खूंटी के दमन  की कहानी, जनता की जुबानी

गत एक वर्ष से झारखंड का खूंटी जिला पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है. यह मुंडा आदिवासियों का क्षेत्र है और ‘अबुआ दिसोम, अबुआ राज’ के लोकप्रिय नारे को गढ़ने और अपने समय के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी ताकत ब्रिटिश हुक्मरानों से लड़ने वाले वाले बिरसा मुंडा की कर्म भूमि. इस जिले के एक गांव ‘उलिहातु’ बिरसा मुंडा की जन्मस्थली है और उनके प्रति श्रद्धा सुमन चढ़ाने वालों का आना जाना बना रहता है.
लेकिन इस बीच खूंटी अपने पत्थरगड़ी आंदोलन की वजह से चर्चा में है. जल, जंगल, जमीन को बचाने का संघर्ष झारखंड में सतत रूप से चलता रहा है और पत्थरगड़ी आंदोलन इसी संघर्ष का एक रूप है. लेकिन खनिज संपदा से भरपूर झारखंड की जमीन को औने-पौने दामों में कारपोरेट को बेचने/देने में लगी भाजपा सरकार को यह चुनौती बर्दाश्त नहीं हुई और आदिवासी जनता के मनोबल को तोड़ने के लिए मीडिया के साथ मिल कर उसने इस आंदोलन के खिलाफ एक सुनियोजित अभियान चलाया. इसी वर्ष कथित रूप से इस जिले के घाघरा गांव में बलात्कार की एक घटना हुई और बलात्कारियों को पकड़ने के नाम पर हजाारों की संख्या में वहां पुलिस और अर्धसैनिक बलों को उतार दिया गया. पत्थरगड़ी आंदोलन से जुड़े लोगों की बर्बर पिटाई हुई. प्रतिक्रिया स्वरूप ग्रामीण जवानों के भ्रम में सांसद कड़िया मुंडा के सुरक्षा गार्डो को अपने साथ पकड़ ले गये. अब यह गांव और आंदोलनकारी न सिर्फ बलात्कारी बना दिये गये, बल्कि सुरक्षा गार्डो का अपहरण करने वाले खूंखार आतंकवादी भी. और उनसे निबटने के नाम पर पूरे इलाके को पुलिस छावनी में बदल दिया गया है.
अब तक इस प्रकरण में आप सबों ने पुलिस-प्रशासन के हवाले छपी खबरों को ही देखा सुना है. इस क्षेत्र की जनता का पक्ष और उनकी व्यथा किसी ने सुनने की जरूरत ही नहीं समझी. एक चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार अपने निहित स्वार्थों के लिए, कारपोरेट का हित साधने के लिए आदिवासी जनता के साथ किस बर्बर तरीके से व्यवहार कर सकती है, इसका एक उदाहरण बन गया है खूंटी.
खैर, इसी बीच इस आतंक से निकल कर ग्रामीणों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को एक आवेदन भेजा है जिसके लिए करीबन सात हजार ग्रामीणों से हस्ताक्षर या अंगूठे का ठेपा लिया गया. इस आवेदन से आप निरीह जनता के साथ हुई पुलिस बर्बरता और उस पुलिसिया खौफ का अंदाजा लगा सकते हैं. उस पत्र को हम आपके समक्ष हूबहू प्रस्तुत कर रहे हैं. सिर्फ भाषाई दृष्टि से यहां वहां कुछ सुधार किये गये है.

” सेवा में,
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,
मानवाधिकार ब्लाॅक, सी॰जी॰पी॰ओ॰, कम्पलेकस, आई॰एन॰ए॰, नई दिल्ली -ं110023
विषय-ंआदिवासियों के सामाजिक समारोह में हुए पुलिस जुल्म के सम्बन्ध में.
महाशय,
सविनय निवेदन यह है कि दिनांक 26-ं27 जून 2018 को खूंटी प्रखण्ड के घघरा गाॅव में पत्थलगङी का आयोजन किया गया था. इसमें खूंटी जिला के खूंटी, मुरहू, अङकी, तोरपा एवं कर्रा प्रखण्ड के कई गावों से ग्रामीण उपस्थित थे. इसमें शांतिपूर्वक घघरा गांव के सीमान पर पत्थलगङी किया गया जिसमें भारत के संविधान की 5वीं अनुसूचि में प्रदत प्रावधानों को लिखा गया. इस प्रकार का पत्थलगङी 2001-ं2002 ई॰ में भी भारत सरकार के सचिव डा॰बी॰डी॰ शर्मा के नेतृत्व में खूंटी जिला के तोरपा, कर्रा, मुरहू प्रखण्ड के कई गांवों में किया गया था.
पत्थलगङी की खुशियाली व सांस्कृतिक कार्यक्रम के बीच भारत के संविधान की 5वीं अनुसूचि में प्रदत्त शक्तियों के बारे में ग्रामीणें को वक्तागण जानकारी दे ही रहे थे कि खूंटी पुलिस आई और हमारे कार्यक्रम को रोक दिया. हमसे कहा गया कि हम कोचांग कांड़ से जुड़े जोन जुनास तिड़ू और बलराम समद को उनके हवाले कर दें. हमने पुलिस को उत्तर दिया कि यहां इस नाम का कोई व्यक्ति नहीं है. पुलिस उन्हें कोचांग क्षेत्र में जाकर खोजे, हमें परेशान न करे. यह सुनकर पुलिस वापस लौट गई. थोड़ी देर मेें सभा स्थल में सूचना मिला कि सभा स्थल में आ रहे लोगों को पुलिस रोक रही है तथा उनसे मारपीट कर रही है. वास्ताविक का पता लगाने के लिए 20-ं25 लोगों को पत्थलगड़ी स्थान से अनिगड़ा (चन्डीडीह) जो, 2 किमी की दूरी पर अवस्थित है, भेजा गया. तब तक 5 बस से पुलिस अनिगड़ा, चन्डीडीह गांव पहॅुच चुकी थी. उन लोगों ने पत्थलगड़ी स्थल से चन्डीडीह भेजे गए 20-ं25 लोगों से मारपीट की और उनमें से अधिकतर को घायलावस्था में ही पकड़ कर अपने साथ ले गई. यह खबर सभा स्थल में दिया गया तो सभी लोग घटनास्थल पर गए. तब तक पुलिस वहां से बस में सवार हो कर चली गई थी। एक जवान बस में नहीं चढ़ सका. वह खूंटी के संसद कड़िया मुण्डा के घर में घुस गया.
चूंकि पुलिस गांव के निर्दोष लोगों के सथ बेबजह बर्बरता पूर्वक पेश आई थी एवं गाली गलौच किया था, इससे ग्रामीण नारज एवं उत्तेजित थे और वे सांसद ़के घर में छिपे पुलिसकर्मियों को शांतिपूर्वक सभा स्थल पर ले गए. हमारा मकसद केवल इतना था कि प्रशासन हमसे बातचीत करने के लिए सभा स्थल पर आए, ताकि थाना में पकड़ कर रखे गए लोगों को मुक्त कराने का प्रस्ताव हम रख सकें.
परन्तु हमारी सोच के विपरित 4000 से भी अधिक संख्या में पुलिस घघरा गांव आई, ग्रामीण जनता के साथ गाली-गलौच करते हुए अंधा-ंधुंध लाठी बरसाने लगी एवं गोली चलाने लगी. इस गोली से एक व्यक्ति मारा गया जिसका नाम बिरसा मुण्डा था. वह चमड़ी प्रखण्ड के एक गांव का रहने वाला था. पहले तो पुलिस ने उसे दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, फिर सर में मारा और जब वह गिर गया तब उस पर 3 गोली मारी. गोली मारने के बाद रायफल में लगी संगीन से अनगिनत बार गोद दिया गया. इसके बाद उसके पैर को पकड़ कर अधमरी अवस्था में करीब 100 मीटर तक घसीट कर ले जाया गया. कुछ देर में वहीं मर गया. तब पुलिस वाहन में उसे
चादर में बांध कर कर खूंटी ले गए. उसका पोस्ट-ंमार्टम तक शायद नहीं किया गया. हमारे गांव के लोगों को बाद में वहां से राइफल के तीन खोखे मिले, जिसका नम्बर एक समान है. इसका अर्थ हुआ कि वह किसी एक ही राइफल की गोली का खोखा है, जिसका नम्बर इस प्रकार है- डी एफ भी-ं 16 एम एम-ं5.56.
दूसरे गांव के बिरसा मुण्डा, उम्र 30 वर्ष, गांव चिरूबेडा, प्रखण्ड तमाड़, जिला रांची, पर पुलिस ने गोलियां चलायी जिससे एक गोली दाहिनें हाथ में लगी है. दूसरी गोली दाहिने जांघ में लगी, जिससे पैर का नश टूट गया है. वह बहुत मुश्किल से चल पाता है. गोली लगने के बाद वह किसी तरह हिम्मत जुटा कर चकोड़ -हजयाडी की ओर भागा और -हजयाडी में ही बेहोश होकर गिर गया था. कुछ समय बाद होश में आया. किसी तरह हिम्मत जुटा करीब से जा रही दो लड़कियों को आवाज दी. उन्होंने उसे सहयोग कर खूंटी तमाड सड़क के किनारे रानी किन बुरू नमाक स्थान तक पहंुचाया. वहां से वह अपने मेहमानों के घर गया. दूसरा दिन अपने गांव पहुंच कर गोली निकलवाया. बाद में देशी जड़ी-बूटी से इलाज किया. आज तक घाव का निशाना तथा जांघ में लगी गोली उनके पास है.
सभा स्थल को पुलिस ने चारों ओर से घेर लिया था. चारों ओर से अन्धा धुंध आदिवासियों को बेरहमी से पीटा गया. गर्भवती महिलाओं व बीमार व्यक्तियों को भी नहीं छोडा गया. कई लोगों का दरवाजा तोड़ा गया एवं छतों को उजाड. दिया गया. खाद्य पदार्थ को छितरा कर नष्ट कर दिया गया. सभा स्थल में पकाए गए भोजन को तहस नहस कर दिया. सभा स्थल में मेहमानों के लिए भोजन पकाने के लिए भाड़ा से लाये गये टेन्ट, कुर्सी, टेबल, साउण्ड सिस्टम को नष्ट कर दिया. अनिगिनत मोटर साईकिल, ओटों रिक्सा, चार पहिया वाहनों को क्षति गस्त किया जिससे लाखों का नुकसान आदिवासियों को हुआ.
घटना के बाद बेगुनाह लोगों पर देशद्रोह का केस दायर किया गया है. कई लोगो को जेल भी भेज दिया गया. सरकार अरोप लगाती है कि आदिवासी पत्थलगड़ी कर संविधान की गलत व्याख्या कर रहे हैं. पत्थलगड़ी आंदोलन को कमजोर करने के लिए कोचांग में हुए गैगरेप घटना से जोड कर हमारे कई लोगों के उपर -झूठा मुकदमा चला रही है और कई बेकसूर गरीब ग्रामीण आदिवासी को जेल भेज दिया गया है.
पुलिस प्रशासन ने गरीब आदिवासियों के घरों को तोड़ दिया है. पत्थलगड़ी नहीं करने की धमकी देकर जबदस्ती बाउंड लिखवा रही है पुलिस. आदिवासियों को गांव-ंगांव से थाना ले जा रही है और आगे पत्थलगड़ी नहीे करने का वाउण्ड लिखवा रही है.जून 26, 27 की घटना के बाद भी लगातार पुलिस फोर्स गांव में लोगों के उपर भय एवं आतंक फैलाने के लिए आती रहती है. सरकार पत्थलगड़ी को कमजोर करने के लिए सड़क के किनारे-ंकिनारें बडे -ं बडे पोस्टर लगा रही है और पत्थरगड़ी को अपराध बता रही है लेकिन निवेदक के रूप में अपना नाम नहीं दे रही है.
इन सभी घटना का सबूत फोटों एवं विडियों के रूप में मौजूद है.
आठवें दिन विपक्ष के नेतागण ग्रामीणों से मिलने के लिए घाघरा गांव आए, परन्तु सुबह में ही पुलिस और भाजपा के लोगो ने गांव में रह रह गई कुछ महिलाओं को भी डरा धमका कर गांव छोडने के लिए मजबुर कर दिया, ताकि सच्चाई का पता विपक्षी नेताओं को न लग सके.
अतः आप से पूरे बारूडीह गांव के सभी लोगों नम्र निवेदन करते है कि एक जांच की टीम बना कर स्वतंत्र रूप से जांच कर हमें न्याय दिलाने तथा दोषी लोगों पर कानूनी करवाई करने की कृपा की जाय.”khuti applicationयह पूरा प्रकरण मेरी नई किताब ‘झारखंड के आदिवासियों का संक्षिप्त इतिहास’ में शामिल है.

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उनके प्राण जंगल में बसे हैं, निकल कर कहां जायेंगे!

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हमारे देश में ऐसे अनेक आदिवासी समुदाय हैं जो आज भी जंगलों में ही निवास करते हैं और केवल बेहद जरूरी आवश्यकताओं के लिए पहाड़ से नीचे उतरते हैं. ऐसी ही एक आदिम जनजाति है डोंगरिया कौंध जो रायगढ़ा जिले के पर्वत श्रृंखला में बसे हैं. वे नियमगिरि को ही अपना भगवान मानते हैं, पहाड़ों की ढलानों पर जो पैदा कर सकते हैं, उसे ही खाते हैं या उसे नीचे के कस्बों में बेच कर जीवन की अन्य मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करते हैं. लेकिन अपना उत्पादित माल – अन्नानास, आम, कटहल, अमरूद, शरीफा, बैगन, बरबट्टी आदि – बेच कर वापस अपने पहाड़ों में दिन ढ़लने के पहले लौट जाते हैं. वे पहाड़ों के झरने का ही पानी पीते हैं. यदि उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले के आलोक में जंगलों से बेदखल किया जाता है तो वे कहां जायेंगे? कैसे जीयेंगे?

वैसे, नियमगिरि में बसे डोंगरिया कौंध समुदाय के जीवन और संघर्श का मामला अंतरराश्ट्रीय रूप से चर्चित हो चुका है. आंध्र प्रदेश के विशाखापटन से शुरु हो कर ओड़िसा के कालाहंडी जिले तक लगभग 250 किमी लंबी पर्वतमाला है नियमगिरि. जैव विविधता से भरी इस पर्वत श्रृंखला के शिखरों पर रहते हैं डोंगरियां कौंध आदिवासी और नीचे की पहाड़ियों पर, झरनों के करीब रहते हंै झरनियां कौंध. ठीक -ठीक कितनी आबादी, यह बताना मुश्किल है. कुल 112 गांवों में रहते हैं डोंगरियां कौंध. गांव अमूमन छोटे छोटे. दस से बीस घरों के. आबदी आंदोलनकारियों के अनुसार बारह हजार के करीब. कहीं काम करने यह समुदाय बाहर नहीं जाता. प्रकृति के साहचर्य में रहता है और प्रकृति द्वारा प्रदत्त वन संपदा व मेहनत से उगाई गई फल सब्जियों पर निर्भर है. इसलिए आबादी घट नहीं रही. कुछ बढ ही रही है. और सबसे घनी आबादी रायगढा जिले में है.

जिस उंचाई पर ये रहते हैं, उन तक पहुंचना दुश्कर कार्य. पहाड़ के बगल से सड़क से गुजरते हुए यह कल्पना करना भी कठिन की पहाड़ के शिखरों पर समतल क्षेत्र भी हो सकता है. लेकिन लंबी पहाडी श्रृंखला की उंचाई पर कई ऐसे
छोटे बड़े समतल क्षेत्र हैं जिन पर गांव बसे होते हैं. विडंबना यह कि उन समतल पहाड़ी क्षेत्रों में ही बाॅक्साईट के भंडार हैं. और जैसे दक्षिण अफ्रिका की खनिज संपदा ही उसका काल बन गया था किसी जमाने में, उसी तरह ये
खदान ही डोंगरियां आबादी के लिए मुसीबत बन गया है. दुनियां भर की देशी विदेशी कंपनियों के आकर्शण का केंद्र है बाॅक्साईट के ये खदान.

वेदांता कंपनी के इस इलाके में आने के पहले काशीपुर इलाके में अनेक कंपनियां आई और एक लंबा संघर्श आदिवासियों ने उनके खिलाफ किया. लेकिन दमन के जोर से वहां काम शुरु हो गया और आंदोलनकारियों को वहां से खदेड़ दिया गया. 2002-03 में वेदांता कंपनी आई और ओड़िसा सरकार ने भूमि अधिग्रहण की
कोशिशें शुरु की. ग्राम सभा ने विरोध किया, लेकिन तत्कालिन जिला कलक्टर शाश्वत मिश्रा ने सरकार को रिपोर्ट यह भेजी की ग्राम सभा ने प्रस्ताव का अनुमोदन किया है. लगभग सभी राजनीतिक दल का समर्थन वेदांता को था. बावजूद विरोध जारी रहा. सरकार और कंपनी ने रणनीति यह बनाई कि जोर जबरदस्ती से ही सही, जितनी भी जमीन हासिल हो, उस पर काम शुरु हो जाये. बाउंडरी की दीवार खड़ी हो जाये. कुछ दलाल लोगों के माध्यम से लोगों को भरमाया जाये. और इस तरह लांजीगढ में वेदांता कारखाना लगाने में सफल हो गई.

इस क्रम में नियमगिरि सुरक्षा समिति के नेतृत्व में खनन के विरोध में आंदोलन चलता रहा. कई अन्य संगठनों का समर्थन इस आंदोलन को मिला. एक जमाने में छात्र युवा संघर्श वाहिनी में रहे और गंधमार्दन में खनन विरोधी
आंदोलन का नेतृत्व करने वाले भक्तचरण दास कांग्रेस में शामिल हो गये थे और उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व, खास कर राहुल गांधी को कनविंस किया कि यदि कांग्रेस आदिवासियों के बीच पैठ फिर से बनाना चाहती है तो उसे नियमगिरि
के आंदोलन का समर्थन करना होगा. पर्यावरण मंत्रालय ने वेदांता के प्रस्ताव पर रोक लगा दी. आंदोलनकारियों का एक अन्य खेमा मामले को कोर्ट में ले गया और इस वातावरण में सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुना दिया
कि पहले आदिवासी जनता के बीच रायशुमारी करें, उसके बाद ही इस दिशा में आगे बढें.

कोर्ट के फैसले से 2013 में जिला जल की उपस्थिति में बारह गावों में ग्राम सभा की बैठकें आयोजित की गई और सभी ग्राम सभाओं ने एक सिरे से खनन के प्रस्ताव को यह कह कर खारिज किया कि नियमगिरि हमारे भगवान और जीविका का साधन हैं. हम किसी कीमत पर नियमगिरि क्षेत्र में खनन होने नहीं देंगे.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के आलोक में नियमगिरि में बसे इन इन निर्दोष आदिवासियों का क्या होगा, यह कहा नहीं जा सकता.

अंग्रेजों से भी बेरहम साबित हुई हमारी न्यायपालिका

IMG_0195कुछ लोग इस भ्रम में रहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट या हमारी न्याय व्यवस्था भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी काशी नगरी जैसी न्यारी और भिन्न व्यवस्था है, जबकि यह बारहा सिद्ध हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट शोषण और विषमता पर टिकी हमारी इस लोकतांत्रिक प्रणाली का ही हिस्सा है. झारखंड के नगड़ी में चले आंदोलन के प्रति उसके रवैये से इसका अंदाजा तो लगा था, 16 राज्यों के करीबन ग्यारह लाख आदिवासियों को जंगल से बेदखल करने के सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से इसी बात की एक बार और पुष्टी होती है. भारतीय सभ्यता और संस्कृति के जानकार इस बात को जानते हैं कि आदिवासियों का सदियों से जंगल पर एकाधिकार रहा है. उनकी पूरी अर्थ व्यवस्था ही खेती और जंगल पर मिल कर बनी और चलती रही है और अंग्रेजों के आने के पूर्व कभी किसी ने उनके इस अधिकार को चुनौती भी नहीं दी.
1765 में नवाब मीर कासिम की पराजय के बाद हुए समझौते में बंगाल, बिहार और ओड़िशा की दिवानी अंग्रेजों को प्राप्त हुई. छोटानागपुर उस वक्त बिहार का हिस्सा था. प्रारंभ के तीन चार वर्षों में अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में कोई दखलंदाजी शुरु नहीं की, लेकिन कैप्टन कैमक ने इस क्षेत्र में प्रशासनिक अधिकार प्राप्त करने के बाद 1769 में प्रशासनिक व्यवस्था कायम करने का प्रयास शुरु किया. इस पूरे इलाके में जमींदारी प्रथा शुरु की. औद्योगिक क्रांति और रेल पटरियां बनाने और बिछाने के क्रम में उन्होंने जंगल के महत्व को समझा और जंगल पर भी जमीन की तरह अपना एकाधिकार माना. आदिवासी बहुल इलाकों में जमींदारों, ठेकेदारों का प्रवेश हुआ और आदिवासियों का अधिकार जंगल पर से छिनता गया. लकड़ी का व्यावसायिक उपयोग शुरु हुआ तो उसकी अंधाधुंध कटाई भी शुरु हो गई और फिर जंगल बचाने के नाम पर अंग्रेज सरकार को जंगल पर अधिकार कायम करने का अवसर मिल गया. आरक्षित वनों के नाम पर जंगल का बड़ा हिस्सा उनके कब्जे में चला गया.
बावजूद इसके 1902-8 के सर्वे सेटलमेंट के वक्त जंगल पर आदिवासियों के परंपरागत अधिकार निम्न रूप में चिन्हित किये गये- अपना घर बनाने के लिए या उसकी मरम्मत के लिए लकड़ी काटने का अधिकार, कृषि औजार, हल आदि बनाने के लिए लकड़ी काटने का अधिकार, जंगल में मवेशी चराने या घास काटने का अधिकार, महुआ और अन्य फलदार वृक्षों से गिरने वाले फलफूल को चुनने का अधिकार. जंगल में बसे आदिवासी गांवों को उजाड़ने का और आदिवासियों को जंगल से बेदखल करने का क्रूर विचार तो विदेशी हुक्मरानों को भी नहीं आया था. यह विचार तो कारपोरेट पोषित इस व्यवस्था की न्यायपालिका को ही आया है.
यहां यह जिक्र करना प्रासांगिक होगा कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी उनके बनाये जंगल संबंधित कानून लगभग जारी रहे. एक बड़ा बदलाव 2006 में केंद्र सरकार द्वारा पारित वन अधिकार कानून से आया, जिसके तहत आदिवासियों या पारंपरिक रूप से जंगलों में निवास करने वालों के प्रति किये गये ऐतिहासिक अन्याय देखते हुए जंगल में रहने वाले प्रत्येक परिवार को 4 एकड़ भूमि देने का प्रावधान किया गया. इसके बाद ही सिर्फ झारखंड में ग्रामसभा के अनुमोदन पर 107187 आदिवासी परिवार एवं 3569 अन्य पारंपरिक वन्य निवासी के जमीन के पट्टे के लिए सरकार के समक्ष दावा पेश किया गया था. पूरे देश में अनुमानता 1127446 आदिवासी एवं अन्य वन निवासियों ने वनभूमि पर नये अधिनियम के तहत दावे पेश किये थे जो अब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से खारिज हो गये और उन लाखों आदिवासियों पर अपने निवास से उजड़ने का खतरा मंडरा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का वनों की हिफाजत या पर्यावरण की सुरक्षा से कोई वास्ता नहीं. यह तो स्वयंसिद्ध है कि जंगल आज देश में उन्हीें जगहों पर बचे हैं, जहां आदिवासी बसे हुए हैं. क्योंकि आदिवासी ही इस बात को समझते हैं कि प्राकृतिक जंगल उगाये नहीं जा सकते, खुद बनते हैं. आदिवासियों ने अपनी सामाजिक व्यवस्था के तहत कुछ बंदिशें स्वं पर लगा रखी हैं. इन बंदिशों के तहत महुआ, आम, करंज, जामुन, केंद, आदि के वृक्ष वे नहीं काटते हैं. सखुआ के पेड़ की बंदिश यह कि तीन फीट छोड़ कर ही उसे काटना है. वे जलावन के लिए हमेशा सूखे पेड़ ही काटते हैं. इसलिए जहां वे हैं, वहां जंगल बचे हुए हैं. लेकिन जहां वे नहीं, वहां जंगल का नामोनिशान मिट चुका है.
सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला वनो से आदिवासियों को उजाड़ वन क्षेत्र को कारपोरेट को देने का रास्ता प्रशस्त करने वाला है. दरअसल, बाॅक्साईट के तमाम खदान विशाखापटनम से रायगढ़ा तक फैले नियमगिरि पर्वतमाला क्षेत्र में हैं. झारखंड में यूरेनियम और सोने के नये खदान वन क्षेत्र में हैं. इन सभी इलाके आदिवासियों के प्राकृतिक निवास क्षेत्र हैं और इस पूरे इलाके में खनन के खिलाफ आदिवासी आंदोलनरत हैं. राजनीतिक कारणों से सरकारें इन आंदोलनों के सामने झुकती रही है. सुप्रीम कोर्ट ने परोक्ष रूप से कारपोरेट जगत को मदद करने की दृष्टि से यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है.
इस फैसले का भयानक असर आदिवासी जन जीवन पर पड़ने वाला है, क्योंकि जंगल से खदेड़े जाने पर वे न सिर्फ अपने परंपरागत निवास स्थल से वंचित हो जायेंगे, बल्कि उनके जीवन का आधार ही छिन जायेगा. आदिवासी अर्थ व्यवस्था पूरी तरह कृषि आधारित नहीं. कुछ महीनें यदि वे खेती पर निर्भर रहते हैं तो कई महीनें जंगलोत्पदों पर. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से लाखों आदिवासियों का जीवन संकट मे ंपड़ गया है.
क्या आदिवासी सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले को आसानी से स्वीकार कर लेंगे? कहना मुश्किल है. मान कर चलिये कि इसका सर्वत्र विरोध होगा. और इस बार सरकारें न सिर्फ कारपोरेट के लठैत के रूप ‘देशप्रेम’ से लबरेज सुरक्षाकर्मियों के साथ अपनी ही जनता के मुकाबिल मौजूद रहेंगी, बल्कि उनके हाथ में सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला भी होगा.

‘मानवाधिकार ‘का’ मोल’ समझें

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संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1948 में ‘10 दिसंबर’ को ‘मानवाधिकार दिवस’ घोषित किया है. यह अवसर है कि हम अपने देश में मानवाधिकार की मौजूदा स्थिति पर गौर करें और उस पर मंडरा रहे संकट को चिन्हित कर प्रतिकार के उपायों पर संगठित होकर विचार करें. हमें दो बातें याद रखनी चाहिए- मानवाधिकार के तहत विश्व मानव आज जिन अधिकारों का उपभोग कर रहा है, वे उसे सहज रूप से प्राप्त नहीं हुए हैं. उसके लिए हजारों वर्षों तक मनुष्य जाति को संघर्ष करना पड़ा और कुर्बानियां देनी पड़ी. और यह कि मानवाधिकार के नाम पर जो अधिकार आज उन्हें प्राप्त हैं, वे बची रहें, उसके लिए उन्हें सतत सचेष्ट भी रहना पड़ेगा. वरना वे कपूर की तरह उड़ जायेंगी.
क्या हैं वे मानवाधिकार? मूल रूप से कहें तो मानवाधिकार मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार है, जिनमें शामिल हैं- आजादी और समानता का अधिकार, भेदभाव से मुक्ति का अधिकार, जीवन का अधिकार, दास-प्रथा पर प्रतिबंध, शारीरीरिक यातना और उत्पीड़न से मुक्त रहने का अधिकार, कानून के समक्ष एक व्यक्ति के रूप में पहचान और समानता का अधिकार, देश निकाला और मनमानी गिरफ्तारी से मुक्त रहने का अधिकार, जब तक अपराध प्रमाणित न हो जाये, तब तक निर्दोष माने जाने का अधिकार, निजता का अधिकार, देश के बाहर और भीतर विचरण का अधिकार, विदेश में शरण लेने का अधिकार, राष्ट्रीयता और उसे चुनने का अधिकार, विश्वास और धर्म चुनने का अधिकार, विचार अभिव्यक्ति और सूचना प्राप्त करने का अधिकार, शांतिपूर्ण जमावड़ा और संगठन बनाने का अधिकार, निष्पक्ष चुनाव में भाग लेने का अधिकार, सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, इच्छित काम और ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, संस्कृति और सामुदायिक जीवन का अधिकार. आदि, आदि.
क्या आज ये सहज सुलभ दिखने वाले अधिकार सबों को हमेशा से प्राप्त रहे हैं? या आज भी गरीबी और विषमता से आक्रांत मनुष्यों की एक विशाल आबादी के लिए ये सुलभ हैं? इतिहास के पन्ने हमे उन बर्बर युगों में ले जाते हैं जब मुट्ठी भर कुलीन तबका इनका उपभोग करता था और विशाल आबादी कीड़े मकोड़ों जैसा जीवन व्यतीत करने के लिए अभिशप्त थी. व्यक्तिगत आजादी एक दुर्लभ अवधारणा थी और मनुष्य द्वारा मनुष्यों को गुलाम की तरह खरीदा और बेचा जाता था. यह बहुत पुरानी बात भी नहीं कि जब यूरोप और अमेरिका के जहाजी बेड़े दक्षिण अफ्रिका से काले लोगों को मवेशियों की तरह हांक कर और बेड़ियों में जकड़ कर ले जाते थे और अमेरिका व यूरोपीय देशों के बंदरगाहों पर उनकी नीलामी होती थी. उन गुलामों को खेतों में जोता जाता था. और यदि किसी ने भागने की कोशिश की तो उन्हें भीषण यातनायें देने और यहां तक कि मार देने तक का कानूनी अधिकार उनके मालिकों को प्राप्त था. एक सामान्य धारणा है कि औद्योगिक क्रांति के लिए पूंजी का निर्माण कालों के श्रम के निर्मम शोषण से ही हुआ था. और यह सब 1948 तक होता रहा, जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने कानून बना कर दास प्रथा का अंत नहीं किया.
भारत में दास-प्रथा नहीं थी, लेकिन यहां की वर्ण- व्यवस्था ने एक विशाल आबादी को गुलामो से भी बदत्तर अवस्था में पहुंचा दिया था. वर्ण व्यवस्था के चैथी श्रेणी में रखे गये शूद्रो को मानवीय जीवन का कोई अधिकार नहीं था. वे मनुष्य से एक दर्जा नीचे जीने के लिए मजबूर थे. जीवन के संसाधनों पर उनका हक नहीं, शिक्षा का उन्हें अधिकार नहीं, हथियार वे नहीं रख सकते थे. वे सिर्फ उच्च जातियों की सेवा के लिए बने थे. उनका श्रम भी उनका नहीं था. दलितों में भी ऐसे दलित भी थे जो नागर समाज से दूर रहते और सफाई कर्म के लिए नगर में प्रवेश करते तो उन्हें गले के ढ़ोल को बजा कर यह सूचना देनी पड़ती थी कि वे वहां से गुजर रहे हैं, उनकी छाया किसी पर न पड़े, इसके लिए सावधान हो जायें. उनकी स्त्रियां सामंतों के भोग का सामान थी, देश के कई हिस्सों में तो दलित महिलाओं को शरीर के उपरी हिस्सों को नंगा रखने की व्यवस्था थी.
ल्ंाबे संघर्ष और आंदोलनों के बाद आजाद भारत के लिए हम ऐसे संविधान का निर्माण करा सके जिसमें सबके लिए समता, न्याय और आजादी की उद्घोषणा संभव हो सकी. भारत एक धर्म निरपेक्ष समाजवादी गणतंत्र बन सका, जिसमें सभी के लिए वगैर भेदभाव के समता और न्याय का अधिकार था. जिसमें संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा उद्धोषित तमाम मानवाधिकारों को शामिल किया गया था.
ल्ेकिन आजादी के बाद जिस तरह गरीबी और विषमता बढ़ी है, उसने तमाम मानवाधिकारों को बेमानी बना कर रख दिया है. यह सही है कि एक अलग सामाजिक आर्थिक व्यवस्था और अपने इलाके में जल, जंगल, जमीन पर अधिकार होने की वजह से देश में आदिवासियों की स्थिति दलितों से बेहतर थी, लेकिन औद्योगीकरण का दौर शुरु होने के साथ उनके इलाके में खनिज संपदा के साथ-साथ जल, जंगल, जमीन पर भी आक्रमण शुरु हुआ और विस्थापन का वह दौर शुरु हुआ जिसने आदिवासियों की सदियों से चली आ रही सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को तहस-नहस करके रख दिया. देश की एक तिहाई आबादी यदि गरीबी रेखा के नीचे अमानवीय परिस्थितियों में जी रही है तो उसमें एक बड़ी आबादी आदिवासी और दलितों की है. और जब उन्होंने प्रतिरोध करना शुरु किया तो मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ा कर उनके प्रतिरोध को कुचलने का सिलसिला चल पड़ा.
वगैर किसी ठोस आधार के गिरफ्तारी, हाजत में कई-कई दिनों तक रख कर टार्चर करना, किसी को मार डालना, मुठभेड़ के नाम पर हत्या, बिना किसी सुनवाई बरसों जेल में बंद रखना, देश के कई हिस्सों में आतंकवाद का हौवा खड़ा कर विशेष सैन्य कानूनों द्वारा मानवाधिकारों का हनन एक सामान्य प्रक्रिया हो गई है और इसके शिकार सामान्यतः गरीब लोग होते हैं, आदिवासी, दलित, औरत व अल्पसंख्यक होते हैं. और यह सिलसिला किसी एक राजनीतिक दल की सरकार के दौरान नहीं, बल्कि यह सत्ता का चरित्र बनता जा रहा है. बस एनडीए शासन में संकीर्ण राष्ट्रवाद व धर्मांधता से जुड़ कर यह और खौफनाक हो गया है. माॅब लिंचिंग, दलितों की सार्वजनिक पिटाई और मुठभेड़ों के नाम पर होने वाली घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि इस बात का द्योतक हैं कि देश पर पुनरुत्थानवादी ताकतें एक बार फिर काबिज हो गई हैं जो देश को एक बार फिर बर्बर युग में ले जाने पर अमादा हैं.
हमारे लिए चिंतनीय विषय है:
0 विकास के दावों के बीच बढ़ती भीषण गरीबी और विषमता की विशाल होती खाई
0 जेलों में विचाराधीन कैदियों की बढ़ती हुई संख्या
0 माॅब लिंचिंग व मुठभेड़ के नाम पर होने वाली हत्यायें
0 हाजत में होने वाली मौतें
0 महिला उत्पीड़न- कन्या भ्रूण हत्या, बच्चियों के साथ बलात्कार, संरक्षण गृहो में रखी गई लड़कियों को ऐय्याशी के लिए सत्ताधारियों के बीच परोसा जाना
0 दलित उत्पीड़न की उना जैसी घटनाएं
0 अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात व देशद्रोह के दमनकारी मुकदमें
0 श्रम कानूनों की समाप्ति
0 शांतिपूर्ण जमावड़े व संघर्ष के तरीकों पर भी समय-समय पर लगाये जाने वाले प्रतिबंध
0 और न्यायिक प्रक्रिया का मंहगा होना व लंबा खिंचना
आईये, हम संकल्पित हों कि इन तमाम मसलों को हमेशा अपने जेहन में रखेंगे और संगठित रूप से इसका विरोध करेंगे. सिर्फ कोर्ट या संविधान में दर्ज कानून उन मानवाधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते. याद रखिये, मानवाधिकार तभी बचेंगे जब हम उनकी अहमियत को समझेगें और उसके लिए सचेष्ट होकर लड़ने के लिए तत्पर रहेंगे.

विनोद कुमार

 

थोड़ी सी अलग #Me too

rajmahal
एक पहाड़िया बच्ची की कहानी
आदिवासियों की एक आदिम जाति पहाड़िया, शताब्दियों से राजमहल की पहाड़ी श्रृंखला के उत्तर में आबाद थी. अपने ‘कुरांव’, ‘भीठो’, ‘पहाड़ी भीठो’ खेती की विशेष प्रणाली और वनोत्पाद पर उनका जीवन निर्भर था. कुरांव खेती के तहत वे अपने आस -पास के जंगल को साफ कर मकई, बाजरा, सुतरी, घांघरा आदि की खेती करते थे और फिर दो-तीन वर्षों के लिए उस जमीन को परती छोड़ देते. भीठो, यानी अपने झोंपड़ीनुमा घर के आसपास की जमीन पर खेती, और पहाड़ी भीठो यानी पहाड़ की ढलान पर खेती. ईसा पूर्व 302 में मेगास्थानीज इस क्षेत्र में आया था और उसने इन्हें ‘माली’ शब्द से संबोधित किया है. 645 ई. में चीनी यात्री फाहियान एवं बाद में व्हेनसांग ने भी इस पहाड़ी आबादी को यहां पाया था और उसका जिक्र अपने यात्रा-वृतान्त में किया है.
तो, इसी समुदाय की एक नन्ही बच्ची को महज 10-12 वर्ष की उम्र में मानव तस्कर बहला फुसला कर 2014 में फरीदाबाद, दिल्ली ले गये. उससे जानवरों की तरह काम लिया गया और सेक्स खिलौने की तरह उसकाउपयोग किया गया. और एक दो दिन नहीं, वर्षों तक वह अमानवीय पीड़ा झेलती रही. इसी वर्ष दिल्ली से उसे कुछ अन्य लड़कियों के साथ पुलिस ने बरामद किया. उसकी हालत बहुत खराब थी. वह सतत बलात्कार की शिकार हुई थी वह. करीबन आठ माह तक उसका दिल्ली में ही इलाज हुआ. कई तरह के आपरेशन और अन्य उपचार. सितंबर में वह दिल्ली से वापस लाई गई. यहां रिम्स के चिकित्सकों ने उसे देखा. उस वक्त तक वह स्वस्थ दिख रही थी. उसके चेहरे पर एक लंबी जंग जीतने की मुसकान थी. बाद में उसे देवघर ले जाया गया और सरकारी सुधार गृह में रखा गया. लेकिन कुछ ही दिनों में उसकी हालत बिगड़ गई. उसे दुबारा रांची लाया गया. यहां के सरकारी संरक्षण गृह में रखा गया. आठ दिन पहले हालत और खराब होने पर फिर रिम्स में भर्ती किया गया. चिकित्सकों ने उसे टीबी का शिकार पाया. उसे फिट्स आते थे. शायद भोगी हुई यातनाओं की स्मृति से घबरा कर वह बेहोश हो जाया करती थी. और इसी क्रम में उसने अपनी जीभ अपने ही दांतों से काट लिया. न वह कुछ खा पाती थी, न बोल पाती थी. हालत और बिगड़ने पर उसे बेंटीलेटर पर रखा गया. लेकिन कल दिन दस अक्तूबर को उसकी मौत हो गई..वह तमाम पीड़ाओं से मुक्त हो गई.
इस त्रासद कहानी में भी कुछ लोगों को यह सवाल परेशान करेगा कि वह मानव तस्करों के हत्थे चढ़ी कैसे? पहाड़िया समुदाय एक आजाद कौम है. वे निरंतर अंग्रेजों से लड़ते रहे, लेकिन अपना स्वच्छंद जीवन नहीं छोड़ा. तंग आकर अंग्रेजों ने एक अलग रास्ता निकाला. वह यह कि राजमहल की पहाड़ियों की तराई में संथालों को बसने के लिए प्रेरित किया.
लेकिन आजाद भारत में अपनी ही सरकार से वे लड़ न सके. राजमहल की पहाड़िया ही कटती जा रही हैं. उनके जीवन का आधार छिनता जा रहा है. भूख की ज्वाला से वह निकली और मानव तस्करों के हत्थे चढ़ गई. उस पहाड़ी लड़की को कैसे पता होता कि बाहर की दुनिया उसके अपने घर बार से कितनी भिन्न और बर्बर है..
इस बार उसे एसी एंबुलेंस से उसके घर भेजा गया.. . हालांकि वह अब गर्मी और ठंढ़ से पड़े हो चुकी थी.

इतिहास के जंगल में पत्थर के निशान

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विनोद कुमार
पत्थलगड़ी को लेकर गैर आदिवासी समाज में, तथाकथित भद्र समाज में एक तरह के भ्रम की स्थिति है. कुछ तो यह भ्रम हमारे इस समझ की उपज है कि आदिवासी समाज एक पिछड़ा आदिम समाज है और वे तरह -तरह के अंधविश्वास के शिकार हैं और पत्थलगड़ी उसी अंधविश्वास से भरी कोई परंपरा है. इसमें कुछ नये खौफनाक अर्थ सत्ता ने हाल के दिनों में भरे हंै. वह यह कि पत्थलगड़ी एक राष्ट्रद्रोह है, देश की सार्वभौमिकता के लिए एक चुनौती. इसे मानने वाले देश के संविधान को नहीं मानते. देश के कानून से खुद को उपर समझते हैं. वे हिंस्र हैं और अब तो बलात्कारी भी. यहां तक कि उसके बारे में लिखने वाले या उसका किसी रूप में समर्थन करने वाले राष्ट्रद्रोही हैं.
पिछले दिनों पत्थलगड़ी के इर्द गिर्द जो राजनीतिक माहौल गरमाया, उसने उत्सुकता जगायी कि हम जाने, पत्थलगड़ी दरअसल है क्या? इस क्रम में जो जाना और जितना समझ पाया वह उदात्त है. इस विराट, नश्वर जगत में अपनी पहचान का घनीभूत एहसास. मूलतः यह मुंडा समाज की सामाजिक व्यवस्था का एक हिस्सा है, लेकिन अन्य रूपों में अन्य आदिवासी समुदायों में भी इसे देखा जा सकता है. आदिवासी समाज ‘पहाड़’ को श्रद्धा से देखता है. ‘मरांग बुरु’ यानी विशाल पहाड़ उसके देवता हैं. और पत्थर उसी का एक अंश. परस्पर सौहार्द और विश्वास पर टिका. सारा पोथी, पतरा, नक्शा, खतिहान एक तरफ, पत्थरगड़ी एक तरफ. विस्तृत भूखंड, खुले आसमान के नीचे एक अदद पहचान. जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता और देगा तो आदिवासी समाज से उसे टकराना पड़ेगा.
मुंडा समाज या वृहद आदिवासी समाज में यह धारणा है कि मृत्यु के बाद भी परिजन जीवित रहते हैं, सूक्ष्म और अगोचर रूप में. और अपने बच्चों के सुख-दुख के साक्षी बनते हैं. मृतक के नाम से सासिंदरि – कब्रिस्तान जैसी जगह- में पत्थर गाड़ा जाता है. पत्थर के आस पास बुहार कर पत्थर पर हल्दी लगाई जाती है. उस पर उस आदमी के नाम से लाया गया कपड़ा बिछाया जाता है. अस्थि फूल रख चुक्का पत्थर के नीचे तीर मार कर सरकाया जाता है. पूजा सामग्री- पानी, आग, धुवन, सिंदूर, इलि का रस. और उसके बाद मंत्र पढ़ा जाता है –
आज………..दिन
आज……….महीना
………………… गांव में
……………….मौजा की सीमा में.
पंाच भाई गांव के
कुटुंब-बंधु देश के
हम आये हुए हैं…
हम एकत्र हुए है…
हमारे बीच से जो देव बन गया
हमारे बीच से जो छिन गया
……………. के नाम से
उसकी स्मृति में
तुम्हारे बताये रास्ते से
तुम्हारे इंगित मार्ग से
………… गांव में
………..मौजा सीमा में.
…………..के घर के आंगन में
………….. की संतान
…………… की संतति
उसे पुर्खे-पूर्वजों के साथ मिलाने के साथ
हम पत्थर खड़ा कर रहे हैं
हम एक चिन्ह स्थापित कर रहे हैं.
हमारे द्वारा खड़ा किया गया यह पत्थर
हमारे द्वारा स्थापित यह चिन्ह
युग-युग तक बना रहे
हमेशा के लिए स्थिर रहे.
जो कोई इसे देखे
जो कोई इसे पहचाने
हां, यह आदमी यही था
यह प्रजा यहीं की थी.
उस आदमी के माध्यम से
इस प्रजा के द्वारा
सारा गांव प्रकाशित हो
सारा देश जाना जाये.
गांव के निर्माण में सहयोगी
देश के गठन में सहयोगी
खुटकटी बचाने वाला आदमी
भुईहरी का रखवाला आदमी…
अब यह पत्थलगड़ी तो मूलतः मुंडा आदिवासी समाज की परंपरा है, लेकिन यह अन्य आदिवासी समाजों में भी किसी न किसी रूप में देखा जा सकता है. मृत्यु के बाद आदिवासी मृतक के शरीर को जलाते भी हैं और मिट्टी भी देते हैं. यानी, मिट्टी के नीचे दबाते भी हैं. एक ही समाज के भीतर के अलग-अलग गोत्रों में अलग परंपरा हो सकती है. जो जलाते हैं, वे अस्थि-राख के अवशेष को मिट्टी के बर्तन में रख कर घर के करीब किसी पेड़-पौधे के नीचे दबा देते हैं और वहां एक पत्थर लगा देते हैं. जो जलाते नहीं, वे उसे ठीक से लपेट कर गांव के करीब ही चिन्हित एक स्थान विशेष में मिट्टी के नीचे दबा देते हैं. जाहिर है एक शरीर के भीतर होने की वजह से वहां की जमीन थोड़ी उंची हो जाती है. फिर उस पर एक चट्टान या पत्थर को सुला दिया जाता है ताकि जंगली जानवर या कोई अन्य पशु उसे नष्ट न कर सके और सिर की तरफ एक पत्थर गाड़ दिया जाता है जिस पर उस व्यक्ति विशेष का नाम, जन्म और मृत्यु की तिथि/वर्ष आदि लिख दिया जाता है. लिखा नहीं, उकेर दिया जाता है. लेकिन यह ससिंदरी या कब्रिस्तान जैसी जगह गांव से बहुत दूर नहीं होती और न उसकी घेराबंदी ही होती है. वह एक खुली जगह और पेड़-पौधों से घिरी जगह ही होती है और गांव, घर, खेत, खलिहान का हिस्सा.
इन सासिंदरियों की चर्चा रांची में आजादी के पहले सेटलमेंट अधिकारी के रूप में रहे जे रीड ने अपने सर्वे रिपोर्ट में इस रूप में की है कि मुंडा समुदाय पश्चिमोत्तर क्षेत्र से झारखंड में आये थे जिसका प्रमाण उन सासिंदरियों से मिलता है जिसे वे इतिहास के उस पथ पर जगह-जगह छोड़ते आये थे. वे बहुधा जमीन पर अपनी दावेदारी के लिए ससिंदरियों या अपने घर-जमीन पर गाड़े गये पत्थरों का इस्तेमाल प्रमाण के रूप में करते थे. अंग्रेजों और उनके पोषित जमींदारों ने जब छल-प्रपंच से उनकी जमीन छीननी चाही तो 25 नवंबर 1880 को ससिंदरी में पत्थरगड़ी के रूप में खड़े पत्थरों के ढेर उठा कर कोलकाता पहंचे थे और ब्रिटिश हुक्मरानों को सबूत के तौर पर सौंपा था.
अस्सी के दशक में जंगल पर अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए हो और मुंडा आदिवासियों ने जहां तहां बिखरी ससिंदरियों को खोजा और सरकार को बताने की कोशिश की कि जिन जंगलों को सरकार सुरक्षित क्षेत्र या रिजर्व फारेस्ट के रूप में चिन्हित कर आदिवासी जनता को उससे बेदखल कर रखा है, वह तो उनका घर-गांव था. लेकिन भारत सरकार ने उनके दावे को लगातार होने वाली फायरिंग से दबा दिया. उस आंदोलन के दौरान दो दर्जन पुलिस फायरिंग में कम से कम दो दर्जन लोग मारे गये थे. कोल्हान क्षेत्र में दर्जनों लोगों पर राष्ट्रद्रोह के मुकदमे चले.
उसी दौर में पत्थरगड़ी का इस्तेमाल शहीदों के नाम को उकेरने में किया गया. रांची के करीब के दशमफाल देखने आप जब जायेंगे तो प्रवेश द्वार के आंगन में एक विशाल पत्थरगड़ी देखेंगे जिस पर उस इलाके के संघर्ष में मारे गये शहीदों के नाम दर्ज हैं. 24 दिसंबर 1996 को संसद में पेसा कानून पास हुआ जिसने आदिवासियों की पारंपरिक व्यवस्था और स्वशासन प्रणाली को कानूनी मान्यता दी. उस दौर में बीडी शर्मा के नेतृत्व में आदिवासी इलाकों में बड़े पैमाने पर पत्थलगड़ी की गई. यानी बड़े-बड़े चट्टानों पर ग्रामसभा की शक्तियों एवं अधिकारों को लिखा गया और अनुष्ठानपूर्वक गांवों में लगाया गया. पत्थर पर लिखने का काम सामान्यतः रंग रोगन से नहीं, बल्कि उसे खोद-खोद उकेरा जाता है ताकि वह कभी मिटे नहीं. कुल मिला कर पत्थलगड़ी का इस्तेमाल पेसा कानून के प्रावधानों को जनता को बताने के लिए सूचनापट्ट के रूप में किया गया. फर्क यह की सरकारी सूचना पट्ट भाड़े के मजदूर / ठेकेदार तैयार करते हैं और पत्थलगड़ी ग्रामीण जनता अपने संसाधन और थोड़े परंपरागत तरीके से अनुष्ठानिक रूप में. उस दौर में पत्थलगड़ी को लेकर कोई विवाद नहीं था. लेकिन अब एनडीए सरकार उसे एक आपराधिक कृत्य बता रही है.
बहाना यह बनाया जा रहा है कि पेसा कानून या संविधान की धाराओं के रूप में कुछ ऐसी बातें या धाराओं का भी उल्लेख पत्थरों पर किया गया जो दरअसल है नहीं. खास कर पत्थलगड़ी के द्वारा आदिवासी इलाके को बहिरागतों के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित करना, जहां वे ग्रामसभा की अनुमति के बगैर प्रवेश नहीं कर सकते. कानूनी पेचीदगियों में न जा कर हम कहें तो खूंटी के आदिवासियों व आंदोलनकारियों का कहना यह कि आप अपने घर में अनधिकृत प्रवेश का बोर्ड लगा सकते हैं, शहर के बीच किसी कालोनी विशेष के प्रवेश द्वार पर बैरिकेट लगा सकते हैं, तो आदिवासी अपने घर-गांव के द्वार पर बैरिकेट क्यों नहीं लगा सकता ? बहिरागतों को, पुलिस-प्रशासन को आदिवासियों से किसी तरह का संवेदनात्मक लगाव नहीं. वे कारपोरेट का लठैत, दलाल बन कर ही आदिवासी इलाके में प्रवेश करते हैं, इसलिए उनके लिए पत्थलगड़ी आंदोलन के क्षेत्र में ग्रामसभा से अनुमति लेकर ही प्रवेश की बात कही गई.
अब रही यह बात कि पत्थलगड़ी आंदोलन के क्षेत्र में सरकारी स्कूलों, अस्पतालों आदि का वहिष्कार किया जा रहा है. यहां तक कि आधार कार्ड को भी गैर जरूरी बताया जा रहा है. सवाल यह कि सरकारी स्कूल और अस्पताल इस लायक हैं कहां कि कोई वहां जाये. और आधार कार्ड की अनिवार्यता पर तो देशव्यापी बहस ही चल रही है. लेकिन पुलिस प्रशासन इन्हीं बातों को बहाना बनाकर पत्थलगड़ी को राष्ट्रद्रोह बता रहे हैं.
वैसे, यहां एक बात समझने की है कि आंदोलनकारी या उसके कुछ अगुवा गुजरात के कुछ आदिवासी गांवों के जिस माॅडल से प्रेरित होकर यह सब झारखंड में करना चाहते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि गुजरात या महाराष्ट्र में जमीन के नीचे खनिज संपदा नहीं और आदिवासी अपने इलाके में स्वायत्त तरीके से रहें तो सरकारों को कोई खास फर्क नहीं पड़ता, लेकिन झारखंड में जमीन के नीचे प्रचुर खनिज संपदा है. यहां तो सत्ता निरपेक्ष नहीं रहेगी. घुस कर आपका दमन करेगी और आपका ‘विकास’ करके मानेगी.
दरअसल पेसा, कानून की मूल भावना है कि राजसत्ता आदिवासी इलाकों में किसी तरह की भी विकास योजना के लिए आदिवासी जनता को भागिदार बनायेगी, यदि जमीन का अधिग्रहण करना चाहती है तो पहले ग्रामसभा की अनुमति लेगी. लेकिन झारखंड सरकार इस मूल भावना को ही नकारती है. सैकड़ों एमओयू बगैर ग्रामसभा की अनुमति के किये गये हैं. और अब आंदोलनकारियों के कुछ अतिवादी तरीकों को आधार बनाकर आदिवासी जनता को कुचलने की नीति पर काम कर रही है. मसलन, गत वर्ष 24 अगस्त को पुलिस ग्रामसभा द्वारा लगाये बेरिकोट को तोड़ कर गांव में घुस गई. उग्र ग्रामीणों ने एसपी, डीएसपी सहित 300 जवानों को बंधक बना लिया. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को जमीन पर बिठा कर रखा, क्योंकि ग्रामसभा में तमाम ग्रामीण जमीन पर ही बैठते हैं. लेकिन इस बात को सत्ता ने अपना भीषण अपमान समझा.
इस बात का एहसास हमे तब हुआ जब देशद्रोह का मामला उठाने की मांग को लेकर जन संगठनों के सांझा अभियान का एक प्रतिनिधि मंडल हाल में झारखंड के गृह सचिव से मिला. इस प्रतिनिधि मंडल में पूर्व के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी रामेश्वर उरांव, जो अब कांग्रेस पार्टी के नेता हैं, निरसा के पूर्व विधायक अरूप चटर्जी, दयामनी बारला, सहित एक दर्जन लोग शामिल थे. गृह सचिव ने माना कि देशद्रोह के इस एफआईआर का कोई पुख्ता आधार नहीं, लेकिन उनका कहना था कि ‘एसपी को पंद्रह घंटे जमीन पर बिठा कर रखेंगे, तो पुलिस चूंटी भी नहीं काटेगी?’
यानी, झारखंड के बीस लोगों को फेसबुक पर लिखने का आधार बनाकर देशद्रोह का अभियुक्त बना देना प्रशासन के लिए एक ‘चूंटी’ काटना मात्र है.
और खूंटी की आदिवासी जनता को पुलिस-प्रशासन के उच्चाधिकारियों की अवमानना की किस तरह सबक सिखाई गई? पत्थरगड़ी इलाके में एक बलात्कार की घटना होती है. बलात्कार की घटना उन महिलाओं के साथ होती है जो सरकारी योजनाओं के प्रोपेगंडा के लिए क्षेत्र में नुक्कड़ नाटक करने गई थी. इस घटना के लिए पीआईएलएफ को जिम्मेदार ठहराया गया और कहा गया कि इस संगठन के सदस्यों ने पत्थरगड़ी आंदोलन के नेताओं के निर्देश पर ऐसा किया. फिर पांच अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए हजारों की संख्या में पुलिस और सुरक्षा बल के जवानों ने खूंटी के कोचांग गांव में प्रवेश किया. घर-घर की तलाशी ली गई. गोली चली और एक और बिरसा मुंडा मारा गया. और उस आपाधापी में जब उत्तेजित ग्रामीणों ने भाजपा सांसद कड़िया मुंडा के चार सुरक्षा गार्डों को अगवा कर लिया, जिन्हें अगले दिन छोड़ भी दिया गया, तो तलाशी अभियान और पुलिस एवं सुरक्षा बलों की दबिश और बढ़ गई. करीबन 300 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमे दायर किये गये. ईसाई मिशनरियों से जुड़े लोग इस आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं, इसलिए मदर टरेसा के निर्मल हृदय संस्थान को बच्चा बेचने का आरोप उसी दौरान लग गया.
अब हालत यह है कि पत्थरगड़ी आंदोलन राष्ट्रद्रोह का आंदोलन बना दिया गया है. उसको चलाने वाले उग्रवादी और बलात्कारी. उसे सपोर्ट करने वाली ईसाई मिशनरियां नवजात शिशुओं को बेचने वाली और पत्थरगड़ी आंदोलन का समर्थन फेसबुक पर करने वाले राष्ट्रद्रोही. कोचांग में स्थाई पुलिस कैंप बन गया. सरकार ऐलान कर रही है कि वह खूंटी का विकास करके ही मानेगी. दरअसल, उसे रांची शहर के बिस्तार के लिए जमीन चाहिए, खूंटी के आस पास निर्वाध उत्खनन का अधिकार. और इसके खिलाफ जो भी खड़ा होगा, उसे कुचल दिया जायेगा.
इस पूरे प्रकरण में स्थानीय मीडिया की भूमिका शर्मनाक रही है. खूंटी में हुई तमाम हाल फिलहाल की घटनाओं को उसने सिर्फ प्रशासन के नजरिये से देखा, सुना और नकारात्मक रूप से अखबारों की सुर्खी बनाया. भाजपा ने यह बता दिया कि मीडिया की मदद से कैसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में फासीवादी तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है.
वैसे, इस घटना का एक सबक भी है. वह यह कि उग्र तरीकों से आप किसी आंदोलन में क्षणिक सफलता जरूर प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन 11-12 लाख सैन्य ताकत और आधुनिकतम हथियारों से लैश इस सत्ता से मुकाबला तो शांतिमय तरीकों से ही हो सकता है. पेसा का इलाका प्रतिबंधित क्षेत्र है, आप वहां नहीं जा सकते ग्रामसभा की अनुमति के, यह पेसा कानून की नई व्याख्या है. मैं चालीस वर्षों से आदिवासी इलाके में परिभ्रमण कर रहा हूं, लेकिन मैं ने ऐसा कभी और कहीं नहीं पाया. आदिवासी जनता चुनावों में शिरकत करती है, झारखंड में तीन तीन आदिवासी मुख्यमंत्री रहे हैं, आप इतिहास की धारा को मोड़ नहीं सकते. हां, शोषण और विषमता के खिलाफ और जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए संघर्ष व आंदोलन तो कर सकते हैं, लेकिन उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह आंदोलन सिर्फ मुंडा आदिवासियों का आंदोलन न रहे, पूरे आदिवासी समाज व बंचित जमात का आंदोलन हो और वह पूरी तरह शांतिमय हो.

22 जून से 28 जुलाई 18 की कहानी

police action in khuti 122 जून

तीन खबर, एक निहितार्थ
एक, राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत भूमि अधिग्रहण बिल पर राज्यपाल ने भी सहमति दी और उसे लागू करने के लिए सरकार के पास भेज दिया गया.
दो, महाधिवक्ता ने राय दी है कि सरकार धर्म परिवर्तन कर चुके आदिवासियों से आरक्षण का लाभ छीन सकती है,
तीन, खूंटी में पांच महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और उसमें पत्थरगढ़ी आंदोलन चलाने वाले शामिल हो सकते हैं..
क्या आपको इन तीनों खबरों में छिपा निहितार्थ दिखाई दे रहा है? बहुत आसानी से इसे देखा और पढ़ा जा सकता है.
पहली खबर का अर्थ हुआ कि अब सरकार आसानी से कृषि योग्य भूमि भी तथाकथित विकास के लिए अधिग्रहित कर सकती है. लेकिन सरकार जानती है कि आदिवासी जनता इसे आसानी से स्वीकार न करे. तो आदिवासी एकता तोड़ने के लिए दूसरी खबर या शगूफा, क्योंकि धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को आरक्षण का लाभ मिलेगा या नहीं, यह एक संवैधानिक मसला है और संविधान में संशोधन करके ही ऐसा किया जा सकता है. लेकिन इस शगूफे से आदिवासी एकता को थोड़ा विषाक्त तो किया ही जा सकता है ताकि जमीन लूट के खिलाफ चल रहा आंदोलन कमजोर हो.
लेकिन सरकार को इतने से संतोष नहीं. तो लीजिये एक और खबर. पत्थरगड़ी आंदोलन चलाने वाले बलात्कारी हैं. वैसे, इस मामले में इतने झोल हैं कि विश्वास करना कठिन. टाईम्स आॅफ इंडिया के मुताबिक पुलिस का दावा है कि उन्होंने ‘सर्वाईवर’ और उनके साथ गये पुरुष सदस्यों की पहचान कर ली है. वे सभी बालिग हैं. यानी, पुलिस अभी तक सर्वाइवरों को ही खोज रही थी, लेकिन उसके पहले यह बयान आ गया कि बलात्कारी पत्थरगड़ी आंदोलन चलाने वाले हैं या हो सकते हैं. समझ से परे है कि आखिरकार एफआईआर किया किसने? खबर इतनी है कि खूंटी में किसी नुक्कर नाटक टीम का बलात्कार हो गया.स्रोत— बलात्कार की शिकार महिलाओं ने किसी समाजमर्की को बताया. उस समाजकर्मी ने किसी और समाजकर्मी को. फिर पुलिस के पास बात पहुंची.
और ये तीनों खबरें एक दिन अखबार की सुर्खियां बनी. वैसे, यह महज ‘इत्तफाक’ भी हो सकता है. और निहितार्थ यह कि झारखंड में आदिवासियों की जमीन लूटने के लिए सरकार हर हथकंडा अपना रही है और अपनायेगी.

27 जून

सरकार प्रायोजित कोलाहल में असल मुद्दा गुम न हो जाये
इस बात को याद रखने की जरूरत है और असल मुद्दा है झारखंड में भाजपा सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर जमीन लूट की तैयारी. एक तरफ तो वर्तमान भू कानूनों और कई व्यवस्थाओं के रहते आदिवासियों से कौड़ियों के मोल पूर्व में हड़पी जमीन के बंदरबांट की तैयारी, दूसरे भूमि कानूनों में कुछ बड़े संशोधन कर नये सिरे से विकास के नाम पर और जमीन छीनने की कार्य योजना. सिंदरी खाद कारखाना कब का बंद हो गया, अब उस जमीन पर नये सिरे से कारखाना लगाने की योजना बन रही है. पतरातु थर्मल पावर प्लांट का भी यही हाल है. बोकारों स्टील कारखाना के पास जरूरत से फाजिल जमीन पड़ी हुई है. एचईसी अब विस्थापितों से मिली जमीन बेच रहा है और सरकार उस जमीन पर स्मार्ट सीटी बनाने वाली है. जबकि आजादी के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के लिए जमीन अधिग्रहण की शर्त यह थी कि जमीन जिस कार्य के लिए ली गई थी, उसी के लिए उसका उपयोग होगा या फिर उसे मूल रैयतों के परिजनों को वापस लौटाना होगा. लेकिन अब इस दिशा में आज कोई सोचने को तैयार नहीं.
भूमि कानून में संशोधन करने में सरकार कामयाब हो चुकी है. लेकिन कानून से उसे ज्यादा मदद मिलने नहीं वाली, क्योंकि आदिवासी जनता एक एक इंच जमीन के लिए लड़ने वाली है. बस जरूरत है विभिन्न इलाकों में चल रहे आंदोलनों को गोलबंद करने की. इस बात को भी समझना चाहिए कि जमीन की लड़ाई सिर्फ खूंटी में नहीं चल रही, आंदोलन तो संथाल परगना और कोल्हान क्षेत्र में भी है.
एक सुस्पष्ट दृष्टि बननी चाहिए. हम कारपोरेट के लिए जमीन नहीं देंगे. स्कूल, कालेज, अस्पताल आदि के नाम पर जमीन अधिग्रहण के पहले सरकार चल रहे स्कूल, कालेज, अस्पताल आदि को दुरुस्त करे. कोई नया कारखाना या माईनिंग प्रोजेक्ट की मूल शर्त यह कि वह नियमित रोजगार कितना पैदा करता है, वरना सिर्फ धन्ना सेठों की तिजोरी भरने के लिए नया कारखाना या किसी तरह का खनन बेमतलब है. वह सिर्फ धरती को विरूपित और नदियों को प्रदूषित करता है. और किसी भी कार्य के लिए जमीन अधिग्रहण के पहले ग्रामसभा की अनुमति अनिवार्य होनी चाहिए.
खूंटी बलात्कार कांड, ईसाई आदिवासियों के आरक्षण को समाप्त करने का शगूफा महज मूल मुद्दे से भटकाने के भाजपा सरकार के हथकंडे हैं. बलात्कार कांड का पर्दाफाश हो चुका है. आदिवासी ईसाईयों के आरक्षण का खात्मा संसद में संविधान में संशोधन कर ही किया जा सकता है. और भाजपा ने संसद में दो तिहाई बहुमत हासिल कर लिया तो वह यह कर सकती है. तो, जल, जंगल, जमीन पर आंदोलन तीव्र करना और भाजपा को राजनीतिक रूप से शिकस्त देना ही हमारा लक्ष्य है. और सब बातें भ्रम जाल है.

29 जून

सिर्फ’काल’बदला, न सत्ता का चरित्र बदला, न आदिवासी मिजाज

ये दो तस्वीरें हैं. एक पत्थरगड़ी क्षेत्र खूंटी में पिछले दिनों सैकड़ों ग्रामीणों को गिरफ्तार कर जानवरोंकी तरह हांकती ले जाती पुलिस की और दूसरी करीबन सवा सौ वर्ष पहले बिरसा और उनके साथियों को गिरफ्तार कर ले जाती पुलिस की. दोनों में काल का फर्क है, अंदाज का नहीं.
‘‘ वह 1895 का जमाना था. पूरा आदिवासी समाज साल-दर-साल चले आ रहे शोषण-उत्पीड़न से भीतर-ही-भीतर सुलग रहा था. मुंडा राज की वापसी की उद्घोषणा हो चुकी थी. जरूरत थी उस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले एक नायक की. और बिरसा मुंडा नायक बनकर उभरे. रांची जिला के तमाड़ थाना के एक गांव चलकड से उन्होंने मुंडा राज के स्थापना की उद्घोषणा की. बिरसा मुंडा के बारे में उस वक्त रोमन कैथोलिक मिशन, सर्वदा, के फादर हाफमैन ने लिखा है- ‘‘मुझे स्पष्ट रूप से याद है कि उरांव सरदार किस तरह सामान्य ग्रामीणों से आग्रह करते थे कि वे बिरसा भगवान् की धर्मस्थली को जायें. शुरू में मैंने इस बात को कोई खास महत्व नहीं दिया. लेकिन जल्द ही मैंने देखा कि बड़ी संख्या में सभी दिशाओं से लोग चलकड पहुंच रहे हैं और मैं उरांव-मुंडा सरदारों के प्रति संदेह से भर गया. वहां से चमत्कारिक घटनाओं की बातें फैल रही थीं. गंभीर रोगों के शिकार लोगों के रोग मक्ति की बातें, मृतकों के जी उठने की बातें. मैं खुद ऐसे लोगों से मिला जो बीमार लोगों को, मृत्युशैया पर पड़े लोगों को ऊपर ले जा रहे थे. इस संबंध में उन लोगों से किसी तरह की बहस करना बेमतलब था. बिरसा छोटानागपुर का भगवान् बन चुका थे. यह एक सच्चाई थी कि न सिर्फ मुंडा, बल्कि उरांव समुदाय के लोग बड़ी संख्या में बिरसाइत बन रहे थे. अचानक उस धर्मगुरू और उसके शिष्यों ने यह घोषणा की कि आकाश से जल्द ही आग बरसेगी और उन्हें छोड़कर जो बिरसा के अनुयायी बन चुके हैं, सभी जलकर राख हो जायेंगे. इस घोषणा के बाद चलकड और उसके समीप के पर्वत शिखर एक विशाल छावनी में बदल गये. लोग चावल और अन्य जो कुछ भी खाने की वस्तुएं उपलब्ध थीं, उसे पहाड़ पर ले जा रहे थे. चलकड का धर्मिक आवरण छंट रहा था और उसका राजनीतिक रूप प्रकट हो रहा था, क्योंकि पहाड़ पर जमा होने वाले लोग हथियारों से लैस हो रहे थे. बिरसा मुंडा खुद यह ऐलान कर रहे थे कि महारानी का ‘राज’ खत्म हो रहा है और उसका मुंडा राज शुरू हो रहा है. उन्होंने पैगंबर की तरह यह भी घोषणा की कि यदि अंग्रेज सरकार ने उनके विरोध की कोशिश की तो बंदूकें लकड़ी के कुंदे में बदल जायेंगी और उससे निकलने वाली गोली पानी में बदल जायेगी.’
बिरसा मुंडा ने चर्च में रहकर ही शिक्षा-दीक्षा पाई थी. जीवन के किशोरावस्था में वे एक क्रिश्चियन थे और चाईबासा के जर्मन लूथरन क्लब में रहकर शिक्षा ग्रहण की थी. लेकिन बाद में उनका ईसाइयत से मोह भंग हो गया, फिर भी लगता है कि उन पर चर्च के संस्कार प्रभावी रहे और गंभीर रोगियों के उनके संपर्क से ठीक हो जाना, मृतक के जी उठने जैसी चमत्कारी घटनाओं-कहानियों का उत्स वहीं से है. उनकी घोषणाओं का अंदाजे बयान भी बाइबल के सूत्र वाक्यों जैसा है. उन्होंने खुद को ईश्वर का भेजा दूत और एक नया पैगंबर बताया जो मुंडा राज की पुनसस्र्थापना के लिए अवतरित हुआ था. हो सकता है कि उन्होंने अपने राजनीतिक उद्देयों को सप्रयास छुपाने के लिए एक रणनीति के तहत धर्मिक आडम्बर का प्रपंच रचा हो.
अब जो भी हो, उनके नेतृत्व में चलकड पहाड़ी पर जो कुछ भी हो रहा था, उससे अंग्रेज अधिकारी सशंकित हो उठे. रांची के पुलिस अधीक्षक मि. मियर्स पुलिस बल के साथ चलकड के लिए रवाना हुए और 24 अगस्त, 1895 की रात सोये अवस्था में बिरसा को गिरफ्तार करने में सफल हो गये. उन्हें उनके 15 शिष्यों के साथ गिरफ्तार कर रांची ले जाया गया, वह भी पैदल. उन पर उस वक्त तक कोई गंभीर आरोप नहीं था. लेकिन उन्हें जंजीरों से जकड़ रखा गया था और उनके पीछे चल रहे थे उनके हजारों समर्थक.’’
उपर का यह पूरा ब्योरा मैंने अपनी ही प्रकाशित पुस्तक ‘आदिवासी संघर्ष गाथा’ से लिया है. पहली तस्वीर में आदिवासियों को गिरफ्तार करने वाली पुलिस ब्रिटिश सत्ता की थी. दूसरी तस्वीर की पुलिस आजाद भारत की है. ब्रिटिश उस वक्त दुनियां की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी ताकत थे, एनडीए की वर्तमान सरकार कारपोरेट जगत की चाकर सत्ता का प्रतिनिधित्व करती है. दोनों सत्ता की पुलिस के मूल चरित्र में कोई अंतर नहीं. और आदिवासी उस वक्त भी स्वशासन के लिए युद्ध कर रहा था और आज भी कर रहा है.

2 जुलाई

कुछ जरूरी सवाल
खूंटी में बलात्कार की कथित घटना अभी जांच प्रक्रिया से गुजर रही है. आगे फास्ट ट्रैक कोर्ट में उसकी सुनवाई चलेगी. साक्ष्यों के आधार पर अभियुक्तों को सजा मिलेगी. लेकिन राज्य सरकार और स्थानीय मीडिया, खास कर भाषायी अखबारों ने मिल कर भाजपा सरकार के ‘खूंटी मंसूबों’ को पूरा कर दिया. पत्थरगड़ी आंदोलन सिर्फ सत्ता ही नहीं, प्रभु वर्ग की छाती में गड़ा शूल है. ग्रामसभा सर्वोपरि, यह कैसी बात हुई? ग्रामसभा के क्षेत्र में कोई बाहरी बिना ग्रामसभा की सहमति के प्रवेश न कर सके, यह भारतीय संविधान का सरासर अपमान है? इसे कैसे बर्दाश्त करेगी राजसत्ता? हम विकास के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहे हैं, और वे कहते हैं, आपका विकास नहीं चाहिए? स्कूल नहीं चाहिए, अस्पताल नहीं चाहिए? और तो और आधार कार्ड नहीं चाहिये? कारपोरेट पूंजी निवेश करके क्षेत्र का कायापलट करना चाहता और वे कहते हैं हम माईनिंग के लिए जमीन नहीं देंगे? यहां तक कि वे पुलिस कैंप के लिए जमीन तक देने के लिए तैयार नहीं. राजसत्ता का यह अपमान? विकास के चालू नीतियों की यह अवहेलना? जनता इसी तरह राजसत्ता की अवहेलना करती रही तो समीपवर्ती सोने की खदानों में उत्खनन कैसे होगा? रांची शहर जो निरंतर सुरसा की तरह मुंह फैलाता बढ रहा है, उसका बिस्तार कैसे होगा? टाटा चांडिल, चौका, होते बुंडू तक पहुंच चुका. यह खूंटी का ही इलाका है जहां अब रांची के विस्तार की गुंजाईश है. और पत्थरगड़ी वाले टंटा खड़ा कर इसका विरोध कर रहे हैं.
लेकिन बलात्कार की इस कथित घटना ने सरकार के सारे मंसूबे पूरे कर दिये.
पत्थरगड़ी वाले देशद्रोही तो थे ही, अब बलात्कारी भी हैं. उनका नक्सली संगठनों से रिश्ता है. उन्होंने पीआईएलएफ के लोगों को कह कर बलात्कार की इस घटना को अंजाम दिया. यह प्रोपगेंडा पूरे देश में करने में सरकार कामयाब हो गई.
जिस ग्रामीण इलाकों में पुलिस की कोई भूमिका नहीं थी, अब वह उन इलाकों में कथित बलात्कार के अभियुक्तों को पकड़ने के लिए घुस रही है. घर-घर की तलाशी ले रही है. उनका यह कह देना ही काफी है कि फला घर में किसी अभियुक्त के होने की उन्हें सूचना मिली थी. आंदोलनकारियों ने क्षणिक आवेश में कुछ सुरक्षाकर्मियों को अगवा कर लिया था जिन्हें मयहथियार अगले दिन छोड़ भी दिया गया. लेकिन इस मामले में भी पुलिस ने दस लोगों को नामजद अभियुक्त और करीबन तीन हजार अज्ञात लोगों को अभियुक्त बनाया है. पुलिस-प्रशासन को अब इस बात का पूरा अधिकार है कि वहां पुलिस कैंप बनाये, अभियुक्तों को पकड़ने के नाम पर इलाके में कभी भी घुसे, किसी भी घर में घुस कर घर वालों को पद दलित करे, पूरे खूंटी को बूंटों तले रौंद दे.
भाजपा और आरएसएस को ईसाई मिशनरियां कभी नहीं सुहाती. दरअसल, उन्हें टारगेट कर गैर ईसाई आदिवासियों और हिंदू वोटों को वह अपने पक्ष में गोलबंद करने की कोशिश में सतत लगी रहती है. इसलिए इस मामले में भी एक मिशन स्कूल के प्राचार्य और शिक्षकों से लगातार पूछताछ जारी है. जिस मिशन स्कूल से नुक्कड़ नाटक करते वक्त नाटक टीम का कथित रूप से अपहरण हुआ, उसके प्राचार्य और ननो से भी पूछताछ हो रही है. पहले पत्थरगड़ी आंदोलन को गैर संवैधानिक बताया गया और अब पत्थरगड़ी के समर्थकों से उसी तरह पूछ-ताछ हो रही है, मानों वे अपराधी हों.
इस कथित बलात्कार की घटना ने सबसे बड़ा काम यह किया कि तमाम आदिवासी विरोधी ताकतों को एकजुट कर दिया है, चाहे वे राजनीति में संक्रिय हों या सांस्कृतिक के क्षेत्र में. यह बात अब सर्वविदित है कि जिस झारखंड में बलात्कार की घटनायें अपवाद स्वरुप होती थी, अब वहां भी मुख्यधारा की संस्कृति के प्रचार-प्रसार के साथ बलात्कार एक सामान्य घटना हो गई है. लेकिन उनके खिलाफ वैसा एकजुट प्रदर्शन पहले कभी नहीं हुआ, जैसा पत्थरगड़ी आंदोलन से जोड़े गये इस कथित बलात्कार की घटना के बाद.
अब सरकार कह रही है कि वह खूंटी क्षेत्र के विकास पर फोकस करेगी. यह बात हर प्रबुद्ध झारखंडी समझने लगा है कि विकास का राजनीतिक अर्थ आदिवासियों की बर्बादी ही है. और यह विकास करेंगे कैसे? जनता को बगैर विश्वास में लिए? पत्थरगड़ी आंदोलन के तमाम नेताओं को कथित बलात्कार का अभियुक्त/समर्थक बता कर? बंदूक के जोर पर पत्थरगड़ी आंदोलन को कुचल कर? आपने तो पत्थरगड़ी आंदोलन से प्रभावित तमाम गांवों को बलात्कार का समर्थक और जवानों को अगवा करने वाला अपराधी घोषित कर दिया है? बिरसा के उलगुलान को ताकत के बल पर ब्रिटिश हुक्मरानों ने कुचला था, वही काम आजाद भारत की पुलिस भी कर रही है. एक बिरसा इस बार भी आपके पुलिसिया अभियान में मारा गया.
विडंबना यह कि सत्ता और उसके दलाल तो एक तरफा बयानबाजी कर ही रहे हैं, जो जन आंदोलनों के नेता रहे हैं, विकास के चालू माॅडल के विरोधी रहे हैं, वे भी खामोश हैं. क्योंकि उन्होंने बिना किसी पुख्ता सबूत के मान लिया है कि पत्थरगड़ी आंदोलन के नेताओं का कथित बलात्कार में हाथ है. ऐसे कुछ लोगों को पुलिस एनकाउंटर में मार भी डाले तो, उन्हें बहुत ज्यादा नागवार नहीं गुजरेगा. बलात्कारी और उग्रवादियों के साथ सख्ती से पेश आना ही होगा, वरना लोकतंत्र कैसे चलेगा?
अब आईये असल मुद्दे पर. दो घटनाएं हुई हैं- एक कथित बलात्कार की, दूसरी जवानों को अगवा करने की.
हम बलात्कार की घटना को लगातार ‘कथित’ कह रहे हैं. यह बात हमारे मित्रों को भी बहुत नागवार लगेगा. लेकिन इस घटना की जब तक अदालती पुष्टी नहीं हो जाती, तब तक यह कथित ही रहेगी. इस मामले में पुलिस खुद एक पक्ष की तरह व्यवहार कर रही है. जो सहज, स्वाभाविक सवाल हैं, जिज्ञासा है, वह सब मीडिया और सरकार के संयुक्त बयानों और ब्योरों से गुम हो चुका है.
मसलन,
0 किसी भी अखबार ने अब तक इस बात की जानकारी नहीं दी कि एफआईआर दर्ज किसने कराया. वैसे, पता चला है कि इस मामले में दो एफआईआर दर्ज किया गया है. एक खूंटी थाने में और दूसरा महिला थाने में. दोनों एफआईआर दोनों थानों में एक ही समय में दर्ज हुआ है. सेकेंड भर का भी अंतर नहीं है. एक एफआईआर एक पीड़िता ने किया है और दूसरा नाटक कंपनी के संचालक ने. क्या ये संभव है कि दो लोग दो जगहों पर एफआईआर दर्ज करा रहे हों और दोनों का समय बिल्कुल एक हो? रत्ती भर का भी अंतर नहीं हो? दोनों एफआईआर की भाषा भी एक है. जैसे किसी एक ही व्यक्ति ने लिखा हो.
0 जिस भी व्यक्ति के माध्यम से बलात्कार की एफआईआर दर्ज कराई गई, वह वास्तव में क्या है, किन-किन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है?
0 महिलाआओं का मेडिकल कहां हुआ और उसकी रिपोर्ट कहां हैं? क्योंकि एफआईआर में दर्ज आरोपों की पुष्टी मेडिकल रिपोर्ट से ही हो सकती है.
0 प्रशासन का कहना है कि उसने एक वीडियों क्लिप जब्त किया है. यह वीडियो कौन बना रहा था? सरकारी पक्ष और अखबारी ब्योरा यह है कि बलात्कारियों ने नुक्कड़ टीम के सदस्यों से उन्हीं की मोबाईल से यह वीडियों बनवाया. जबकि अखबारों का ब्योरा यह है कि मिशन स्कूल से अगवा करने के बाद उनके ही वाहन में नुक्कड़ टीम को कुछ दूर ले जाया गया और पुरुष सदस्यों को मारपीट और उन्हें उनकी ही गाड़ी में बंद कर दिया गया. फिर वीडियों कौन बना रहा था?
0 वीडियों जिस सिम में बना, वह सिम कहां है? क्योंकि कहा जा रहा है कि सिम नहीं है, मोबाईल के मेमोरी में ही कुछ हिस्से रह गये हैं.
0 जिस वाहन पर वह नुक्कड़ टीम घूम रही थी, उसका चालक कहां है? उसकी गवाही महत्वपूर्ण इसलिए है कि वही बता सकता है कि नुक्कड़ टीम को अगवा कब किया गया और कितने समय के लिए वे कथित बलात्कार के अभियुक्तों के कब्जे में रहे?
0 अखबारों ने कहा कि अगवा किये जाते वक्त तीन सौ बच्चे स्कूल में थे. किसी भी अखबार ने या जांच एजेंसी ने बच्चों की गवाही क्यों नहीं ली.
0 और अंतिम सवाल कि घटना की शिकार महिलाएं कहां हैं? आधिकारिक जानकारी यह है कि वे सख्त पुलिस सुरक्षा में हैं और उनकी काउंसिलिंग की जा रही है? उन्हें किसी से मिलने की इजाजत नहीं, खासकर मीडिया से. क्या उनके परिजन नहीं? या उन्होंने उन्हें स्वीकार करने से इंकार कर दिया है? कहीं पुलिस काउंसिलिंग के नाम पर उन्हें मनमाफिक बयान देने के लिए तैयार तो नहीं कर रही?
रही जवानों को अगवा करने वाला मामला. यह गांधी के असहयोग आंदोलन के दौरान घटित चौरा चौरी कांड जैसी घटना है. बिना वजह अपने उपर हुए आक्रमण और प्रताड़ना से बौखलाई भीड़ ने कुछ जवानों को अगवा कर लिया, हालांकि दूसरी रात उन्होंने उन्हें रिहा भी कर दिया. यह आंदोलनकारियों की एक भूल थी, जिसे उन्होंने सुधार लिया. लेकिन प्रशासन उन्हें सबक सिखाने पर तुली है. किसी भी लोकतांत्रिक सरकार से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती.
यह मामला अत्यंत संवेदनशील है. इसे बहाना बना कर भाजपा सरकार खूंटी की आदिवासी जनता पर जुल्मों सितम ढ़ा रही है. निजता के अधिकार का हनन कर रही है. अब तक की जांच के आधार पर अधिकारी कह रहे हैं कि पत्थरगड़ी आंदोलन के नेता जाॅन जोनास तीरु ने पीएलएफआई संगठन के लोगों से कह कर यह काम करवाया. वैसे, जानकारों के अनुसार यह संगठन माओवादी संगठन से टूट कर बना एक गिरोह है जिसका काम ग्रामीण जनता को परेशान करना है. और पत्थरगड़ी आंदोलनकारियों से उनकी नहीं पटती, क्योंकि उन्हें वे अपने क्षेत्र में घुसने नहीं देते.
चलिये, थोड़ी देर के लिए इसे मान भी लें, तो अपराधियों को पकड़ो, खूंटी क्षेत्र के मुंडा गांवों को टेरोराईज्ड करने का अधिकार भाजपा सरकार को कैसे मिल गया? राष्ट्रीय मीडिया इस मुद्दे पर खामोश क्यों है?

13 जुलाई

सफाई नहीं आरोप
विशप मास्केरेनहैस ने आरोप लगाया है कि जिस सिस्टर को 4 जुलाई को बच्चा बेचने के आरोप में गिरफ्तार क़िया गया, उनके वकील को एफाआईआर की कॉपी नहीं दी गई, न एक सप्ताह तक मिलने दिया गया. और एक सप्ताह बाद वकील सिस्टर से मिले तो सिस्टर ने बताया कि उनसे ‘कनफेसनल स्टेटमेंट’ पर जबरन दस्तख्वत करवाया गया.
यह सफाई नहीं, सरकार पर गंभीर आरोप है.

9 जुलाई

खूंटी फैक्ट फाइंडिंग टीम की अंतरिम रिपोर्ट

इस पूरी घटनाक्रम में, ऐसा मालूम पड़ता है कि प्रशासन द्वारा पीड़ित महिलाओं के पक्ष और उनकी इच्छा को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ और गौन कर दिया गया है. यह साफ नहीं है कि पांचों पीड़ित महिलाओं को उनकी मर्जी से पुलिस की हिरासत में रखा गया है या नहीं.

फैक्ट फाइंडिंग की तारीख: 28/06/2018 से 30/06/2018 स्थानः खूंटी
जैसा की ज्ञात है कि, 19/06/2018 को कोचांग गांव (ब्लाक-अड़की, जिला-खूंटी) में मानव तस्करी पर नुक्कड़ नाटक करने गई पांच महिलाओं के साथ कथित तौर पर घटे गैंग रेप की घटना की खबर मालूम हुई. इस घटना के बाद भारत के विभिन्न राज्यों में महिला अधिकारों पर काम करने वाले संगठनों और झारखण्ड़ के स्थानीय सामाजिक कार्यकत्ताओं ने डब्लू0 एस0 एस0 की अगुवाई में एक जांच टीम का गठन किया. जांच टीम दिनांक 28/06/2018 को रांची पहुंची और मामले से संबंधित तथ्यों की सही जानकारी इकट्ठी की जा सके. इस क्रम में फैक्ट फाइंडिंग के सदस्यों ने घटना से प्रभावित लोगों और घटना की जानकारी रखने वाले लोगों से बात-चीत की. फैक्ट फाइंडिंग के सदस्य तथ्यों की पुक्ता जानकारी के लिए पीड़ित महिलाओं से भी बात करने के लिए पीड़िताओं से मिलने गए, पर फैक्ट फाइंडिंग टीेम को उनसे मिलने नहीं दिया गया. साथ ही, खूंटी के डी0 सी0 और एस0 पी0 से फैक्ट फांडिंग टीम ने मिलने के लिए समय मांगा, पर वे फैक्ट फाइंडिंग टीम से नहीं मिले. फैक्ट फाइंडिंग टीम की जांच -पड़ताल के बाद कुछ खास बातें सामने निकल कर आती हैं. जैसे कि, आम जनता तक घटना की जानकारी का स्त्रोत केवल पुलिस द्वारा गढी गई कहानी है, जो अखबारों के माध्यम से उन तक पहुंच रहा है. साथ ही, फैक्ट फाइंडिंग टीम की जांच के बाद जो तथ्य निकल कर सामने आए हैं, वे पुलिस द्वारा बनाई गई कहानी की प्रमाणिकता पर सवाल उठाते हैं.
फैक्ट फाइंडिंग टीम की जांच में पाए गए तथ्यः
 19/06/2018 को एफ0 आई0 आर0 के मुताबिक कथित तौर पर गैंग रेप
की घटना घटी. इस घटना में स्थानीय संस्था की देख-रेख में रहने वाली दो बालिग महिलाओं और नुक्कड़ नाटक करने वाले संस्था के संचालक की टोली से तीन बालिग महिलाओं के साथ कथित गैंग रेप की घटना को कोचांग नामक गांव में अंजाम दिया गया. फैक्ट फाइंडिंग की टीम को जांच के दौरान यह पता चला कि खूंटी के एक स्थानीय संस्थान के कर्मी और नुक्कड़ नाटक करने वाले संस्था के संचालक की मंडली साथ में मानव तस्करी के खिलाफ खूंटी में नुक्कड़ नाटक किया करते थे. इस पूरे मामले में गौर करने लायक बात यह है कि, एफ0 आई0 आर0 में न नुक्कड़ नाटक करने वाले संस्था के संचालक द्वारा खूंटी के एक स्थानीय संस्थान की सिस्टर पर यह आरोप लगाया गया है कि, उन्होंने नुक्कड़ नाटक की मंडली को जोर देकर कोचांग मिशन स्कूल में नुक्कड़ नाटक करने को कहा. जबकि, उनका प्रोग्राम कोचांग स्थित बाजार में चल रहा था. लेकिन, अन्य सूत्रों से बात करने पर यह पता चला कि, सिस्टर पर नुक्कड़ नाटक करने वाले संस्था के संचालक द्वारा 19 जून का कार्यक्रम करने को लेकर दबाव डाला गया था. जबकि, सिस्टर द्वारा नुक्कड़ नाटक का टारगेट पूरा कर लिया गया था. साथ ही, नुक्कड़ नाटक मंडली का कोचांग में यह पहला कार्यक्रम था और नुक्कड़ टोली के लोग और दोनों सिस्टर इस इलाके से परिचित नहीं थे.
 फादर के बारे में एफ0 आई0 आर0 में यह आरोप लगाया गया है कि, उन्होंने ननों को रोक लिया, जबकि बांकि महिलाओं को जानबूझ कर मोटर साइकिल पर सवार चार अज्ञात लोगों के साथ जंगल में जाने दिया. उन पर एफ0 आई0 आर0 में षडयंत्र करना, जबरदस्ती रोक कर रखना और गैंग रेप और भारतीय दंड संहिता के अन्य प्रावधान लगाए गए हैं. पर, फैक्ट फाइंडिंग टीम को अन्य सूत्रों से यह पता चला है कि फादर खुद उस परिस्थिति में डरे हुए थे और उन अज्ञात अपराधियों के दबाव में थे.
 एफ0 आई0 आर0 के मुताबिक, गैंग रेप की घटना के बाद जब पीड़ित महिलाएं वापस आई और उन्होंने स्थानीय संस्था की दोनों सिस्टर (जो उनके साथ थी) को घटना के बारे में बताया, तो उन्होंने घटना की जानकारी देने से मना किया. जबकि, फैक्ट फाइंडिंग टीम ने जब इसके बारे में पूछ-ताछ की तो पता चला कि जब पीड़ित महिलाएं घटना के बाद गाड़ी में सिस्टर के साथ बैठीं, तब कोचांग से खूंटी के रास्ते में उन्होंने सिस्टर के पूछने पर बलात्कार की घटना के बारे में बताया. सिस्टर ने उसी वक्त डी0 सी0 के पास खबर देने को कहा. पर, पीड़ित महिलाओं ने उन्हें ऐसा करने से यह कह कर मना कर दिया कि, उन्हें खतरा होगा क्योंकि कथित गैंग रेप को अंजाम देने वाले अज्ञात लोगो ने उनका नाम, पता और पूरे परिवार का ब्योरा ले लिया है.
 20 जून को पुलिस को घटना की जानकारी मिली, लेकिन एफ0 आई0 आर0 या मीडिया में चल रहे खबरों के मुताबिक यह स्पष्ट नहीं है कि, उन्हें घटना की जानकारी कहां से मिली. फैक्ट फाइंडिंग की टीम द्वारा सूत्रों से पूछ-ताछ करने पर यह पता चला कि एस0 पी0 आॅफिस से ही थानों को कथित गैंग रेप की घटना की सूचना मिली थी. पुलिस के अनुसार, 20 जून की रात से ही पुलिस ने पीड़ित महिलाओं से संर्पक साधने की कोशिश की. पर, वे 21 जून को पीड़ित महिलाओं तक पहुंच पाए. उसके बाद 21 जून को पांचों पीड़ित महिलाओं का मेडिकल करवाया गया. पर, यहां गौर करने लायक बात यह है कि, पीड़ित महिलाओं के मेडिकल जांच के बारे में जब हमने सदर अस्पताल, खूंटी में पूछ-ताछ की तो हमें पता चला कि दो पीड़ित महिलाओं को मेडिकल जांच के लिए 20 जून को ही लाया गया था. फिर, 21 जून को मेडिकल जांच के लिए सभी पांच पीड़ित महिलाओं को लाया गया, जिसकी जांच के लिए मेडिकल बोर्ड की टीम बनाई गई थी.
 एफ0 आई0 आर0 में फादर के अलावा अज्ञात अपराधियों और पत्थलगढी समर्थकों को अपराधी के रुप में डाला गया था. फैक्ट फाइंडिंग टीम के पूछ-ताछ के मुताबिक फादर के अलावा दो अन्य लोगों को गिरफ्तार किया गया है. पुलिस द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, दोनों संदिग्ध लोगों ने तीन अन्य लोगों का नाम लिया. इनमें दो को पत्थलगढी का नेता बताया गया है और एक बाजी सामंत नामक व्यक्ति का नाम लिया गया है, जो पी0 एल0 एफ0 आई0 का एरिया कमांडर है.पुलिस से जब यह पूछा गया कि दोनों गिरफ्तार आरोपियों और सभी आरोपियों की शिनाख्त पीड़ित महिलाओं द्वारा की गई है या नहीं, तो कहा गया कि कानूनी प्रक्रिया की सारी जानकारी एस0 पी0 से ही मिलेगी और उन्हें इस मामले में किसी से कुछ भी ना कहने को कहा गया है. यह बात साफ है कि, आरोपियों की शिनाख्त पीड़ित महिलाओं द्वारा नहीं की गयी है. इसके अलावा, आस-पास के गांवो के लोगों और अन्य स्त्रोत के अनुसार जो चार अज्ञात लोग मोटरसाइकिल पर सवार होकर पांचों महिलाओं को ले गए थे, वे उस इलाके के नहीं थे और पत्थलगढी के नेता और उससे जुड़े व्यक्ति तो बिलकुल नहीं थे.
 26 जून को घाघरा में पुलिस के जवानों ने यह कह कर अंदर घुसने की कोशिश कि,की वहां कथित गैंग रेप के मामले में शामिल आरोपी पत्थलगढी में शामिल होने वाले हैं. जबकि घाघरा गांव में पत्थलगढी को लेकर ग्राम सभा हो रही थी, जहां आस-पास के गांव के लोग आए थे. वहां पुलिस और गांव वालों के बीच झड़प हुई. इस क्रम में महिलाओं ने पुलिस को करिया मुंडा के घर तक खदेड़ कर भगा दिया. इस बीच करिया मुंडा के घर से चार जवानों को महिलाएं अपने साथ ले आए.
 27 जून को सी0 आर0 पी0 एफ0, रैफ, जे0 ए0 एफ0 और होम गार्ड के 1000 जवान घाघरा (300 लोगों का गांव) और उससे सटे गांवों में घुस गए. फैक्ट फांडिंग टीम द्वारा घाघरा से सटे गावों का 30 जून को दौरा करने पर यह पता चला कि,घाघरा से सटे 7 गांव हैं, जहां पुलिस गई थी, पर उनमें से केवल 3 से 4 गांवों में पत्थलगड़ी हुई थी. पुलिस जब उन गावों में घुसी जहां पत्थलगढी हुई थी, तब अर्धसैनिक बलों द्वारा इन गांवों में लोगों को मारा-पीटा गया, जिसमें एक व्यक्ति मारा गया, कुछ लोगों को चोट पहुंची और एक बच्ची का हाथ भी टूट गया. कुल 150 से 300 लोगों को हिरासत में लिया गया जिसमें महिलायें भी काफी संख्या में थीं. बांकि के लोग पुलिस के आने की सूचना पाकर अपने घरों को छोड़ कर चले गए थे. जबकि, अन्य गांवों में जहां पत्थलगढ़ी नहीं हुई थी, वहां पुलिस ने लोगों के घर में घुसकर तलाशी ली. फैक्ट फाइंडिंग टीम ने घाघरा में भी घुसने की कोशिश की पर वहां पर भारी संख्या में जवान तैनात थे. उन्होंने यह कह कर फैक्ट फाइंडिंग टीम को रोक दिया कि एस0 पी0 की अनुमति के बिना हम वहां नहीं जा सकते. हमने एस0 पी0 से संर्पक करने की कोशिश की पर वे हमें नहीं मिले.
 29 जून को गार्ड को रिहा कर दिया गया, इसके बावजूद 30 जून तक घाघरा में भारी मात्रा में पुलिस तैनात थी. पुलिस ने प्रेस कान्फरेंस में कथित गैंग रेप के आरोपियों का वीडियो जारी किया और जिस व्यक्ति बाजी सामंत का फोटो दिखाया वह पत्थलगड़ी से जुड़ा व्यक्ति नहीं बल्कि पी0 एल0 एफ0 आई0 का मेंबर है.
फैक्ट फाइंडिंग टीम की जांच से उठते कुछ सवालः
 पुलिस को कथित तौर पर गैंग रेप की घटना की जानकारी सबसे पहले कब और किसके द्वारा मिली?
 पुलिस के अनुसार, वह पीड़ित महिलाओं से पहली बार 21 जून को मिली और वह पीड़ित महिलाओं को मेडिकल जांच के लिए 21 जून को ले गई. जबकि सदर अस्पताल, खूंटी के मुताबिक 20 जून को दो पीड़ित महिलाओं की मेडिकल जांच की गई, वहीं 21 जून को पांचों पीड़ित महिलाओं की मेडिकल जांच फिर से की गई. पुलिस और सदर अस्पताल, खूंटी के द्वारा बताए गए तत्थों में अनियमितता क्यों है?
 जब पुलिस के पास कथित तौर पर घटे गैंग रेप आरोपियों का वीडियो था, तो उन्होंने अज्ञात लोगों या पत्थलगढ़ी समर्थकों के खिलाफ केस क्यों दर्ज किया?
 पुलिस घाघरा में जहां पत्थलगढ़ी को लेकर ग्राम सभा हो रही थी वहां घुसने की कोशिश यह कह कर क्यों की, कि वहां कथित तौर पर घटे गैंग रेप के आरोपी आ रहे हैं? जबकि उन्हें पता है कि रेप का एक आरोपी बाजी सामंत दूसरे इलाके (खरसावां,सराईकेला) का रहने वाला है.
 पुलिस ने पीड़ित महिलाओं के द्वारा पकड़े गए कथित तौर पर गैंग रेप के आरोपियों की शिनाख्त क्यों नहीं करवाया? और जिन तीन आरोपियों के लिए वह छापेमारी कर रही है, उसकी शिनाख्त पीड़ित महिलाओं द्वारा ना करवा कर पुलिस की हिरासत में लिए गए दो आरोपियों द्वारा क्यों करवा रही है?  पीड़ित महिलाओं को प्रशासन की हिरासत में अब तक क्यों रखा गया है और उन्हें किसी से मिलने क्यों नहीं दिया जाता है?
 नुक्कड़ नाटक करवाने वाली संस्था का संचालक जिसने एक एफ0 आई0 आर0 दर्ज किया है, वह कौन है और एफ0 आई0 आर0 दर्ज कराने के बाद वह कहां गायब हो गया है? क्या वह प्रशासन की हिरासत में है?
फैक्ट फांडिंग टीम की जांच के कुछ निष्कर्ष
 इस पूरे मामले में पीड़ित महिलाओं (जिनमें कुछ शादीशुदा हैं और उनके बच्चे भी हैं) का पक्ष पूरी तरह से गौन है. उनके परिवारों द्वारा मामले में कोई भी बयान नहीं आया है. हमने यह भी पाया कि, पीड़ित महिलाओं के परिवारों को पुलिस द्वारा घटना की जानकारी नहीं दी गई है.
 सरकार एवं स्थानीय पुलिस प्रशासन द्वारा पूरे मामले में गोपनीय तरीके से कार्यवाई की जा रही है. पीड़ित महिलाओं को सरकार की हिरासत में रखने के नाम पर किसी से मिलने नहीं दिया जा रहा है. अज्ञात आरोपियों के नाम पर पत्थलगढी के नेताओं को टारगेट किया जा रहा है और उनके खिलाफ छापेमारी की जा रही है. ये सभी चीजें पूरे मामले में अपनाई गई कानूनी और जांच की प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करती हैं, क्योंकि सभी जानकारियों का पुलिस प्रशासन ही एकमात्र स्त्रोत है. इससे केवल प्रशासन द्वारा दिखाया जाने वाला पहलू ही देखने को मिल रहा है. बांकि जानकारी के माध्यमों को बंद कर दिया गया है.
 इस पूरे मामले में मीडिया की भूमिका संदिग्ध रही है. मीडिया ने पूरे मामले में तत्थों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है. मामले में मीडिया ने पत्थलगढ़ी, आदीवासी समुदाय और चर्च एवं मिशन की संस्थाओं की नाकारात्मक छवि पेश की है.
 मीडिया और सरकार द्वारा चर्च एवे मिशन की संस्थाओं को फंसाने और बदनाम करने की कोशिश की गई है, इससे साफ पता चलता है कि तत्थों के साथ खिलवाड़ करके ऐसा किया गया है. इससे मामले से संबंधित सभी संस्थाओं के लोगों में भी भय का माहौल है.
 ये पीड़ित महिलाएं जिन संस्थाओं से संबंध रखतीं हैं, उन संस्थाओं को प्रेस या किसी से भी बात करने की स्वतंत्रता नहीं है. इन संस्थाओं में काम करने वाले लोगों को जिनका संबंध मामले से है, उन्हें संस्था के चारदीवारी से ना निकलने को कहा गया है. इन संस्थाओं के कर्मीयों को किसी भी बाहरी व्यक्ति से बात करने से मना किया गया है और संस्थाओं के अंदर किसी को भी घुसने की अनुमति नहीं दी गई है.
फैक्ट फांडिंग टीम की मांगें:
 फैक्ट फाइंडिंग की टीम कथित तौर पर घटे गैंग रेप की घटना की एक स्वतंत्र जांच एक उच्च स्तरीय जांच कमिटी द्वारा करवाने की मांग करती है. इस जांच को खूंटी प्रशासन से बिलकुल स्वतंत्र हो कर कराने की जरुरत है. इस जांच कमिटी में रिटायर्ड जज, वकील और महिला अधिकारों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता होने चाहिए.
 मामले की तहकीकात खूंटी पुलिस द्वारा ना करवा कर एक स्वतंत्र जांच द्वारा करवानी चाहिए.
 इस पूरी घटनाक्रम में, ऐसा मालूम पड़ता है कि प्रशासन द्वारा पीड़ित महिलाओं के पक्ष और उनकी इच्छा को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ और गौन कर दिया गया है. यह साफ नहीं है कि पांचों पीड़ित महिलाओं को उनकी मर्जी से पुलिस की हिरासत में रखा गया है या नहीं. इनमें से कुछ शादीशुदा हैं और उनके बच्चे भी हैं. इस मामले में खूंटी पुलिस और प्रशासन की संदिग्ध भूमिका को देखते हुए, यह तय है कि खूंटी पुलिस प्रशासन की देख-रेख में मामले की स्वतंत्र और निष्प्क्ष जांच संभव नहीं है. ऐसे में पीड़ित महिलाओं का खूंटी पुलिस और प्रशासन की हिरासत में रखना उनके लिए सुरक्षा की दृष्टि से सही नहीं होगा. महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए फैक्ट फाइंडिंग टीम की यह मांग है कि पांचों पीड़ित महिलाओं को खूंटी पुलिस और प्रशासन की हिरासत से निकाल कर राज्य द्वारा अपने संरक्षण में रखे या उन्हे अपने घर वापस जाने दिया जाए.
 इसके अलावा, कथित तौर पर घटे गैंग रेप की घटना के बाद घाघरा और आस -पास के गांवों में पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा किए गए दमन की भी स्वतंत्र जांच होनी की सख्त जरुरत है. पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा किए गए दमन के दौरान एक व्यक्ति की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए. इसमें यह जांच होनी चाहिए कि प्रशासन द्वारा बल प्रयोग करने की जरुरत थी भी या नहीं. और अगर थी तो जिस प्रकार से बल प्रयोग किया गया वह उचित था या नहीं.
 साथ ही, घाघरा और आस-पास के गांवों में जहां पत्थलगढी हुई है, वहां से पुलिस और अर्धसैनिक बलों को हटाया जाना चाहिए ताकि, इन गांवों में रहने वाले लोग अपने घरों को लौट पाएं. वे आज भी अपने घरों को लौटन में संकोच कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा वहां दोबारा हिंसा होगी. ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम में आम जिंदगी इन गांवों में ठहर सी गई है. बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं और लोग जीविका चलाने के लिए रोजमर्रा के काम- काज नहीं कर पा रहे हैं.

रिनचिन, राधिका, पूजा डब्ल0ू एस0 एस0 की फैक्ट फाइंडिंग टीम
यौन हिंसा व दमन के खिलाफ महिलाएं, नवंम्बर 2009 में गठित एक गैर-अनुदान प्राप्त ज़मीनी प्रयास है. इस अभियान का मकसद है – हमारे शरीर व हमारे समाज पर हो रही हिंसा को खत्म करना. हमारा नेटवर्क पूरे देश में फैला हुआ है और इसमें औरतें, अनेक राजनीतिक परिपाटियों, जन संगठनों, नारी संगठनों, छात्र व युवा संगठनों, नागरीक अधिकार संगठनों एवं व्यक्तिगत स्तर पर हिंसा व दमन के खिलाफ सक्रिय हैं. हम औरतों व लड़कियों के विरुद्ध किसी भी अपराधी/अपराधियों द्वारा की जा रही यौन हिंसा व दमन के खिलाफ हैं.
संपर्क: रिनचिन – 9516664520, पूजा – 6202157299

10 जुलाई

आदिवासियों के प्रति संवेदहीन है मीडिया

मीडिया में आज की तारीख में कुल मिलाकर प्रतिगामी शक्तियों का कब्जा है. उनमें अगड़ी मानसिकता के लोग भरे पड़े हैं, यह तो लगातार विमर्श का विषय बनता ही रहा है, लेकिन उसका चरित्र नस्ली भी है, इसका खुलासा पत्थरगड़ी और खूंटी से जुड़ी हाल की घटनाओं के एक तरफा प्रस्तुतीकरण से हो जाता है.
खूंटी में पांच महिलाओं के साथ पत्थरगड़ी आंदोलन से जुड़े लोगों ने बलात्कार किया, इस खबर को स्थानीय अखबारों ने तो गैर जिम्मेदाराना तरीके से लिखा ही, एनडीटीवी सहित तमाम राष्ट्रीय चैनलों और अखबारों ने दो दिन तक अपने चैनलों पर चलाया. लेकिन अब किसी चैनल या अखबार की दिलचस्पी इस बात में नहीं कि वे पांचों पीड़ित महिलाएं कहां हैं? किस हाल में हैं? अब तक वे सामने क्यों नहीं आई? वे पुलिस सुरक्षा में हैं या पुलिस हिरासत में? उनसे उनके परिजनों सहित किसी को भी मिलने क्यों नहीं दिया जा रहा है? कई फैक्ट फाइंडिंग कमेटियों की सदस्यों ने उन महिलाओं से मिलने की कोशिश की, लेकिन प्रशासन ने किसी से उन्हें मिलने नहीं दिया.
यह सही है कि कड़िया मुंडा के यहां से कुछ सुरक्षा गार्डों को पुलिस की प्रताड़ना से बौखलाई खूंटी की महिला आंदोलनकारी अगवा कर ले गयी, लेकिन उन्हें दूसरे दिन हथियार सहित मुक्त भी कर दिया गया. लेकिन इन घटनाओं को बहाना बना कर पुलिस-प्रशासन ने खूंटी के ग्रामीण इलाकों में जिस तरह तांडव किया, यह किसी भी जनतांत्रिक व्यवस्था के लिए शर्मनाक है. अभियुक्तों की तलाशी के नाम पर सैकड़ों घरों में पुलिस ने छापा मारा. औरतों, मर्दों के साथ मार- पीट, उन्हें हिरासत में लेकर ढ़ोर-बकरी की तरह हांकना. बेमतलब फायरिंग में एक की मौत. अभी खेती का समय है, लेकिन पुलिस-प्रशासन से आतंकित सैकड़ों गांव के लोग पलायन किये हुए हैं, यहां वहां छुपे हुए है. क्या यह राष्ट्रीय मीडिया के लिए गंभीर चिंता का विषय नहीं?
इस बात का भी कोई तर्क समझ में नहीं आता कि अपने गांव घर में आदिवासी पत्थरगड़ी क्यों नहीं कर सकते? वे आपके शहर में आकर तो चैक-चैराहों पर पत्थरगड़ी नहीं कर रहे, वे अपने घर-आंगन में गांव की सीमा क्षेत्र में पत्थरगड़ी कर रहे हैं. पांचवी अनुसूचि और पेसा कानून द्वारा दिये गये अधिकारों को लिपिबद्ध कर रहे हैं. हो सकता है, वे कुछ संविधान विरुद्ध बातें भी लिख रहे हों, तो आप उन पर कानून सम्मत कार्रवाई कीजिये. लेकिन घटनाक्रम जिस तरह है, उससे तो लगता है कि वे गैर कानूनी या असंवैधानिक कुछ नहीं कर रहे, इसलिए उनको कुचलने और उत्पीड़ित करने के लिए फर्जी मामले गढ़ने पड़ रहे हैं.
यह बात भी समझ से परे हैं कि मुंडाओं के एक आदिवासी इलाके में पुलिस का स्थाई कैंप बनाने में सरकार की क्यों रुचि है? क्या वह हिंसा का क्षेत्र है? वहां के नागरिकों ने सरकार से सुरक्षा की गुहार की है? आवेदन दिया है कि आप उनकी जानमाल की रक्षा के लिए एक स्थाई पुलिस कैंप बहाल करें? या वहां से आदिवासी गिरोह बना कर निकल कर आपके घरों में लूट पाट कर रहे हैं?
आदिवासी समाज सदियों से बिना पुलिस और शहर कोतवाल के चलता रहा है. पुलिस थानों की स्थापना वहां अंग्रेजों ने शुरु की, वह भी अपने निहित स्वार्थों के लिए. तो, भाजपा सरकार भी अपने निहित स्वार्थों के लिए सुदूर आदिवासी इलाकों में पुलिस थानों की स्थापना करना चाहती है? मीडिया ने कभी यह समझने की कोशिश की कि वे निहित स्वार्थ क्या हैं?
आदिवासी, गैर आदिवासियों को ‘दिकू’ कह कर संबोधित करते हैं. ‘दिकू’ यानी दिक-दिक करने वाला. यह बात हम गैर आदिवासियों को बहुत कचोटती है, लेकिन जिस तरह का व्यवहार सत्ता, पुलिस और मीडिया उनसे कर रहा है, उससे गैर आदिवासियों के प्रति उनकी नफरत घटेगी नहीं, बल्कि और बढ़ेगी. क्योंकि पुलिस प्रशासन हो या मीडिया, वहां वर्चस्व गैर आदिवासियों का ही है. और वे आदिवासी समाज के प्रति बेहद संवेदनहीन तरीके से व्यवहार कर रहे हैं.

17 जुलाई

सत्ता का खेल
रांची के निर्मल हृदय संस्था से कथित रूप में बेचे गये बच्चों की बरामदी हो गई और उन्हें उन्हीं अभिभावकों को लौटाया जा रहा है, जिन्हें कथित रूप से बच्चे बेचे गये. बस शर्त यह रखी गई कि उस बच्चे को हर सप्ताह बच्चे के अभिभावक चाईल्ड वेलफेयर सेंटर के कार्यालय में लेकर आवे, ताकि बच्चे के स्वास्थ आदि को अधिकारी देख सकें. दूसरी तरफ निर्मल हृदय संस्थान की दोनों सिस्टरों को जेल भेज दिया गया है. वैसे, यह सहज सवाल उठसकता है कि यदि इस प्रकरण में कोई अपराध हुआ तो अपराधी सिर्फ बेचने वाला कैसे हो गया?
खैर, हम उम्मीद करें कि कोर्ट में इस मामले का निष्पादन भी हो जायेगा.
इस प्रकरण से भाजपा की यह मंशा तो पूरी हुई कि ईसाई मिशनरियों की बदनामी हो, एक फायदा यह भी हुआ कि इस हंगामे में यह त्रासद तथ्य आम जनता की आंखों से ओझल हो गया कि झारखंड में शिशु मृत्यु दर बहुत ज्यादा है और कुपोषित बच्चों के लिहाज से तो स्थिति और भी भयावह.
पिछले वर्ष नवंबर माह में आई एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में जन्म के एक वर्ष के भीतर प्रति हजार में 29 बच्चे मर जाते हैं. यानी, तीन फीसदी नवजात बच्चे एक वर्ष की उम्र नहीं देख पाते.
जहां तक कुपोषित बच्चों का सवाल है, नैशनल फैमली हेल्थ सर्वे 15—16 के अनुसार झारखंड में पांच वर्ष की उम्र तक के 47.8 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, यानी उम्र के लिहाज से उनका वजन कम है. यह हालत तब है जबकि सरकार ने 2015 से ही ‘झारखंड पोषण मिशन’ चला रखा है जिसके तहत गर्भावस्था के 270 दिन सहित एक हजार दिनों तक जच्चा और बच्चा के स्वास्थ पर सरकार ध्यान रखती है.
हम उम्मीद करें कि ईसाई मिशनरियों से निबटने के बाद सरकार इस दिशा में काम करेगी.

20 जुलाई

वीडियो को मानवीय संवेदना के साथ देखने की जरूरत

पिछले दो दिनों से मिशनरीज आॅफ चैरिटीज की एक सिस्टर का वीडियो सोशल मीडिया पर घूम रहा है. इस वीडियो को ही एनडीटीवी सहित कई न्यूज चैनलों ने दिखाया और इसे बच्चों को बेचे जाने वाले प्रकरण में एक बड़ा मोड़/खुलासा बताया. हालांकि इस वीडियों से ही इस बात के संकेत मिलते हैं कि झारखंड सरकार स्थानीय प्रशासन और पुलिस का इस्तेमाल कर ईसाई मिशनरियों को बदनाम करने का घृणित खेल खेल रही है. इस साजिश को समझने के लिए किसी खुफिया यंत्र की जरूरत नहीं, न बहुत ज्यादा भागदौड़ करने की ही जरूरत है, बस इस वीडियो को ही थोड़ी मानवीय संवेदना के साथ देखने और समझने की जरूरत है.
सबसे पहला सवाल तो यह उठता है कि यह वीडियो सोशल मीडिया तक आया कैसे? इस वीडियो को बनाया किसने? देखने से तो यही लगता है कि सिस्टिर से कोई अधिकारी कड़ाई से पूछ ताछ कर रहा है और सिस्टर घुटे स्वर में बच्चा बेचने का अपराध स्वीकार कर रही हैं. अब सिस्टर तो इस प्रकरण के उद्घाटन के बाद से ही पुलिस की गिरफ्त में हैं. जाहिर है, यह पूछताछ पुलिस कस्टडी में ही की जा रही है. तो क्या पुलिस ने ही यह वीडियो बनाया और सोसल मीडिया पर लीक किया? यदि पुलिस ने बनाया तो उसे कोर्ट में पेश किया जाना है या सोशल मीडिया पर? इसका अर्थ तो यह हुआ कि बिना कोर्ट द्वारा अपराध की पुष्टि हुए हुए सिस्टर और मिशनरीज आॅफ चैरेटीज को दुनिया भर में बदनाम करने का काम झारखंड की भाजपा सरकार कर रही है?
वैस, हमारे कुछ बुद्धिमान मित्र कहेंगे कि अब वीडियो जिस तरह से भी सामने आया हो, उसमें सिस्टर अपराध स्वीकार करती दिखती तो हैं. उन्हें यह यह बताने की जरूरत नहीं कि पुलिस थानों में किसी को भी दो चार थप्पड़ लगा कर कुछ भी कबूलवाया जा सकता है. बावजूद इसके अभी हम यह नहीं कहेंगे कि बच्चा बेचे जाने का आरोप गलत ही है. पुलिस प्रशासन को किसी भी सूत्र से यदि इस तरह की शिकायत मिली है तो इसकी जांच होनी चाहिये. लेकिन इस बात की भी जांच होनी चाहिये कि यह वीडियो कैसे बनी, किसने बनाई और सोशल मीडिया पर कैसे जारी हुई?
उल्लेखनीय है कि सोशल मीडिया पर इस वीडियो के आने के पहले विशप मास्केरेनहैस एक प्रेस कंफ्रेंस कर इन आरोपों को गलत कह चुके हैं और न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठा चुके हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि गिरफ्तार सिस्टर के वकील को एक स्प्ताह तक अपने मुवक्क्लि से मिलने नहीं दिया गया. और उसके बाद जब वे सिस्टर से मिल पाये तो सिस्टर ने जानकारी दी कि उनसे जबरदस्ती दबाव देकर ‘कनफेशनल स्टेटमेंट’ लिया गया.
यहां यह बताना प्रासांगिक होगा कि खूंटी के कथित बलात्कार कांड में भी ईसाई मिशन द्वारा चलाये गये स्कूल के प्राचार्य और ननों को बदनाम करने की साजिश हुई है. पूरे प्रकरण को राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखने की भी जरूरत है. देश में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से अल्पसंख्यकों और दलितों पर लगातार आक्रमण हो रहे हैं. दलितों पर हो रहे अत्याचार की खबरें छपती रहती है. गोरक्षा के नाम पर ‘माॅब लिचिंग’ में मुस्लिम समुदाय के लोग मारे जा रहे हैं. विडंबना यह कि इन पर शर्म खाने की जगह भाजपा के नेता हत्यारों का माला पहना कर स्वागत करते हैं. केंद्र सरकार के मंत्री दंगाईयों से जाकर मिलते हैं.
दरअसल, यह वोट की राजनीति के लिए किये जा रहे उपक्रम हैं. यदि नहीं, तो सरकार को तत्काल झारखंड में हुई हाल की घटनाओं की उच्चस्तरीय जांच करनी चाहिये. जांच का काम स्थानीय पुलिस प्रशासन नहीं कर सकती. उनकी भूमिका संदेह के घेरे में है. बाबूलाल मरांडी सहित विपक्षी दलों के नेताओं ने इन मामलों की सीबीआई जांच की मांग की है.
क्या सरकार इन मामलों की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच करायेगी?

28 जुलाई

“अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे”
भाजपा सरकार ने खूंटी वाली खबर पर सोसल मीडिया में लिखने के लिए 19 अन्य साथियों के साथ मुझ पर भी एफआईआर दर्ज किया है. चलिए, काई अब यह तो नहीं कहेगा कि 74 के जेपी आंदोलन और वाहिनी धारा के लोग आदिवासी मुद्दों पर मुखर नहीं..