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डा. रामदयाल मुंडा से बातचीत

‘बनिया बनने में हजार-दो हजार वर्ष लगेगा आदिवासियों को’

आदिवासी समाज की ताकत और संकट के बारे में जितनी गहरी समझ डा. रामदयाल मुंडा में हैं, शायद वैसी समझ अपने समकालीन किसी अन्य आदिवासी नेता में नहीं. हमने उनसे नई औद्योगिक नीति और उदारीकरण के इस दौर में आदिवासी समाज पर मंडरा रहे अस्तित्व के संकट पर बातचीत की थी. बातचीत तो एक साक्षात्कार के रूप में शुरू हुआ, लेकिन एकाध प्रश्न के बाद ही सवालों का सिलसिला खत्म हो गया और वे खुद सवाल और जबाब बन गये. यह बातचीत मोहराबादी स्थित उनके आवास पर हुई थी हम आंगन में तन कर खड़े आकाश छूते शाल वृक्षों की छाया में बैठे थे और सन्नाटे में तिर रही थी उनकी आवाज..

सरप्लस एकानामी, मैनेजमेंट का एक पक्ष. यहां का आदमी बाबाजी है. कल क्या खायेगा इसकी चिंता नहीं. अब उसका पाला पड़ा है उन लोगों से जो प्रबंधन में, जोड़-तोड़ में माहिर हैं. जबकि आदिवासी डेमोक्रेसी, सुपर डेमोक्रेसी सब देख लिया, लेकिन मार्केट में एक दम फ्ेल्योर.. बनिया बनने में उसे हजार-दो हजार साल लगेगा.. जिस इलाके में वह रहता है वह एकोनोमिकली वायेबल हो गया है पूरी दुनियां के लिए. इस दबाव के बीच कैसे सरवाईव करे? कैसे खुद भी इनरिच हो और उन फोर्सेज का भी मुंह बंद कर सके जो कहते हैं कि वह विकास विरोधी है, यह सवाल है. उसके क्षेत्र में अतिक्रमण हो रहा है तो कहते हैं कि ऐसा विकास नहीं चाहिए. तो कैसा विकास चाहिए? हम लोग ऐसा प्रस्ताव लाते जिसे वे देख और समझ पाते तो इतना संघर्ष नहीं होता. हमको हजार मेगावाट बिजली वाला प्लांट नहीं चाहिए ऐसी योजना बताओ जिससे जंगल डूब क्षेत्र में नहीं जाय, खेती योग्य जमीन न डूबे. छोटे प्लांट बिठाओ. एक की जगह बीस प्लांट जिससे हमारा गांव भी रौशन हो और तुम्हें भी बिजली मिले.
….नेहरु युग के औद्योगीकरण से कोई लाभ नहीं हुआ आदिवासी समाज का. ऐसा मंदिर बनवाया जिसमें भगवान तो नहीं ही मिला, प्रसाद भी नहीं. विकल्प खड़ा करना होगा, वह भी हमारी संस्कृति और बुद्धिमत्ता के साथ. खेत बनाने में हजार साल लगते हैं, उसको डुबाने की बात करोगे तो कैसे होगा?
पुनर्वास की कोई नीति नहीं. कटहल के एक विशाल पेड़ की कीमत लगाते हैं 200 रुपये. आप यह कर क्या रहे हैं पुनर्वास के नाम पर. आप कम्युनिटी उजाड़ रहे हैं और व्यक्ति को बसा रहे हैं, जबकि इनकी ताकत है सामुदायिक जीवन. पानी बिना मछली जीवित रह सकती है? इसलिए हम मांग करते हैं सांस्कृतिक पुनर्वास की. हमारा अखड़ा, हमारे स्कूल, हमारे जाहेर थान सबको एक साथ बसाईये. कोयलकारो पर सब राजी हो गये थे. बस उनकी मांग थी कि पहले दो गांव बसा कर दिखाइये. वे नहीं कर सके. दो गांव भी फिर से खड़ा नहीं कर सके तो सौ गांव को नये सिरे से कैसे बसायेंगे?
पूरा देश मरुभूमि बनने के कगार पर है. जहां आदिवासी हैं, वहीं थोड़ा जंगल बचा है. सरकार के लिए तो यह रेवेन्यु मात्र है. जंगल को बचाना है तो आदिवासियों को बचाना होगा. पहले खेती से आध पेट भरता था तो आधा पेट जंगल से. लेकिन जंगल तो वैसे लोगों के हाथ में चला गया जो जंगल को समूल नष्ट करने पर तुले हैं. जंगल देखते देखते गायब हो गया. जंगल के आदमी का चेहरा भी उजाड़ हो गया. हम अंडमान निकोबार देख कर आये हैं. देह पर कपड़ा नहीं लेकिन हृस्ट-पुष्ट हैं वहां के लोग. लेकिन यहां के आदिवासियों को देखिये, लगता है जैसे पूरा सत्व ही निचुड़ गया है. मूल वजह है कि जंगल नहीं रहे.
जंगल का दोहन अंग्रेंजों के जमाने से हो रहा है. इस्ट इंडिया कंपनी को व्यापार के विस्तार के लिए रेल और सड़क मार्ग चाहिए था. जंगल कटने का सिलसिला तभी से शुरु हो गया. फिर उनकी दृष्टि खनिज संपदा पर पड़ी. उसके लिए भी जंगल कटे. आदिवासी खनिज संपदा के बारे में नहीं जानता हो, ऐसी बात नहीं. मौर्य काल से ही लोहा और तांबा का ज्ञान था. आवश्यकता के अनुसार उसे गलाने की प्रविधि भी थी. लेकिन यह समझ नहीं कि उसकी खरीद बिक्री भी हो सकती है. कोयला जला कर भात रांधने की बात उसे नहीं सूझी कभी. इसलिए खनिज का दोहन नहीं किया. अब दोहन हो रहा है. लेकिन सारा पैस विदेश चला जाता है. ठेकेदार बाहर का, अभियंता बाहर का. सब मिल कर लूट रहे हैं. लोयेस्ट लेवल से लेकर हाइयेस्ट लेवल तक हस्तक्षेप करना होगा.
जंगल तो नाममात्रा को रह गये. मेहनत से तैयार खेती योग्य जमीन भी खनन और प्रदूषण से बर्बाद हो रहा है. जो कुछ बचा है, उसे भी लूटने की तैयारी हो रही है. 99 इयर लीज, इसका क्या मतलब? एक जेनरेशन 30 साल का होता है. बहुत जरूरी हो तो अधिक से अधिक दस से पंद्रह साल की बात कीजीये.रायल्टी का एक हिस्सा खेत के मालिक को भी दीजिये. लेकिन अभी तो जमीन से जुड़ी किसान की नाल ही काट देना चाहते हैं. नाल जुड़ी रही तो कारखाना नहीं लगने पर पूछेगा तो, हजूर यह क्या हो रहा है? यह तो पूछ सकेगा कि कारखाना लगने के बजाय यह फाईव स्टार होटल, यह स्वीमिंग पुल क्यों बनवा रहे हैं?
जरूरत है 100 एकड़ की. मांगते हैं हजार एकड़. एचईसी का काम 2000 एकड़ में चल सकता था. एक्वायर किया 13000 एकड़. अब वहां बना रहे हैं केरला एसोसियेशन का क्लब तो बंगाल एसोसियेशन. तुपुदाना, कोकर, हरमू कालोनी, सब उसी के नाम पर बन गये. बनिया आया. फिर उसका साला आया, फिर उसका ससुर. अब एचइसी बंदी के कगार पर है. तो फालतू जमीन लौटा दो उनको जिनसे जमीन लिया. लेकिन नहीं. उस जमीन को लेकर सरकार और एचइसी में सौदेबाजी हो रही है. सरकार चाहती है कि जमीन किसी तरह से हथिया लें. वहां नया शहर बसायेंगे. विधायकों सांसदों को कोअपरेटिव बनाने के लिए जमीन देंगे.
और इस तरह उजड़ने वाले आदिवासी कहां गये ? एक चला गया आसाम. फिर उसका भाई बंद भी चला गया. 60 लाख झारखंडी अभी आसाम में है. हमको आश्चर्य हुआ भाषाओं को लेकर. यहां नागपुरी, खोरठा चलाते हैं. वहां सभी भाषाएं मिल कर सदरी हो गयी. सभी वही बोलते हैं. वहां भी उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है. देश के अन्य हिस्सों में गये आदिवासियों का भी वही हाल है. जो इलाके उनके कठोर परिश्रम से आबाद हुए, उन इलाकों से भी उन्हें बार-बार खदेड़ा जाता है. अब वे उन इलाकों के लिए बोझ हो गये.
आदिवासी समझ रहा है कि उन्हें नष्ट करने का हिडिंग एजेंडा बना लिया गया है. भिन्नता में एकता का नारा देते हैं. भिन्नता को स्वीकार भी कर रहे हैं.  बंगला, उड़िया, पंजाबी की भिन्नता को स्वीकार कर लिया, लेकिन हमारी भिन्नता उन्हें स्वीकार नहीं. मोटे जजमानों ने अपने राज्यों का तो इंतजाम कर लिया लेकिन लगभग दस करोड़ की आदिवासी आबादी को छिन्न भिन्न करके रखा. भील आबादी लगभग दो करोड़ है. पूर्वी गुजरात, उत्तरी महाराष्ट्र, पश्चिमी मघ्यप्रदेश, दक्षिणी राजस्थान जहां मिलते हैं, वहीं आबादी का निवास है. गोड़ उत्तरी महाराष्ट्र, दक्षिणी मघ्यप्रदेश, पश्चिमी आंध्र प्रदेश और ओड़ीसा में बसे हुए हैं. संथाल हो गये आसाम, बंगाल ओड़ीसा और झारखंड में. सब छिन्न भिन्न.
सिड्यूलिंग ऐसा किया कि जिन राज्यों में आदिवासियों की आबादी कम है, उसे आदिवासी सूची से बाहर कर दिया. बंगाल में सिड्यूल एरिया है ही नहीं, जबकि आदिवासियों की बड़ी आबादी पुरुलिया, मिदनापुर में बसी हुई है. कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान में भी वही बात. कुछ को राजनीतिक रूप से आईसोलेट कर दिया. असम में रह रहे 60 लाख आदिवासियों की पहचान आज भी झारखंडियों के ही रूप में है, जबकि वहां गये आदिवासियों को अब यहां के गांव घर का नाम भी याद नहीं रह गया है.
प्लानिंग ऐसा किया है कि विकास का सारा प्रेशर आदिवासी बेल्ट पर. ओजोन लेयर में छेद हो गया तो पेड़ लगाना है आदिवासियों को. जंगल बचाने का जिम्मा आदिवासियों का. वातावरण को सबसे अध्कि प्रदूषित कर रहे हैं सड़कों पर चलने वाले असंख्य वाहन और वायुमंडल को शुद्ध करने की जिम्मेदारी आदिवासियों की. आश्चर्यजनक तथ्य यह कि औद्योगिक कचड़े से, ध्ूाल धक्कड से जनेवा की टाईन नदी, लंदन की टेम्स या अमेरीका की मिसीसिपी जहरीली नहीं हो रही है, जहरीली हो रही है हमारी गंगा, दामोदर और सुवर्णरेखा. वर्ल्ड बैंक का पैसा वहां नदियों को साफ कर रहा है और हमारे यहां की नदियों को गंदा. मैंने अमरीका के मेनेसोटा में दस वर्ष तक प्राघ्यापन का काम किया है. वह कोयला क्षेत्र है, लेकिन अमरीका का सबसे अच्छा पर्यावरण वाला क्षेत्र. वसंत में सफेद वर्फ की चादर से ढक जाता है इलाका. लेकिन अपने यहां रामगढ़ उतरते ही सांस भारी चलने लगती है. ओड़ीसा में एक जगह 37 स्पंज आईरन कारखाना खोला गया है. विरोध करो तो आदिवासी चोर है, बदमाश है.. विकास विरोधी है. चार राज्य मिल कर इन गंवार, जंगली लोगों का विकास करेंगे. इन चारो राज्यों में सबसे बड़ी संख्या में बंद हैं आदिवासी. उस समुदाय को राष्ट्र विरोधी बोला जा रहा है जो मानता है कि भारतवर्ष हमारा है. जो हमेशा लड़ा गुलामी के खिलाफ, जंगलों पहाड़ों में.
भारत के संविधान में आदिवासी शब्द नहीं. सिंधी अष्टम सूची में, नेपाली अष्टम सूची में, लेकिन जनजातीय भाषा अष्टम सूची में नहीं. 60 साल बाद संताली को अष्टम सूची में जगह मिली. बिडंबना देखिये कि आदिवासियों को अल्पसंख्यक भी नहीं माना गया. हमें इंडीजीनस पीपुल कहा गया. ह्यूमन हेरिटेज के केरियर. और अब तो झारखंड में रहने वाला हर समुदाय खुद को आदिवासी घोषित कराने की मांग कर रहा है. हम बोलते हैं, ठीक है. सभी आदिवासी हैं, लेकिन हमलोग थोड़े अधिक आदिवासी हैं.
बिडंबना यह कि एक तरफ आदिवासी बनने की होड़, दूसरी तरफ आदिवासी को मिटाने की साजिश. दिल्ली में एक आदिवासी नहीं मिलेगा, लेकिन लाखों हैं. हजारों हरिजन के रूप में. भील बस्ती है लेकिन आदिवासी नहीं…आदिवासी दस करोड़ हैं. कहते हैं दो करोड़ ईसाई बन गये. शेष आठ करोड़ कहां गये? वह हिंदू हो गया. धर्मिक विश्वासों के आधर पर तो आदिवासी खत्म. हिंदू जैसा बोल कर सबको हिंदू ही घोषित कर दिया. हिंदू जैसा तो मुसलमान भी है. भारत का हिंदू मुसलमान जैसा भी है. लेकिन धर्मिक विश्वासों के हिसाब से सब अलग. फिर आदिवासी धर्मिक विश्वासों में भारी अंतर के बाद भी हिंदू कैसे हो गया? इतिहास गवाह है कि आदिवासियों को हिंदुओं ने कभी स्वीकार नहीं किया. उसे मनुष्य नहीं माना. पूंछ वाला हनुमान स्वीकार्य, वह देवता हो गया. लेकिन आदिवासी को वा-नर, किन्नर बोला. अंग्रेजी में जिसे सब-ह्यूमन बोलते हैं.
जमाना कितना बदल गया, लेकिन नजरिया वही. उपर से चाहे वोट की राजनीति के लिए प्रेम दिखायें. लेकिन हमे आदमी से थोड़ा कम माना जाता है. मुझे अनुभव है. बहुत त्रासद अनुभव. जब विद्यार्थी था तो कमर के नीचे एक फोड़ा हो गया. कहां जाता इलाज के लिए. यही रांची के सदर अस्पताल में चला गया. डाक्टर ने टेबुल पर लेट जाने के लिए कहा. घाव को चीर कर साफ करना था. कंपाउडर घबरा कर बोला- ‘ एनेस्थेसिया की सूई नहीं दीजियेगा सर?’ डाक्टर का जवाब था -‘ क्या जरूरत.. इन लोगों को दर्द नहीं होता है. बड़े सहनशील होते हैं.’ उसके बाद चार लोगों ने कस कर पकड़ लिया और चीर-फाड़ करते रहे..
लेकिन धीरे-धीरे जागृति आ रही है. नेपाल से लेकर तेलंगाना तक वही जंगली- वनवासी सत्ता में है. वह अब हार मानने वाला नहीं, मैदान में डटा हुआ है अपने अस्तित्व को बचाने के लिए. यह आपको तय करना है कि आप उससे कैसे कम्युनीकेट करते हैं..