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एजूकेशन हब का विरोध

 
झारखंड में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ लगातार संघर्ष हो रहे हैं. दुबारा या तिबारा सत्ता में आने के बाद अर्जुन मुंडा चुनाव लड़ने और लड़वाने में व्यस्त थे. थोड़ा फुसर्त मिली है तो अचानक उन्हें एजूकेशन हब का ख्याल आया. इसके लिए खूंटी में 875 एकड़ जमीन के अधिग्रहण की बात है. वहां इंडियन इस्टीच्यूट ऑफ मैनेजमेंट, नैशनल यूनीवर्सीटी फार स्टडीज एंउ रिसर्च इन लॉ और सेंट्रल यूनीवरसिटी खुलेगा. वे कल स्थानीय विधायक के साथ खूंटी गये. लोगों ने विरोध किया. ‘खेतिहर जमीन का अधिग्रहण इस तरह के काम के लिए आप क्यों कर रहे हैं?’ वे लौट तो आये लेकिन स्थानीय प्रशासन को निर्देश दे कर आये हैं कि इस मामले को निबटाओ.
झारखंड के अधिकतर विधायक कम पढे लिखे हैं. यह कोई अपराध नहीं. लेकिन वे आधुनिक चलताउ शब्दावली सीख गये हैं. ‘सिलिकॉन सिटी’, ‘आईटेक शहर’, ‘एजुकेशन हब’, ‘ई मैनेजमेंट’ बगैरह बगैरह. विडंबना यह कि रांची विवि के कुछ कालेजों को छोड़ पूरे राज्य के किसी कालेज में लिखाई पढाई होती ही नहीं. सिद्धो कान्हू विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक बता रहे थे कि पिछले 20 वर्षों से उन्होंने एक भी कक्षा नहीं ली. वे देवघर के एक कालेज के प्राध्यापक हैं. वहां बहुत सारे पंडे प्रोफेसर हो गये हैं और बोल बम के इन महीनों में जजमानों के चक्कर में रहते हैं. हां, प्राध्यापक के रूप में हर महीने मोटी रकम लेते हैं. अर्जुन मुंडा या राज्य के अन्य नेताओं से यह बात छुपी भी नहीं. राज्य के सरकारी स्कूलों और इन कालेजों में वैसे भी पढता कौन है? रांची, बोकारो, हजारीबाग, टाटा, धनबाद जैसे शहरों के निजी स्कूलों में पढ कर बच्चे निकलते हैं और अन्य राज्यों का रुख करते हैं. तो जरूरी है कि स्कूली शिक्षा को आप पहले सुधारिये, कालेजों में पठन पाठन का वातावरण बनाईये, फिर इस तरह के कामों में उलझिये.
फिर खूंटी जैसे इलाके में एजूकेशन हब बनाने का मतलब? मतलब यह कि वह इलाका अभी तक साफ सुथरा, हरा भरा, और राजधानी के करीब है. बड़ी योजना माने, बड़ा इनवेस्ट. बड़ा इनवंेस्टमेंट माने, बड़ा कमीशन. लेकिन व्यवहारिक पक्ष यह कि इस तरह के तकनीकि संस्थानों में पढाने वालों में अधिकतर बहिरागत होंगे और पढने वाले भी गैर आदिवासी बहिरागत. फिर कैंपस के आस पास बाजार डेवेलप होगा, रिहायशी कालोनी विकसित होगी और आस पास की जमीन पर इनक्रोचमेंट शुरु होगा. हो सकता है आपको यकीन न हो. लेकिन टाटा और हाता के बीच की सारी जमीन आदिवासियों के हाथ से निकल गई है और बहिरागतों के कब्जे में है. रांची आदिवासीबहुल शहर था, लेकिन एचईसी के बनने के बाद शहर से वे उजड़ गये. बोकारो और टाटा में वे अब नहीं दिखते. शहर के हाशिये की गंदी बस्तियों में वे सिमट गये हैं. खूंटी को भी निगलगे की योजना बन रही है. जिंदल वहां विशाल कारखाना लगाने वाला है. मुख्यमंत्री वहां एजूकेशन हब. विरोध की वजह से यह रुका हुआ है.
सबसे बड़ी बात कि जमीन अधिग्रहण से पहले आपे वहां की ग्रामसभा से अनुमति ली? खूंटी बिरसा मुंडा का इलाका है जहां ग्राम सभा अभी भी मजबूत है. जोर जबरदस्ती से बात नहीं बनने वाला.