क्यों टूटी हरे और लाल झंडे की मैत्री ?

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सत्तर के दशक में शिबू सोरेन, कामरेड एके राय और बिनोद बिहारी महतो ने मिल कर जो सामाजिक—राजनीतिक शक्तियों का समीकरण बनाया उसने कोयलांचल में माफियागिरी और आदिवासी इलाकों में व्याप्त महाजनी शोषण के खिलाफ निर्णायक संघर्ष किया. वह दौर ‘लाल—हरे झंडे की मैत्री’ का दौर था. वह मैत्री क्यों टूटी, इसे लेकर बहुतों में गहरी जिज्ञासा है.

इसलिए अपनी जानकारी में जो बातें हैं उसे आपसे शेयर कर रहा हूं. यह सम्मान की राजनीति से बेहतर हम इस बात को जाने और समझें कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन और कामरेड एके राय के बीच का रिश्ता कैसा था? मुझे उन दोनों से लंबे साहचर्य का अवसर रहा, क्योंकि एक पत्रकार के रूप में जब मैं बोकारों में था तो 1985 के बाद से लगातार उनके संपर्क में रहा. 2003 में मैं रांची चला आया और प्रभातखबर में ही राजनीतिक डेस्क का प्रभारी रहा.

यह झारखंड के लिए महत्वपूर्ण कालखंड था. झारखंड अलग राज्य का आंदोलन, उसके समानांतर माओवाद का फैलाव और झारखंड अलग राज्य का गठन व शुरुआती दिन. 2005 में कामरेड महेंद्र सिंह की हत्या और उसी वर्ष होने वाले विधान सभा चुनाव के बाद मैंने सक्रिय पत्रकारिता से किनारा कर लिया. इस दौर की जानकारी और जीवनानुभव को ही मैंने अपने तीन उपन्यासों- ‘समर शेष है’, ‘मिशन झारखंड’ व ‘रेडजोन’ में व्यक्त किया है. वैसे, वाहिनी धारा के एक सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत से पत्रकारिता में आने के पहले आदिवासी क्षेत्र में काम करने का अनुभव भी मेरे काम आया.

तो, अब मैं मूल बात पर आता हूं. मैं यह जानता था कि झामुमो के गठन में कामरेड एके राय और बिनोद बिहारी महतो की बराबरी की भूमिका रही. कामरेड राय आदिवासियों को सबसे बड़ा सर्वहारा मानते थे और झारखंड को क्रांति की उपयुक्त भूमि, इसलिए उन्होंने झारखंड को लालखंड की संज्ञा और ‘लाल-हरे झंडे की मैत्री’ का नारा दिया था. इस मैत्री की ही वजह से झारखंडी जनता कोयलांचल में माफियागिरि और छोटानागपुर में महाजनी शोषण के खिलाफ मजबूती से संघर्ष कर सकी थी. फिर यह मैत्री टूटी क्यों? यह जिज्ञासा मुझे भी थी और बहुतों को है.

गुरुजी से मैंने कई अवसरों पर बात की. उन्होंने कभी भी इस बात पर बहुत बिस्तार से नहीं बताया. उनके मन में कुछ् मलाल तो था, पर वे बोलते नहीं थे. वे बस इतना ही कहते कि जो हो गया सो हो गया. अब यही सच है कि हम अलग हैं. एक बार बस उन्होंने सिर्फ इतना कहा था – ‘ कम्युनिस्टवन सब किसी का होता है हो.’ लेकिन उन्होंने कभी भी कामरेड एके राय के प्रति अवज्ञा नहीं दिखायी. कभी भी उनके खिलाफ एक शब्द नहीं कहा. एक बार राजीतिक संबंध खत्म हो जाने के बाद वे दोनों बहुत कम अवसरों पर मिले. लेकिन शिबू सोरेन ने उनका हमेशा समादर किया

दूसरी तरफ कामरेड एके राय ने तो गुरुजी को आदिवासियों का महानायक ही कहा है. उन्होंने अपनी पुस्तक झारखंड और लालखंड में लिखा है – ‘‘बागुन सुंब्रई, एनई होरो और शिबू सोरेन आदिवासी आंदोलन में तीन धाराओं के प्रतीक हैं. श्री सुंब्रई आदिवासी सामंतवाद के प्रतीक हैं जो कि झारखंड को पीछे ले जाने वाला है. श्री होरो आदिवासी पूंजीवाद के प्रतीक हैं जो ज्यादा से ज्यादा वर्तमान में सीमित है. शिबू सोरेन आदिवासी समाजवाद के प्रतीक हैं जिसमें सारे समाज का भविष्य नीहित है. श्री सोरेन भारत के उपर एक लाल सितारा बनने की संभावना रखते हैं और हरा झंडा लाल भारत का जन्मदाता होगा.’’
फिर ऐसा क्या हुआ जिसे बिनोद बिहारी महतो भी पाट नहीं सके?

दो अलग सामाजिक राजनीतिक पृष्ठभूमि

कामरेड एके राय और शिबू सोरेन दो बिल्कुल अलग सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि से आये थे. शिबू सोरेन गोला प्रखंड के नेमरा गांव के रहने वाले थे जहां उनके पिता सोबरन मांझी की महाजनों ने हत्या कर दी थी. सोबरन मांझी स्कूल शिक्षक थे, साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता. शराब और महाजनी शोषण के विरोध की वजह से उनकी हत्या महाजनों ने करवा दी थी. उस वक्त अपने भाई राजराम के साथ शिबू सोरेन गोला के आवासीय विद्यालय में पढ़ते थे. पिता की हत्या के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट गया. उनकी मां सोनामणि कुछ वर्ष तक अपने पति के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए कोर्ट के चक्कर लगाती रही जहां वे अक्सर शिबू सोरेन और उनके बड़े भाई राजाराम को लेकर जाते थीं. लेकिन आखिरकार निराश हो गयी और ठंढ़ी सांस लेकर सोचा कि अब तो उनके बेटे ही अपने पिता की हत्या का बदला बड़े होकर लेंगे. और यही हुआ. युवावस्था की दहलीज पर पहुंचते ही शिबू सोरेन और उनके साथियों ने महाजनों के कब्जे वाली जमीन पर खड़ी फसल को काटना शुरु कर दिया. वे यह सब किसी राजनीतिक दर्शन से प्रेरित हो कर नहीं कर रहे थे, सहज बुद्धि से कर रहे थे कि यह जल, जंगल, जमीन हम आदिवासियों का है. वे आदिवासियों के उस संघष परंपरा के बारिस बन गये जिसका नेतृत्व कभी सिदो कान्हू और बिरसा मुंडा ने किया था. बाद में वे झालदा में कुछ कम्युनिस्ट नेताओं के संपर्क में आये जहां वे लकड़ी बेचने जाया करते थे. फिर चितरपुर में भी कम्युनिस्ट नेता मंजूर हसन के संपर्क में आये. वैज्ञानिक समाजवाद का पाठ पढ़ा, लेकिन कितना समझा, यह कहना मुश्किल. बस उन्हें अपने संघर्ष का नैतिक आधार मिल गया. उनके जीवन की व्यक्तिगत त्रासदी एक सामाजिक त्रासदी के खिलाफ युद्ध में बदल गया. उन्हीं दिनों बोकारो कारखाना के भूमि अधिग्रहण का काम भी शुरु हुआ था और वे बोकारो के विस्थापित आंदोलन में भी भाग लेने लगे. वह एक लंबी कहानी है, लेकिन इसी क्रम में एक दिन उनकी मुलाकात चास कोर्ट में बिनोद बिहारी महतो से हुई जो धनबाद के कम्युनिस्ट नेता थे और साथ ही विस्थापितों का मुकदमा लड़ा करते थे. और विनोद बिहारी महतो उन्हें अपने साथ धनबाद ले गये. धनकटनी आंदोलन के नेता के रूप में शिबू सोरेन की ख्याति उस वक्त तक दूर दूर तक फैल चुकी थी.

एके राय ने कोलकाता विश्वविद्यालय से एम टेक किया था और कुछ दिन कोलकाता के ही किसी कारखाना में नौकरी करने के बाद सिंदरी कारखाना में बहाल हो गये थे. यहां उनकी नियुक्ति प्लानिंग एंड डेवेलपमेंट विभाग में रिसर्च इंजीनियर की थी. यहां नौकरी शुरू करने के बाद कुछ अन्य रिसर्च इंजीनियरों और विभाग के सहयोगियों के साथ मिल कर ‘साथी’ नाम की संस्था बनायी और साप्ताहिक अवकाश के दिनों में आस पास के गांवों में परिभ्रमण के लिये जाने लगे. वहां साक्षरता का काम करते थे. शुरूआती दिनों में वामपंथी विचारधारा का होने के बावजूद उनका किसी राजनीतिक दल से संपर्क नहीं था. यहां तक कि कुछ कम्युनिस्ट साथियों ने मिल कर जब सिंदरी में जनवादी श्रमिक संगठन का गठन किया तो ये उससे अलग रहे. लेकिन श्रमिक आंदोलन और राजनीति में उनकी भूमिका बढ़ती गयी. कांग्रेसी शासन में बढ़ती मंहगाई और बेरोजगारी के विरोध में 9 अगस्त 1966 को समाजवादियों और कम्युनिस्टों ने मिल कर बिहार बंद का आह्वान किया था. राय और उनके साथियों ने इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. उस बार वे बीस अन्य साथियों के साथ पहली बार गिरफ्तार हुये. अन्य लोग तो जेल से निकल गये, लेकिन वे और उनके साथ गिरफ्तार मनोरंजन प्रसाद तीन चार महीने जेल में रह गये. लेकिन दूसरी बार एक हड़ताल के दौरान गिरफ्तार होने के बाद सिंदरी कारखाना की उनकी नौकरी जाती रही. जब वे जेल में बंद थे तभी विनोद बिहारी महतो उनसे मिलने जेल में गये और उनके ही जोड़ देने पर राय सक्रिय राजनीति में आये और 67 में हुये विधानसभा चुनाव में सिंदरी से चुनाव लड़ कर विधायक बन गये. बिनोद बाबू भाकपा में तो थे ही और भाकपा टूट कर जब माकपा बनी तो विनोद बिहारी महतो और राय माकपा में शामिल हो गये. लेकिन आदिवासी और झारखंड संबंधी अपनी अवधरणाओं की वजह से उन्हें और विनोद बिहारी महतो को बाद में माकपा से निकाल दिया गया. उस वक्त तक कोई भी कम्युनिस्ट पार्टी अलग राज्य की मांग का समर्थन नहीं करती थी और राय अलग राज्य की मांग का समर्थन करते थे.

शिबू सोरेन से एके राय की मुलाकात 67 में उनके विधायक बनने के बाद हुई थी. जयपाल सिंह और तत्कालीन अन्य झारखंडी नेताओं के कांग्रेस से बढ़ती नजदीकी को देख कर वे प्रारंभ में शिबू सोरेन के प्रति भी आशंकित हुये, लेकिन टुंडी में उनके काम काज से प्रभावित हो कर उन्होंने ही शिबू सोरेन को आदिवासियों का महानायक करार दिया.

झामुमो के गठन के वक्त उभरा द्वंद्व

राजनीतिक दलों के नाम के साथ सामान्यतः ‘दल’ या ‘पार्टी’ शब्द जुड़ा रहता है. भारतीय जनता पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया, माले, जनता दल आदि आदि. लेकिन झामुमो एक राजीतिक दल तो है, उसके साथ पार्टी शब्द नहीं जुड़ा है. वह मोर्चा है. आपने कभी समझने की कोशिश की कि ऐसा क्यों है? दरअसल, यही वह पेंच है जिसमें शिबू सोरेन और कामरेड एके राय के बीच की दूरी का रहस्य छिपा है. आईये, उसे खोलते हैं.
शिबू सोरेन, विनोद बिहारी महतो से पहली बार जब मिले थे, तभी इस बात पर संक्षिप्त चर्चा हुई थी कि आदिवासी सुधार समिति और शिवाजी समाज को मिला कर एक नया संगठन बनाया जाये, लेकिन इस योजना को मुकम्मल रूप 73 तक नहीं दिया जा सका, हालांकि उनकी मुलाकात 68 में ही हो चुकी थी. एक तो शिबू सोरेन टुंडी में लग गये और यहां घटनाक्रम इतनी तेज गति से चला कि और सब बातें पीछे चली गयी. शिबू का टुंडी से निकलना बहुत कम हो गया था और टुंडी में हो रही बहुत सी बातों का पता विनोद बाबू और एके राय को तब होती, जब वह घटना लोकल अखबारों में छपती. विनोद बाबू और राय भी वहां नियमित नहीं जा पाते, लेकिन जब जाते वहां चल रही गतिविधियों से प्रभावित होते. कामरेड राय के मन में भी शिबू सोरेन के प्रति आस्था बनने लगी थी. लेकिन जब एक नया संगठन बनाने की बात शुरू हुई तो कुछ मतभेद फिर उभर आये.

गौरतलब यह है कि 1967 में पहली बार विधायक बनने के बाद से लगातार एके राय सिंदरी से विधानसभा का चुनाव तो जीत रहे थे, लेकिन विनोद बाबू झरिया से चुनाव नहीं जीत पा रहे थे. उन्हें लगता था कि एक क्षेत्रीय पार्टी जिसे आदिवासी और सदान अपना समझ सके, बनाने का वक्त आ गया है. उस वक्त तक जयपाल सिंह की झारखंड पार्टी कांग्रेस में विलय के बाद अपना वजूद खो चुकी थी. हालांकि अखिल भारतीय झारखंड पार्टी के रूप में बाघुन सुम्बरई और एनई होरो उसे जीवित रखने का प्रयास कर रहे थे. वे अलग झारखंड राज्य के गठन की मांग कर रहे थे. 1967 में मोजेस गुड़िया के नेतृत्व में बिरसा सेवा दल का गठन किया गया था. लेकिन सेवा दल झारखंड में चुनाव का वहिष्कार करती थी. 1969 में जस्टिस रिचर्ड के नेतृत्व में संथाल परगना में हूल झारखंड पार्टी गठित की गयी. लेकिन ये सभी पार्टियां झारखंड आंदोलन को दिशा देने में कामयाब नहीं हो सकी. इनकी एक सीमा यह थी कि ये सभी आदिवासियों को केंद्र में रख कर झारखंड की राजनीति को देख रही थीं.

विनोद बाबू इस तथ्य को समझ रहे थे कि जब तक आदिवासी और सदान इकट्ठे नहीं होंगे, तब तक राष्ट्रीय पार्टियों का मुकाबला नहीं किया जा सकता. लेकिन अड़चन यह थी कि उस वक्त तक राजनीतिक रूप से परिपक्व नहीं होने के बावजूद शिबू तो उनके विचारों से सहमत थे, लेकिन कामरेड एके राय एक नया संगठन तो चाहते थे, लेकिन नई राजनीतिक पार्टी नहीं. वे इस बात पर जोर दे रहे थे कि राजनीतिक दल और मूल पार्टी के रूप में उनकी पार्टी मार्क्सवादी समन्वय समिति ही बनी रहे और नई पार्टी उसके जन संगठन के रूप में काम करे. इसके अलावा वे अलग झारखंड राज्य के तो पक्ष में थे, लेकिन उनका सपना शोषण मुक्त अलग झारखंड राज्य का था. इसलिये जब फरवरी माह में धनबाद के गोल्फ मैदान में एक जनसभा करके नई पार्टी को लांच करने की योजना बनी तो उसके पहले टुंडी और धनबाद में कई बैठकें हुई और झारखंड मुक्ति पार्टी की जगह झारखंड मुक्ति मोर्चा नये संगठन का नाम रखा गया. कामरेड राय और विनोद बिहारी महतो दोनों चाहते थे कि पार्टी का अध्यक्ष शिबू सोरेन को ही बनाया जाये, लेकिन शिबू इसके लिये सहमत नहीं हुये. उनका कहना था कि विनोद बिहारी महतो के रहते वे अध्यक्ष कैसे रह सकते हैं. और तय हुआ कि बिनोद बिहारी महतो नये संगठन के अध्यक्ष और शिबू सोरेन महासचिव बनेंगे.

गोल्फ मैदान में उस ऐतिहासिक सभा के पहले विनोद बाबू, शिबू सोरेन, शक्ति महतो एवं कुछ अन्य साथियों की टीम ने पूरे झारखंड क्षेत्र का दौरा किया. कुछ लोग पश्चिम बंगाल, ओड़िसा और मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों में भी गये. सभी जगहों से सहयोग और समर्थन का आश्वासन मिला. विनोद बिहारी महतो की सक्रियता से जमशेदपुर और हजारीबाग- गिरिडीह जिले के कई कुड़मी युवक सामने आये, जिनमें प्रमुख थे शैलेंद्र महतो, शिवा महतो, टेकलाल महतो और जमशेदपुर के कम्युनिस्ट नेता सरयू प्रसाद.

शिबू सोरेन उस वक्त इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं थे कि मोर्चा और पार्टी में क्या अंतर है. कामरेड एके राय पार्टी बनाने के बजाय मोर्चा बनाने पर जोर क्यों दे रहे हैं. उन्होंने विनोद बाबू से इस संबंध में बात की और इस अंतर को स्पष्ट करने का आग्रह किया. विनोद बिहारी महतो ने बताया कि राय झारखंड मुक्ति मोर्चा को जन संगठन बनाना चाहते हैं, जो शोषण मुक्त अलग झारखंड राज्य के लिये संघर्ष करे, वे उसकी परिकल्पना राजनीतिक दल के रूप में, यानी चुनाव लड़ने वाली पार्टी के रूप में नहीं करते. शिबू सोरेन ने उस वक्त तो इस बात को लेकर ज्यादा बहस नहीं की लेकिन उस वक्त उनके दिल में एक गांठ जरूर पड़ गयी और एके राय के प्रति एक अविश्वास का भाव जिसे बाद में कांग्रेस नेता ज्ञानरंजन और सूरज मंडल ने हवा दी.

पार्टी नहीं मोर्चा

4 फरवरी 1973 को धनबाद के गोल्फ मैदान में झामुमो के गठन की जो ऐतिहासिक सभा हुई थी, उसके बारे में यहां बताने में मैं अपने ही पहले उपन्यास ‘समर शेष है’ की मदद ले रहा हूं. उस उपन्यास का प्रकाशन 1998 में हुआ था और उसे लिखना मैंने 1995 में शुरु किया था. करीबन तीन वर्षों की मेहनत से मैं उसे लिख पाया और उसके लिए बहुत सारे लोगों से मिला. गुरुजी अपने बारे में कम बोलते थे, इसलिए मैंने उनके गांव नेमरा की कई बार यात्रा की. उनके बड़े भाई राजाराम से मिला, कामरेड एके राय से कई बार बातचीत हुई. बिनोद बाबू से मेरी मुलाकात कम हुई, उनके बारे में सबसे अधिक मदद मिली चास कालेज के प्राचार्य चंडीचरण महतो के संपादन में बिनोद बाबू की मृत्यु के बाद निकाले गये एक सोविनियर से जिसमें बिनोद बाबू को जानने वाले अनेकानेक विद्वानों ने उनके व्यक्तित्व पर लिखा था. इसके अलावा मैंने टुंडी की भी कई बार यात्रा की अपने मित्र विश्वनाथ बागी के साथ, जो अब नहीं रहे. टुंडी में हमारे एक पत्रकार मित्र देवीशरण भी रहते हैं. उन्होंने बहुत मदद की.

तो, अब हम उस सभा में चले जिसमें विनोद बाबू के शिवाजी समाज और शिबू सोरेन के सनत संथाल समाज का विलय हुआ और झामुमो के गठन का ऐलान.

उस दिन सुबह से ही गोल्फ मैदान, धनबाद में लोग जमा होने लगे थे. हरे झंडे और नगाड़े की घनघोर आवाज के साथ चलते लोग. लाल झंडो के साथ मजदूर कोलियरियों से से निकले लोग. गोल्फ मैदान को जाने वाली हर सड़क पर यही नजारा था और दिन चढने के साथ अपार भीड़ मैदान में जमा हो जाती है, उस ऐतिहासिक दिन का गवाह बनने के लिये. मंच पर तमाम प्रमुख नेता मौजूद थे. सबसे पहले मंच से आदिवासी सुधार समिति और शिवाजी समाज के विलय की सूचना दी गयी और इस घोषणा के साथ डुगडुगी बज उठी. फिर यह सूचना दी गयी कि नये संगठन का नाम झारखंड मुक्ति मोर्चा होगा, जिसके अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो और महासचिव शिबू सोरेन होंगे. उसके बाद विनोद बाबू को मंच संचालन का जिम्मा सौंप दिया गया.
सबसे पहले विनोद बाबू ही माईक पर बोलने आते हैं. उनकी जोरदार आवाज हवा में गूंजने लगती हैः

‘‘आज का दिन ऐतिहासिक दिन है. झारखंड आंदोलन को एक नई दिशा देने के लिये हम एक संगठन की नींव रख रहे हैं. इस संगठन का उद्देश्य शोषण मुक्त अलग झारखंड राज्य का निर्माण है. लेकिन साथ ही हमे गांव से महाजनी शोषण को मिटाना है. कोयलांचल से माफियागिरी को खत्म करना है…’’
फिर वे शिबू सोरेन को बोलने के लिये आमंत्रित करते हैं. शिबू उस दिन बोलते हुये भावुक हो गये थे. उनकी बोली से भदेसपन अभी तक खत्म नहीं हुआ था. वे कभी खड़ी बोली में बोलते, कभी संथाली में और कभी सादरी में. जो कुछ उन्होंने कहा था उस दिन उसका लब्बोलुआब यह थाः

‘‘मुझे झारखंड मुक्ति का महासचिव बनाया गया है. पता नहीं मैं इस योग्य हूं भी या नहीं, लेकिन मैं अपने मृत पिता की सौगधं खाकर कहता हूं कि शोषण मुक्त झारखंड के लिये अनवरत संघर्ष करता रहूंगा. हम लोग दुनियां के सताये लोग हैं. अपने अस्तित्व के लिये हमें लगातार संघर्ष करते रहना पड़ा है. हमे बार बार अपने घरों से, जंगल और जमीन से उजाड़ा जाता है. हमारे साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जाता है. हमारी बहू-बेटियों के इज्जत से खिलवाड़ किया जाता है. दिकुओं के शोषण उत्पीड़न से परेशान हो कर हमारे लोगों को अपना घर बार छोड़ कर परदेश में मजूरी करने जाना पड़ता है. हरियाणा-पंजाब के इंट भट्ठों में, असम के चाय बगानों में, पश्चिम बंगाल के खलिहानों में मांझी, संथाल औरतें मर्द मजदूरी करने जाते हैं और वहां भी उनसे बंधुआ मजदूरों जैसे व्यवहार किया जाता है. यह बात नहीं कि हमारे घर गांव में जीवन-यापन के साधन नहीं, लेकिन उन पर बाहर वालों का कब्जा है. झारखंड की धरती का, यहां के खदानों का दोहन कर, उनका लूट खसोट कर नये-नये शहर बन रहे हैं, जगमग आवासीय कालोनियां बन रही है और हमनी सब गरीबी और भूखमरी के अंधकार में धंसे हुये है. लेकिन अब यह सब नहीं चलेगा.. हम इस अंधेरगर्दी के खिलाफ संघर्ष करेंगे..’’

शिबू सोरेन बोलते बोलते अचानक रूके और अपनी जगह पर जा कर बैठ गये. उनके भाषण के दौरान मैदान में सन्नाटा था. उसके बाद आये बोलने शक्तिनाथ महतो. उनका व्यक्तित्व कद्दावर और आवाज गूंजती हुई थी. उन्होंने कहाः

‘‘आज हम वर्षों की लड़ाई की बुनियाद डाल रहे हैं. यह लड़ाई लंबी होगी और कठिन भी. हम जिस पार्टी की नींव डाल रहे हैं, वह अन्य पार्टियों से भिन्न एक क्रांतिकारी पार्टी है. इसमें आने जाने वालों की कभी कमी नहीं रहेगी, परंतु इसकी धार रूकेगी नहीं. इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेंगे. दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेंगे और तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे. जीत अंत में हमारी होगी..’’

सभा के अंत में बोलने आये थे कामरेड एके राय. उनके माईक पकड़ते ही कामरेड एके राय को लाल सलाम.. मजदूर एकता जिंदाबाद के नारों से आकाश गूंज उठाः

‘‘साथी, देश एक मुक्ति संग्राम चाहता है. संयुक्त फ्रंट नहीं मुक्ति फ्रंट. एक विकल्प की राजनीति,सिर्फ विरोध की राजनीति नहीं. एक नया माॅडल चाहिये. यह माॅडल बंगाल और केरल को बनाना मुश्किल है, लेकिन झारखंड में बन सकता है. यहां का समाज समतामुखी और बाहर से जो यहां आये मजदूर भी समाजमुखी. शोषणहीन समाज का माॅडल यहां छोड़ और कहां बन सकता है?… साथियों आज इस नये संगठन की नींव रखते हुये मैं कुछ बातों की तरफ आपका ध्यान खींचना चाहता हूं. आज तक जितनी भी झारखंडी पार्टियां बनी, वे आदिवासी बहुल रांची या सिंहभूम में. लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा का जन्म धनबाद में हो रहा है जो एक औद्योगिक क्षेत्र है. यहां आदिवासियों की संख्या सिर्फ दस फीसदी है. झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन आदिवासी और गैर आदिवासी को मिला कर हुआ है. इस संगठन की दूसरी बड़ी विशेषता है कि यह एक माक्र्सवादी आंदोलन की संतान के रूप में सामने आया है. इतिहास में पहली बार लाल झंडा हरे झंडे को नये रूप में पैदा करने जा रहा है. इस आंदोलन की नींव रखने वालों में प्रमुख हैं विनोद बाबू जो इस इलाके में कम्युनिस्ट आंदोलन के भी जनक हैं… इस पार्टी के महामंत्री हैं शिबू सोरेन जो दूसरे आदिवासी नेताओं की तरह सत्तामुखी नहीं, हमेशा जनमुखी रहे हैं. जुल्म और शोषण को इन्होंने बचपन से देखा है. इनके पिताजी को महाजनों ने मार दिया था, इसलिये अन्याय के खिलाफ बगावत और क्रांति सिर्फ इनकी राजनीति नहीं, उनके जीवन का अंग है.
खैर, वह दिन उत्साह और उमंग का था. देर रात तक गोल्फ मैदान में जन सभा चलती रही और आंदोलन के तमाम साथी मिल बैठ कर आगे की येाजना बनाते रहे. सभी जिलों में संगठन की कमेटी बनाने और रांची में पूरी तैयारी से एक विराट प्रदर्शन करने का निर्णय लिया गया. एक दो दिन धनबाद में रूकने के बाद शिबू वापस टुंडी चले आये. नये संगठन से उन्हें भी एक ताकत मिली थी. उनके संघर्ष को एक पार्टी और एक झंडा मिल गया था. झामुमो के गठन के बाद टुंडी के आंदोलन को नया विस्तार मिला और माफियागिरी के खिलाफ कोयलांचल में चल रहे संघर्ष को एक नयी धार.

लेकिन झामुमो के गठन में ही अंतर्निहित थे उसके विभाजन के बीज. पहली बात तो यह कि झामुमो के गठन के बाद भी टुंडी में शिबू अकेले थे, शहर से उन्हें कोई खास मदद नहीं मिलने वाली थी, जबकि कोयलांचल के मजदूरों को ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों के समर्थन से नई ताकत मिली. इस्ट बसुरिया गोली कांड के पहले और बाद इस बात का एहसास सभी को हुआ. दूसरी बात यह कि कामरेड राय भले ही झामुमो को माक्र्सवादी समन्वय समिति का एक जन संगठन मानते थे, लेकिन शिबू सोरेन और उनके करीबी झामुमो को एक राजनीतिक दल का रूप देना चाहते थे और आने वाले दिनों में इस बात को लेकर साथियों में भारी मतभेद उत्पन्न हुये. शिबू और उनके समर्थकों की समझ थी कि यदि राय ‘लाल और हरे झंडे की मैत्री’ के इतने ही पक्षधर है तो कामगार यूनियन को समाप्त क्यों नहीं कर देते. वे क्या चाहते हैं कि हम हमेशा उनका झंडा ढ़ोते रहें?

और टुंडी में गुरुजी के मुकाबले शक्ति महतो को खड़ा करना

मैंने गुरुजी और कामरेड एके राय के बीच के द्वंद्व को रेखांकित करने के लिए जो चर्चा शुरु की, उसकी शुरुआत निर्मल महतो प्रकरण के अपने उपन्यास ‘रेडजोन’से की थी और इसका अंत भी अपने उसी उपन्यास के एक अंश से कर रहा हूं. कृपया ध्यान से पढ़ियेगा. ‘लाल—हरे झंडे की मैत्री’ क्यों खत्म हुई, यह समझ पायेंगे.
यदि यह उपन्यास खरीदना चाहें तो रांची में फिरायालाल के सामने ज्ञानदीप में उपलब्ध है और एमेजोन पर भी.

रेडजोन
उपन्यास अंश, पृष्ठ 370

यात्रा की वापसी में मानव धनबाद में रुकते हैं. बागी से मिलते हैं. फिर दोनों साथ कामरेड ए. के. राय से मिलते हैं. राय जो एक जमाने में कोयलांचल के सबसे बड़े नेता थे, मंडल और कमंडलवादी राजनीति से हुए सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों की वजह से राजनीति के हाशिये पर पहुंच गये हैं. लेकिन अभी भी उनकी जीवन शैली नहीं बदली है. पार्टी कार्यालय के ही एक छोटे-से कमरे में रहते हैं. समय पर कार्यालय में बैठते हैं. कोयलांचल के मजदूरों से, अपने संगठन के लोगों से और बाहर से आये अतिथियों से उत्साह पूर्वक मिलते हैं.
‘‘क्या कहूं, औद्योगीकरण की दिशा ही एकबारगी विदेशमुखी हो गई है! इस वजह से हमारे अपने जो संसाधन हैं, उनकी संभावनाओं की खोज नहीं हो पा रही है. बौद्धिक पंूजी नष्ट हो रही है. अपने देश में कोयले का जो भंडार है वह पूरे विश्व का छठा भाग है. इसमें ऐश की मात्रा जरूर ज्यादा है लेकिन गंधक की मात्रा विदेशी कोयला से कम है. लेकिन नइयी अर्थनीति जब से आयी है, विदेशी कोकिंग कोल का उपयोग बढ गया है. खपत का बड़ा हिस्सा विदेश से आता है, लगभग 15 मिलियन टन. देशी कोयले का उपयोग नहीं हो रहा है. वाशरियां बंद हो रही हैं. कोयला आधारित कई उद्योग बंद हो चुके हैं. सेंट्रल फ्यूल रिसर्च इंस्टीच्यूट एक प्रतिष्ठित संस्था थी, जो मर रही है. सेंट्रल माइनिंग रिसर्च इंस्ट्च्यिूट को मारने की साजिश हो रही है. सिंदरी फर्टिलाइजर बंद कर दिया गया. दरअसल, स्वदेशी तरीके से विकास की कोशिश ही खत्म हो रही है.
झारखंड की अपनी समझी जाने वाली सरकार पिछले तीन वर्षों में इस बात को समझ नहीं सकी है कि झारखंड की असली ऊर्जा झारखंडी भावना है. इसी भावना की वजह से झारखंडी नेताओं के बार-बार बिकते रहने के बावजूद झारखंड आंदोलन को समाप्त नहीं किया जा सका. इस भावना में झारखंड निर्माण की जो संभावना थी, उसे सरकार नहीं समझ सकी. बस, उनका सारा ध्यान विदेशी पूंजी का आयात करने और अपना कच्चा माल, जल, जंगल, जमीन बेचने की तरफ लगा है. अरे भाई, आजादी के बाद भारत में सार्वजनिक क्षेत्र में जितनी पूंजी लगी हुई है, उसका सबसे बड़ा हिस्सा इसी राज्य में लगा. सिंदरी, बोकारो, एचईसी, बीसीसीएल, सीसीएल, डीवीसी इसके उदाहरण हैं. लेकिन तमाम विकास बाहर से आये विकसित लोगों का चारागाह रहा. झारखंडियों का विकास नहीं हुआ, उल्टे उन्हें विस्थापन, शोषण और उपेक्षा का शिकार होना पड़ा. इसलिए उनके मन में सत्ताधारियों के प्रति गहरी घृणा है. जिस विकास में उनको पूछा नहीं जाता, जिसमें उनकी कोई भूमिका ही नहीं, उसका वे अंदर से विरोध करते हैं. और कोई भी क्षेत्र तब तक विकास नहीं कर सकता जब तक उसमें उस क्षेत्र के लोगों का उत्साह जुड़ा न हो. इसलिए झारखंड एक आंतरिक उपनिवेश के रूप में रहा और कभी विकास की राह पर नहीं चल सका. तमाम तरह के कल कारखाने, पूंजी आदि लेकर भी झारखंड अपनी गरीबी में ही सिमटा रहा. यहां तक कि उसको उपनिवेश बनाने वाला बिहार भी एक पिछड़ा राज्य ही बना रहा. हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि आजादी और मुक्ति की भावना से ही समाज में ऊर्जा और शक्ति पैदा होती है.
झारखंड बनने के बाद एनडीए सरकार ने विकास की ऐसी नीति अपनायी है कि उससे आम झारखंडी नफरत करता है. जो बीजेपी का आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सोच है, वही एनडीए का सोच है. वह सोच दरअसल बाजारवादी सोच है जो पूंजीवादी सोच की एक विशेष विकृति है. जो उत्पादन से ज्यादा व्यापार को महत्व देता है. वर्ग चरित्र के रूप में यह सेठ, साहुकार और बिचैलियों की पार्टी है जो कुछ दिनों से उद्योग पर भी अपनी बाजारी सोच के साथ हस्तक्षेप कर रहा है. दूसरी तरफ झारखंडी सोच, संस्कृति एवं परंपरा पूर्णरूपेण समाजवादी न सही समाजमुखी है. बाजार से ये अक्सर दूर रहते हैं. उतना ही संबंध रखते हैं जितना जीवन के लिए नितांत जरूरी है. वे मूलतः श्रमजीवी हैं और अपने बलबूते जीवित रहना चाहते हैं. लेकिन झारखंड बनने के बाद झारखंड सरकार ने ऐसी नीति अपनायी है जिससे आम झारखंडी नफरत करते हैं और जिसके विरोध में झारखंड आंदोलन पनपा. झारखंडी लोग ऊपर से थोपा हुआ विकास नहीं चाहते, जबकि सरकार की नीति यह बनी है कि जो विकास होगा, ऊपर से होगा. ऊपर से ही नहीं आसमान से होगा. बहुराष्ट्रीय कंपनियां आयेंगी और आदिवासियों की जमीन पर कब्जा कर उन्हें उठा देंगे. साथ ही टीवी और अन्य तरह के प्रचार माध्यमों से उनके अंदर उपभोक्तावादी रुझान पैदा करने की पुरजोर कोशिश की जा रही है ताकि वह उत्पादक से ज्यादा पूंजीवादी माल का क्रेता बन जाये. उसके अंदर का चारित्रिक बल, शुद्धता आदि नष्ट हो जाये. भूमंडलीकरण के बबंडर में वे भी बह जायें. इससे उनके अस्तित्व और पहचान के समक्ष ही खतरा बन गया है.
मानव, इस स्थिति का निदान तभी संभव है जब झारखंड के लिए झारखंडी भावना के साथ आज तक संघर्ष करने वाले सही राजनीतिक दिशा के साथ नेतृत्व में आयें. लेकिन विडंबना यह है कि वे लोग जिन्होंने झारखंड के लिए संघर्ष किया और जिनका झारखंडी भावना और संस्कृति से संबंध है, उनको विकास की सही दिशा का ज्ञान और समझ नहीं है और जिनमें यह समझ है, उनका झारखंडी भावना और संस्कृति से लगाव नहीं है. वह कौन-सी दिशा हो सकती है जो झारखंडी भावना और संस्कृति को साथ लेकर झारखंड का विकास कर सके? झारखंड आंदोलन बुनियादी रूप में एक सामाजिक आंदोलन रहा है जो एक स्तर के बाद अलग राज्य के आंदोलन में बदल गया. अब अलग राज्य में उनके राज को सुनिश्चित करना है तो सामाजिक आंदोलन के उनके सूत्र को पकड़ कर उसे समाजवादी आंदोलन में बदलना होगा. विडंबना यह भी है कि आम झारखंडी नेता समाजवादी आंदोलन मुखी नहीं हैं और जो लोग समाजवादी आंदोलन में हैं, वे झारखंडी नहीं हैं.’
मानव और बागी राय की बातों को मुग्ध भाव से सुनते रहे. फिर चाय पी और उनसे विदा लिया.
‘क्यों बागी, राय दा कहीं गुरूजी और अपनी बात तो नहीं कह रहे थे! उन्हें कहीं इस बात का मलाल तो नहीं कि वे मूलतः झारखंडी नहीं! आदिवासी नहीं और इसलिए झारखंड आंदोलन के एक बड़े नेता होने के बावजूद राजनीति के हाशिये पर पहुंच गये.’
‘इसमें उनका अपना भी दोष रहा है. समाजवादी वे हैं, लेकिन नितांत व्यक्तिवादी भी. गुरूजी को उन्होंने ही आदिवासियों का महानायक बताया था. लेकिन एमरजेंसी के बाद जब गुरूजी टुंडी विधानसभा सीट से खड़े हुए तो उन्होंने अपनी पार्टी के टिकट पर शक्तिनाथ महतो को खड़ा कर दिया. परिणाम यह हुआ कि दोनों चुनाव हार गये और कोयलांचल में पहली बार भाजपा के टिकट पर भाजपा के एक उम्मीदवार सत्यनारायण दुधानी चुनाव जीत गये.”
मानव इस बाबत गुरूजी के मुंह से ही वर्षों पहले सारी बात सुन चुके थे.
‘लेकिन झारखंडी नेताओं के बारे में रायदा की यह आशंका भी सच साबित हुई कि वे सत्ता की सीढ़ियों पर जल्दी फिसल जाते हैं.’
‘तो गुरूजी क्या करते! राय की महत्वाकांक्षी राजनीति की कठपुतली बने रहते?’

‘तीर-धनुष’ की कहानी

टुंडी में चुनावी जंग हारने के बाद गुरुजी ने संथालपरगना का रुख किया जहां साईमन मरांडी, सटीफन मरांडी, हेमलाल मुर्मू सहित अनेक संगी साथी उन्हें वहां मिले. उनका टुंडी आना जाना तो रहा, लेकिन कार्यक्षेत्र संथाल परगना बनता गया. इंदिरा गांधी ने पहली बार देश में एमरजंसी लगायी थी और हटाने के बाद चुनाव कराने का मन बनाया तो वे चाहती थीं कि आदिवासी इलाके में उनके साथ शिबू सोरेन आ जायें जिनकी ख्याति उस वक्त तक धनकटनी आंदोलन की वजह से पूरे देश में फैल चुकी थी.

कहा जाता है कि केबी सक्सेना को धनबाद का डीसी बना कर इस कार्य विशेष के लिए भेजा जाता गया था कि वे गुरुजी को बागी जीवन छोड़ संसदीय राजनीति में आने के लिए राजी करें. केबी सक्सेना गुरुजी से मिलने टुंडी गये. पोखड़िया आश्रम देखा, रात्रि पाठशालाएं देखी और उन्होंने शिबू सोरेन को गुरुजी कहना शुरु कर दिया.

खैर, उनकी सलाह पर गुरुजी ने एमरजंसी में ही आत्मसर्पण किया, जेल गये और फिर निकल कर संसदीय राजनीति में प्रवेश किया. अब वह कहानी फिर कभी. अभी तीर धनुष की कहानी, जिसके बारे में आरोप लगाया जाता है कि उसे कामरेड एके राय की पार्टी मार्क्सवादी समन्वय समिति से गुरुजी ने छीन लिया.

दरअसल, जब राह अलग हो गयी तो गुरुजी ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 1980 का संसदीय चुनाव दुमका से लड़ा और जीते. उसके बाद झामुमो को एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण कराने की कोशिश शुरु हुई. और इस काम में उनकी सर्वाधिक मदद मुक्ति प्रकाश तिर्की ने की.जिन्हें आज हम ‘दलित आदिवासी दुनिया’ के संपादक के रूप में जानते हैं. साथी मुक्ति तिर्की पर भी हम बीस अन्य समाजकर्मियों के साथ देशद्रोह का मुकदमा भाजपा सरकार ने किया था जिसे हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री बनने के बाद वापस लिया.

मुक्ति तिर्की अलिपुरद्वार से पांच बार सांसद रहे एक शीर्ष नेता पियूष तिर्की के पुत्र हैं और जब गुरुजी सांसद बन कर दिल्ली गये तो वे वहीं रहते थे और इंडियन एयर लाइंस की नौकरी किया करते थे. वे गुरुजी को संसद ले जाने का काम करते. अपना ज्यादा समय गुरुजी के साथ बिताते बिताते उन्होंने एयरलाइंस की नौकरी भी छोड़ दी. जब पार्टी को रजिस्टर्ड कराने की बात हुई तो यह काम उन्हें ही सौंपा गया. इधर कामरेड राय भी अपनी पार्टी का पंजीकरण कराना चाहते थे.
अब हुआ यह कि तिर्की अपने कुछ अन्य साथियों के साथ आनन फानन इस काम में जुट गये. भाकपा सहित कई पार्टियों के दफ्तर गये. उनके संविधान का अध्ययन किया और झामुमो का संविधान रजिस्टार आफिस में जमा कर दिया. उन्होंने तीर धनुष, जो अब तक बिहार में मुक्त सिंबल था, की मांग की. यही मांग कामरेड एके राय की तरफ से भी किया गया. लेकिन कामरेड राय को धनबाद जाकर पार्टी का संविधान बनाना आदि काम था, इसलिए उनका आवेदन बिलंब से रजिस्टार कार्यालय में जमा हो पाया और ‘तीर-धनुष’ गुरुजी की पार्टी को मिल गया. जयपाल सिंह की पार्टी झारखंड पार्टी का सिंबल मुर्गा था, और तीर धनुष झामुमो का सिंबल हो गया.

वैसे, कामरेड राय उस चुनाव चिन्ह से पहले लड़ चुके थे और वे अपना विरोध दर्ज कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. वह आज का जमाना नहीं था..

और इस तरह खत्म हो गया ‘लाल—हरे झंडे की मैत्री’ का ऐतिहासिक दौर.

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