टीस

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रामदयाल को नींद नहीं आ रही थी. कुल्हें के फोड़ें से रह रह कर उठते टीस की वजह से या सुबह- सुबह उस संघ प्रचारक की अहंकार में डूबी बातों की वजह से, यह तय करना मुश्किल था. फोड़ा दो दिन पहले तक महज मटर के दाने के बराबर था. कोई खास दर्द भी नहीं. नहाते वक्त हाथ कुल्हे पर गया तो मटर का वह दाना हाथ आया. उसने साबुन उस दाने पर मला और रगड़ कर साफ किया कि यदि मवाद हो तो बह जाये. लेकिन वैस कुछ नहीं हुआ. उल्टे मटर के दाने बराबर फोड़ा मानों चुटीला हो कर कुछ और उभर आया. और दो दिनों में इस कदर विकराल हो गया कि अब न सोते बन रहा था, न बैठते.
रामदयाल अपने गांव क्या उस पूरे इलाके के उन गिने चुने लड़कों में से था जिसने उस साल मैट्रिक की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की और रांची के कालेज में आकर पढने लगा था. कुछ मित्रों के साथ वहां के हास्टल में रहता. लंबा कद, सुगठित बदन, बड़े-बड़े बाल और भावपूर्ण आंखें. अपनी ठहरी हुई आवाज और गंभीर मुद्रा की वजह से वह अपनी उम्र से बड़ा दिखता. पढाई में जितना तेज, खेल कूद में भी उतना ही आगे और मांदल तो ऐसा बजाता कि लोगों के पैर थिरक उठने के लिए मचल जाये. लेकिन सबसे अधिक उसे मजा आता बौद्धिक प्रश्नों से उलझने और लोगों से बहस करने में.
हमेशा की तरह पिछले शनिवार की शाम अपने गांव चला गया था और गांव में ही टकरा गया था उस संघ प्रचारक से जो अपर बाजार के कुछ सेठों के साथ गांव में पहुंचा हुआ था. चैरस्ते पर कई खाट डाल दिये गये थे जिन पर वह दल-बल के साथ बैठे हुये थे और चारो तरफ गांव की औरतों, मर्दो, बच्चों का एक घेरा बन गया था. सेठ लोगों को राम-सीता की फ्रेम में जड़ी तस्वीर दिखा कर बोल रहा था- देखो, इस तस्वीर की ही जैसी एक मूर्ति लगेगी मंदिर के बीचो बीच. मंदिर के साथ एक स्कूल और होमियोपैथी चिकित्सालय भी. मंदिर बनाने में जो भी खर्च आयेगा, वह हम करेंगे.’
सामने बैठे एक युवक ने थोड़ी रुखाई से कहा- ‘हम मंदिर नहीं जाते.’
गेरुआ वस्त्रधारी संघ प्रचारक ने चिंतित हो उसकी तरफ देखा. उन्हें इस बात की जानकारी थी कि आदिवासी ईसाई मिशनरियों के शाॅफ्ट टारगेट हैं और रांची तथा उसके आस पास के ग्रामीण इलाकों में उनका गहरा प्रभाव है, जो तेजी से बढ भी रहा है. फिर भी वे खामोश रहे और स्थिति का जायजा लेते रहे. जवाब दिया उसी सेठ ने.
‘ देखों, हमारा और तुम्हारा रिश्ता सदियों पुराना है. रामलला अपने भाई लक्ष्मण और सीता मईया के साथ जब वन-वन भटक रहे थे और दुराचारी रावण जब सीता मईया को हर ले गया था, तब तुम वनवासियों की मदद से ही सीता मईया को खोज निकाला था राम ने और सोने की लंका पर आक्रमण कर रावण को मारा और सीता मईया को छुड़ाया. राम के परम शिष्य पवनपुत्र हनुमान ने ही तो सीता का पता लगाया था. तो, हम उसी राम के वंशज हुए और तुम सब उसी वीर हनुमान के. इस चित्र में हनुमान भी तो हैं.’
नजदीक बैठे लोगों ने लालमुंह और लंबी पूछ वाले हनुमान को देखा और चमत्कृत हुए. कुछ लोगों ने उन्हें पहले भी देख रखा था और यह सुन रखा था कि हनुमान चालीसा पढने से भूत-प्रेत निकट नहीं आता है. लेकिन भीड़ में दोस्तों के साथ पीछे खड़े रामदयाल को इस बात से वितृष्णा सी हुई. ‘हमे मनुष्येतर जीव बता रहे हैं और चाहते हैं कि हम खुश हो जायें.’ लेकिन वह खामोश रहा. उसके काका सस्वर रामायण का पाठ करते थे. रामदयाल को अच्छा ही लगता था सुन कर. लेकिन आज न जाने क्यों हनुमान के वंशज बताये जाने से उसे गहरे अपमान का बोध हुआ. वह कुछ बोलता, इसके पहले ही वह संघ प्रचारक बोलने लगा.
‘इसमें तुम लोगों का दोष नहीं. हमारा ही दोष है कि हम अपने वनवासी भाईयों की सुध नहीं रख सके. और आज यह हालत है कि तुम भूल गये कि तुम भी हिंदू ही हो. देखो, हम सब एक जैसे ही दिखते हैं. नहीं?’
रामदयाल अब तक खामोशी से उनकी बात सुन रहा था. बिना किसी उत्तेजना के बोला- ‘ दिखते तो हम सब एक जैसे हैं. क्या हिंदू, क्या मुसलमान, क्या सिख और क्या ईसाई.. . लेकिन हम सब अलग हैं. अलग-अलग धर्म को मानने वाले. अलग अलग भाषाएं बोलने वाले. हमारे रहन-सहन का तरीका अलग-अलग है.’
संघ प्रचारक ने मृदु स्वर में पूछा- ‘तुम्हारा कौन सा धर्म है. उसकी उत्पत्ति कब और कैसे हुई?’
रादयाल निरुत्तर हो गया. उसने इस मुद्दे पर बहुत गंभीरता से नहीं सोचा था. उसने अपने गांव में बचपन से सघन वृक्षों के नीचे अपने समुदाय के लोगों को पूजा करते बस देखा था.
‘हम प्रकृति पूजक है. जंगल में साल वृक्ष के नीचे पूजा करते हैं. पहाड़ हमारा भगवान. मंदिर नहीं जाते हमारे लोग.’
संघ प्रचारक बोला -‘ हिंदू धर्म की अनेक शाखायें हैं. इसमें ईश्वर के सगुण रूप के उपासक हैं. निर्गुण रूप के उपासक हैं. प्रकृति पूजक भी. तुमने बड़ पेड़ की पूजा करती औरतों को नहीं देखा है. शिवलिंग तो छोटा पहाड़ ही है.’
रामदयाल थोड़ा तिक्त हो उठा.
‘योनी और लिंग का यह प्रतीक चिन्ह पहाड़ है?’
अबकि निरुत्तर हो जाने की बारी संघ प्रचारक की थी. उन्होंने बात संभालते हुए कहा -‘ वाह, तुम तो बहुत समझदार निकले. स्कूल-कालेज में आज कल यही सब पढाई होती है? वैसे, तुम जब इतने समझदार हो तो यह भी जानते होंगे कि शिवलिंग भगवान शंकर को ही कहते हैं और शंकर अनार्यों के ही देवता थे जिसे हम आर्य भी श्रद्धापूर्वक पूजते हैं. इस तरह भी तुम आदिवासी हिंदू ही हुए. फिर मंदिर बनने में क्या आपत्ति?’
‘ आपत्ति यह कि अब मंदिर के नाम पर आपको जमीन की दरकार होगी. आदिवासियों की जमीन इसी तरह तो हड़पी जाती है.’
‘नहीं भाई. हम किसी से जमीन नहीं मांगेंगे. पहाड़ी की तराई में टाड़ जमीन पर मंदिर बनेगा. फिर शिशु मंदिर और होमियोपैथी दवाखाना भी तो. इसके अलावा यदि तुम लोग कोई यूथ क्लब बनाओ तो हम उसमें भी मदद करेंगे.’
बात ज्यादा देर नहीं चल पाई. वे लोग कुछ देर में रुखसत हो गये.
गांव के कुछ लोगों को मंदिर बनने में कोई बुराई नजर नहीं आ रही थी. लेकिन रामदयाल और उसके युवा साथी कृतसंकल्प थे कि वे मंदिर नहीं बनने देंगे गांव के करीब. वैसे, वे यह भी जानते थे कि सेठ लोग आसानी से नहीं मानेंगे. वे बार-बार यहां आयेंगे. गांव वालों को समझायेंगे. रामदयाल और उसके साथी अभी छोटे हैं. गांव पर उनका वैसा प्रभाव नहीं.
रामदयाल के एक अन्य साथी ने अगली सुबह रांची लौटते वक्त रामदयाल से कहा भी – ‘ मंदिर बनने में क्या हर्ज है? सेठ हमे क्लब चलाने में भी मदद करेगा. कितने दिनों से हम एक जोड़ी मांदल और नगाड़ा जुटाना चाहते हैं.. .’
लेकिन रामदयाल को अपर बाजार के सेठों से बेहद नफरत है. रांची की छाती पर नया-नया विकसित हुआ मकड़ जाल सा अपर बाजार. संकरी गलियां. पक्के मकान-दुकान. कपड़े-गल्ले के थोक व्यापारी. तरह तरह के उपभोक्ता सामानों की छोटी बड़ी दुकाने. काउंटर पर गाव तकिया लगा कर बैठा सेठ. गली में स्थूलकाय औरतों को बिठा कर रिक्शा खींचते आदिवासी. सामान से लदे ठेले को खींचते मजूर जो सेठों की नजर में कीड़ें-मकोड़ों से भी तुच्छ थे. सबसे बड़ा आश्चर्य की इतना बड़ा बाजार लेकिन एक का भी मालिक कोई आदिवासी नहीं. वैसे, यह नजारा रामदयाल को आस पास के इलाकों में लगने वाले हाट बाजारों में भी दिखाई देता. वहां भी यही के दुकानदार-व्यापारी दुकान सजा कर आ बैठते. गांव में उत्पादित वस्तुओं को, वन उत्पादों को वे ग्रामीणों से ही सस्ते दर पर खरीद लेते और उसे ही शहर के बाजार में महंगे दाम में बेचते. वे गलियों में फेरी लगा कर अपना मनिहारी सामान बेचने वाले सेठ बन गये थे और आदिवासी पहले की तरह विपन्न.
आदिवासी कभी सेठ बन पायेगा? यह कल्पना करके ही रामदयाल के चहरे पर हंसी की लहर दौड़ गई.
‘हंस क्यों रहे हो.’
‘कल्पना कर रहा हूं कि तुम किसी आढती की दुकान पर गाव तकिया लगाये सेठ की तरह बैठे हो. भैरव मुंडा नहीं, भैरव सेठ..’
ल्ेकिन अगले पर गंभीर हो गया रामदयाल.
‘नहीं, बनिया बनने में अभी हजार वर्ष लगेगें आदिवासी को. और बनिया बनना जरूरी क्यों है? हम तो मेहनतकश इंसान ही बने रहना चाहते हैं.’
भैरव को अपना यह साथी अजीब लगता कभी-कभी. क्या-क्या सोचता रहता है? कैसी बातें करता है? लेकिन उसकी बुद्धिमत्ता पर उसे गर्व भी होता.
बस आ गई थी. दोनों दोस्त उस पर सवार हो गये. पतली इकहरी और दोनों तरफ हरियाली से लदी सड़क पर वह बस चल पड़ी. कुछ घंटों में वे रांची पहुंच गये. दिन तो कालेज में बीता लेकिन देर शाम रामदयाल के कमरे में एक बार फिर दोस्त जम गये. हमेशा की तरह भैरव भी. उसने संक्षेप में अन्य दोस्तों को आज सुबह गांव में घटित प्रकरण का ब्योरा सुनाया और रामदयाल से पूछा -‘ तो क्या कहते हो. गांव में क्लब बनाया जाये?’
‘क्लब तो बनेगा, लेकिन हम गांव की मदद से ही यह काम करेंगे. किसी सेठ से मदद नहीं लेंगे.’
भैरव ने बात बदल दी.
‘अच्छा रामदयाल, आदिवासी हिंदू नहीं?’
रामदयाल हंसा.
‘दिखाओं, कहां है तुम्हारी टीक.’
‘टीक!’
‘हां, हिंदुओं के सर पर पीछे एक लंबी चोटी होती है. उसे टीक कहते हैं.’
‘तो तुमने यह बात उस समय सेठ से क्यों नहीं कही? उस वक्त तो चुप्पी साध ली थी.’
‘देखों, हम सब मनुष्य है. लेकिन अलग अलग जैविक परिस्थितियों में रहने वाले. अपने अपने हिसाब से चलने वाले. कोई मंदिर में पूजा करता है. कोई मस्जिद में तो कोई चर्च में. हम प्रकृति पूजक है. प्रकृति के खुले प्रांगण में पूजा करते हैं. क्योंकि हमारे पूर्वजों की समझ है कि सबसे पूजित है पहाड़. सबसे पहले समुद्र से वही निकल कर बाहर आया. फिर उसके आदेश से केकड़े और कछुये और केंचुए ने समुद्र की तल से मिट्टी निकाला और पहाड़ के आस पास फैला दिया. उससे बनी पृथ्वी. फिर जल और स्थल के संसर्ग से तरह तरह के जीव जंतु पैदा हुए. आदि नर और मादा. हम उन्हीं की संतान है. और पहाड़ इसलिए सबसे ज्यादा पूजित.’
जयप्रकाश को यह सब अनूठा लगा. खास कर रामदयाल के मुंह से सुन कर, जो उनके समूह में सबसे अधिक प्रबुद्ध था. उसने थोड़ा उत्तेजित स्वर में कहा -‘ यह तुम कह रहे हो. तुम भी इस तरह की कहानियों पर विश्वास करते हो?’
रामदयाल पूर्ववत शांत स्वर में बोला -‘ विज्ञान के नित नये खोज से कल्पना का अंत हो जाता है. लेकिन ऐसी कहानियां सभी धर्मावलंबियों के पास है. ईसाईयों के पास आदम और हब्बा की कहानी, सात दिनों में सृष्टि के जन्म की कहानी, हिंदुओं के पास ब्रह्मा के मुंह से ब्राह्मण और पैर से शूद्र के पैदा होने की कहानी, मुसलमानों की खुदा की मर्जी से कायनात के प्रकट होने की कहानी. हमारे पास भी एक कहानी है और मेरी समझ से इन सब कहानियों से अधिक वैज्ञानिक, तर्कसंगत.
अचानक पीड़ा की एक लहर सी दौर गई उसके बदन में और वह कुर्सी से उठ कर चहल कदमी करने लगा.
‘क्या हुआ रामदयाल?’
‘बहुत दर्द कर रहा है फोड़ा. बस में लगातार सीट के हत्थे से टकराता रहा. फूट जाये तभी शायद आराम मिले.’
‘देखें जरा घाव को.’
रामदयाल ने कमर से बंधी धोती को थोड़ा नीचे कर दिया और पीछे मुड़ कर घाव को देखने की कोशिश करने लगा. लेकिन वह थोड़ा सा हिस्सा ही देख पाया. साथियों ने देखा कि फोड़ा विकराल रूप ले चुका था और मुंह पर बेहद लाल.
‘लगता है अस्पताल जाना पड़ेगा. किसी तरह रात काटो. कल सुबह आठ बजे सदर अस्पताल चलेंगे.’
एक-एक कर सभी दोस्त रुखसत हो गये. रामदयाल कमरे में बेचैन से टहलता रहा.
अगली सुबह सभी समय से पहले अस्पताल के लिए रवाना हो गये. रामदयाल रात भर सो नहीं सका था. साथी ने पूछा -‘ रिक्शा कर लूं.’
‘नहीं, कौन सा दूर जाना है. चलो चलते हैं.’
फिरायालाल तब भी था, लेकिन ऐसी गहमा गहमी नहीं थी. बगल में एक मंदिर और करीब ही एक खपरैल के मकान में चलता सदर अस्पताल. थोड़ी देर में डाक्टर झा पहुंच गये. रामदयाल को देखा और बोले – ‘चलो ड्रेसिंग रूम में. घाव को साफ कर मवाद निकालना होगा. मैं कुछ मरीजों को देख कर आता हूं.’
डाक्टर झा ही उस अस्पताल के सर्जन भी थे. उन्हें मरीजों को निबटा कर आने में एक घंटे लग गये. उस बीच ड्रेसिंग रूम के बरामदे में रामदयाल और उसके साथी कभी बैठते, कभी चहलकदमी करते रहे. कुछ देर में डाक्टर झा पहुंच गये.
‘अरे, खड़े क्यों हो. स्ट्रेचर पर लेट जाओ पट हो कर.. .’
रामदयाल स्टील के एक ट्रे में रखे चीड़ फाड़ के औजारों को देख रहा था. डाक्टर की बात सुन स्ट्रेचर पर पट हो लेट गया.
कंपाउंडर ने पैट को कमर को नीचे सरका दिया. मवाद से भरा फोड़ा बाहर झांकने लगा. उसने रूई को चिमटे से पकड़ा और दवा में डुबो कर दस्ताना पहन रहे डाक्टर से फुसफुसा कर कहा -‘ सर, लोकल एनेस्थीसिया नहीं दे देना चाहिये. बड़ा सा नासूर है. बहुत दर्द करेगा.’
डाक्टर झा हो-हो कर हंस पड़े.
‘ अरे, ये आदिवासी बहुत जब्बर जान होते हैं. कुछ नहीं होगा. पांच मिनट का काम है. जरा कस कर पैरों को घुटनों के पास दबाना.. . अरे भाई तुम लोगों से भी कह रहा हूं.’
एक तरफ से कंपाउंडर ने दबोचा, दूसरी तरफ से रामदयाल के ही दोस्तों ने और नश्तर चल गया. पीड़ा की एक गहरी लहर उठी जख्म से और पूरा जिस्म थरथरा गया रामदयाल का. कंठ की चीख घुट कर रह गई.
डाक्टर ने कहा था, मामला पांच-सात मिनट का है, लेकिन उन्हें काफी समय लग गया था. और उस दौरान रामदयाल असह्य पीड़ा को दम साधे भोगता रहा. ड्रेसिंग के बाद उन्होंने रामदयाल से कहा- ‘कुछ देर आराम कर लो. मैं दवा लिख दे रहा हूं. खा लेना. ठीक हो जाओगे.’ कहते हुए डाक्टर झा कमरे से निकल गये.
रामदयाल बहुत देर तक मतिशून्य सा स्ट्रेचर पर पड़ा रहा. फिर दोस्तों के सहारे कमरे से बाहर निकला.
‘चलो डाक्टर से मिल लेते हैं.’
‘क्या करना है मिल कर?’
ल्ेकिन रामदयाल नहीं माना. वह डाक्टर झा के कमरे में गया.
‘धन्यवाद डाक्टर साहब.. .’
डाक्टर ने मुस्कुरा कर उसकी तरफ देखा.
रामदयाल के अंतरमन से एक टीस सी उठी -‘ आदिवासी को भी दर्द होता है डाक्टर..’
लेकिन उसने जब्त कर लिया.
‘उन्हें यकीन नहीं होगा… .’

समाप्त.

 

आदिवासी मुद्दो से विमुख आदिवासी जन प्रतिनिधि

आदिवासी राजनीति उठान पर है. आदिवासी अस्मिता, संस्कृति और पहचान के नाम पर ही सन 2000 में तीन आदिवासीबहुल राज्य- झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड- अस्तित्व में आये. आंध्र प्रदेश से कट कर तेलंगाना राज्य भी आदिवासीबहुल राज्य ही है. इसके अलावा संसद में कम से कम एसटी सीटों से जीत कर पहुंचे 47 आदिवासी हमेशा मौजूद रहते हैं. बावजूद इसके आदिवासियों के अस्मिता और अस्तित्व का सवाल अनुत्तरित रह जाता है तो इसके तह तक जाने की जरूरत है. लेकिन यह मशक्कत करना नहीं चाहते आदिवासी युवा. उन्हें लगता है कि ‘जय आदिवासी’ कहने भर से काम चल जायेगा.
आदिवासी समाज धीरे-धीरे जंल, जंगल, जमीन पर नैसर्गिक अधिकार से वंचित हो कर विस्थापन का दंश भोग रहा है और अपने घर से बेघर हो दर- दर भटक कर अकाल मृत्यु की तरफ बढ़ रहा है, यह किसी को दिखाई नहीं दे रहा. समाज का अभिजात तबका, तो मान कर चलता है कि विकास के लिए के लिए किसी न किसी को तो कुर्बानी देनी ही होगी, आदिवासियों के प्रति संवेदना दिखाने के बावजूद उनके हितों के लिए कटिबद्ध नहीं और उन्हें मुख्यधारा में शामिल होने की सलाह देता रहता है, लेकिन त्रासद तो यह कि आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों से जीत कर जाने वाले जनप्रतिनिधि भी आदिवासी हितों को लेकर उतने ही उदासीन है.
जल, जंगल, जमीन से जुड़े किसी भी बड़ी लड़ाई में आदिवासी जनप्रतिनिधि या क्षेत्रीय दल शामिल नहीं होते. बड़े बांधों से होने वाले विस्थापन के खिलाफ किसी भी लड़ाई में राजनीतिक दलों के आदिवासी नेता सामान्यतः शामिल नहीं रहे, नेतरहाट में फायरिंग रेंज के खिलाफ आंदोलन जन संगठनों द्वारा चल रहा है. ओड़िसा के कलिंग नगर में टाटा कंपनी के खिलाफ आंदोलन हो या पोस्को व नियमगिरि में चल रहा आंदोलन, जन संगठनों द्वारा संचालित आंदोलन है. कहा जा सकता है कि आदिवासी जनता अपने दम पर लड़ रही है, आदिवासी जनप्रतिनिधियों का समर्थन उन्हें सामान्यतः नहीं मिलता.
झारखंड में डोमेसाईल नीति न प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी बनवा सके, न अपने मुख्यमंत्रित्व काल में झामुमो नेता हेमंत सोरेन. जब मोदीजी के सत्ता में आने के बाद भूमि अधिग्रहण कानून में केंद्र सरकार ने संशोधन किया तो उसका देश भर में विरोध हुआ और सरकार को वह संशोधन वापस लेना पड़ा. लेकिन वही संशोधन झारखंड विधानसभा में पारित होकर कानून बन गया और आदिवासी विधायक और सांसद उसे रोक नहीं सके.
सवाल उठता है कि आदिवासी सांसद या विधायक जन आंदोलनों में शामिल क्यों नहीं हो पाते? इसका जवाब बहुत सरल और स्पष्ट है. विडंबना यह कि आदिवासी जनता और बुद्धिजीवी इसे समझना नहीं चाहते, क्योंकि इससे खुद उनका अस्तित्व- जो अस्मितावादी आंदोलन की ही वजह से बना हुआ है, खतरे में पड़ जायेगा. अभी भी आदिवासी समाज का एक बड़ा तबका यह समझता है कि यदि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री आदिवासी हो जाये तो आदिवासियों का कल्याण हो जायेगा. हालांकि झारखंड में कुछ वर्षों पूर्व तक आदिवासी मुख्यमंत्री ही रहे, लेकिन कारपोरेट से सर्वाधिक एमओयू उनके जमाने में ही हुए.
वे इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं कि संसदीय राजनीति दलों पर आधारित है. इस व्यवस्था में दलों का वर्चस्व होता है. पार्टी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में टिकट देती है, विधायक बनने के बाद यदि बहुमत में आये तो मंत्रिपद देती है. नेताओं के तमाम शानोंशौकत पार्टी के ही बदौलत है और इसके बदले उसे पार्टी की नीतियों का समर्थन भी करना पड़़ता है. यह हमारी संसदीय व्यवस्था की खौफनाक सच्चाई है कि प्रत्याशी जनता के वोट से चुना तो जाता है लेकिन वह जनता का प्रतिनिधि नहीं, पार्टी का गुलाम होता है. इसलिए यदि कोई आदिवासी भाजपा या कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ कर सदन में पहुंचता है तो वह उन नीतियों का समर्थन करने के लिए बाध्य होता है. यानी, भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ कर जन प्रतिनिधि बनने वाला भगवा रंग में रंग जाता है और उन्हीं आर्थिक नीतियों का समर्थन करता है जिस पर भाजपा चल रही होती है. बल्कि पार्टी के प्रति वफादारी दिखाने के लिए वह और ज्यादा प्रतिक्रियावादी बन जाता है.
एक बात और बारीकी से समझने की जरूरत है. आरक्षित सीटें इस बात को सुनिश्चित करती हैं कि उन पर कोई दलित या आदिवासी ही खड़ा होगा. अब किसी क्षेत्र विशेष से यदि झामुमो और भाजपा अपने अपने प्रत्याशी खउ़ा करती है तो क्षेत्रीय पार्टी, यानी झामुमो तो क्षेत्रीय सवालों और आदिवासी मुद्दों की बदौलत चुनाव में वोट प्राप्त करती है, लेकिन वही खड़ा भाजपा प्रत्याशी, जो आदिवासी ही होता है, कुछ वोट तो आदिवासी समुदाय का भी काटता है और उसी सीट पर आदिवासी के विरुद्ध गोलबंद हुए गैर आदिवासियों का वोट प्राप्त कर जीत जाता है. कोई आश्चर्य नहीं कि देश में आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में से 31 सीटों पर भाजपा प्रत्याशी की जीत हुई.
दूसरी तरफ क्षेत्रीय आदिवासी दलों की मजबूरी यह है कि वे इस तथ्य को समझने लगे हैं कि सिर्फ आदिवासी मतों की बदौलत वे चुनाव नहीं जीत सकते. यदि जीत भी गये तो सरकार बनाने के लिए ऐसे दलों की मदद लेनी पड़ेगी जो आदिवासी मुद्दों के प्रति गंभीर नहीं या प्रतिकूल भाव रखते हैं. परिणाम यह होता है कि वे गैर आदिवासी वोटों या गैर आदिवासी दलों के समर्थन के लिए आदिवासी सवालों को मजबूती से उठाने में हिचकते हैं. इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है यह तथ्य कि तेलंगाना बनते ही चंद महीनों बाद वहां डोमेसाईल नीति की घोषणा हो गई, लेकिन झारखंड में भाजपा के मुख्यमंत्री के रूप में बाबूलाल मरांडी डोमेसाईल नीति की घोषणा कर सके, न हेमंत सोरेन अपने मुख्य मंत्रित्व काल में.
इसके लिए जरूरी है वंचित जमातों की एकजुअता जिसमें आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक और तमाम अन्य वंचित एकजुट हों, लेकिन यह परिपक्वता आने में कुछ वक्त लगेगा. अभी तो आदिवासी युवा ‘जय आदिवासी’ कह कर ही काम चलाना चाहते हैं.

आदिवासी वोटर किसके साथ?

IMG_0185क्या झारखंड के आदिवासी भाजपा के साथ गोलबंद हो रहे हैं?
यह झारखंड की राजनीति का अहम सवाल बनता जा रहा है. लोकसभा चुनाव में भाजपा की अपार सफलता के बाद झारखंड में इस वर्ष के अंत तक विधान सभा चुनाव होने हैं. और मुख्य विपक्षी पार्टी झामुमो या संभावित महागठबंधन के पक्ष में यदि आदिवासी जनता गोलबंद नहीं रहती या होती तो भाजपा का भगवा झंडा फिर से झारखंड में लहरायेगा और उसे पहले से भी बड़ी सफलता हासिल होगी. इसलिए यह सवाल झारखंड का अहम सवाल बन गया है. उम्मीद यही से बनती है कि यदि आदिवासी जनता या वोटर अभी भी झामुमो के साथ हैं तो अल्पसंख्यको के साथ जुड़ कर वह भाजपा को टक्कर दे पायेगी.
एक जमाने में झारखंड में तीन सामाजिक शक्तियां राजनीति में अहम भूमिका निभाती थीं- आदिवासी, सदान और औद्योगिक मजदूर. और जतीय समीकरणों से ज्यादा काम करती थी बाहरी-भीतरी का द्वंद्व. अलग झारखंड राज्य के संघर्ष की बदौलत स्व.जयपाल सिंह साठ के दशक तक एकीकृत बिहार की राजनीति में प्रभावी रहे और प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका निभाते रहे. लेकिन कांग्रेस पार्टी में उनकी झारखंड पार्टी के विलय के बाद उनका प्रभाव नहीं रह गया और कांग्रेस तेजी से इस पूरे क्षेत्र में प्रभावी हो गई. लेकिन फिर उभरे झारखंड की राजनीति में तीन प्रमुख जन नायक – शिबू सोरेन, स्व. विनोद बिहारी महतो और कामरेड एके राय- आदिवासी, सदान और औद्योगिक मजदूरों के नेता बन कर. उनके नेतृत्व में धनकटनी आंदोलन, कोयलांचल में माफियागिरी के खिलाफ सघर्ष और अलग झारखंड राज्य के आंदोलन को गति मिली. लेकिन ‘लाल और हरे झंडे की मैत्री’ का यह दौर सत्तर के दशक के अंत तक आते आते टूट गया. बावजूद इसके जनसंघ या भाजपा इस क्षेत्र में प्रभावी नहीं हो सकी. क्योंकि बिहार की राजनीति में लालू यादव के अभ्युदय और झामुमो के साथ उसके करीबी रिश्तों की बदौलत आदिवासी, अल्पसंख्यक और पिछड़ा वोटरों की एकजुटता बनी और भाजपा के लिए झारखंड अभेद्य किला जैसा बना रहा, तो दूसरी तरफ कांग्रेस झारखंड में निष्प्रभावी होती चली गई.
लेकिन झारखंड अलग राज्य के आंदोलन के चरम क्षणों में लालू का यह बयान आया कि झारखंड उनकी लाश पर बनेगा और वह राजनीतिक किलाबंदी टूट गई और भाजपा एक बाढ़ की तरह झारखंड में प्रवेश कर गई. दो चार सीटें जीतने वाली भाजपा विधानसभा चुनावों में झामुमो को बराबरी से टक्कर देने लगी. लोकसभा की अधिकतर सीटें जीतने लगी. यह सफलता इतनी बड़ी थी कि बिहार में उस वक्त तक कुछ ज्यादा नहीं कर पाने वाली भाजपा ने सन् 2000 में अलग झारखंड राज्य का गठन कर दिया. अब न सही बिहार, उसके एक बड़े हिस्से पर भाजपा का कब्जा था.
बाद के इन लगभग इन दो दशकों में भाजपा एक मजबूत राष्ट्रीय पार्टी के रूप में स्थापित हो चकी है. इसकी एक बड़ी वजह झामुमो का भाजपा के साथ मिल कर कुछ वर्ष सरकार चलाना है. इसका खामियाजा पिछले विधानसभा चुनाव में झामुमो को चुकाना पड़ा जब भाजपा अपने दम पर बहुत के करीब पहुंच गई. पिछले लोकसभा चुनाव में उसे 14 में से 12 सीटों पर सफलता मिली है. मुख्यमंत्री रघुवर दास का दावा है कि ‘गुरुजी’ तो हार गये, विधान सभा चुनाव में अगली बार बेटा, बहु भी हारेंगे. भाजपा 65 सीटों पर जीतेगी.
क्या यह राजनीतिक वक्तव्य सच होने वाला है? इसका दारोमदार इस सवाल के जवाब पर निर्भर करता है कि आदिवासी जनता भी क्या भाजपा के पीछे गोलबंद हो रही है या वह अब भी झामुमो के साथ है? पिछले लोकसभा में भाजपा की विशाल सफलता के बावजूद यह सवाल संदिग्ध बना हुआ है. सरना आदिवासी और ईसाई आदिवासी विवाद, ‘सरना-सनातन एक है’ के नारों और अपसंस्कृति का शिकार होने के बावजूद आदिवासी राजनीति भाजपा को चुनौती देती दिखी पिछले लोकसभा चुनाव में.
इस तथ्य को 14 लोक सभा सीटों के चुनाव परिणामों में आसानी से देखा जा सकता है. एक सामान्य परिदृश्य यह है कि सामान्य सीटों पर भाजपा की जीत लाखों वोटों के विशाल अंतर से हुआ, जबकि आदिवासियों के लिए आरक्षित पांच सीटों पर उसे नाको चने चबाने परे और जीत का अंतर कुछ हजार मात्र हैं. एसटी सीट में पर सबसे अधिक वोटों के अंतर से हारने वाले शिबू सोरेन रहे जहां जीत का अंतर 47590 रहा, जबकि एसटी सीटों के बाहर जीत का अंतर दो लाख से चार लाख तक रहा. आईये हम कुछ सीटों पर जीत के इस फर्क को परिलक्षित करें.
सबसे प्रतिष्ठित सीट दुमका जहां से झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन हारे. प्राप्त जानकारी के अनुसार वहां बीजेपी के सुनील सोरेन को 484923 वोट प्राप्त हुए और शिबू सोरेन को 437333 वोट. यानी, जीत का अंतर रहा 47590 वोट. वहां निर्दलीय विधायक श्रीलाल किस्कू को 16562 वोट मिले जबकि सीपीआई के सेनापति मुरमू को 16157 वोट.
आदिवासियों के लिए आरक्षित खूंटी सीट में जीत का मार्जिन 1445 था. वहां भाजपा के अर्जुन मुंडा को 382638 वोट प्राप्त हुए, जबकि महागठबंधन प्रत्याशी कांग्रेस के कालीचरण मुंडा को 381193 वोट प्राप्त हुए. निर्दलीय मीनाक्षी मुंडा को 10989 वोट मिले. जेएचकेपी प्रत्याशी अजय टोपनों को 8838 वोट.
सिंहभूम सीट तो कांग्रेस जीत गई और एक अन्य सीट लोहरदगा में भाजपा के जीत का अंतर 10363 वोट रहा. इस सीट पर भाजपा के सुदर्शन भगत को 371595 वोट मिले, जबकि कांग्रेस या महागठबंधन के सुखदेव भगत को 361232 वोट. यहां जेएचकेपी के देवकुमार धान को 19546 वोट प्राप्त हुए. यहां आठ निर्दलीय विधायक भी खड़े थे.
एसटी सीटों के इन चार सीटों के जीत के मामूली अंतर की तुलना सामान्य सीटों से करें तो इस फर्क को देखा जा सकता है. अधिकतर सीटों पर विशाल वोटों के अंतर से भाजपा जीती. जमशेदपुर में भाजपा के विद्युतवरण महतो 679632 वोट मिले जबकि झामुमो को 377542 वोट. अन्य प्रत्याशियों को 1 फीसदी से भी कम वोट. गिरिडीह में एनडीए के घटक आजसू को 648277 वोट, जबकि झामुमो के जगन्नाथ महतो को 399930 वोट. गोड्डा में भाजपा के निशिकांत दूबे को 637610 वोट जबकि महागठबंधन के प्रदीप यादव को 453383 वोट. पलामू में भाजपा के विष्णु दयाल राम को 755659 वोट, जबकि राजद के जी राम को 278053 वोट. यही नजारा कमोबेस अन्य सामान्य सीटों पर भी रहा, चाहे वह हजारीबाग हो या रांची या कोडरमा. यानी, आदिवासीबहुल सीटों पर भाजपा मुश्किल से जीत पाई, जबकि सामान्य सीटों पर भाजपा बेहद आसानी से जीत गई जिसमें तमाम शहरी सीटें हैं.
गौर तलब यह भी है कि कि आदिवासी सीटों के बाहर एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधी टक्कर थी, जबकि एसटी सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशियों की बड़ी सख्या. इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि आदिवासी राजनीति अभी परिपक्व नहीं हुई, लेकिन वह भाजपा के साथ हो गई है, यह कहना फिलहाल गलत होगा.

चूहेदानी

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अजीब लगता है
खुद को चूहेदानी में बंद चूहे जैसा महसूस करना
अपनी आंखों से देखना चूहे में व्यक्तित्वांतर होते खुद को
अगले दोनों पैरों को छोटा होते
और पिछले दोनों पैरों को कुछ लंबा होते देखना.
छोटे पैरों को हाथ की तरह इस्तेमाल करते
रोटी के टुकड़े को कुतुरते देखना.
काश्! यह व्यक्तित्वांतर पूर्ण हो जाता
फिर तो न टकराती कानों से यह खरोंच ध्वनि
न पैदा होता यह जुजुप्सा भरा एहसास
जो हर पल आत्मा को बेचैन किये रहती है.

पता नहीं क्या होना है इस चूहे का
कहीं दूर चूहेदानी को ले जाकर दरवाजा खोल दिया जायेगा
या फिर बर्बरता से खुली सड़क पर पटक मार दिया जायेगा
लहू लुहान चूहा पड़ा रहेगा उस सड़क पर तब तक
कि कोई चील झपट्टा मार ले जाये,
या मुनिस्पलिटी की गाड़ी झाड़ू बुहार ले जाये. .

वैसे,
उस चूहेदानी के बाहर की दुनिया वैसी ही रंगीन
जैसे कैंसर बार्ड के बाहर होती है रंगीन दुनियां
छोटे चूहे, मोटे चूहे
बच्चे और जवान चूहे
नाचते चूहे, गाते चूहे
प्रेम करते, मनुहार करते
और सफलता के नितंबों के साथ इतराते चूहे.
या फिर किसी नायक-खलनायक के पीछे
कोरस गान करते,
झाल बजाते चूहे.
सब एक जैसे दिखते हैं
क्या हम मानव भी चूहों को एक जैसे दिखते होंगे?

गुहाअंधकार से उठती गहरी हताशा
याद आता है उस नेक दिल दोस्त की सलाह
साहित्यकर्मी, रंगकर्मी, शिल्पकार हैं हम
यही है हमारी दुनियां
कविता रचो, कहानियां गढ़ो, हो सके तो उपन्यास लिखो
हमे राजनीति नहीं करनी, न सड़कों पर धरना प्रदर्शन,
बहुत मन मचले तो कार्यशाला आयोजित कर लो,
मानवाधिकार पर बहस मुहाबसा
क्रांतिकारी फिल्में भी देख-दिखा सकते हैं
वातावरण निर्माण तो सतत काम है
यह सब करो
खुश रहो,
इनसे भी बदलाव आयेगा.
आत्मा पर पड़ा बोझ कम हो जायेगा.

बस व्यवस्था-सत्ता से पंगा मत लेना
फूंक-फूंक कर कदम रखना.
जमाना खराब
सच को सच और झूठ को झूठ कहना है ‘पाप’
लेकिन नसीहत याद नहीं रही,
खून को खून और पानी को पानी कह दिया
बलात्कार को राजनीति और राजनीति को!
जनता के साथ बलात्कार कह दिया.
और फंस गया चूहेदानी में.
काश! पूरी तरह बदल जाता चूहे में
फिर यह बेचैनी नहीे होती.

वैसे,
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका,
के खंभो पर टिका.
चूहों का भी एक लोकतंत्र है
एक चौथा खंभा भी
जिसे गोदी मीडिया कहा जाता है,
जिसने पिछली मुलाकात में कहा था-
‘प्रीज्यूडिस है आपका मामला, इसलिए कुछ लिख नहीं सकते.’

सत्ता के संतुलन के लिए है यह विभाजन
क्योंकि ‘‘सत्ता करती है भ्रष्ट
और पूर्ण सत्ता पूर्ण रूपेन भ्रष्ट’’
लेकिन सत्ता का यह पृथकीकरण
बदल गया है आपसी याराने में
किसी पहलू खां को मारने के लिए
सत्ता विरोधी हर स्वर का गला घोंटने के लिए.
स्वर्ग में भले प्रवेश हो दीन!
न्याय के चैखट में सिर्फ अमीर प्रवेश पाते हैं
‘दीन’ चौखट पर सर पटक मर जाते हैं.

और लोकतंत्र के इन पहरुओ ने दिखा दिया
जनतंत्र के खोल में घुसे भेड़िये
गोदी मीडिया से सांठ-गांठ कर
कैसे तानाशाही पर उतर आते है
हिटलर और मुसोलिनी बन जाते हैं.
कैसे जनता के पैसे का खा कर,
दंड पेल मुटिया कर सुरक्षा गारद
निरीह जनता पर ही बंदूक ताने
उनकी छाती को बूंटों तले रौंदे चला जाता हैं.
बंदूक के जोर पर कैसे किया जाता है विकास
मुल्क की भलाई के लिए मुल्क को कैसे
बड़े से चूहेदानी में बदल दिया जाता है.

उस दिन उमस भरी गली में
एक बार फिर मारा गया था कोई बिरसा
बार-बार जिंदा हो जाता है बिरसा
इसलिए बुद्ध और गांधी के देश की बंदूकों के
संगीनों से गोद दिया गया था उसका जिस्म
फिर घसीटते हुए ले जाया गया था कचड़ा गाड़ी तक
और आतंक के अंधेरे साये में
हर घर को रौंदा गया था,
उछाले गये अल्युमिनियम के बर्तन,
नोचा गया जिस्म
कुंदो से तोड़ा गया आंगन के चूल्हों को
मुकम्मल सजा दी गयी थी हुक्मउदूली की
घृणा से मुंह बिचका बोला-
तुम लोगों ने मुहावरे को सच समझा?
हमे जनता का सेवक समझा?
बिठाया अपने साथ जमीन पर?
आज बतायेंगे तेरी औकात.
ग्राम सभा, पत्थरगड़ी की औलाद
आज बतायेंगे तुझे तेरी जात. .
एक और बिरसा के टखने में धंसी गोली
धिसटता, रेंगता पहुंच गया गली के मुहाने पर
छुपा रहा झुरमुठों में भयाक्रांत पशु जैसा
अब हथेली पर लिये घूमता है
थ्री नाॅट थ्री की गोली की वह खोली
जो निकली थी उसके टखने से
न्याय पाने को.

लेकिन न्याय का चौखट मासूमो के खून से है सना
अभी-अभी वहां से बाहर आये हैं पहलू खां के हत्यारे
हथेलियों से मुंह पोंछते दूधमुहें बच्चों की तरह.
और उधर के दरवाजे से निकल रहा है एक गरीबजान
पूरी उम्र जेल में बिता निर्दोषिता का ले प्रमाण.
गलियारों के अलग अलग कमरों में
जिधर देखो उधर छोटे-छोटे जालो के बीच
उदासीन, लेकिन शातिर आंखों से इंतजार करती मकड़ियां
किसी फतिंगे का
कि आकर जाले में फंसे और उनका निवाला बने.
इन्हीं मकड़ियों से निकल कुछ मकड़ियां
न्याय के सिंहासन पर जा बैठी हैं.

न्याय का सूत्र वाक्य
निन्यानबे दोषी छूट जाये, लेकिन एक निर्दोष सजा न पाये
उलट गया है
अब निर्दोष ही सजा पाते हैं
दोषी छूट जाते है
जेल भरे हैं अंडरट्रायलों से
हत्यारे खुली सड़कों पर गश्त लगाते हैं.

कोर्ट सुस्त है, सुरक्षा गारद चुस्त
अभिव्यक्ति की आजादी कटघरे में है
मानवाधिकार लहुलूहान
इसलिए चौखट पर होते ही कोई दस्तक
या सामने की सड़क से गुजरती हर गाड़ी से चौंक जाता हूं

राहत नहीं देता है यह परम सत्य
दुनिया ऐसे ही चलती है
कुछ लोग नवाजे जाते हैं.
कुछ सूली पे चढ़ाये जाते हैं.

भागता दम छोड़
गली-गली, मोड़-मोड़
किसी दोस्त की तलाश में
लेकिन हर जगह नजर आता है
निर्देश देता, फुसफुसाता
सुरक्षा गारद के कानों में डोभाल
जी का जंजाल.
हर नुक्कर-चैराहे पर
सिंदूर पुती मूर्तिेयां
झंडा खबरदार
मजबूत कलाईयों पर लपेटे रंग बिरंगे सूत
गले में रुद्राक्ष या मोतियों का हार
गौरक्षक, धर्मरक्षक, देशरक्षकों की टोली

भागता दम छोड़
गली-गली, मोड़-मोड़
दिल में धुंआ, सर में चक्कर
गिर पड़ता हूं चकरा कर
कि शहर के बीचों बीच उभरता है एक जुलूस
सजल उर, स्नेहिल, सहचर मित्रों की टोली
तनी हुई मुट्ठियां, अंगारों से दहकते नारे
शामिल हो जाता हूं
बड़ी राहत पाता हूं.. ..

– विनोद कुमार

आदिवासी भाषाओं का संकट

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इस वर्ष के आदिवासी दिवस का मूल थीम था आदिवासी भाषाओं का संकट. इस पर गंभीर बहस-विमर्श नहीं हुआ. हमारे पास यह जानकारी तो है कि कितनी आदिवासी भाषायें हैं. उनमें से कितनी मिट गई. कितनी मिटने के कगार पर हैं. लेकिन हमारे पास उन्हें बचाने की कोई दृष्टि या कार्य योजना नहीं. मेरे दिमाग में जो बातें चलती रही हैं पिछले कुछ दिनों से, उन्हें यहां कलमबद्ध करने की कोशिश कर रहा हूं, यह भी अपने निजी अनुभवों के आधार पर.
मैं हिंदी भाषी हूं. मेरी पत्नी तेलुगु भाषी. लेकिन चूंकि हम घर में हिंदी में ही बातचीत करते हैं, इसलिए मेरे बच्चे तेलुगु नहीं सीख पाये. वे हिंदी बोलते हैं और अंग्रेजी. मेरी पत्नी की एक अन्य बहन का विवाह एक बंगला भाषी से हुआ. और चूंकि उनके यहां घर में बंगला बोली जाती है, इसलिए उस घर के बच्चों ने बंगला सीखा. इसके अलावा शिक्षा दीक्षा की भाषा अंग्रेजी होने की वजह से अंग्रेजी भी. जबकि मेंरी एक अन्य बहन का विवाह सजातीय तेलुगु भाषी से ही हुआ और उनके घर में तेलुगु में बातचीत होती है, इसलिए उस घर के बच्चे तेलुगु जानते हैं. इसका एक अर्थ यह हुआ कि हमारी मातृभाषा इस बात से तय नहीं होती अब कि बच्चे को जन्म देने वाली मां की भाषा क्या है. बच्चे वही भाषा सीखते हैं जो उनके घर में बातचीत के लिए इस्तेमाल होता है. और अंग्रेजी इसलिए वे सीख पाते हैं, क्योंकि उच्च शिक्षा की भाषा अंग्रेजी है.
इसलिए आदिवासी भाषाओं का भी भविष्य सबसे पहले तो इस बात से तय होगा कि उनके घरों में उनके माता पिता किस भाषा का इस्तेमाल करते हैं. फिर उनके स्कूल में पढ़ाई की भाषा क्या है. दुर्भाग्य से विस्थापन के शिकार आदिवासी घरों में अब अपनी मूल भाषा का इस्तेमाल नहीं होता. वे रोजी रोटी की तलाश में जहां जा कर बसते हैं, उस क्षेत्र की भाषा, इस्तेमाल करते हैं. अपने कार्य स्थल में इस्तेमाल होने वाली भाषा को अपना लेते हैं. धीरे-धीरे वे अपने घरों में भी उसी भाषा का इस्तेमाल करने लगते हैं. इसके अलावा चूंकि वे सामान्यतः निम्न आय वर्ग में आते हैं, इसलिए उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और उसी भाषा में शिक्षा ग्रहण करते हैं जो उस राज्य की भाषा होती है. इस तरह उनका रिश्ता अपनी मूल भाषा से टूटता चला जाता है.
जरूरी नहीं कि उनका विस्थापन ही हो. वे जहां रहते हैं, वहां का पूरा परिवेश भी बदल सकता है. जैसा कि झारखंड में विकसित हुए शहरों के आस पास हुआ. टाटा, रांची, बोकारो, हजारीबाग और एक हद तक दुमका का भी परिवेश पूरी तरह बदल चुका है. वहां कार्यस्थलों पर बहिरागत भाषायें बोली जाती है. बाजार की भाषा भी बहिरागत भाषा है. वहां के स्कूलों में शिक्षा के माध्यम स्थानीय भाषायें नहीं. जाहिर है कि वहां के बड़े और बच्चे दोनों अपनी भाषा से कटते चले जा रहे हैं.
आर्थिक रूप से थोड़े संपन्न आदिवासी समाज की समस्या कुछ और है. अपनी भाषा से प्रेम होने के बावजूद वे उस भाषा को अपनाते हैं जिसमें रोजगार के अवसर अधिक हैं. इस क्रम में पहले वे हिंदी या अन्य राज्यों की प्रचलित भाषा को अपनाते हैं और फिर अंग्रेजी को. और इस क्रम में अपनी भाषा से कटते चले जाते हैं. ऐसे बहुत कम घरों में अब अपनी मूल भाषा का इस्तेमाल होता है. जैसे हिंदी भाषी मध्यम वर्ग अंग्रेजी को अपनाता है और अपने बच्चों को अंग्रेजी में ही घर में भी बात करने के लिए बाध्य करता है, वैसे ही, आदिवासी मध्यम वर्ग अपने बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी सीखने-बोलने के लिए बाध्य करता है. यानी, जो कार्य स्थलों और रोजगार की भाषा होती है, बाजार की भाषा होती है, उसी को लोग अपनाते हैं और आदिवासी समाज भी अपना रहा है.
इस लिहाज से देखें तो उन इलाकों में आदिवासी भाषाएं अभी भी जीवित हैं जो आधुनिकता से दूर हैं और पिछड़े कहे जाते हैं. यानी, शहरों से दूर के ग्रामीण इलाके. जहां की कार्य संस्कृति अभी नहीं बदली है. जिनका जीवन पुराने तरीके की कृषि व्यवस्था और परंपरागत कुटिर उद्योगों से जुड़ा हैं. सिंहभूम के ग्रामीण इलाकों में या फिर कोल्हान के जंगलों के भीतर बसे गांवों में अभी भी अपनी मूल भाषा में बात करते लोग मिल जायेंगे, लेकिन शहरों के करीब के गांवों, कस्बों की आदिवासी बस्तियों में मूल भाषा में बात करते लोग नहीं मिलते.
इसका एक ठोस उदाहरण मैं रांची शहर के बीच बसे-बचे आदिवासी गांवों के हालात के आधार पर दे सकता हूं. मैं पिछले कुछ वर्षों से कांके डैम साईड में बसे एक उरांव गांव में बच्चों को पढ़ाने जाया करता हूं. वहां के बच्चे और उनके माता पिता अपनी उरांव/ कुड़ुख भाषा में बात नहीं करते. वे जानते ही नहीं. बड़ों में कुछ लोग मुंडारी थोड़ा बहुत समझते हैं, लेकिन अपनी भाषा नहीं. सभी हिंदी ही बोलते समझते हैं. मैंने प्रसिद्ध फिल्मकार और फोटोग्राफर बीजू टोप्पो की पत्नी कुर्दुला से आग्रह किया कि वह आ कर बच्चों को सप्ताह में एक दिन उनकी भाषा पढ़ाये. वह दो चार सप्ताह आई भी और बच्चों ने रुचि दिखाई अपनी भाषा सीखने में. लेकिन यह योजना नहीं चल पाई.
दरअसल, व्यक्तिगत प्रयासों से भाषा विलोपन की समस्या का समाधान निकालना मुश्किल है. इसके लिए तो राजसत्ता की मदद और इच्छाशक्ति जरूरी है. और वह राजसत्ता जो आदिवासी सभ्यता और संस्कृति को तबाह कर ही फलफूल रही है, वह इस काम में क्यों मदद करे? इसके लिए तो आदिवासी समाज को ही आगे आना पड़ेगा. विडंबना यह भी कि आदिवासी प्रबुद्ध वर्ग भाषा और संस्कृति की बात भले करे, वह सार्वजनिक रूप से अपनी भाषा में बात करते लजाता है. मेरी जानकारी में ऐसे बहुत कम साहित्यकार या आदिवासी बुद्धिजीवी रह गये हैं जो अपनी मूल भाषा में लिखते हैं. अधिकतर ने हिंदी या अंग्रेजी को अंगीकार कर लिया है. वैसे में आदिवासी भाषाओं का अस्तित्व खतरे में बना रहेगा. वैसे, अभी भी इस दिशा में सामूहिक प्रयास सफल हो सकता है. यदि रांची शहर के आस पास के आदिवासी गांवों में आदिवासी भाषाओं के आठ दस केंद्र भी खोल कर कम से कम दो तीन वर्षों तक सप्ताह में एक दिन भी पठन-पाठन का केंद्र चलाया जाये, तो इसके सार्थक परिणाम सामने आ सकते हैं. लेकिन भाषा की राजनीति एक बात है और भाषा के प्रचार प्रसार का काम दूसरी बात. आदिवासी भाषायें तो तभी बचेगी जब आदिवासी समाज आदिवासियत पर गर्व करें, अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करें.

कश्मीर में विकास के चरण का अर्थ

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कश्मीर के बारे में सबसे प्रसिद्ध उक्ति यह है कि धरती पर कही स्वर्ग है तो यही है.. . यही है.. .यही है. और 70 वर्षों के भीषण राजनीतिक उथल-पुथल, आतंकवाद और आतंकवाद को समाप्त करने के नाम पर होने वाले खून खराबे के बावजूद यदि कश्मीर अभी भी दुनिया का खूबसूरत पर्यटन स्थल है तो इसलिए कि अब तक वहां ‘विकास’ के ‘चरण’ नही ंपड़े हैं. वहां की खामोश पर्वतमालायें, देवदार के आकाश छूते वृक्ष, झीलें, वहां का पर्यावरण अब भी दिल- दिमाग को शकून देते हैं. वहां पहुंच कर कोई भी दीन-दुनिया के रंजोगम और जद्दोजहद को भूल कर प्रकृति के मनोरम दृश्यों में खो सा जाता है. और यह सब बचा इसलिए था कि अब तक वहां धारा 35 एक के वजूद की वजह से बाहर का कोई व्यक्ति जमीन नहीं खरीद सकता था.
धारा 370 के साथ 35 ए, यानी इस अवरोध को खत्म कर दिया गया है. वह भी विकास के नाम पर. और हमारी विकास दृष्टि क्या है?
वहां कल कारखाने लगेंगे. चैड़ी सड़के बनेंगी. निजी क्षेत्र के अस्पताल व स्कूल बनेंगे. माॅल बनेंगी. सभी बार्डेड कंपनियों की दुकाने खुलेंगी. और इसके लिए बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई होगी. पहाड़ों को छीला-काटा जायेगा. झीलों को भरा जायेगा. बिल्डरों, धन्ना सेठों, कारपोरेट घरानों के हवाले कर दिया जायेगा कश्मीर को. विकास के नाम पर यही होता रहा है. रांची और पूरे झारखंड में यही हो रहा है. छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड में यही हो रहा है. कोई शक हो तो राजमहल की पहाड़ियों का हश्र देख आईये. बरही से बहरागोड़ा और राचीं से टाटा जाने वाली छह लेन वाली सड़कों को देख आईये. आड़िसा और छत्तीसगढ़ के स्पंज आईरन कारखानों वाले इलाकों को देख आईये. विकास के तीर्थ स्थल और कभी बागीचों का शहर कहे जाने वाले बंगलोर शहर का हाल देख आईये. अपनी दिल्ली को देख लीजिये जो साल के दो-तीन महीने गैस चैंबर में बदल जाता है.
यह भी जगजाहिर है कि निजी अस्पताल हों या स्कल, आम जन की पहुंच से बाहर है. उसका लाभ तो मुट्ठी भर अमीरजादे ही उठा पाते हैं. गरीब की पहुंच वहां कहां? रहे कारखाने तो अब वे रोजगार पैदा नहीं करते, सिर्फ और सिर्फ अकूत मुनाफा और प्रदूषण फैलाता है. और स्थानीय आबादी को उसका लाभ मिले, यह तो कल्पनातीत है. क्योंकि उनका वही पुराना तर्क रहेगा कि वे स्किलड नहीं. अधिक से अधिक दिहाड़ी पर खटने वाली मजदूरी उन्हें मिलेगी.
जो सबसे बड़ी परिघटना होने वाली है, वह यह कि एक बार बहिरागतों के वहां बसने और जमीन खरीदने की छूट मिलते ही वहां बड़े पैमाने पर बहिरगत बसेंगे और वहां स्थानीय एवं बहिरागत आबादी की अनुपात बदलेगा. जम्मू कश्मीर में यदि मुस्लिम और हिंदू आबादी का अनुपात 60/40 है तो वह तेजी से बदलेगा. स्थानीय आबादी के लिए बहुमत पर आधारित लोकतंत्र बेमानी हो कर रह जायेगा.
इतने जुल्मों सितम के बावजूद भी कश्मीर यदि आज भी दिलकश बना हुआ है तो इसलिए कि अभी तक वहां तथाकथित विकास के चरण नहीं पड़े हैं.

खूंटी के दमन  की कहानी, जनता की जुबानी

गत एक वर्ष से झारखंड का खूंटी जिला पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है. यह मुंडा आदिवासियों का क्षेत्र है और ‘अबुआ दिसोम, अबुआ राज’ के लोकप्रिय नारे को गढ़ने और अपने समय के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी ताकत ब्रिटिश हुक्मरानों से लड़ने वाले वाले बिरसा मुंडा की कर्म भूमि. इस जिले के एक गांव ‘उलिहातु’ बिरसा मुंडा की जन्मस्थली है और उनके प्रति श्रद्धा सुमन चढ़ाने वालों का आना जाना बना रहता है.
लेकिन इस बीच खूंटी अपने पत्थरगड़ी आंदोलन की वजह से चर्चा में है. जल, जंगल, जमीन को बचाने का संघर्ष झारखंड में सतत रूप से चलता रहा है और पत्थरगड़ी आंदोलन इसी संघर्ष का एक रूप है. लेकिन खनिज संपदा से भरपूर झारखंड की जमीन को औने-पौने दामों में कारपोरेट को बेचने/देने में लगी भाजपा सरकार को यह चुनौती बर्दाश्त नहीं हुई और आदिवासी जनता के मनोबल को तोड़ने के लिए मीडिया के साथ मिल कर उसने इस आंदोलन के खिलाफ एक सुनियोजित अभियान चलाया. इसी वर्ष कथित रूप से इस जिले के घाघरा गांव में बलात्कार की एक घटना हुई और बलात्कारियों को पकड़ने के नाम पर हजाारों की संख्या में वहां पुलिस और अर्धसैनिक बलों को उतार दिया गया. पत्थरगड़ी आंदोलन से जुड़े लोगों की बर्बर पिटाई हुई. प्रतिक्रिया स्वरूप ग्रामीण जवानों के भ्रम में सांसद कड़िया मुंडा के सुरक्षा गार्डो को अपने साथ पकड़ ले गये. अब यह गांव और आंदोलनकारी न सिर्फ बलात्कारी बना दिये गये, बल्कि सुरक्षा गार्डो का अपहरण करने वाले खूंखार आतंकवादी भी. और उनसे निबटने के नाम पर पूरे इलाके को पुलिस छावनी में बदल दिया गया है.
अब तक इस प्रकरण में आप सबों ने पुलिस-प्रशासन के हवाले छपी खबरों को ही देखा सुना है. इस क्षेत्र की जनता का पक्ष और उनकी व्यथा किसी ने सुनने की जरूरत ही नहीं समझी. एक चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार अपने निहित स्वार्थों के लिए, कारपोरेट का हित साधने के लिए आदिवासी जनता के साथ किस बर्बर तरीके से व्यवहार कर सकती है, इसका एक उदाहरण बन गया है खूंटी.
खैर, इसी बीच इस आतंक से निकल कर ग्रामीणों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को एक आवेदन भेजा है जिसके लिए करीबन सात हजार ग्रामीणों से हस्ताक्षर या अंगूठे का ठेपा लिया गया. इस आवेदन से आप निरीह जनता के साथ हुई पुलिस बर्बरता और उस पुलिसिया खौफ का अंदाजा लगा सकते हैं. उस पत्र को हम आपके समक्ष हूबहू प्रस्तुत कर रहे हैं. सिर्फ भाषाई दृष्टि से यहां वहां कुछ सुधार किये गये है.

” सेवा में,
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,
मानवाधिकार ब्लाॅक, सी॰जी॰पी॰ओ॰, कम्पलेकस, आई॰एन॰ए॰, नई दिल्ली -ं110023
विषय-ंआदिवासियों के सामाजिक समारोह में हुए पुलिस जुल्म के सम्बन्ध में.
महाशय,
सविनय निवेदन यह है कि दिनांक 26-ं27 जून 2018 को खूंटी प्रखण्ड के घघरा गाॅव में पत्थलगङी का आयोजन किया गया था. इसमें खूंटी जिला के खूंटी, मुरहू, अङकी, तोरपा एवं कर्रा प्रखण्ड के कई गावों से ग्रामीण उपस्थित थे. इसमें शांतिपूर्वक घघरा गांव के सीमान पर पत्थलगङी किया गया जिसमें भारत के संविधान की 5वीं अनुसूचि में प्रदत प्रावधानों को लिखा गया. इस प्रकार का पत्थलगङी 2001-ं2002 ई॰ में भी भारत सरकार के सचिव डा॰बी॰डी॰ शर्मा के नेतृत्व में खूंटी जिला के तोरपा, कर्रा, मुरहू प्रखण्ड के कई गांवों में किया गया था.
पत्थलगङी की खुशियाली व सांस्कृतिक कार्यक्रम के बीच भारत के संविधान की 5वीं अनुसूचि में प्रदत्त शक्तियों के बारे में ग्रामीणें को वक्तागण जानकारी दे ही रहे थे कि खूंटी पुलिस आई और हमारे कार्यक्रम को रोक दिया. हमसे कहा गया कि हम कोचांग कांड़ से जुड़े जोन जुनास तिड़ू और बलराम समद को उनके हवाले कर दें. हमने पुलिस को उत्तर दिया कि यहां इस नाम का कोई व्यक्ति नहीं है. पुलिस उन्हें कोचांग क्षेत्र में जाकर खोजे, हमें परेशान न करे. यह सुनकर पुलिस वापस लौट गई. थोड़ी देर मेें सभा स्थल में सूचना मिला कि सभा स्थल में आ रहे लोगों को पुलिस रोक रही है तथा उनसे मारपीट कर रही है. वास्ताविक का पता लगाने के लिए 20-ं25 लोगों को पत्थलगड़ी स्थान से अनिगड़ा (चन्डीडीह) जो, 2 किमी की दूरी पर अवस्थित है, भेजा गया. तब तक 5 बस से पुलिस अनिगड़ा, चन्डीडीह गांव पहॅुच चुकी थी. उन लोगों ने पत्थलगड़ी स्थल से चन्डीडीह भेजे गए 20-ं25 लोगों से मारपीट की और उनमें से अधिकतर को घायलावस्था में ही पकड़ कर अपने साथ ले गई. यह खबर सभा स्थल में दिया गया तो सभी लोग घटनास्थल पर गए. तब तक पुलिस वहां से बस में सवार हो कर चली गई थी। एक जवान बस में नहीं चढ़ सका. वह खूंटी के संसद कड़िया मुण्डा के घर में घुस गया.
चूंकि पुलिस गांव के निर्दोष लोगों के सथ बेबजह बर्बरता पूर्वक पेश आई थी एवं गाली गलौच किया था, इससे ग्रामीण नारज एवं उत्तेजित थे और वे सांसद ़के घर में छिपे पुलिसकर्मियों को शांतिपूर्वक सभा स्थल पर ले गए. हमारा मकसद केवल इतना था कि प्रशासन हमसे बातचीत करने के लिए सभा स्थल पर आए, ताकि थाना में पकड़ कर रखे गए लोगों को मुक्त कराने का प्रस्ताव हम रख सकें.
परन्तु हमारी सोच के विपरित 4000 से भी अधिक संख्या में पुलिस घघरा गांव आई, ग्रामीण जनता के साथ गाली-गलौच करते हुए अंधा-ंधुंध लाठी बरसाने लगी एवं गोली चलाने लगी. इस गोली से एक व्यक्ति मारा गया जिसका नाम बिरसा मुण्डा था. वह चमड़ी प्रखण्ड के एक गांव का रहने वाला था. पहले तो पुलिस ने उसे दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, फिर सर में मारा और जब वह गिर गया तब उस पर 3 गोली मारी. गोली मारने के बाद रायफल में लगी संगीन से अनगिनत बार गोद दिया गया. इसके बाद उसके पैर को पकड़ कर अधमरी अवस्था में करीब 100 मीटर तक घसीट कर ले जाया गया. कुछ देर में वहीं मर गया. तब पुलिस वाहन में उसे
चादर में बांध कर कर खूंटी ले गए. उसका पोस्ट-ंमार्टम तक शायद नहीं किया गया. हमारे गांव के लोगों को बाद में वहां से राइफल के तीन खोखे मिले, जिसका नम्बर एक समान है. इसका अर्थ हुआ कि वह किसी एक ही राइफल की गोली का खोखा है, जिसका नम्बर इस प्रकार है- डी एफ भी-ं 16 एम एम-ं5.56.
दूसरे गांव के बिरसा मुण्डा, उम्र 30 वर्ष, गांव चिरूबेडा, प्रखण्ड तमाड़, जिला रांची, पर पुलिस ने गोलियां चलायी जिससे एक गोली दाहिनें हाथ में लगी है. दूसरी गोली दाहिने जांघ में लगी, जिससे पैर का नश टूट गया है. वह बहुत मुश्किल से चल पाता है. गोली लगने के बाद वह किसी तरह हिम्मत जुटा कर चकोड़ -हजयाडी की ओर भागा और -हजयाडी में ही बेहोश होकर गिर गया था. कुछ समय बाद होश में आया. किसी तरह हिम्मत जुटा करीब से जा रही दो लड़कियों को आवाज दी. उन्होंने उसे सहयोग कर खूंटी तमाड सड़क के किनारे रानी किन बुरू नमाक स्थान तक पहंुचाया. वहां से वह अपने मेहमानों के घर गया. दूसरा दिन अपने गांव पहुंच कर गोली निकलवाया. बाद में देशी जड़ी-बूटी से इलाज किया. आज तक घाव का निशाना तथा जांघ में लगी गोली उनके पास है.
सभा स्थल को पुलिस ने चारों ओर से घेर लिया था. चारों ओर से अन्धा धुंध आदिवासियों को बेरहमी से पीटा गया. गर्भवती महिलाओं व बीमार व्यक्तियों को भी नहीं छोडा गया. कई लोगों का दरवाजा तोड़ा गया एवं छतों को उजाड. दिया गया. खाद्य पदार्थ को छितरा कर नष्ट कर दिया गया. सभा स्थल में पकाए गए भोजन को तहस नहस कर दिया. सभा स्थल में मेहमानों के लिए भोजन पकाने के लिए भाड़ा से लाये गये टेन्ट, कुर्सी, टेबल, साउण्ड सिस्टम को नष्ट कर दिया. अनिगिनत मोटर साईकिल, ओटों रिक्सा, चार पहिया वाहनों को क्षति गस्त किया जिससे लाखों का नुकसान आदिवासियों को हुआ.
घटना के बाद बेगुनाह लोगों पर देशद्रोह का केस दायर किया गया है. कई लोगो को जेल भी भेज दिया गया. सरकार अरोप लगाती है कि आदिवासी पत्थलगड़ी कर संविधान की गलत व्याख्या कर रहे हैं. पत्थलगड़ी आंदोलन को कमजोर करने के लिए कोचांग में हुए गैगरेप घटना से जोड कर हमारे कई लोगों के उपर -झूठा मुकदमा चला रही है और कई बेकसूर गरीब ग्रामीण आदिवासी को जेल भेज दिया गया है.
पुलिस प्रशासन ने गरीब आदिवासियों के घरों को तोड़ दिया है. पत्थलगड़ी नहीं करने की धमकी देकर जबदस्ती बाउंड लिखवा रही है पुलिस. आदिवासियों को गांव-ंगांव से थाना ले जा रही है और आगे पत्थलगड़ी नहीे करने का वाउण्ड लिखवा रही है.जून 26, 27 की घटना के बाद भी लगातार पुलिस फोर्स गांव में लोगों के उपर भय एवं आतंक फैलाने के लिए आती रहती है. सरकार पत्थलगड़ी को कमजोर करने के लिए सड़क के किनारे-ंकिनारें बडे -ं बडे पोस्टर लगा रही है और पत्थरगड़ी को अपराध बता रही है लेकिन निवेदक के रूप में अपना नाम नहीं दे रही है.
इन सभी घटना का सबूत फोटों एवं विडियों के रूप में मौजूद है.
आठवें दिन विपक्ष के नेतागण ग्रामीणों से मिलने के लिए घाघरा गांव आए, परन्तु सुबह में ही पुलिस और भाजपा के लोगो ने गांव में रह रह गई कुछ महिलाओं को भी डरा धमका कर गांव छोडने के लिए मजबुर कर दिया, ताकि सच्चाई का पता विपक्षी नेताओं को न लग सके.
अतः आप से पूरे बारूडीह गांव के सभी लोगों नम्र निवेदन करते है कि एक जांच की टीम बना कर स्वतंत्र रूप से जांच कर हमें न्याय दिलाने तथा दोषी लोगों पर कानूनी करवाई करने की कृपा की जाय.”khuti applicationयह पूरा प्रकरण मेरी नई किताब ‘झारखंड के आदिवासियों का संक्षिप्त इतिहास’ में शामिल है.