हंटर के हवाले संतालों की संस्कृति और इतिहास


विनोद कुमार

भारत में रहने वाली विशाल आबादी को मोटे तौर पर दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है- आर्य और अनार्य, गैर आदिवासी और आदिवासी. दोनों में फर्क यह है कि गैर आदिवासी समुदाय का मुख्य हिस्सा आर्य भाषा परिवार का सदस्य है, जबकि आदिवासी समुदाय में विभिन्न भाषा परिवार के सदस्य हैं. भारत के किसी भी हिस्से के जंगलों में, पर्वतीय अंचलों में चले जाईये, अपनी नीरवता में जीते किसी न किसी आदिवासी समुदाय के लोग आपको मिल जायेंगे. कम से कम 200 किस्म की भाषायें ये बोलते हैं. इनके रूप रंग में भी भिन्नता है. कुछ मलय मूल से मिलते जुलते हैं. कुछ चाईनीज मूल के लोगों से मिलते जुलते हैं. इनके बारे में आज हमारे पास पहले से ज्यादा जानकारी है, लेकिन आज भी वे एक धुंध में लिपटे नजर आते है. हंटर ने अपनी पुस्तक ‘एनल्स आफ रूरल बंगाल’ मे इसी जनजातीय समुदाय के एक प्रमुख सदस्य -संतालों को अपनी लेखनी का विषय बनाया है. चंूकि अतिक्रमणकारी आर्यों के दासत्व को, उनकी भाषा-संस्कृति को आदिवासियों ने कभी स्वीकार नहीं किया, अपने अस्तित्व के लिए लगातार उनसे संघर्ष करते रहे, इसलिए आर्यों ने उन्हें अपने वेद पुराणों में असुर, दासायन, दस्यु, राक्षस आदि के रूप में चित्रित किया और यह प्रचारित किया कि उनकी भाषा अपूर्ण है, वे मांस भक्षी हैं. उनका कोई ईश्वर नहीं. कोई संस्कृति और आचार विचार नहीं. लेकिन यह भ्रामक धारणा है. उनकी अपनी संस्कृति है, जीवन जगत के बारे में अपनी धारणासें है. एक समृद्ध संस्कृति है और हर तरह के भावबोध को अभिव्यक्त करने वाली एक सशक्त भाषा भी है. आश्चर्य तो यह देख कर होता है कि कोई लिपि या लिखित इतिहास नहीं होने के बावजूद उनकी भाषा और संस्कृति आज तक जीवित कैसे है?

संतालों के बारे में चर्चा करने के पहले हम यह जान लें कि संताल जनजातीय समुदाय की सबसे बड़ी प्रजाती है. हंटर की पुस्तक 1868 में प्रकाशित हुई थी जब संपूर्ण बिहार और ओड़िसा बंगाल में ही शामिल था. उनका मूल ठिकाना तबके लोअर बंगाल का संपूर्ण पश्चिमी क्षेत्र है. वे समुद्र से कुछ किमी की दूरी से लेकर वतर्मान भागलपुर जिला तक बसे हुए हैं, जो वीरभूम के रूप में चिन्हित किया जाता है. यह भौगोलिक क्षेत्र अर्द्ध चक्करदार सीढियों के आकार का है जो मोटे रूप में एक सौ माईल चैड़े और चार सौ माइल लंबे क्षेत्र में फैला हुआ है. लोअर बंगाल के पश्चिम के संपूर्ण जंगलों में ये फैले हुए हैं.

मानव जीवन की उत्पत्ति के संबंध में एक सामान्य वैज्ञानिक सोच यह है कि सूरज से टूट कर पृथ्वी बनी जो प्रारंभ में आग का धधकता हुआ पिण्ड था. हजारों वर्षों में यह ठंढा हुआ और तीन भाग समुद्र और एक भाग स्थल में तब्दील हो गया. पहले जलचर जीव पैदा हुए,फिर ऐसे जीव जो जल और स्थल दोनों पर विचरण कर सकते थे. फिर विकास के क्रम में स्थल पर चलने वाले जीव जंतु जिनसे विकास के क्रम में आदि मानव की उत्पत्ति हुई. लेकिन विभिन्न मानव समुदाय के धार्मिक ग्रंथों में ईश्वरेच्छा से मनुष्य और जीव जगत की सृष्टि हुई. ईसाई धर्म ग्रंथों के अनुसार प्रभु इच्छा से सिर्फ सात दिनों में पूरे कायनात की सृष्टि हुई. सभी धार्मिक ग्रंथों में एक जल प्लावन की भी चर्चा है. हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार एक समय सर्वत्र जल ही जल था. आदि मानव एक नाव पर सवार हुआ. नाव पर बीज आदि रखे और नाव बहते बहते हिमालय की चट्टानों के पास आकर टिक गया. आदि मानवों के संसर्ग से सप्त ऋषि पैदा हुए जिन्हों ने मानव सभ्यता को विकसित किया. मनुष्य जीवन की उत्पत्ति के संबंध में संतालों के बीच भी एक कथा प्रचलित है. सबसे पहले समुद्र की अतल गहराईयों से पहाड़ पैदा हुए. पहाड़ एकाकीपन से उब रहे थे. उन्होंने देखा, जल की सतह पर कुछ पक्षी दौड़ रहे हैं. उनके विश्राम के लिए उन्होंने उन्हें उठा कर कमल के पत्तों पर रख दिया. फिर कछुए और मछलियों को आदेश दिया कि वे समुद्र की तली से मिट्टी लाये. वे उन्हें ला कर पहाड़ के आस पास फैलाने लगे जिससे धरती बनी और फिर घास पैदा हुए. फिर बत्तखों के अंडे से आदि पुरुष और औरत की सृष्टि हुई. उनके युवा होने पर पहाड़ ने ही उन्हें वस्त्र दिये. फिर पहाड़ द्वारा दिये जड़ी बंूटी से उन्होंने नशीला पेय-हड़िया- बनाया. खुद पीने के पहले उन्होंने हड़िया पहाड़ पर भी चढाया. फिर उन्होंने सात बच्चों को जन्म दिया जिन्होंने संतालों के समुदाय को आगे बढाया. हंटर यहां बताना नहीं भूलते कि आर्यों के आदि पुरुष और स्त्री ने भी सात संतानों को ही जन्म दिया था. हां, वे सात ऋषि बने.

अपने वर्तमान निवास स्थल तक वे कैसे पहुंचे, किन रास्तों से पहुंचे, इसके बारे में भी उनके पूर्वज बताते रहे हैं. लेकिन जिन भौगोलिक क्षेत्रों का वे जिक्र करते हैं, उसकी शिनाख्त अब तक नहीं हो पायी है. लेकिन कुछ बातें विचारणीय हैं. विशाल पहाड़ उनकी स्मृतियों में भी है. लेकिन वे पश्चिमोत्तर नहीं हो सकता, क्योंकि उनके मौखिक गाथा में सप्त संधू या किसी भी बड़ी नदी की चर्चा नहीं आती. यानी, जिस रास्ते आर्य भारत में आये, उस रास्ते वे नहीं. उनके प्रस्थान के बिंदू से आज के निवास स्थल तक जिन स्थान विशेषों का नाम आता है उसमें से कुछ है हिहिड़ी -पिपिड़ी, चाई चंपा, शिकार, नागपुर आदि. इसमें हिहिड़ी पिपिड़ी को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है. इस तरह के शब्द न तो संस्कृत में मिलते हैं और न हिंदी, उर्दू या बंगला में. संताली में भी हिहिड़ी शब्द नहीं आता. पिपिड़ी शब्द आता है जिसका अर्थ तितली है. हिमालय की तराई में तितली बेशुमार मिलते हैं. चाई चंपा यानी चंपा एक मीठी सुगंध वाले फूलों का पेड़ है. ब्रह्मपुत्र के उपरी घाटी में ये पेड़ बहुलता से मिलते हैं. शिकार दामोदर नदी के उपर का इलाका है जो पुराने वीरभूम में ही पड़ता है.

हंटर ने संताली भाषा पर विस्तार से चर्चा की है और यह बताने की कोशिश की है कि इसका एक अपना व्याकरण है और यह अत्यंत शक्तिशाली भाषा है. संतालों की भाषा की बनावट संस्कृत से अलग है. इसकी प्रमुख खासियत है कि यहां एक मूल शब्द से कई शब्द बनते हैं, वह भी मूल में बगैर किसी परिवर्तन के. मसलन, हिंदी का बाघ और अंग्रेजी के टाईगर को संताली में कुल कहा जाता है. अब यदि बाघ दो हुए तो हिंदी में दो बाघ और अंग्रेजी में टाईगर-टू कहेंगे. लेकिन संताली में किन शब्द कुल में जोड़ कर कुलकिन यानी दो बाघ हो गया. अनेक बाघ की जगह ‘कुल’ में ‘को’ शब्द जोड़ कर ‘कुलको’ बना दिया गया. समय के लिए संस्कृत में काल शब्द का प्रयोंग होता है. संताली में समय के लिए कोई शब्द नहीं. लेकिन काल को जोड़ कर ही समय के अंतराल को बताने वाले कई शब्द बनते हैं. मसलन, काल-ओम, अगला वर्ष, दिन काल ओम, पिछला वर्ष, हाल-कालओम, दो वर्ष पूर्व आदि. इसी तरह मैन अंग्रेजी शब्द है लेकिन इससे संस्कृत और संताली के कई समान अर्थक शब्द बनते है. संस्कृत का मानवा, मनु, मन आदि. उसी तरह संताली का मन-ऐट, सोचना, मन-इ, आत्मा, मानिको, पहला आदमी, मनोई जोनोम, मानव जनम आदि. हंटर कहते हैं कि बहुत सारे शब्द का मूल रूप संस्कृत और संताली दोनों में हैं. लेकिन ये एक दूसरे से नहीं लिये गये हैं बल्कि किसी एक अन्य स्रोत से लिये गये प्रतीत होते हैं.

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