आदिवासी स्त्री की आजादी का मर्म

विनोद कुमार

इस तस्वीर को देख कर सभी मुग्ध होंगे. मां की पीठ पर बंधा हुआ एक नन्हा शिशु, मां के चेहरे की विश्रांति और एक सलज्ज मुस्कान. घर-बाहर के छोटे बड़े कामों को निबटाते दो मुक्त हाथ. मुझे बिंब सूझता है तो धरती की जो हम सब को धारण किये चांद तारों के बीच चक्कर लगाती रहती है.

यह चित्र आदिवासी समाज की एक खास पहचान है. एक खास तुकबंदी ही कही जाती थी कि ‘पीठ पर छौवा, माथे पर खांची, समझ जाओ तुम पहुंच गये रांची.’ कुछ लोग इसे एक कारुणिक अवस्था भी कह सकते हैं, लेकिन इसी चित्र में आदिवासी स्त्री की आजादी का मर्म और अर्थ भी छुपा है.

एक सामान्य धारणा है कि स्त्री शोषण और गैर बराबरी के मूल में है स्त्री का मातृत्व. बच्चे को नौ महीने पेट में रखना, उसे जनना और उसके लालन पालन से स्त्री कमजोर और परावलंबी हो जाती है. घर से बंध जाती है और पुरुष सत्तात्मक समाज की नींव पड़ती है. आदिवासी स्त्री इस भ्रम का निवारण करती है. मातृत्व उसके लिए सहज प्रक्रिया है. और यह उसके किसी भी क्रिया कालापों- घर या बाहर- बाधक नहीं बनती. और आदिवासी समाज मैं स्त्री-पुरुष की सापेक्षिक समानता के मूल में है यही तथ्य.

आदिवासी समाज में सहज रूप से दिखने वाला यह दृश्य गैर आदिवासी समाज में सहज नहीं दिखता. इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि वृहद हिंदू समाज में स्त्रियां अपने बच्चे को ममता से नहीं पालती. या उनकी गोद में बच्चा नहीं होता, लेकिन नौ महीने बच्चे को उदर में रखना और नौ महीने अपनी पीठ पर बच्चे को बांध कर रखने का काम आदिवासी औरत ही करती है और वह भी एकदम सहज भाव से. और यह अकेली तस्वीर एक पूरी संस्कृति को रेखांकित करती है.

दरअसल, पूरे भारतीय समाज के लिए, वृहद गैर आदिवासी समाज के लिए, आदिवासी दुनिया एक भिन्न दुनिया है. उस पर मुग्ध हुआ जा सकता है, उनके आनंमय जीवन से रश्क किया जा सकता है, उनकी गरीबी और विपन्नता पर तरस भी खाया जा सकता है, लेकिन उस तरह जिया नहीं जा सकता.
क्योंकि वह एकदम भिन्न समाज है. उनका जीवन दर्शन, प्रकृति से उनका रिश्ता, वहां के स्त्री-पुरुष संबंध, वहां की सामूहिकता, वहां के नृत्य-गीत, वहां की कविता और स्त्री की आजादी का अर्थ भी सब कुछ गैर आदिवासी समाज से, वृहद हिंदू समाज से भिन्न है.

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