हर जान की कीमत है

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एनकाउंटर सभ्यता के आवरण में छुपी सत्ता की बर्बरता है

पांच हजार से अधिक एनकाउंटर सिर्फ उत्तर प्रदेश में हाल के कुछ वर्षों में हुए हैं. उत्तर प्रदेश का मुकाबला अन्य राज्य नहीं कर सकते, लेकिन आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र सहित अन्य राज्यों से भी एनकाउंटर या पुलिस कस्टडी में मौत की खबर आती ही रहती है. इससे इतर माब लिंचिंग की घटनाएं. लेकिन अब इन सबसे हमारी चेतना में कोई सुगबुगाहट नहीं होती. मानवाधिकार की बात करना देशद्रोह है. और ऐसे कुछ देशद्रोहियों को छोड़ पूरा समाज मुठभेड़ों को एक सामान्य घटना समझ कर चल रहा है.

एक मोटी सी बात लोगों के समझ में नहीं आती कि किसी को अभियुक्त करार देना, उसके लिए अनुसंधान और फिर उसे दोषी करार दे कर सजा देना यदि व्यवस्था के एक ही अंग को सौंप दिया जाये, तो यह खतरनाक होगा. इसलिए हर सभ्य समाज में पुलिस और न्यायपालिका के अलग अलग अधिकार है. अपराधी को पकड़ना और अनुसंधान का काम यदि पुलिस करती है, तो साक्ष्यों को परख कर सजा देने का काम न्यायपालिका का है.

हर एनकाउंटर के बाद बहस यह चलती है कि एनकाउंटर फर्जी था या असली. हालांकि यह बहस बेमानी है. एनकाउंटर की अधिकतर घटनाओं में एक जैसी कहानी सामने आती है. कथित अपराधी पुलिसकर्मी से ही हथियार छीन कर भागता है, उस पर हमला करता है और प्रतिउत्तर की कार्रवाई में मारा जाता है. यह एक बार नहीं, लगभग हर बार की कहानी है. हर कोई जानता है कि एनकाउंटर फर्जी है. फिर भी एक पाखंड पूरी ईमानदारी से टीवी चैनलों और अन्य संचार माध्यमों में चलता रहता है.

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर कानून व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित रखने और विधि सम्मत शासन को सुनिश्चित करने के लिए गठित पुलिस बल किसी निहत्थे व्यक्ति को घेर कर क्रूरता से मार डालती है, यह कैसी न्याय व्यवस्था है? सभ्यता के क्रमिक विकास में हम यह कहां पहुंच गये हैं कि हमारे ही आस पास एक ऐसे हिंस्र पशु वृत्ति के ऐसे लोग घूम फिर रहे हैं, जो बेरहमी से किसी का खून कर सकते हैं और उसके बदले तमगा बटोरते हैं?

लेकिन हमारे लिए मौजू सवाल यह है कि लोग उसका समर्थन क्यों करते हैं?

इसकी पहली वजह तो यह है कि हमारे भीतर की मानवीय संवेदना निरंतर भोथड़ी होती चली गयी है. आजादी के संघर्ष के दिनों में या फिर आजादी के बाद के कुछ वर्षोें में देश में कही गोली भी चलती थी तो देश व्यापी हलचल होती थी. पुलिस कस्टडी में मौत या फिर एनकाउंटर की घटनाएं हमें उद्वेलित करती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं होता. इस तरह की अमानुषिक घटनाएं हमारी संवेदना की नोक को भोथड़ा कर रही है. हमें थोड़ा और अमानुष बना रही हैं.

लोगों का विश्वास न्याय व्यवस्था से उठ गया है. न्यायिक प्रक्रिया लंबी होती है और पैसे व ताकत के बल पर उसे और लंबा खींचा जा सकता है. अपराधी सामान्यतः छूट जाते हैं या बेल पर रह कर अपराध करते रहते हैं. ऐसे में आपराधिक कृत्यों से आक्रांत जनता को लगता है कि पुलिस ने एनकाउंटर करके ठीक ही किया. हमें नहीं भूलना चाहिए कि दसकों पूर्व भागलपुर के आंख फोड़वा कांड को अंजाम देने वाले पुलिस अधिकारियों के समर्थन में लोग सड़कों पर उतर गये थे.

एनकाउंटर आज की तारीख में एक राजनीतिक मसला भी बन गया है. भाजपा के राज्य में एनकाउंटर अधिक हो रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के राज्य में नहीं होते थे, यह नहीं दावा किया जा सकता. फर्क यह है कि अब योगी सार्वजनिक रूप से यह घोषणा करते हैं कि अपराधी उनके राज्य से चले जाये, वरना उन्हें खत्म कर दिया जायेगा. लेकिन यह जानना दिलचस्प होगा कि उनकी इस बात की घोषणा के बावजूद हाल में मारा गया विकास दुबे अब तक अपने अपराध का साम्राज्य कैसे चलाता आ रहा था?

कभी नक्सलवाद के खात्मे के नाम पर, कभी आतंकवाद को समाप्त करने के नाम पर, कभी अपराध के सफाये के नाम पर एनकाउंटर का सहारा लिया जाता है. और हर एनकाउंटर हमारी ही न्यायिक प्रक्रिया की धज्जियां उड़ाता है. पुलिस को या सुरक्षा बलों को यह इख्तियार देता है कि वह किसी को भी अपराधी के रूप में चिन्हित करे और उसे मार डाले. गौर से देखेंगे तो कुछ अपवादों को छोड़ कर एनकाउंटर के नाम पर मारे जाने वाले लोग वंचित जमात के लोग होते हैं.

कुछ वर्ष पूर्व आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि एनकाउंटर करने वाले पुलिसकर्मियों पर हत्या का मामला चलना चाहिए और खुद को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी उन्हीं की होनी चाहिए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि कस्टोडियन डेथ की मैजिस्ट्रेट से जांच होनी चाहिए. उनकी स्वतंत्र जांच सीआईडी या फिर किसी दूसरे थाने के सीनियर पुलिसकर्मियों से करानी चाहिए. लेकिन सामान्यतः जांच का काम उन्हें ही शौंप दिया जाता है जो एनकाउंटर के लिए जिम्मेदार होते हैं. मैजिस्ट्रेट की जांच की हकीकत यह है कि 2017 से अब तक उत्तर प्रदेश में जिन 74 मामलों की जांच की गयी, उन सबमें पुलिस को क्लियर चिट दे दिया गया.

यह संभव है कि पुलिस यदि कथित अपराधी को पकड़ने गयी हो तो दोनों पक्षों में गोलीबारी हो और दोनों पक्षों में लोग मारे जा सकते हैं. लेकिन कस्टोडियन डेथ, यानि कथित अपराधी पुलिस की हिरासत में हो और उसकी मौत हो जाये तो उसकी ज्म्मिेदारी पुलिस की होनी ही चाहिए. अपवाद स्वरूप यदि अपराधी के भागने और उसके हमले की घटना हो और वह मारा जाये तो उसकी सक्षम व स्वतंत्र एजंसी से जांच होनी ही चाहिए.

हमारे पास एक विस्तृत व लिखित संविधान है. हर तरह के अपराध और समाज विरोधी कार्यों के लिए सजा भी सुनिश्चित है. लेकिन अपराधी को चिन्हित करने, उसके खिलाफ अनुसंधान करने और उसे सजा देने का काम किसी एक संस्था का नहीं. पुलिस और अन्य जांच एजंसियों का काम अपराधियों को पकड़ना, उस पर लगे आरोपों की जांच करना और उसे अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना है. सजा देने का काम अदालतों का है. एक न्यायिक व्यवस्था है और उसमें एनकाउंटर का कोई प्रावधान नहीं.

दरअसल, इस देश में ‘हर जान की कीमत है’ का आंदोलन चलाने की जरूरत है.

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