छाता साग: आदिवासी जीवन से जुड़ी कोमल पत्तियां

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    इस बात को बहुत सारे लोग मानते हैं कि मानव जाति के विकास के क्रम में खाद्य-अखाद्य वनस्पतियों की पहचान में आदिवासियों ने अहम भूमिका निभाई है. वन संपदा, दवा के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली सैकड़ों किस्म की जड़ी-बूटियों की खोज और उन्हें बचाने का काम आदिवासी समाज ने ही किया है. इसलिए प्राकृतिक आपदाओं और महामारियों को भी आदिवासी समाज झेल लेने की कुव्वत रखता है. बस, जल, जंगल, जमीन पर उसका अधिकार बना रहे, वह जीने का रास्ता खोज लेता है.
    उदाहरण के लिए कई तरह के साग -सब्जी हम सभी खाते हैं. सागों का सभी के जीवन में उपयोग है. उन्हें विटामिन से भरपूर माना जाता है. लेकिन सामान्यतः सागों के रूप में हम उन्हीं सागों का इस्तेमाल करते हैं जिनकी मौसम के हिसाब से खेती होती है. पालक, गांधारी, भथुआ, मेथी, चना का साग आदि. लेकिन आदिवासी समाज इन प्रचलित सागों के अलावा कई ऐसे सागों का भी इस्तेमाल करता है जिसकी वह खेती नहीं करता, बस उसे प्रकृति पैदा करती है और वह भी सहज सुलभ है. ऐसा ही एक साग है छाता साग. मैंने गुगल में इसके बारे में पता लगाने की कोशिश की, लेकिन कुछ पता नहीं चला. इसलिए जितनी जानकारी मुझे है, वह यहां रख रहा हूं.
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    छाता साग मार्च-अप्रैल के इन्हीं महीनों में स्वतः जमीन से फूट पड़ता है. कोमल सा तना और उस पर तीन नन्हीं-नन्हीं पत्तियां. धान के खेतों में धान कटने के बाद पानी रहता है. पानी के सूखते ही नम जमीन पर दुनियां भर के खर पतवार निकल पड़ते हैं. धरती पर एक हरी चादर बिछ जाती है. जाहिर है, वह उन्हीं खेतों या उसके आस पास पैदा होती है जहां धान कटने के बाद जमीन परती छोड़ दी जाती है. उन इलाकों में नहीं, जहां धान कटने के बाद कुछ ही दिनों के अंतराल पर गेंहू या कोई अन्य फसल लगा दी जाती है.
    तो, बेशुमार उगे उन खर पतवारों से खाने योग्य कई पौष्टिक व सुस्वादु साग आदिवासी समाज ढ़ूढ निकालता है. उन्हीं में से एक है छाता साग. हालांकि, उन्हें पहचान कर तोड़ना एक कठिन काम है. सामान्य घरों की औरतें तो अब पीढ़े के बगैर बैठ ही नहीं सकती ज्यादा देर, और उस साग को तोड़ कर इकट्ठा करने में काफी समय लगता है. कोई लड़की एकाध घंटे धीरज और लगन से पत्ते तोड़ने का काम खेतों में बैठ कर कर सके, या लगातार झुक कर कर सके, तभी एक शाम के लिए साग इकट्ठा हो पाता है.
    आदिवासी लड़कियां या औरतें यह काम बहुधा दो चार लोगों के साथ मिल कर करती हैं. आपस में बतियाते, कभी-कभी कुछ गुनगुनाते हुए भी. और कुछ घंटों में इतना साग इकट्ठा कर लेती हैं जिससे छोटे परिवार के लिए एक शाम की सब्जी हो जाये. वैसे, उन पत्तियों को सुखा कर पाउडर बना कर भी खाने का रिवाज है. और यह सिलसिला उस वक्त तक जारी रहता है जब तक धान की अगली फसल के लिए खेतों को जोत नहीं दिया जाता.
    यह साग इस मौसम में घर की क्यारियों और गमलों में भी उग आता है. लेकिन गैर आदिवासियों के लिए इसका मोल नहीं. यदि बाजार में यह बिकने लगे तो शायद लोग खरीद कर इसे खायें, लेकिन बहुतायत से होने के बावजूद इसे तोडना आसान नहीं और तोड़ कर बेचना व्यावसायिक रूप से फायदेमंद नहीं. इसलिए यह साग आदिवासी समाज के लिए बचा हुआ है और कठिन समय में उनके काम आता है और उनके भोजन को जायकेदार बनाता है.

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