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फिर डाईन हत्या

डाईन हत्या की एक घटना फिर हुई है. लोहरदगा जिले के एक गांव में. वही पुरानी कहानी जो लगभग डाईन हत्या के पीछे हर बार सुनाई देती है. बुधराम उरांव जो बनसारी गांव के गुड़िया टोली में रहता है के परिवार में कई लोगों की लगातार मौत हुई. उसका संदेह गया एक 55 वर्षीया तेतरी उड़ांव और उसके पति पर. उसने सोखा, यानी गांव में तंत्र मंत्र सिद्ध करने वाले व्यक्ति, से संपर्क किया. उसने पुष्टि कर दी कि तेतरी उरांव और उसके पति ने जादू टोना करके तुम्हारे परिजनों की हत्या कर दी है. उसने गांव की मिटिंग बुलाई. वहां सुनवाई हुई और उन दोनों की पीट पीट कर हत्या कर दी गई और उसकी बेटी को गांव छोड़ कर चले जाने का आदेश दिया गया.
डाईन के रूम में सामान्यतः किसी उम्र दराज औरत को चिन्हित किया जाता है. इस बार उसके साथ उसके पति की भी हत्या की गई. इस तरह की घटनाओं के आधार पर आदिवासी समाज को अंधविश्वासी करार दिया जाता है. यह संभव है कि जहां इलाज की सुविधा नहीं, उस समाज में मौत की वजह रोग को न मान कर कोई अदृश्य मारक शक्ति मान लिया जाये. लेकिन इस तरह की घटनाओं के पीछे बहुधा आर्थिक कारण होते हैं. जमीन के झगड़े में या फिर किसी लाचार औरत की संपत्ति हड़पने के लिए इस तरह के अंधविश्वास का सहारा लिया जाता है. जमशेदपुर में हमारे एक मित्र हैं जायसवाल साहब. वकील है. उनके साथ मिल कर पंद्रह वर्ष पहले एक फ्री लीगल एड कमेटी हमलोगों ने बनाई थी. बाद में उस कमेटी ने डायन हत्या के मामलों की गहरी छान बीन की. कसमार प्रखंड में हुई अनेक घटनाओं की गहरी छानबीन के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया था कि डाईन को लेकर आदिवासी समाज में हो सकता है किसी तरह का किसी जमाने में अंधविश्वास भी हो लेकिन उसका इस्तेमाल निरीह, लाचार विधवा आदिवासी स्त्री की जमीन संपत्ति हड़पने के लिए उसके करीबी रिश्तेदार या पड़ोसी करते हैं. सोखा इस काम में उनकी मदद करता है.
इस तरह की घटनाओं से मानवीय चेतना को गहरा धक्का लगता है. इसकी भर्त्सना होनी चाहिए. लेकिन इस वजह से आदिवासी समाज को अंधविश्वास और जहालत का शिकार करार देना सही नहीं. हर तरह का समाज किसी न किसी तरह के अंधविश्वास का शिकार होता है. छठ मईया की टोकरी लेकर हमने पढे लिखे प्रबुद्ध जमात, जिसमें डाक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, सभी तरह के लोग होते हैं, को गंदले पानी में उतरते देखा है. इस उम्मीद से कि मईया या सूर्य देवता उनका भला कर देंगे. गणेशजी को दूध तो एक बड़ी आबादी ने पिलाया था. जब तब हनुमानजी को पसीना छूटने की बात हवा में मंडराती है. इन सब तरह के अंधविश्वास का पूरी ताकत से विरोध किया जाना चाहिए. और लोहरदगा वाली घटना की जांच पड़ताल एक आपराधिक घटना के रूप में होनी चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए.

विकास के हो हंगामे के बीच जीता एक आम आदिवासी

अलग झारखंड राज्य के गठन के बाद यह नवगठित राज्य निरंतर सपने देख रहा है. आर्थिक विकास का. भारी पूंजीनिवेश के बाद सर्वाधिक पिछड़े इस राज्य के ‘सिलिकॉन सीटी’ में बदल जाने का. वैसे, कुछ लोगों के लिए बगैर औद्योगिक विकास के ही यह पिछड़ा राज्य रेशम के शहर में तब्दील हो चुका है. वे चांदी के चम्मच से खाते हैं, बेशकीमती गाड़ियों में घूमते हैं और महानगरों के उपभोक्ता वस्तु से भरे बाजार में जब खरीदारी के लिए निकलते हैं तो देखने वाले इस बात पर यकीन नहीं कर पाते कि वे देश के सर्वाधिक पिछड़े झारखंड से आये हैं. वे हैं यहां के राजनेता, अफसरशाह, ठेकेदार और दलाल. उद्योगपति और प्रोफेशनल एनजीओ चलाने वाले मठाधीश. शहरों का निरंतर विस्तार हो रहा है. बहुमंजिली इमारतें बन रही हैं. शहर की परिधी छोटी पड़ने लगी है. समीपवर्ती गांवों को लीलने की साजिश चल रही है. और इसके समानांतर चलता डोमेसाईल का आंदोलन, कभी आरक्षण को लेकर उठा विवाद, तो कभी आदिवासी-कुर्मी टकराव. अर्थ और राजनीति केे इस चढ़ते-लुढ़कते सेंसेक्स के बीच एक आम आदिवासी कैसे जीवन यापन कर रहा है, क्या है उसके जीवन का अर्थशास्त्र, उसके सपने और आकांक्षाएं क्या हैं? आईये इसकी पड़ताल करें. इसके लिए हम आपको आदिवासी समाज की तीन प्रजातियों से रूबरू करेंगे. एक है मुंडा परिवार, दूसरे हैं कोल्हान क्षेत्र में रहने वाला हो परिवार और तीसरा अपनी खामोशी से लिपटा खड़िया समुदाय.
आईये मिलते हैं सबसे पहले एक मुंडा परिवार से. नाम है हरि सिंह मुंडा. मौजा – हूठ और टोला मरांगपिडी. पोस्ट पड़ता है अड़की. बिरसा मुंडा के गांव उलिहातू जाने के कुछ पहले पड़ता है यह गांव. सड़क के बिल्कुल करीब. हरि सिंह मुंडा चार भाई है. उसके पास 13 एकड़ 39 डिसमल जमीन है. वह बिल्कुल मुफलिस नहीं. सामान्य आर्थिक स्थिति वाला आदमी है. अधिकांश आदिवासी मुंडा परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी ही होती है. उस मौजा के अन्य गांवों हेम्ब्रोम, रूमचू, कुदीमनी, बरूत- सब के सब मुंडाओं के गांव हैं. अधिकांश लोग उसी की आर्थिक हैसियत के. पिता, बड़ा भाई, वह स्वयं अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ  उस जमीन पर मेहनत करता है और जीवन बसर करता है. अच्छी बारिस हुई तो साल भर का धान हो जाता है. कम बारिस हो भी तो मलाल नहीं. उसका भी रास्ता है उसके पास. हमारे लिए आश्चर्य का विषय. कम बारिस में भला कौन सा रास्ता ?
हरि सिंह मुंडा मंद- मद मुस्कुराता है. जैसे कोई भेद खोल रहा हो. ‘‘ है न. पिछले वर्ष अच्छी बारिस हुई. लेकिन उसके पहले सुखाड़ की स्थिति थी. तो, जून महीने में हुई हल्की बारिस में ही टांड़ जमीन पर गोड़ा धान लगा दिये. अक्तूबर में काट लिये.’’
गोड़ा धान की कई किस्में हैं. एक काला- काला. एक हल्का सफेद और एक लाल-लाल. पकने में समय लगता हैं. लेकिन पेट भ्र जाता है. हां डीएपी खाद मिल जाये तो फसल अच्छी हो जाती है. इसके बाद बारिस ठीक-ठाक हुई तो धान की नियमित फसल. खाने भर हो जाता है. थोड़ी बहुत सब्जी भी हो जाती है. आलू, बैगन, टमाटर.. जो हो जाये. इसके अलावा लाह है. पलाश, बैर, कुसुम, करंज के पेड़ पर लगता है लाह का कीड़ा. लाह 115-120 रूपये केजी तक बिक जाता है.
‘‘लकड़ी काट कर नहीं बेचते ?’’
‘‘ नहीं, हूट मौजा में जंगल से लकड़ी काटने पर रोक है. गांव का मुंडा है परता मुंडा. उसके साथ बैठ कर हम सबने तय किया है.’’
इतने से काम चल जाता है ?
हरि मुंडा थोड़े तैश में आ जाता है. ‘‘ क्यों नहीं चलेगा ? बहुत जरूरी हुआ तो कभी-कभार मजदूरी कर ली.’’
 नई औद्योगिक नीति और उदारीकरण और उसके साथ हुई तकनीकि क्रांति ने आम आदमी के सपनों को पंख लगा दिया है. मामूली से मामूली आदमी बड़ा से बड़ा सपना देखने लगा है. इन सपनों के व्यापार से ही आज की राजनीति और पतनशील पूंजीवादी व्यवस्था जिंदा है. हूट मौजा के मरांगपिडी गांव का हरि सिंह मुंडा सपने देखता ही नहीं और देखता भी है तो बहुत मामूली सपने. उसके गांव का कुंआ सूखे नहीं. तालाब और करीब के बहते नाले में पानी हो. उसका संकट यह है कि भूमिगत पानी का जलस्तर नीचे भागा जा रहा है. खुदाई करने पर अब जमीन के नीचे पत्थर मिलने लगता है, लेकिन पानी नहीं. यदि गांव के तालाब में पानी होता, कुंए में पानी होता तो वह थोड़ा ज्यादा सब्जी उगा पाता. उसे पानी-भात के साथ सब्जी भी खाने को मिल जाता. विडंबना यह कि उसके छोटे-छोटे सपने भी तकनीति क्रांति के इस दौर में पूरे नहीं हो पा रहे हैं.  फिर भी कोई बात नहीं. कल क्या होगा इसकी उसे चिंता नहीं. और आज की जरूरतों को वह अपने श्रम से पूरा कर लेगा. उसकी जरूरते हैं ही कितनी ?
हमने हरि मुंडा से पूछा -‘‘ एक महीने में कितना खर्च तुम करते हो?’’
वह मेरी बात समझ नहीं पाता. उसने कभी इस तरह का हिसाब किताब नहीं किया. इस बात का उसे अंदाजा नहीं. मेरे जोर देने पर वह हिसाब लगा कर कहता है -‘‘ हेम्ब्रोम में दो बार बाजार लगता है. एक बार सैको में. सप्ताह में तीन बाजार. हर बाजार में 15-20 रूपये का खर्च. सरसों तेल, नमक, किरासन तेल, आलू, प्याज और मिर्च खरीद कर लाते हैं. ’’
यानी, महीने में ढाई-तीन सौ रूपये का खर्च. मैं फिर पूछता हूं -‘‘ इसके अलावा कोई खर्च नहीं?कपड़े-लत्ते?
 वह बताता है – ‘‘ हां कपड़े तो चाहिए. सरहुल में सबको नया कपड़ा होना चाहिए. धोती 170-180 रूपये में. उसी दर में साड़ी. सर्ट, कुरता सौ-डेढ़ सौ रूपये में. दिसंबर में भी त्योहार होता है. चावल की रोटी बनती है. पत्ते के बीच चावल की रोटी. बच्चे पतंग उराते हैं.’’
 इस तरह हुआ साल में चार पांच हजार रूपये का खर्च. इतना रूपया जुट पाता होगा ? कैसे चलता होगा इसका जीवन ? मैं परेशान हूं. लेकिन हरि मुंडा के चेहरे पर शिकन नहीं. ‘‘ हो जाता है. कटहल के दिनों में कटहल बेच लिया. महुआ फूल और लाह बेच कर भी पैसा हो जाता है थोड़ा बहुत. कभी-कभार मजदूरी भी कर ली.’’
 कभी बाहर काम के लिए नहीं जाते ?
‘‘ हमारे परिवार के लोग नहीं जाते. जो भी दिक्कत होगा, यही सहेंगे. गांव के कुछ लोग जाते हैं. पंजाब, खेती बाड़ी के काम के लिए, नागालैंड सड़क बनाने के लिए. 28 घर का गांव है. पिछले साल तीन लोग काम की तलाश में बाहर गये थे.’’
उससे पूछने को अब कुछ रह नहीं गया है. फिर भी पूछता हूं -‘‘ अच्छा हरि सिंह मुंडा, बताओ, अच्छे दिनों की तुम्हारी क्या कल्पना है?’’
वह समझ नहीं पाता. टुकुर-टुकुर हमारी तरफ देखता है. एक बार कुछ दूर पर काम कर रही अपनी घरवाली की तरफ देखता है. फिर अस्फुट स्वर में बोलता है -‘‘ कुआं और तालाब में पानी हो, समय पर अच्छी बारिस हो. कभी-कभी पीने के पानी की बहुत किल्लत हो जाती है…’’
 हमारे अर्थशास्त्री परेशान हैं. मानते हैं कि सपनों का न होना ही उन्हें अतिरिक्त उत्पादन के लिए प्रेरित नहीं करता. इसीलिए तो यह समाज जड़ है, पिछड़ा है. उन्हें इस बात की शर्म नहीं कि हरि सिंह मुंडा के मामूली सपनों को पूरा करने में भी आज की व्यवस्था अक्षम है.
भोजन चक्र ही जीवन चक्र है कोल्हान में
कोल्हान क्षेत्र हो जाति के आदिवासियों का निवास क्षेत्र है. खनिज संपदा से भरपूर इस क्षेत्र के आदिवासियों का जीवन चक्र उनके भोजन-चक्र के पीछे-पीछे घूमता है. वनो से आच्छादित इस इलाके के गर्भ में भू संपदा अधिक और खेती योग्य जमीन कम हैं. इसलिए भले ही इस क्षेत्र के लौह अयस्क और खनिज संपदा के बूते बड़े उद्योगपति दुनियां के औद्योगिक साम्राज्य पर कब्जा कर रहे हों, लौह व्यापारी माला माल हो रहे हों, यहां के खनिज संपदा का सौदा कर राजनेता अपने घर की तिजोरी भर रहे हों, जनता बेहद गरीब है. इसका एक ठोस प्रमाण यह कि पूरे झारखंड बेल्ट में नशे के लिए या पर्व-त्योहारों के वक्त आदिवासी समाज हड़िया पीता है, लेकिन इस अलाके में हड़िया का सेवन भोजन के रूप में होता है. जीवन यापन के लिए यहां के आदिवासियों को अन्य क्षेत्र में बसे आदिवासियों से अधिक मेहनत करनी पड़ती है. लेकिन फिर भी उन्हें न तो अपने जीवन से असंतोष है और न किसी से कोई शिकायत. आईये नोवामुंडी प्रखंड के एक हो परिवार से आपको मिलाते हैं और समझने की कोशिश करते हैं उनके जीवन की जीजीविषा का रहस्य.
परिवार के मुखिया का नाम बामिया बोयपायी. पत्नी का नाम कुंती बोयपायी. बेटा नहीं, तीन बेटियां. लेकिन शहरी मध्यम वर्गीय गैर आदिवासी समाज में जैसे लड़किया अपने परिवार की छाती का बोझ बन जाती हैं, वैसी नहीं हैं ये बेटियां. वे अपने परिवार की संबल हैं, मजबूत हाथ हैं, जो घर को संवारता हैं, आंगन द्वार नीपता पोछता हैं, जलावन के लिए लकड़ियां बीन कर लाता है और खेती में भी हाथ बंटाता है. परिवार के पास है पांच एकड़ जमीन. इनमें अप्रैल-मई के दो महीनों को छोड़ पूरा परिवार पूरे साल खटता है तब जाकर इस परिवार का पेट भ्रता है. लेकिन उनकी विपन्नता में भी एक सुरूची है और एक बार अपरिचय की दीवार ढह गयी तो वे खुले मन से आपका स्वागत भी करेंगे. हम उनके यहां कोल्हान रक्षा संघ के बागी नेता केसी हेम्ब्रम के साथ पहुंचे थे जिन पर आदिवासी अस्मिता का सवाल राष्ट्र संघ में उठाने की वजह से वर्षों पहले राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चल चुका है.
बामिया बताते हैं -‘‘ पांच एकड़ जमीन में हम चावल, उड़द, मूंग, सरसों, मसूर, मटर, राहऱ, बाजरा, मकई सभी लगाते हैं.. सबसे पहले धान, बाजरा और राहऱ एक साथ बूनते हैं. जून में लगाते हैं और सितंबर में फसल तैयार. सबसे पहले धान काटते हैं. उसके बाद बाजरा और फिर राहर. जनवरी के बाद रवी फसल जिसमें हैं मटर, चना, मसूर, तीसी, सरसो और सरगुजा. मार्च तक फसल तैयार. अप्रैल मई में कोई फसल नहीं. खेती का काम नहीं. फल्-फूल चुनते हैं. इमली, कटहल, साल बीज, महुआ, कुसुम और करंज बीज. अपने उपयोग के लिए तेल भी बनाते है और शेष बेच देते हैं.’’
और बारिश नहीं हुई तो? थोड़ा बहुत तो हो ही जाता है. धान तीन किस्म की लगाते हैं. गोड़ा धान में पानी कम लगता है. पीबाबा धान में थोड़ा ज्यादा और बेड़ा धान में सबसे अधिक. तीनों फसल लगाते हैं. कुछ न कुछ तो हो ही जाता है. जिस परिवार के पास पांच एकड़ तक जमीन है, उनकी खोराकी चल जाती है. उतनी भी जमीन नहीं तो मार्च के बाद रोजी रोटी की तलाश में पलायन शुरू हो जाता है. अधिकतर लोग माध पर्व के समय तक लौट आते हैं कोई एकाध साल बाद लौटते हैं, लेकिन लौटते जरूर हैं. अपना ‘देस’ उन्हें खींच लाता है.
विपन्नता की दुनियां में त्योहारों के रंग
साल के कुछ महीनों को छोड़ जीवन का हर आयोजन एक पर्व के रूप में शुरू होता है. जीवन ही उनके लिए एक पर्व है. रंग-बिरंगा त्योहार. शायद अपनी शुष्कऔर एकरस दिनचर्या में उन त्योहारों से ही रंग भरता है. कोल्हान रक्षा संघ के सर्वमान्य नेता केसी हेम्ब्रम बताते हैं – ‘‘ कोल्हान में हो जनजाति की बहुलता है. अंग्रेजों के जमाने से हो ‘दिशुम कस्टम ऑफ द सिंहभूम’ के रूप में जाने जाते थे. बंगाल एसियेटिक सोसायटी 1840 के पेज नंबर 240 में उनका जिक्र मिलता है. उनकी भाषा हो है. पूजा-पाठ की प्रविधि अलग है. किसी मंदिर में या किसी मूर्ति की पूजा नहीं करते. गाछ के नीचे पूजा करते हैं. बड़, साल या अर्जुन गाछ. सिंदूर लगाते हैं. किनारे किनारे हल्छी और फिर रस्सी यानी नीट हड़िया चढ़ाते हैं.’’
घर के मालिक बामिया बोयपाय बताते हैं: वसंत के समय जब नया पत्ता फूटता है तो पर्वों की शुरूआत होती है. सबसे से पहले ‘बा पर्व’. उसके बाद फसल लगाने के पहले ‘बाबा मूटी’ की पूजा. धान उगने के बाद ‘हेरो पर्व’ और धान पकने के बाद ‘जोमनामा पर्व’. खेत से धान काट कर खलिहान में ले जाने के पहले भी पूजा होती  है. जब तक खलिाहन में धान रहता है, तब तक वहां ‘रस्सी’ चढ़ाया जाता है. खलिहान का धान जब घर पहुंच जाता है तो खलिहान में मुर्गा की बलि दी जाती है. घर में धान को रस्सी से बांध कर रखा जाता है फिर मकर के पहले या बाद मवेशी चराने वालों की पूजा. उसके बाद हड़िया-बर्तन आदि की पूजा और फिर साल का सबसे बड़ा पर्व ‘ माघे पर्व’.
पर्व त्योहार में होता क्या है, पूछे जाने पर बताया जाता है: जुटा तो माघे पर्व के समय नया साड़ी और धोती. सर्ट पैंट भी. फिर चावल के पकवान बने. सूअर और खस्सी का मांस. मांदल की थाप पर नाच गान और क्या.
 इन सबके लिए पैसा कहां से जुटता है ? जितनी फसल होती है, उससे पेट ही मुश्किल से भरता है, फिर कपड़े लत्ते के लिए पैसे कहां से आते हैं ? वक्त जरूरत पडत्रने पर इलाज के लिए पैसे कहां से आते हैं?
 ये सवाल हमे परेशान करते हैं, उन्हें नहीं. ‘‘ घर बनाने में पैसा नहीं लगता है. मिट्टी, जंगल से बांस-बल्ला और अपना श्रम. बन जाता है घर. अब तो सरकार भी इंदिरा आवास बना कर दे रही है, लेकिन अधिकांश लोग उसमें नहीं रहते. अपने घर से जोड़ कर बना तो अपने हिसाब से बना लेते हैं. लेकिन इसके लिए सरकार पर निर्भर नहीं. बीमार पड़ने पर जड़ी बूटी का इलाज या फिर जगन्नाथपुर और जामदा का सरकारी अस्पताल. जरूरत भर पैसा इमली, आम, बैर, करंज, महुआ, लाह आदि बेच कर हो जाता है. उस पर भी नहीं पुरा तो कहीं मजदूरी कर ली. गांव में 25-30 रूपये मजदूरी मिलती है. गांव से बाहर जाने पर पचास-साठ रूपये.’’
 मतलब कोई परेशानी नहीं ?
‘‘परेशानी तो है बाबू. जंगल खत्म होता जा रहा है. खनन वाले इलाके के आस पास पेड़ों में फल नहीं लगते.जमीन बंजर हुई जाती है..’’
 गांव से लौटते वक्त सड़क पर मिलता है सोमा लागुरी. पुकुरीपी गांव का युवक. साईकल पर लकड़ियों का गट्ठर लादे. बताता है: आठ किमी दूर जगन्नाथपुर जायेंगे. 100-120 रूपये तक में ये सारी लकड़ी बिक जायेगी. कल सुबह से इस काम में लगे हैं. जंगल से सूखी लकड़िया बीन कर और काट कर जमा किये. उनके गट्ठर बना कर अब शहर जा रहा हूं. दो बजे दिन में जगन्नाथपुर पहुंचूगा. लकड़ी बेच कर चावल वगैर खरीदूंगा. घर में मां है, बाबूजी हैं, पत्नी और दो बच्चे हैं. सबका पेट इसी से भरता है. खेत नहीं. दस-पंद्रह डिसमल जमीन है. उससे क्या होगा ?
 थकान के बावजूद वह मुस्कुरा कर हमे बिदा करता है. भाड़े की गाड़ी में सवार होते एक सवाल हमे मथने लगता है. ‘ ये दिल मांगे मोर’ की’ आक्रामक उपभोक्तावादी संस्कृति के बीच यह कैसा आत्मतोष ?
अपनी खामोश दुनियां में रहते हैं खड़िया
खड़िया आदिवासियों की वह प्रजाति मानी जाती है जो शुरूआती दौर में झारखंड में आई थी. लेकिन सदियों से  एक साथ रहने के बाद भी वह आदिवासी बृहद समाज के साथ घुल मिल नहीं सकी है और अपनी विशेष जीवन शैली और रूझान के कारण खामोशी की एक रहस्यमय चादर अपने चारो तरफ लपेटे अपनी दुनियां में रहती है.   खामोशी की उस चादर को आजादी के इन छप्पन वर्षों में भी भेदना संभव नहीं हो सका है. यह अलग बात कि उन्हें तथाकथित मुख्यधारा में लाने के नाम पर अब तक करोड़ों रूपये की लूट हो चुकी है. इसलिए हम भी आपको किसी खड़िया परिवार से नहीं मिला सकते, हां उस समाज के रूबरू आपको कर सकते हैं.
खड़िया समुदाय के लोग समतल में भी रहते हैं. सिमडेगा, गुमला, रांची जिले में कुछ जगहों पर उनकी बस्तियां मिल जाती है, लेकिन वे मूलतः पहाड़ों के एकांत में ही रहना पसंद करते हैं. सिंहभूम के लगभग सभी प्रखंडों में. घाटशिला, पटमदा, पोटका और जमशेदपुर प्रखंड के बहरागोड़ा में. पोटका प्रखंड में वे एक उंची पहाड़ी पर रहते हैं. नाम है सबरनगर. सबरनगर एक उंची पहाड़ी पर बसा है. पोटका प्रखंड के कलिकापुर गांव से हो कर एक सड़क भीतर जाती है. उस सड़क के अंतिम छोड़ पर पहाड़ी चढाई शुरू हो जाती है जो खत्म होती है एक उंचे विस्तृत खुले मैदान में. नीचे से यह कल्पना करना कठिन है कि पहाड़ के उपर इतना विशाल विस्तृत क्षेत्र भी हो सकता है. सबरनगर की ख्याति है क्योंकि उस नगर को केंद्र बना कर खड़िया समुदाय के विकास ? के लिए कई पाईलट प्रोजेक्ट पिछले तीस वर्षों में चल चुके हैं. अब तो भारत सेवाश्रम संघ नामकी एक संस्था ने भी वहां अड्डा बना लिया है. उसका एक सामुदायिक भवन है. उसमें करघे का प्रशिक्षण दिया जाता है. इसके अलावा खड़िया समुदाय की जमीन पर उनसे ही बेगार करवा कर वे वहां खेती बाड़ी भी कर रहे हैं.
 लेकिन खड़िया समुदाय का जीवन नहीं बदला है. यह मैं दावे के साथ इसलिए कह सकता हूं कि आज से पच्चीस वर्ष पहले भी अपने मित्र कुमार चंद्र मार्डी के साथ मैं वहां जाया करता था और इधर हाल में मुझे फिर उनके बीच जाने का अवसर मिला है. आज भी उस खुले विस्तृत मैदान में जहां तहां पेड़ों के झुरमुठों के बीच या जंगल झाड़ के बीच वे झोपड़ी बना कर रहते हैं. उसी तरह अपने घोसलेनुमा झोपड़ियों में. पुरूष सामान्यतः नंगे बदन, औरते घुटनों तक लिपटी एक साड़ी में. उसी तरह खामोश और बेजुबान.
 खड़िया पुरूष और औरत औसत कद के होते हैं और उनमें एक दूसरे के प्रति गहरा प्रेम होता है. वे एक दूसरे के साथ शरीर और छाया की तरह रहते हैं. दीन-दुनियां से बेखबर, एक दूसरे में लीन. कभी शिकार कर लिया, कभी समतल क्षेत्र के आदिवासी परिवारों के यहां ढ़ोर मवेशी चराने का काम कर लिया, कभी कभार मजदूरी भी कर ली. कभी जंगल से लकड़ी काट कर बेच आये. लेकिन किसी तरह का बंधन उन्हें स्वीकार नहीं.
 लेकिन इन निर्दोष प्राणियों के प्रति भी बाहर के समाज की अमानवीयता किस क्रूरतम रूप में प्रकट होती है उसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि एमरजंसी में सिर्फ अपने आकड़े बढाने के लिए सरकारी कर्मचारियों का एक गिरोह उन्हें ढ़ोर बकरी की तरह हांक कर विशेष रूप से बनाये गये चिकित्सा कैंपों में ले गया था और उनमें से बहुतो की नसबंदी कर दी गयी थी.
 लेकिन उनकी घटती आबादी की वजह सिर्फ वह अमानवीय कार्रवाई नहीं थी. दरअसल बृहद् समाज की समझ यह है कि ऐसे लोग खत्म हो जाये. उनकी उपयोगिता नहीं रही ? पिछले कुछ दशकों में पक्षियों की पचास साठ किस्म की प्रजाति लुप्त हो चुकी है. कुछ मानव प्रजाति भी लुप्त हो जाये तो किसी को क्या फर्क पड़ता है ?
लूट का सबब है खड़िया विकास योजनाएं
मैं पच्चीस वर्ष पहले भी पोटका प्रखंड के सबरनगर में गया था. उस वक्त उनके लिए एक आवासीय विद्यालय बनाया गया था. इस उम्मीद से कि खड़िया समुदाय के बच्चे वहां पढ़ सकेंगे. उस वक्त भी वहां इंदिरा आवास योजना के तहत उनके लिए घर बन रहा था. मेरी डायरी में उस वक्त के ठेकेदार और योजना का खर्च दर्ज है. उस वक्त के ठेकेदार का नाम था एम अजीज और एक घर उस वक्त बनता था 2500 रूपये में. ठेकेदार को 1 लाख 32 हजार रूपये में 53 घर बनाने का ठेका मिला था. घर के नाम पर एक कमरा बनना था. कुछ घर बने, कुछ आधे अधूरे रहे. दो चार दिन उन घरों में रहने के बाद खडिया परिवारों ने उन घरों को छोड़ दिया. दूसरे राउंड में एक बार फिर इंदिरा आवास के नाम से और तीसरे राउंड में अब बिरसा आवास के नाम से घर बन रहे हैं. बिरसा आवास 20 -22 हजार रूपये में बननी शुरू हुई थी. इधर उसकी प्राक्कलित राशि में कुछ और वृद्धि हुई है. यानी, पिछले पच्चीस वर्षों में खड़िया समुदाय को घरों में बसाने के नाम पर करोड़ों रूपये की लूट हो चुकी है. लेकिन वे उसी तरह स्वयं निर्मित घरों में रहना पसंद करते हैं.
उन्हें मजदूरी के रूप में उस वक्त भी तीन से चार पैला चावल मिलता था. अब भी मजदूरी के रूप में वही मिलता है. हां अब चावल की कीमत आठ रूपये पैला हो गया है. यानी, 24 रूपये मजदूरी के रूप में मिलते हैं और सरकारी निर्माण कार्यों में 40-45 रूपये.
खड़िया समुदाय को सबर भी कहा जाता है. हर सबर परिवार को ढाई-ढाई एकड़ जमीन सरकार ने दी थी. एक तो वे खेती बाड़ी जानते नहीं और न खेती करने का उनके पास कोई साधन है. सिंचाई की कोई सुविधा नहीं. इतनी पंूजी नहीं कि वह फसल लगा कर उसके कटने तक इंतजार करे. उसे तो पेट की आग बुझाने के लिए हर दिन उपार्जन करना है. जंगल में लकड़ी काटनी है या किसी के यहां जा कर मजदूरी करनी है. अब हो यह रहा है कि उसकी जमीन या तो समतल क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों ने या फिर भारत सेवाश्रम संघ जैसे स्वयं सेवी संस्थाओं ने उनसे ले रखा है और उस पर उनसे ही मजूरी करवा कर खेती बाड़ी कर रहे हैं. आप यदि कभी सबर नगर जायेंगे तो वे वहां आपको लहलहाती फसल दिखा कर फक्र के साथ यह बतायेंगे कि वे किस तरह खड़िया लोगों को खेती करना सिखा रहे हैं. लेकिन वहां जो गाजर मूली या अन्य कुछ उपजता है, उसका सेवन संस्था के साधु महात्मा सरीखे लोग करते है. मुकरू सबर कहता है: यदि खेत महाराज नहीं लेगा तो नीचे के लोग लेंगे.
खड़िया लोगों के नाम पर जो आवासीय विद्यालय चल रहा है, उसमें खड़िया समुदाय के बच्चे कम, आस पास के ग्रामीण इलाकों के बच्चे अधिक हैं. वे बच्चे भी अमानवीय स्थिति में रहते हैं. हॉस्टल में 48 बच्चों के लिए जगह है, लेकिन वहां रह रहे हैं 208 बच्चे. स्कूल में कई विषयों के शिक्षक नहीं. जरूरत पड़ने पर बच्चे आपस में चंदा करके किसी को पढाने के लिए बुलाते हैं.
दरअसल खड़िया लोगों को स्वच्छंद जीवन और अपने तरीके से जीने का अधिकार चाहिए. जरूरी नहीं कि वे भी हमारे समान बन जायें, हमारी जीवन शैली को अंगीकार कर लें. नैसर्गिक रूप से वे जंगल पहाड़ों में रहते थे. अपने स्वार्थ के लिए हम जंगल समाप्त करते जा रहे हैं. पहाड़ों को काटते जा रहे हैं. इन बदली हुई परिस्थिति में उनके जीवन को कैसे सुगम बनाया जा सके, इसके लिए मानवीय संवेदना की जरूरत है. एक ऐसी जीवन दृष्टि की जिसमें हमसे भिन्न तरह के प्राणी के भी जीने का अधिकार अक्षण्य रह सके. आज के दौर में हम इस बात की उम्मीद कर सकते हैं?  
   

औरों से भिन्न है आदिवासी संस्कृति

आदिवासी एक बिल्कुल ही अलग सभ्यता, संस्कृति और जीवन-दर्शन के वारिस हैं, जो गैर-आदिवासी भारतीय जनता से भिन्न और कहीं-कहीं प्रतिलोम है. गैर आदिवासी व्यवस्था में व्यक्तिगत संपत्ति को मर्यादित स्थान सभ्यता के प्रारंभ से रहा है, आदिवासी समाज में उत्पादन के संसाधनों पर सामूहिक स्वामित्व रहा है. गैर आदिवासी समाज के संसर्ग में आने के बाद सामूहिक स्वामित्व की परंपरा कमजोर पडी है, उनकी खुटखुट्टीदारी व्यवस्था लगभग समाप्तप्राय है, लेकिन सामूहिकता आज भी आदिवासी समाज का मूलाधार है.
आदिवासी समाज में औरतों की सामाजिक भूमिका रही है, सार्वजनिक उत्पादन में वे बराबर की हिस्सेदार हैं, आदिवासी औरतें कुदाल चलाती हैं. गैर आदिवासी समाज में औरत घर की चारदीवारी के भीतर की वस्तु हो जाती है. सामाजिक उत्पादन में उनकी भूमिका नगण्य रही है. आर्यों ने अपने दिग्विजय के क्रम में जिन्हें गुलाम और दास बनाया और वर्णाश्रम के चतुर्थ श्रेणी में रखा, उस चतुर्थ श्रेणी में औरतों को सामाजिक उत्पादन में भूमिका निभाने की छूट है. लेकिन, वहां भी जब कोई समुदाय आर्थिक रूप से संपन्न होने लगता है तो अपनी औरत को खेत में काम करने देना बंद कर देता है, जैसा कि अवधिया कुरमियों के संदर्भ में देखा जा सकता है.
 आदिवासी समाज में व्याभिचार नहीं होता, वेश्या नहीं होती, गैर-आदिवासी समाज में गणिकाओं का एक सम्मानित स्थान हुआ करता था और अभी हर छोटे-बड़े महानगरों में जिस्म के खरीद फरोख्त की इन दुकानों को देखा जा सकता है. गैर आदिवासी समाज तो व्याभिचार के उन अड्डों को सुसभ्य नागरिक समाज के लिए अनिवार्य मानता है.
आदिवासी प्रकृति के सहचर और मित्र रहे हैं, गैर आदिवासी समाज प्रकृति पर विजय में विश्वास रखता है. आदिवासी समाज प्रकृति पूजक है. उनके पूजा स्थल खुले आकाश के नीचे साल वृक्ष के जंगलों में अवस्थित होते हैं.
गैर आदिवासी समुदाय का बड़ा तबका ंिहंदू समाज है जो वर्णाश्रम धर्म, वर्ण  व्यवस्था  पर आधारित है, जबकि आदिवासी समाज में वर्णाश्रम धर्म और वर्ण व्यवस्था का कोई स्थान नहीं. यहां जाति व्यवस्था नहीं. समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में विभाजित नहीं. आदिवासी समाज में भी कई आदिवासी समुदाय और गोत्र के रूप में लोग विभाजित हैं लेकिन सभी श्रम करते हैं और उनमें छूआछूत या जाति के नाम पर उंच-नीच का भाव नहीं. 
आदिवासी समाज श्रमजीवी समाज है. सभी को वहां जीने के लिए श्रम करना पड़ता है. गांव का मुंडा हो या मांझी, पुरोहित हो या पुजारी- सबको जीवन यापन के लिए श्रम करना पड़ता है.
कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी अभिजात्य संस्कृति से उनके फर्क को देखा जा सकता है. वहां मंच और दर्शक दीर्घा के बीच फर्क नहीं. मंच पर कोई कलाकार बाद्य यंत्र बजा रहा हो या कोई नृत्यांगना नृ्त्य कर रही हो और दर्शक दीर्धा में बैठे लोग उसका रसास्वादन कर रहे हों, ऐसा नहीं होता. हर्ष और उल्लास के अवसरों पर सभी मिल कर नाचते गाते हैं. मांदल और बांसुरी थोड़ा बहुत सभी बजा लेते हैं और जिन्हें इस विधा में महारत हासिल है, उन्हें भी अपने इस गुण की वजह से सम्मान भले ही मिले, जीवन यापन के लिए उन्हें भी श्रम करना पड़ता है.
आदिवासी और गैर आदिवासी समाज के बीच के बीच के फर्क को समझने की एक कुंजी यह है कि आर्थिक विषमता की वजह से संपूर्ण गैर आदिवासी समाज वर्गों में बंटा हुआ है, जबकि आदिवासी समाज में वर्ग नहीं. इसलिए वर्ग संघर्ष भी नहीं. और इसीलिए उनकी स्वशासन व्यवस्था सर्वानुमति से चलती है भारतीय लोकतंत्र के बहुमत के आधार पर नहीं.
और चूंकि आदिवासी समाज में वर्ग नहीं रहा इसलिए वर्ग संघर्ष के विभिन्न दौर में जिस तरह गैर आदिवासी समाज में सामंतवाद और राजशाही का युग क्रमिक रूप से आया, उस तरह का दौर आदिवासी समाज में कभी नहीं रहा. यहां न कोई सामंत था और न कोई राज व्यवस्था या राजशाही. हां, गैर आदिवासी राजा-रजवाड़ों की सोहबत या संपर्क से कुछ लोगों ने राजशाही कायम करने की और किला आदि बनाने की कोशिश जरूर की लेकिन आदिवासी समाज पर उनका असर बहुत कम था. आदिवासियों के नायक तो तिलका मांझी, सिधू-कान्हू, बिरसा मुंडा जैसे जन नायक थे जिनके साथ पूरा आदिवासी समाज गोलबंद था.
आदिवासी तथा गैर आदिवासी भारतीय समाज का सबसे बड़ा अंतर यह है कि आदिवासियों में वनिक बुद्धि नहीं, महाजनी वृत्ति नहीं. वह उतना ही उत्पादन करता है जितने की उसको जरूरत है. वह संचय नहीं करता. कल की चिंता नहीं करता. आप कहेंगे- इसी वजह से तो वह आज भी पिछड़ है, लेकिन उसी वक्त आप यह भूल जायेंगे कि संचय की इसी प्रवृत्ति से बाजारवाद की सृष्टि होती है, महाजनी शोषण का दौर शुरू होता है जो आज विश्व की मानव सभ्यता के लिए काल बन चुका है. वैसे भी यहां इस बहस की गुजांइश नहीं कि  यह वृत्ति गलत है या सही, मनुष्य जाति के भविष्य के लिए यह जरूरी है या अभिशाप, हम सिर्फ आदिवासी और गैर आदिवासी समाज की भिन्नता को यहां रेखांकित करना चाहते हैं.