश के साथ महुआ के पेड़ निरंतर कम होते जा रहे हैं. बावजूद इसके मुसाबनी, चाकुलिया, हटिया, कालिकापुर, चांडिल आदि बाजार इसके खरीद-फरोख्त के बड़े केंद्र बन गये हैं.  फूल का बड़ा भाग अब छोटे-छोटे बिचौलियों के माध्यम से बड़े व्यावसायियों तक पहुंच जाते हैं और फिर शराब मापिफया तक. शराब बनाने का तरीका बहुत आसान है. महुआ के फूल को रानू -एक किस्म का रसायन- के साथ मिला कर सड़ाया जाता है और बड़े-बड़े हंडों में रख कर जमीन में गाड़ दिया जाता है. तीन-चार दिन बाद इस सामग्री को गर्म कर वाष्प बनाया जाता है और वाष्प को ठंढा कर शराब में बदल दिया जाता है.
अर्थशास्त्र बिल्कुल सरल है. एक सेर महुआ, 50 ग्राम रानू और 250 ग्राम गुड़ से तीन बोतल शरब बनता है. शराब बनाने में जलावन के रूप में सामान्यतः जंगल से चुराई लकड़ी का इस्तेमाल होता है. कुल मिला कर खर्च पांच सात रूपये पड़ता है, जबकि तीन बोतल महुआ शराब की कीमत 40-45 रुपये.
यह शराब आदिवासी समुदाय को आर्थिक रूप से विपन्न और उनके तन-मन को खोखला बना रहा है. साथ ही शराब चुलाई के धंधे की वजह से जंगल की अवैध कटाई होती है. बैध भट्ठियों के अलावा महुआ शराब की अधिकतर भट्ठिया जंगल-झाड़ में ही छुप कर चलती है. जब तब इस तरह की भट्ठिया पकड़ी भी जाती हैं लेकिन कुछ दिन बंद रहने के बाद फिर से स्थान बदल कर स्थानीय पुलिस-प्रशासन की मदद से चालू हो जाती हैं.
महुआ के पेड़ जंगल कटने के साथ निरंतर कम होते जा रहे हैं. जो बचे हैं वह शराब माफिया के चंगुल में हैं. समय रहते यदि आदिवासी समाज और आदिवासी संस्कृति और अस्मिता को बचाने के मूल उद्देश्य से बनी झारखंडी सरकार महुआ के पेड़ों को बचाने और उसे शराब माफिया के चंगुल से मुक्त नहीं करती तो आदिवासी संस्कृति से जुड़ा यह अनमोल पेड़ मिट जायेगा.

जनजातीय कथा लेखन: विचार और पुनर्विचार

जनजातीय लेखन नये दौर में प्रवेश कर रहा है.उसकी शक्ति और सीमाओं को रेंखांकित कर रहे हैं जनजातीय भाषा और साहित्य के प्रख्यात विद्वान डा. दिनेश्वर प्रसाद.

डा. दिनेश्वर प्रसाद

स्वतंत्रता के पूर्व ही झारखंड जनजातीय भाषाओं का अपने ढंग का रचनात्मक जागरण दिखाई देता है. किंतु इस जागरण की सीमीएं भी थी. जनजातीय भाषाओं में जो साहित्य लिखा गया था, वह मुख्यतः धार्मिक था. धर्म संबंधी प्रश्नोत्तर पुस्तिकाएं, बाईबल के आंशिक अनुवाद की पोथियां और अपने अपने चर्च में गाये जाने के लिए विभिन्न प्रकार के भजन और स्रोत- मुख्य रूप से इनकी ही रचना के उदाहरण उपलब्ध होते हैं. 1840 ई. के आस पास इस प्रकार के लेखन में त्वरा आती है. किंतु जहां तक मेरी जानकारी है, इन भाषाओं में कथा लेखन का एक ही उदाहरण मिलता है. वह 1920 ई. के आस पास मेनास ओड़िया का उपन्यास ‘मथुरा की कहानी’ है. यह एक महा काव्यात्मक उपन्यास है जो पिछली शताब्दी के अंतिम वर्षों में ही मुद्रित हो सका. यह कहानी खूंटी के नजदीक बसाये जाने वाले एक नया मुंडा गांव की कहानी से आरंभ होता है. आरंभ बड़ा चमत्कारी है. एक नया गांव बसाने के लिए पाहन के निर्देशों के अनुसार कुछ लोग पहाड़ी की चोटी से ससंदिरी के लिए शिलाखंड लुढ़का रहे हैं. ससंदिरी नहीं तो गांव कैसा. किंतु इस नाटकीय आरंभ के बाद उस युग की घटनाओं का एक पूरा सिलसिला चित्रित हुआ है. इन घटनाओं में बिरसा भगवान का जीवन भी आया है. इसमें समस्त मुंडा जीवन चक्र चित्रित हुआ है. इसे पढ़ कर महाभारत की याद आती है जिसके विषय में यह कहा गया है कि जो महाभारत में नहीं है वह भारत में नहीं है – यन्न भारते तन्न भारते – जो कुछ मथुरा कहानी में नहीं है वह मुंडा जीवन में भी नहीं है. भाषा की दृष्टि से भी यह एक अद्वितीय रचना है. इस महान रचना के प्रकाशन के पीछे फादर पौनेट की साधना नहीं होती तो यह कभी प्रकाशित नहीं होती. किंतु आज तक इसके नमूने और स्तर का कोई दूसरा कार्य नहीं हो पाया है. खड़िया के प्यारे केरकेट्टा इसके अपवाद हैं जिनका लघु उपन्यास ‘ बेरथा बिहा’ है.
 लेकिन यदि हम सर्वेक्षण करें तो यह पायेंगे कि उपन्यास लेखन का कार्य एक सीमा तक संथाली में तो हुआ है लेकिन मुंडारी और खड़िया के अतिरिक्त अन्य किसी जन जातीय भाषा में शायद नहीं. कहानियां कमोबेश लिखी जाती रही है और ये कहानियां आगामी कथा लेखन की उस दिशा का संकेत करती है जिसमें यात्रा करने पर झारखंड का जनजातीय कहानी लेखन अपनी मौलिक और प्रभावशाली परंपरा बनायेगा. इसका कारण यह है कि आज के झारखंडी नवयुवक अपने समाज की विशिष्ट संरचना और समस्याओं को पहचानने लगे हैं. वे गैर जनजातीय समाजों से अपनी भिन्नता का प्रखर बोध रखते हैं. इसलिए रोज केरकेट्टा जैसे कहानी लेखक, लेखिकाएं सामने आ रहे हैं. हाल में हो भाषा के विशेषज्ञ डा. आदित्य प्रसाद सिन्हा ने लगभग पांच दशकों में लिखित हो कहानियों का संधान किया है. आदिवासी पत्रिका में खोज करने पर यहां की अन्य भाषाओं में लिखी गई कहानियां भी सामने आ सकती हैं. किंतु मैं जिस बात का उल्लेख करना चाहता हूं, वह यह है कि अब तक संथाली के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में कहानी लेखन की प्रायः क्षीण परंपरा ही बन सकी है.
 यह एक ऐसा विषय है जिस पर सोचा जाना चाहिए. मुझे ऐसा लगता है कि रचना का केवल स्वांतःसुखाय पक्ष ही नहीं होता. इसका एक अर्थशास्त्रा भी होता है. इन भाषाओं का कोई खरीदार वर्ग नहीं बन सका है. यह वर्ग स्वयं इन भाषाओं को बोलने वालों का ही वर्ग हो सकता है. इनमें लिखी गई रचनाएं स्वयं जनजातीय भाषाभाषी नहीं खरीद पाते या खरीदना चाहते हैं.
 किंतु इस क्रम में जिस बात की विशेष रूप से चर्चा होनी चाहिए, वह यह है कि यहां की जनजातीय के संबंध में हिंदी में बहुत कुछ लिखा गया है. उस लेखन का सबसे बड़ा भाग कथा लेखन है. पिछली शताब्दी के प्रारंभ में ठाकुर रामचीज सिंह ने हो जीवन पर उपन्यास लिखा था. गांधीवादी हिंदी प्रचारक रामानंद ने ‘कोरा कुमारी’ नामक उपन्यास लिखा जो संथाल जीवन पर आधरित है. किंतु यहां की हो जनजाती पर जो उपन्यास और कहानियां योगेंद्रनाथ सिन्हा ने लिखी, वे कलात्मक दृष्टि से भी उल्लेखनीय है. उन्होंने वनलक्ष्मी और वन के मन में ये दो उपन्यास लिखे और हो जाति के जीवन प्रसंगों पर कई मार्मिक व कलात्मक कहानियां लिखी. यद्यपि राधाकृष्ण का लेखन क्षेत्र मुख्यतः भिन्न है, किंतु उन्होंने जनजातीय जीवन पर कई बहुत अच्छी कहानियां लिखी हैं. बाद के लेखकों ने भी इस क्षेत्र में कार्य किया है. कभी भालचंद्र ओझा का सांवला जल नामक उपन्यास कई वर्षों तक चर्चा में था. पिछले 20-25 वर्षों में यहां के हिंदी लेखकों का एक विस्तृत जनजातीय कथा सहित्य तैयार हुआ है. इसके उदाहरण हैं गगन घटा घहरानी, मनमोहन पाठक, पांव तले की दूब, संजीव, समर शेष है, विनोद कुमार.
 किंतु आलोचना करने वाले यह कह सकते हैं कि जनजातीय लेखक ही अपने समाज के जीवन पर सबसे प्रामाणिक रूप में लिख सकता है. इसलिए यह आशा की जाती है कि इस क्षेत्र के जनजातीय रचनाकार न केवल अपनी अपनी भाषा में, बल्कि हिंदी में भी अपने समाज का जीवन लिखेंगे. तभी जनजातीय यथार्थ का बहुरंगी चित्र सामने आ पायेगा. अभी तो स्थिति यह है कि न केवल अपनी अपनी भाषा में इस विषय से संबंधित उनका लेखन बहुत सिमित है बल्कि जिन जन जातीय रचनाकारों ने हिंदी में भी अपने जीवन का यर्थाथ लिखा है, उनकी रचनाएं भी बहुत सिमित हैं.