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स्पंज आईरन कारखानों ने दूभर बनाया आदिवासियों का जीवन

 स्पंज आईरन कारखानों से होने वाले भीषण प्रदूषण के बारे में झारखंड विधानसभा में पिछले कई वर्षों से चर्चा हो रही है. हर बार सरकार यह आश्वासन देती है कि वह स्पंज आईरन कारखानों से होने वाले प्रदूषण के खिलाफ सख्त कदम उठाने जा रही है. लेकिन हालात जस का तस हैं. प्रदूषण की स्थिति पहले से बद्तर होती जा रही है.
  स्पंज आईरन उद्योग भारी मुनाफे वाला उद्योग हैं. जानकारों के मुताबिक 100 टन क्षमता वाला स्पंज प्लांट लगाने में 7 से 12 करोड़ रूपये का खर्च पड़ता है, जबकि हर महीने करीब 60 लाख रूपये का मुनाफा होता है. यानी साल डेढ़ साल में लागत मूल्य निकल आता है. उसके बाद मुनाफा ही मुनाफ. फिर पूंजीपति स्पंज कारखाना क्यों न लगावे? लेकिन इन स्पंज आईरन कारखानों से ग्रामीणों का जीवन दूभर होता जा रहा है. विकसित देशों में एक तो स्पंज कारखाने लगते ही नहीं, दूसरे जो लगे भी हैं वे गैस आधारित हैं. लेकिन अपने यहां तो सस्ता है कोयला और उससे सस्ता हैं आदिवासियों का जीवन!
 हमने ने चांडिल, गमहरिया, नीमडीह क्षेत्र में लगे स्पंज कारखानों से मानव जीवन और प्रकृति को होने वाली अपूरणीय क्षति को अपनी आंखों से देखा. प्रभावित ईलाकों में खेती योग्य जमीन, स्वतःस्फूर्त वन और तमाम जल स्रोत नष्ट हो रहे हैं. अपने सीमित संसाधनों के बावजूद इस क्षेत्र की जनता अपना जीवन सुचारू रूप से चला रही थी. खेती के अलावा, लाह और महुए की खेती एवं अन्य वन संपदा की मदद से उनका जीवन चल रहा था. लेकिन औद्योगीकरण के नाम पर उनके जीवन के संसाधन- जल, जंगल, जमीन- पर पूुजीपतियों, नौकरशाहों और राजनेताओं का एकाधिकार होता जा रहा है और वे उसे बेरहमी से लूट रहे हैं. पहले इस क्षेत्र की जनता ने चांडिल बांध के नाम पर विस्थापन का दंश भोगा और अब उन पर आसमानी कहर स्पंज आईरन कारखानों से निकले धुंए और लौह कणों के रूप में बरस रहा है.
 जानकारों के अनुसार 100 टन क्षमता के एक स्पंज आईरन प्लांट के लिए प्रति दिन 160 टन लौह अयस्क, 125 टन कोयला,  3.5 टन डोलोमाईट और 150 टन पानी की आवश्यकता होती है. यानी, साढे तीन सौ टन कच्चा माल से 100 टन स्पंज आईरन और 250 टन कचड़ा निकलता है. चांडिल क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक स्पंज कारखाने हैं और अनुमानतः न्यूनतम प्रति दिन 3000 टन कचड़ा निकल रहा है. इसका एक बड़ा हिस्सा तो स्पंज आईरन कारखनों की चिमनियों से मिश्रित गैसों और काले धुएं के रूप में निकलता है और उस क्षेत्र के जल, जंगल, जमीन पर धूल कण की मोटी परत के रूप में जमता जा रहा और बॉटम ऐश या गाद के रूप में निकला कचड़ा बह कर सुवर्ण रेखा नदी या समीपवर्ती अन्य नदी नालों में पहुंच रहा है. या फिर उसे समीपवर्ती गांवों के आस पास खपाया जा रहा है. कुछ स्पंज कारखानें तो सुवर्णरेखा नदी से सटे बनाये गये हैं और बेरहमी से सारा कचड़ा नदी में बहाया जा रहा है. कई कारखाना मालिक जला कोयला और छाई गांव के भीतर बिछा रहे हैं और गिरा दे रहे हैं. अज्ञानतावश या विवशता की वजह से गांव वाले इसका विरोध भी नहीं करते. कुछ को यह भ्रम रहता है कि इस जले कोयले का इस्तेमाल जलावन के रूप में हो सकता है, हालांकि एक बार जल चुका कोयला किसी काम का नहीं होता. यह क्रूरता की प्राकाष्ठा है.
  कारखानों तक लौह अयस्कों, कोयला और अन्य कच्चा माल पहुंचाने वाले खुले ट्रकों से पूरे रास्ते धूल कण उड़ता रहता है. हाई वे को छोड़ कर इन कारखानों तक पहुंचने वाली तमाम ग्रामीण सड़के विलुप्त हो चुकी हैं और रह गये हैं सिर्फ गड्ढे, नुकीले पत्थर और प्रदूषित धूल का अंबार. और इन सब के सम्मिलित प्रकोप से चांडिल क्षेत्र के प्रभावित इलाकों में मनुष्य और पशुओं को अकाल मृत्यु की तरफ बढते हम अपनी आंखों से देख सकते हैं. जनजीवन, जल, जंगल, जमीन- सभी पर पदूषित धूल की परत जमती जा रही है. उनसे ब्रॉकियल आस्थमा सहित कई तरह के पेट और हृदय के रोग हो रहे हैं. प्रदूषित तालाबों नदियों में नहाने धोने से आदमी और जानवर दोनों तरह-तरह के चर्म रोगों के शिकार हो रहे हैं.
 लेकिन इसकी चिंता न कारखाना मालिकों को है और न सरकार को. भले ही झारखंड का मुख्यमंत्री आदिवासी बनता रहा हो, लेकिन आदिवासियों को आज भी मनुष्य से एक दर्जा नीचे का जीव माना जाता है. वे तो शुरू से विकास की खाद बनते रहे हैं. अंग्रेजों ने यही किया. देशी हुक्मरानों ने यही किया और अलग राज्य बनने के बाद आदिवासी मुख्यमंत्रियों के नेतृत्व में चल रही सरकारें भी यही कर रही है. इसे ही समाजशास्त्री आंतरिक उपनिवेशवादी शोषण कहते हैं और इससे लगता है आदिवासी जनता को अभी मुक्ति नहीं. और यह समझ सत्ता में शामिल आदिवासी नेताओं का भी बन गया प्रतीत होता है.
 अपने स्वार्थों के लिए झारखंड को श्मसान बनाने में लगे राजनेताओं को तो इस बात की जरा भी चिंता नहीं, लेकिन जनता आने वाले इस खतरे को समझ रही है. जिंदल को चांडिल क्षेत्र से भगाया जा चुका है. उसके बाद वह आसनबनी पहुंची, लेकिन वहां से भी उसे खदेड़ा जा चुका है. और अब विस्थापन विरोधी एकता मंच ने चांडिल क्षेत्र में तमाम चल रहे स्पंज कारखानों को बंद करने का निर्णय लिया है.  गांव वालों की साफ समझ है कि मानव संहारक और प्रकृति विध्वंसक इन कारखानों का बंद हो जाना प्राणी मात्र के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है.
 
स्पंज आईरन के नाम पर लौह अयस्क की लूट
स्पंज कारखानों के नाम पर देशी-विदेशी कंपनियां लौह अयस्कों की लूट की साजिश में लगी हुई हैं. यह समस्या सिर्फ झारखंड की नहीं, संपूर्ण आदिवासीबहुल जनजातीय क्षेत्र का है जिसमें झारखंड, ओड़ीसा और छत्तीसगढ आते हैं. लौह अयस्क इसी क्षेत्र में हैं और उस पर दुनियां भर के उद्योगपतियों की नजर है. प्राकृतिक संसाधनों और लौह अयस्कों की निरंतर कमी हो रही है और हर देश अपने संचित भंडार को सोच समझ कर खर्च करने की रणनीति पर चल रहा है, जबकि हमारे देश के हुक्मरान कच्चा माल ही औने पौने दाम में बेच कर विदेशी मुद्रा का भंडार भरने की फिराक में लगे हैं ताकि विलासिता के सामानों का विदेश से निर्यात हो सके.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार अभी देश में 22.1 बिलियन टन लौह अयस्क भंडार है. इसमें से 11.42 बिलियन टन हेमेटाईट का और 10.68 बिलियन टन मैगनेटाईट का है. इस लौह भंडार का सिर्फ 45 फीसदी ही मूल्यवान और उपयोगी है. वर्तमान में लौह अयस्कों का निर्यात कर 4 बिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा देश को प्राप्त हो रहा है. लेकिन इतने से देशी हुक्मरानों को संतोष नहीं. हाल में कोरिया और जापान से एक समझौता किया गया है जिसके तहत उन देशों को अगले पांच वर्षों में 8035 मिलियन टन लौह अयस्क निर्यात किया जायेगा. यह समझौता पूर्व स्टील मंत्री रामविलास पासवान और पूर्व उद्योग राज्य मंत्री जयराम रमेश के मुखर विरोध के बावजूद किया गया. दरअसल देश के भीतर भी स्टील उत्पादन के क्षेत्र में लगातार वृद्धि हो रही है. हाल तक जहां 40 मिलियन टन स्टील का उत्पादन हो रहा था, वहीं निकट भविष्य में पांच गुना अधिक स्टील का उत्पादन होने की उम्मीद है. यानी 40 मिलियन टन से बढ कर 210 मिलियन टन का उत्पादन होने लगेगा. इसलिए यह मांग जोर पकड़ रही है कि लौह अयस्कों के निर्यात पर रोक लगे.
ता,े हंगामें के बाद थोड़ा अंकुश यह लगाया गया कि देश के भीतर कारखाना लगाने वाली कंपनियों को ही लौह अयस्क और कोयला खदानों के पट्टे आवंटित किये जायें. विदेशी कंपनियों ने तब स्पंज आईरन कारखानों की आड़ में लौह अयस्क और कोयला खदानों के पट्टे हाशिल करने की रणनीति बनायी है. इस तरह वे खनिज संपदा की लूट भी कर सकेंगे और स्पंज आईरन, जिससे बाद में परिष्कृत स्टील बनता है, के बनाने के दौरान होने वाले भीषण प्रदूषण का मार निरीह आदिवासी जनता को झेलना पड़ेगा. आदिवासियों के नाम पर राजनीति करने में कोई पीछे नहीं, लेकिन उनकी वास्तविक चिंता करने वाला कोई नहीं. कोई आश्चर्य नहीं कि भारत स्पंज आईरन बनाने वाला सबसे बड़ा देश बन गया है. फिलहाल यहां सात मिलियन टन स्पंज आईरन का उत्पादन प्रति वर्ष हो रहा है और सन् 2010 तक यह 50 मिलियन टन तक पहुंच जाने वाला है. 1985 तक सिर्फ तीन स्पंज आईरन देश में थे, जिनकी संख्या अब 400 के करीब पहुंचने वाली है. और ये सभी स्पंज आईरन कारखाने छत्तीसगढ़, ओड़िसा और झारखंड में लगने जा रहे हैं.
झारखंड में लौह अयस्क का एक बड़ा क्षेत्र चिड़िया माइंस है.  तमाम बड़े मल्टीनैशनल कंपनियों की नजर इस माइंस के लौह अयस्क पर है और यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि झारखंड में पिछली बार अर्जुन मुंडा सरकार ने जितने भी एमओयू किये, उनमें से अधिकांश स्पंज आईरन बनाने वाले हैं. मित्तल, जिंदल,एस्सार, टाटा जैसी बड़ी कंपनियां लौह अयस्क भंडार पर कब्जा चाहती हैं. और अन्य तमाम एमओयू करने वाली कंपनियां चिड़िया माईस से लौह अयस्क खदान का पट्टा आवंटन कराना चा1हती हैं.
दरअसल स्टील उद्योग अर्थ व्यवस्था का एक मजबूत आधार होता है. लेकिन लौह अयस्क के पॉकेट दुनियां में गिने-चुने हैं और वे लौह अयस्क भंडार तेजी से समाप्त हो रहे हैं. इसलिए जिन देशों के पास अपना लौह अयस्क भंडार है भी, वह उन्हें मितव्ययिता से खर्च कर रहा है और भारत जैसे देशों के लौह भंडार पर कब्जे की फिराक में हैं. कहा तो यहां तक जा रहा है कि मित्तल और टाटा जैसी कंपनियां दुनियां के स्टील उद्योग पर अपना दबदबा इसी लौह अयस्क खदानों के बूते बना रही हैं. और इसीलिए वे स्पंज आईरन के उत्पादन में भी रूचि ले रही हैं. वरना अभी तक स्पंज आईरन का उत्पादन लघु उद्योग के दायरे में ही हो रहा था. करीबन 60 फीसदी स्पंज आईरन का उत्पादन आज भी छोटे पैमाने के उद्योग में हो रहे हैं.
लंकिन झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के गठन के बाद बड़ी कंपनियां भी लौह अयस्क की लूट की नीयत से मैदान में उतर रही हैं. और वे ऐसा क्यों न करें. इन राज्यों के हुक्मरान और राजनेता उनका स्वागत करने में तत्पर हैं. निजी क्षेत्र और विदेशी निवेश के लिए उन्होंने अपने दरवाजे खोल दिये हैं. औद्योगीकरण को इन नवगठित राज्यों के के आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने का एकमात्र रास्ता माना गया. उसी के अनुसार खनन आधारित उद्योगों के लिए अतिरिक्त सुविधाएं उपलब्ध करायी जा रही हैं. सरकार जमीन अधिग्रहित कर उन्हें उपलब्ध करा रही है. अपने क्षेत्र की नदियों और भूमिगत जल स्रोतों के दोहन का उन्हें अपार अवसर प्रदान किया गया. कच्चे माल पर सीमा शुल्क कम किया गया. सस्ता मानव श्रम उन्हें उपलब्ध हो, इसके लिए तमाम श्रम कानूनों की तिलांजलि दे दे गयी.
लेकिन इन स्पंज कारखानों के लगने का कुल परिणाम यह होने वाला है कि एक तो अपना लौह अयस्क भंडार  पचास-साठ वर्षों में खत्म हो जायेगा और पीछे रह जायेगा बुरी तरह प्रदूषित-विरूपित धरती. प्रदूषण के कारण मिट्टी की उपरी आठ इंच की परत पूरी तरह अनउपजाउ हो जाती है. झारखंड में तो उनकी विनाश लीला अभी शुरू ही हुई है, लेकिन ओड़िसा और छत्तीसगढ में बड़ी संख्या में स्पंज आईरन कारखाने लग रहे हैं और उनके प्रभाव क्षेत्र में धरती तेजी से बंजर हुई जा रही है. छत्तीसगढ के रायपुर जिले के सिल्चर क्षेत्र में 29 स्पंज आइरन उद्योग हैं और वहां हुए सर्वेक्षण से पता चलता है कि 17 गांव की लगभग 4000 हेक्टेयर जमीन अब खेती के लायक नहीं रही. चांडिल भी इसी तरह के संकट के दौर से गुजर रहा है.
कानूनों की धज्जियां उड़ा कर लगाये गये हैं स्पंज कारखाने
अधिकतर स्पंज कारखानें आदिवासी क्षेत्र में लगाये गये हैं जहां पेसा अधिनियम 1996 लागू है. इस कानून के तहत जनजातीय क्षेत्रों में कारखाना के लिए जमीन अधिग्रहण के पूर्व ग्रामसभा की अनुमति जरूरी है. सामान्यतः किसी आदिवासी की जमीन गैर- आदिवासी को स्थानांतरित नहीं की जा सकती. लेकिन छत्तीसगढ़, ओड़िसा और झारखंड में अधिकांश स्पंज आईरन कारखानों के लिए जमीन का अधिग्रहण बगैर ग्रामसभा की अनुमति के हुआ है. चांडिल में भी स्पंज कारखाना लगाने के पूर्व ग्राम सभाओं से अनुमति नहीं ली गयी.
इसी तरह 1980 के वन संरक्षण कनून के अनुसार केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बगैर किसी भी जंगल की जमीन को गैर-वानिकी कार्यों के लिए हस्तांतरित नहीं किया जा सकता. वन संरक्षक अधिनियम के अनुसार ऐसी अनुमति मिलने के पहले ग्राम पंचायत का सहमति पत्र अनिवार्य है. कारखाना लग जाने के बाद पर्यावरण प्रदूषण की जांच और रिकार्ड रखने की जिम्मेदारी राज्य के प्रदूषण नियंत्रण विभाग को दी जाती है. इसी विभाग को प्रदूषण रोकने वाले यंत्रों की समय-समय पर जांच करनी है. लेकिन यह सब नहीं हो रहा है.
कुछ नियमों की तो खुल्लम खुल्ला उल्लंधन हो रहा है. मसलन- वन एवं वन भूमि संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है और उनसे कम से कम ढाई किमी की दूरी पर स्पंज आईरन कारखाने लगने चाहिए. लेकिन चांडिल क्षेत्र में अधिकतर  स्पंज कारखाने वनों के भीतर या करीब अवस्थित हैं. इसी तरह रिहायिशी इलाके और बस्तियां कम से कम 1 किमी दूर होनी चाहिए. पांच किमी के दायरे में एक से अधिक स्पंज कारखानें नहीं होने चाहिए लेकिन नीमडीह, गमहरिया और चांडिल क्षेत्र में पांच किमी के दायरे में कई-कई स्पंज कारखाने है.
प्रदूषण नियंत्रण विभाग के द्वारा जारी दिशा निर्देशों की अवहेलना सिर्फ झारखंड में ही नहीं, ओड़िसा और छत्तीसगढ समेत अधिकतर राज्यों में हो रही है. इस मामले में नियमों का अनुपालन थोड़ा बहुत आंध्र प्रदेश में हुआ बताया जाता है.