हम एक भयानक दौर में प्रवेश कर चुके हैं और हमे एहसास भी नहीं

पूरे देश में 2016 से 2019 तक 5922 लोगों को देशद्रोह का अभियुक्त बनाया गया और गिरफ्तार किया गया और उनमें से 132 लोगों को कोर्ट ने दोषी करार दिया. इस लिहाज से देखें तो सजा सिर्फ 2.2 फीसदी लोगों को ही मिली, लेकिन शेष लोगों का इतना मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न हुआ, जो सजा से कम नहीं. उन्हें पुलिस ने उत्पीड़ित किया. बिना कारण वे जेल में बंद रहे. कोर्ट के चक्कर लगाते रहे. उनके साथ पूरा परिवार आतंक के साये में रहा. परिवार क्या, वे पूरे समाज को आतंकित करने में कामयाब रहे. और खौफ का यह साया कैसा है?

आप प्रबुद्ध हैं. आपके सामने शीशे की तरह सब कुछ साफ है. लेकिन आप मौन की एक चादर ओढ़ लेंगे. आप इतिहास की बातें करने लगते हैं. मिथकों और प्रतीकों में बोलेंगे. कविताओं में शब्दों की बाजीगरी दिखायेंगे. आप यह दिखाने की कोशिश करेंगे कि आप किसी और दुनियां के वासी हैं. लेकिन आप सत्ता प्रतिष्ठानों के खिलाफ बोलने से बाज आयेंगे. सड़कों पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा बनने से कतरायेंगे. आपको लगेगा कि यह आपके मूल्क का नहीं, किसी पड़ोसी मूल्क की घटनाएं है.

आतंक के इस वातावरण के निर्माण में सबसे खतरनाक भूमिका सेडीसन कानून की है. उस कानून की, जिसे अंग्रेजों ने आजादी के दीवानों को काबू में करने के लिए आईपीसी में 1870 में शामिल किया था. इस कानून को आजादी के बाद खत्म कर दिया जाना चाहिए था. इस कानून को भारतीय संविधान में शामिल करने वाले अंग्रेजों ने अपने देश के संविधान से खत्म कर दिया, लेकिन भारत के संविधान में यह अभी भी बना हुआ है. और इसका इस्तेमाल पूरी बेशर्मी और क्रूरता से विरोध में उठे स्वर को कुचलने के लिए सत्ता करती रहती है.

यहां उल्लेखनीय है कि केदारनाथ सिंह बनाम स्टेट आॅफ बिहार- 1962- में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फसला सुनाते हुए कहा था कि इस कानून का इस्तेमाल धारा 19 दो के तहत मिली अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने के लिए नहीं किया जाना चाहिए. सरकारी संस्थानों के खिलाफ हिंसा और पब्लिक डिसआॅर्डर के आरोप ठोस आधार पर लगाये जाने चाहिए. यह भी सुझाव भी समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय देती रही है कि देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने के पहले कानूनविद् से और राज्य के पब्लिक प्रोसीक्यूटर से विमर्श-राय कर लेनी चाहिए. लेकिन मोदी की सरकार पूरी बेशर्मी से इसका इस्तेमाल करने में लगी है.

खस्ताहाल अर्थ व्यवस्था, बेरोजगारी, महंगाई, आकाश छूते पेट्रोल और गैस के दाम के साथ हर रोज सिकुड़ता लोकतंत्र व छीजता मानवाधिकार. लेकिन हमे इस बात का एहसास भी नहीं. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और संकीर्णता इस कदर हम पर प्रभावी हो गया है कि हम उस भीषण संकट को देख नहीं पा रहे हैं. अपना देश हिंदू राष्ट्र बने न बने, यह तो बड़ा सच है कि यहां की बड़ी आबादी हिंदू है और उस तबके को कहीं न कहीं यह भरोसा था कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और संकीर्णता के शिकार मुसलमान होंगे, ईसाई होंगे, लेकिन हिंदू होने का लाभ उन्हें हासिल होगा. उन्हें बख्श दिया जायेगा. सिखों को हिंदू धर्म का रक्षक ही मान कर चला जाता था, लेकिन अब वे इस संकीर्णता के शिकार हो गये. कृषि कानूनों के विरोध के एवज में उन्हें खालिस्तानी कहा जाने लगा है. और अपने से इतर अन्य लोगों को कसने के लिए उनके पास है उनके द्वारा पारिभाषित राष्ट्रवाद, जिसका परिणाम यह है कि अब किसी भी विरोध प्रदर्शन में तिरंगा झंडा लहराते हुए चलना जरूरी लगता है. यह बताना जरूरी हो गया है कि हम विरोध तो कर रहे हैं, लेकिन हम भी राष्ट्रवादी हैं, यह देखो मेरे हाथ में तिरंगा.

वरना यदि आप आदिवासी हैं या दलित- आदिवासियों के हित की बात करने वाले, तो आप माओवादी, मुसलमान हैं तो आतंकवादी और सिख हैं तो खालिस्तान समर्थक आसानी से घोषित कर दिये जायेंगे और फिर आप आसानी से देशद्रोही बना दिये जायेंगे. बेहद आसान है सत्ता के लिए यह करना. सोशल मीडिया, फेसबुक, ट्वीटर के किसी एक पोस्ट के आधार पर देशद्रोह का मामला दर्ज कर दिया जायेगा, जो सत्ता को बिना किसी ठोस आधार के आपको उठा लेने का अधिकार देता है. बहुत संभव है कि आप आखिरकार दोषमुक्त करार दिये जायें, लेकिन इस प्रक्रिया में ही आपका इतना उत्पीड़न हो जायेगा कि आप खुद तो आतंकित होगे ही, पूरा समाज आतंक के गिरफ्त में फंस जायेगा.

याद रखिये, दिशा रवि और नवदीप कौर उसी उस आतंक को तोड़ती हैं. हमें उनके साथ मजबूती से खड़े रहना है. उनका संघर्ष हमारा संघर्ष है.

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